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Tejas Mk1A Order: वायुसेना क्यों कर रही तेजस MK1A के नए ऑर्डर से तौबा? LCA मार्क2 को ‘वर्कहॉर्स’ बनाने की तैयारी!

Tejas Mk1A Order: Indian Air Force not willing New Procurement Amid Delivery Delays and Production Challenges

Tejas Mk1A Order: भारतीय वायुसेना ने स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट एलसीए तेजस एमके1ए को लेकर बड़ा फैसला लिया है। भारतीय वायुसेना ने अब घरेलू लड़ाकू विमान तेजस एमके1ए के नए ऑर्डर जारी नहीं करने का फैसला किया है। अभी तक दो चरणों में 180 तेजस एमके1ए फाइटर एयरक्राफ्ट के ऑर्डर Tejas Mk1A Order दिए जा चुके हैं। लेकिन इनमें से अभी तक एक भी फाइटर जेट की डिलीवरी नहीं हुई है। वहीं, अक्टूबर में पहले दो तेजस एमके1ए की डिलीवरी की जानी है।

Tejas Mk1A Engine Delivery: एचएएल को जीई से मिला चौथा एफ404 इंजन, वायुसेना को जल्द होगी दो तेजस जेट्स की डिलीवरी

देरी से रणनीतिक योजनाओं पर पड़ा असर

वायुसेना सूत्रों ने बताया कि तेजस एमके1ए (Tejas Mk1A Order) के उत्पादन में देरी और इंजन सप्लाई की दिक्कतों के चलते यह फैसला लिया गया है। वायुसेना के उच्च अधिकारियों का कहना है कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा समय पर डिलीवरी न होने से वायुसेना की रणनीतिक योजनाओं पर असर पड़ा है। उन्होंने बताया कि 2021 में दिए गए 83 तेजस एमके1ए विमानों के ऑर्डर की डिलीवरी अभी पूरी नहीं हुई, जबकि नए 97 विमानों का ऑर्डर जारी हो चुका है।

मार्क1ए के नए ऑर्डर देने की कोई गुंजाइश नहीं

सूत्रों ने कहा कि फरवरी 2021 में हुए 48,000 करोड़ रुपये के पहले सौदे के तहत 83 विमानों (73 सिंगल-सीटर और 10 ट्रेनर) की डिलीवरी मूल रूप से मार्च 2024 से शुरू होनी थी, लेकिन देरी से यह मार्च 2025 तक खिसक गई। वहीं इनमें से दो विमान की डिलीवरी अक्टूबर 2025 में प्रस्तावित है, और वित्त वर्ष 2025 के अंत तक 12 विमान वायुसेना को मिलने की उम्मीद है।

सूत्रों ने कहा कि डिलीवरी में देरी इतनी हो चुकी है कि फिलहाल तेजस मार्क1ए (Tejas Mk1A Order) के नए ऑर्डर देने की कोई गुंजाइश ही नहीं हैं। उन्होंने बताया कि अब वायुसेना का पूरा फोकस तेजस मार्क2 पर है। जिसके प्रोटोटाइप की पहली उड़ान 2026 के आखिर तक या 2027 की शुरुआत में होने की उम्मीद है। उम्मीद जताई जा रही है कि इसका प्रोडक्शन 2028 से शुरू हो जाएगा, जो 2035 तक चलेगा।

एयर चीफ ने भी की मार्क2 की वकालत

हाल ही में 93वें एयर फोर्स डे पर भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि तेजस भविष्य की हल्के लड़ाकू विमानों की जरूरतों के लिए हमारी रीढ़ है। उन्होंने कहा कि एलसीए मार्क2 मेरी नजर में मार्क1ए का ही एक एक्सटेंशन है। यह एक बड़ा प्लेटफॉर्म होगा, जो अधिक हथियार ले जा सकेगा, लंबी दूरी और ज्यादा समय तक ऑपरेट कर सकेगा और बड़े हथियार ले जाने में सक्षम होगा। इसलिए यह वायुसेना की योजनाओं में बड़ी अहमियत रखता है।

