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114 राफेल जेट डील पर बड़ा फैसला! मैक्रों का भारत दौरा भारतीय वायुसेना के लिए बन सकता है गेमचेंजर

इस प्रस्ताव के तहत भारतीय वायुसेना को कुल 114 मल्टी-रोल राफेल फाइटर जेट्स मिलेंगे। इनमें 88 सिंगल-सीटर विमान होंगे, जो सीधे कॉम्बैट मिशन में इस्तेमाल किए जाएंगे, जबकि 26 ट्विन-सीटर जेट्स होंगे...

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📍नई दिल्ली | 6 Feb, 2026, 12:11 AM

114 Rafale Jet Deal: फरवरी का तीसरा हफ्ता भारत की डिफेंस पॉलिसी के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। वजह है फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों 18 से 20 फरवरी के बीच भारत आ सकते हैं। इस दौरे का मुख्य कार्यक्रम भले ही एआई इम्पैक्ट समिट हो, लेकिन इसके ठीक पहले और दौरान भारत और फ्रांस के बीच एक बहुत बड़ी डिफेंस डील को अमली जामा पहनाया जा सकता है। यह डील भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल फाइटर जेट्स की है, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। (114 Rafale Jet Deal)

114 Rafale Jet Deal: क्या है 114 राफेल जेट्स की यह डील?

इस प्रस्ताव के तहत भारतीय वायुसेना को कुल 114 मल्टी-रोल राफेल फाइटर जेट्स मिलेंगे। इनमें 88 सिंगल-सीटर विमान होंगे, जो सीधे कॉम्बैट मिशन में इस्तेमाल किए जाएंगे, जबकि 26 ट्विन-सीटर जेट्स होंगे, जिनका इस्तेमाल ट्रेनिंग के साथ-साथ कुछ ऑपरेशनल रोल में भी किया जा सकेगा।

खास बात यह है कि इस बार राफेल की खरीद सिर्फ “बाय एंड फ्लाई” तक सीमित नहीं रहेगी। सरकार की योजना है कि इनमें से 80 फीसदी से ज्यादा विमान भारत में ही बनाए जाएं। यानी करीब 96 राफेल जेट्स देश में असेंबल और मैन्युफैक्चर किए जाएंगे। शुरुआत में कुछ विमान फ्रांस से सीधे आएंगे, ताकि वायुसेना को जल्दी ताकत मिल सके, लेकिन उसके बाद पूरा फोकस मेक इन इंडिया पर रहेगा। (114 Rafale Jet Deal)

भारत में कैसे बनेंगे राफेल?

इस डील में फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर काम करेगी। नागपुर में पहले से मौजूद दसॉ-रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड की फैसिलिटी को इस प्रोजेक्ट में अहम भूमिका मिलने की संभावना है। इसके अलावा एचएएल और अन्य प्राइवेट कंपनियां भी सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग में शामिल हो सकती हैं।

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योजना यह है कि राफेल के अलग-अलग पार्ट्स, सब-सिस्टम और मेंटेनेंस से जुड़ा काम भारत में हो। धीरे-धीरे लोकल कंटेंट 30 फीसदी से बढ़कर 60 फीसदी तक ले जाने की तैयारी है। इससे न सिर्फ लागत कम होगी, बल्कि भारत में हाई-स्किल जॉब्स और टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर भी होगा। (114 Rafale Jet Deal)

अभी किस स्टेज पर है डील?

फरवरी 2026 तक की जानकारी के मुताबिक, इस प्रस्ताव को जनवरी में डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड की शुरुआती मंजूरी मिल चुकी है। अब अगला कदम रक्षा मंत्रालय की हाई-लेवल मीटिंग है, जिसमें इस पर विस्तार से चर्चा होगी। इसके बाद इसे डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल और फिर कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी के सामने रखा जाएगा।

अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता है, तो फ्रांसीसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान या उसके आसपास इस डील का औपचारिक ऐलान या समझौता हो सकता है। डिलीवरी की बात करें तो पहले राफेल जेट्स 2030 के आसपास मिलने शुरू हो सकते हैं। (114 Rafale Jet Deal)

भारतीय वायुसेना के लिए यह डील क्यों जरूरी है?

आज भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती फाइटर स्क्वाड्रन की कमी है। वायुसेना के पास इस समय करीब 29 से 30 स्क्वाड्रन ही बचे हैं, जबकि अप्रूव्ड संख्या 42 स्क्वाड्रन की है। पुराने मिग-21, जगुआर और कुछ अन्य विमान रिटायर हो रहे हैं, लेकिन उनकी जगह नए जेट्स उतनी तेजी से नहीं आ पा रहे।

तेजस मार्क-1ए प्रोजेक्ट में देरी, इंजन सप्लाई की समस्याएं और प्रोडक्शन धीमे होने से स्थिति और मुश्किल हो गई है। ऐसे में राफेल जैसे साबित हो चुके फाइटर जेट्स वायुसेना को तुरंत और लंबे समय तक ताकत दे सकते हैं। (114 Rafale Jet Deal)

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हर मोर्चे पर भरोसेमंद फाइटर्स की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों में भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हैं। पाकिस्तान और चीन के बीच सैन्य तालमेल, बांग्लादेश के साथ पाकिस्तान की नजदीकियां और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की आक्रामक गतिविधियां भारत के लिए चुनौती हैं। ऐसे माहौल में वायुसेना को ऐसे फाइटर चाहिए, जो हर मोर्चे पर भरोसेमंद हों।

राफेल पहले ही भारतीय वायुसेना में अपनी क्षमता साबित कर चुका है। लंबी रेंज, एडवांस सेंसर, आधुनिक हथियार और मल्टी-रोल क्षमता इसे आज के समय का एक मजबूत फाइटर बनाती है। (114 Rafale Jet Deal)

भारत और फ्रांस के रक्षा रिश्ते पहले से मजबूत रहे हैं। 2016 में 36 राफेल जेट्स की डील हुई थी और हाल ही में नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन विमानों को भी मंजूरी मिली है। 114 राफेल की यह नई डील से यह साझेदारी औऱ मजबूत होगी। (114 Rafale Jet Deal)

यह सौदा दुनिया में राफेल का अब तक का सबसे बड़ा सिंगल ऑर्डर माना जा रहा है। इससे फ्रांस के साथ भारत का रणनीतिक भरोसा मजबूत होगा और भारत को हाई-एंड एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनने का मौका मिलेगा।

हालांकि इस डील की लागत बहुत ज्यादा है, जिस पर सरकार को संतुलन बनाना होगा। इसके अलावा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, लोकल मैन्युफैक्चरिंग और समय पर डिलीवरी जैसे मुद्दों पर भी कड़ी बातचीत चल रही है। लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा सुरक्षा हालात में यह निवेश जरूरी है। (114 Rafale Jet Deal)

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