उन्होंने कहा कि अगर एमके2 प्रोग्राम समय पर होता, तो संभव है कि एलसीए मार्क1ए (Tejas Mk1A Order) की कुछ अगली खेप मार्क2 के रूप में ऑर्डर की जाती। उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में इस पर विचार हो सकता है। तेजस मार्क1ए की टाइमलाइन पर उन्होंने कहा कि यह विमान वायुसेना की दी गई क्वॉलिफिकेशन रिक्वायरमेंट्स के अनुसार डेवलप किया जा रहा है, और जैसे ही एचएएल इसे सर्टीफाइड करेगा, वायुसेना इसे शामिल करने के लिए तैयार है। उन्होंने बताया कि उत्पादन शुरू हो चुका है, कुछ वादे किए गए हैं, कुछ रिसर्च और डेवलपमेंट का काम बाकी है। जैसे ही यह पूरा होगा, हम विमान लेने के लिए तैयार हैं।

प्रोडक्शन स्पीड है असली चुनौती

हालांकि, एयर चीफ ने साफ कहा कि असली चुनौती प्लेटफॉर्म की नहीं बल्कि प्रोडक्शन स्पीड की है। उन्होंने कहा, “वायुसेना को हर साल कम से कम दो स्क्वाड्रन यानी 30 से 40 फाइटर विमान चाहिए ताकि पुरानी हो चुकी फ्लीट को समय रहते बदला जा सके।” वर्तमान में वायुसेना के पास करीब 30 फाइटर स्क्वाड्रन हैं, जो उसकी स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन की ताकत से काफी कम है। पुराने मिग-21, मिग-27 और जैगुआर विमानों के तेजी से रिटायर होने के कारण यह अंतर और बढ़ता जा रहा है।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम पर भी भरोसा जताया। उन्होंने कहा, “AMCA की पहली उड़ान 2028 के आसपास और इंडक्शन 2035 तक का लक्ष्य है। अगर फोकस बनाए रखा जाए तो यह समयसीमा पूरी हो सकती है या उससे भी बेहतर प्रदर्शन हो सकता है। हमें अब स्पष्ट रूप से पता है कि हमें कौन-सी तकनीक चाहिए और वह कहां उपलब्ध है।”

एमके2 पर शिफ्ट कर दें 97 विमानों का ऑर्डर – Tejas Mk1A Order

वहीं सूत्रों का कहना है कि एमके1ए के 97 विमानों के दूसरे ऑर्डर को एमके2 पर शिफ्ट कर देना चाहिए। अगर हम जल्दी ऑर्डर देते हैं, तो दोनों का प्रोडक्शन साथ शुरू हो सकता है, जिससे समय और क्षमता दोनों में बड़ा अंतर आएगा।”

एमके2 में अधिक पेलोड, लंबी रेंज और एडवांस्ड एवियोनिक्स होंगे, जिससे यह अगले दशक में भारत की सामरिक बढ़त बनाए रखने के लिए उपयुक्त प्लेटफॉर्म साबित होगा। भारतीय वायुसेना और सरकार अब तेजस एमके1, एमके1ए और एमके2 के तीनों वेरिएंट्स में कुल 350 से अधिक स्वदेशी एलसीए को शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

83 विमानों का पहला ऑर्डर दिया था 2021 में – Tejas Mk1A Order

फरवरी 2021 में कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने 83 तेजस एमके1ए विमानों के ऑर्डर को मंजूरी दी थी, जिसमें 73 सिंगल-सीटर और 10 ट्रेनर शामिल थे। इस सौदे की कुल लागत 48,898 करोड़ रुपये थी और प्रति विमान की कीमत लगभग 579 करोड़ रुपये के आसपास थी, जिसमें हथियार, रखरखाव और ट्रेनिंग का खर्च शामिल था। इसके लिए अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक के साथ अगस्त 2021 में 5,375 करोड़ रुपये की सौदे के तहत 99 जीई-एफ404 टर्बोफैन इंजन देने का करार किया गया था।

सितंबर 25 में दूसरा ऑर्डर

वहीं, इस साल 25 सितंबर को रक्षा मंत्रालय ने 97 तेजस मार्क1ए की खरीद का ऑर्डर जारी किया, जिसकी कुल लागत 62,370 करोड़ रुपये थी। इन विमानों में 68 लड़ाकू और 29 ट्विन-सीटर ट्रेनर शामिल हैं। वहीं, इस डील के मुताबिक इन विमानों की डिलीवरी 2027-28 से शुरू होगी और अगले छह सालों में 2034 तक पूरी की जानी है। जल्द ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और जीई के बीच 113 अतिरिक्त इंजनों की खरीद का नया सौदा लगभग 1 बिलियन डॉलर का होने वाला है।

एचएएल ने बढ़ाई क्षमता

Chlenge Tejas Mk1A Order तेजस एमके1ए की डिलीवरी फरवरी 2024 से शुरू होनी थी, लेकिन जनरल इलेक्ट्रिक के एफ-404 इंजनों की सप्लाई चेन समस्या के चलते डिलीवरी की तारीख आगे खिसकती रही जो इस साल मार्च 2025 तक पहुंच गई। इस साल अक्तूबर तक चार एफ404 इंजन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के पास पहुंच चुके हैं। और साल के अंत तक सात और आने की उम्मीद है।

एचएएल के मुताबिक अक्टूबर में नासिक स्थित प्रोडक्शन लाइन से फ्लाइट टेस्ट शेड्यूल किए गए हैं। नासिक फैसिलिटी को अप्रैल 2023 में 150 करोड़ रुपये से अधिक की लागत के साथ शुरू किया गया था। यह एचएएल की तीसरी प्रोडक्शन लाइन है। यहां हर साल आठ विमान तैयार करने की क्षमता है। बेंगलुरु की दो मौजूदा लाइनों के साथ मिलकर एचएएल का टारगेट है कि वर्ष 2027 से हर साल 24 तेजस एमके1ए विमानों की डिलीवरी की जाए। एचएएल का कहना है कि मार्च 2026 तक उसे 12 इंजन मिल जाएंगे। इसके बाद अगले वित्त वर्ष में सप्लाई सुचारू हो जाएगी। 2026–27 तक एचएएल का लक्ष्य हर साल 30 तेजस एमके1ए विमान तैयार करना है। इसमें निजी और सरकारी साझेदार कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा।

2031-32 तक 180 एमके1ए की डिलीवरी

सूत्रों का कहना है कि एचएएल की मौजूदा रफ्तार का आकलन करें तो अकेले 83 विमानों का सौदा 2028-29 तक पूरा हो सकेगा। वहीं, दूसरे सौदे की डिलीवरी 2028 से शुरू होगी, और 2031 तक पूरी होने की उम्मीद है। कुल मिलाकर, 2031-32 तक 180 एमके1ए वायुसेना में शामिल हो जाएंगे, जिससे कुल एलसीए तेजस फ्लीट 220 तक पहुंचेगी।

तेजस मार्क1 के दो एक्टिव स्क्वाड्रन

Tejas Mk1A Order वहीं, तेजस मार्क 1 की बात करें तो 2009-2010 में वायुसेना ने 40 तेजस एमके1 विमानों का पहला ऑर्डर दिया था, जिसकी लागत 8,802 करोड़ रुपये थी। प्रति विमान लगभग 220 करोड़ रुपये पड़े। इनमें से 32 सिंगल-सीट इनिशियल ऑपरेशनल क्लियरेंस कॉन्फिगरेशन में थे, जो 2016 में इंडक्ट हुए। दूसरा ऑर्डर 2016 में 20 फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस विमानों का था, जिसकी कीमत 6,500 करोड़ रुपये थी। ये तेजस मार्क 1 वायुसेना की दो स्क्वाड्रन नंबर 45 ‘फ्लाइंग डैगर्स’ और नंबर 18 ‘फ्लाइंग बुलेट्स’ में तैनात हैं, जो तमिलनाडु के सुलुर एयर फोर्स स्टेशन में है।

INS Androth in Indian Navy: भारतीय नौसेना में शामिल हुआ दूसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट, 14 और जहाज कमीशनिंग के लिए कतार में

INS Androth in Indian Navy

INS Androth in Indian Navy: भारतीय नौसेना ने आज विशाखापत्तनम के नेवल डॉकयार्ड में आईएनएस अंद्रोथ को औपचारिक रूप से अपने बेड़े में शामिल कर लिया। अंद्रोथ भारतीय नौसेना का दूसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट है, जो INS Androth का हिस्सा है। ईस्टर्न नेवल कमांड के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल राजेश पेंढरकर ने आईएनएस अंद्रोथ को नौसेना में कमीशन किया।

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INS Androth in Indian Navy आईएनएस अंद्रोथ को आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत स्वदेश में ही बनाया गया है। इस जहाज में 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री और तकनीक इस्तेमाल की गई है। वहीं, इस जहाज को कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स ने बनाया है, जिसने इससे पहले आईएनएस अर्नाला को भी बनाया है।

आईएनएस अंद्रोथ की ऑपरेशनल क्षमता

आईएनएस अंद्रोथ की लंबाई 77.6 मीटर और चौड़ाई 10.5 मीटर है। इसका ड्राफ्ट 2.7 मीटर है और डिस्प्लेसमेंट लगभग 1,490 टन (ग्रॉस टनेज) है। यह जहाज तीन डीजल इंजन से चलने वाले वॉटरजेट प्रोपल्जन सिस्टम से लैस है, जिससे यह 25 नॉट्स की अधिकतम रफ्तार प्राप्त कर सकता है। 14 नॉट्स की रफ्तार पर इसकी रेंज 1,800 नॉटिकल मील तक है, जिससे यह लंबे समय तक तटीय और उथले जलक्षेत्रों में लगातार ऑपरेशन कर सकता है।

इस जहाज में सात अधिकारी समेत कुल 57 सदस्यीय चालक दल है। यह भारतीय नौसेना का अब तक का सबसे बड़ा शैलो वाटर वेसल है जो उथले पानी में भी ऑपरेशन कर सकता है।

लगे हैं अत्याधुनिक हथियार और सेंसर सिस्टम

आईएनएस अंद्रोथ में एडवांस सोनार और सेंसर सिस्टम लगे हैं, जिनमें हल-माउंटेड सोनार, लो-फ्रीक्वेंसी वेरिएबल डेप्थ सोनार और इंटीग्रेटेड एंटी-सबमरीन वॉरफेयर डिफेंस सूट शामिल हैं, जिसे महिंद्रा डिफेंस ने बनाया है। जिसकी मदद से यह जहाज पानी के भीतर छिपी पनडुब्बी को भी ट्रेक कर सकता है।

हथियारों में लाइटवेट टॉरपीडो, स्वदेशी एंटी-सबमरीन रॉकेट्स, 30 मिमी नेवल गन और दो 12.7 मिमी स्टेबलाइज्ड रिमोट कंट्रोल्ड गन शामिल हैं। इन सभी हथियारों और सेंसरों को नेटवर्क में जोड़कर एक एंटी सबमरीन शील्ड तैयार की गई है, जो किसी भी नजदीकी या मध्यम दूरी के खतरे का जवाब तुरंत देने में सक्षम है।

जहां पारंपरिक जहाज फेल, वहां अंद्रोथ रहेगा एक्टिव

आईएनएस अंद्रोथ को खास तौर पर लिटोरल जोन यानी तटीय जलक्षेत्र में तैनाती के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी मुख्य भूमिका शैलो वाटर में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, ट्रैक करना और उन्हें तबाह करना है। इसके अलावा यह जहाज मैरिटाइम सर्विलांस, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन, माइन लेइंग, तटीय रक्षा और लो इंटेंसिटी मैरिटाइम ऑपरेशंस जैसे अभियानों में भी भाग ले सकता है।

इसकी तैनाती से भारतीय नौसेना की नॉर्थ-वेस्टर्न, ईस्टर्न और आइलैंड कमांड्स की क्षमताओं में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। यह जहाज विशेष रूप से उन इलाकों में तैनात किया जाएगा जहां उथले पानी में पारंपरिक बड़े जहाज आसानी से काम नहीं कर पाते हैं।

इस जहाज का नाम अंद्रोथ द्वीप के नाम पर रखा गया है, जो लक्षद्वीप समूह का उत्तरी छोर है। अंद्रोथ द्वीप ऐतिहासिक और रणनीतिक दृष्टि से भारत के समुद्री क्षेत्र में एक अहम स्थान रखता है। इस नामकरण से भारतीय नौसेना ने न केवल भौगोलिक विरासत का सम्मान दिया है बल्कि तटीय इलाकों की सामरिक अहमियत समझा है।

आईएनएस अर्नाला क्लास का हिस्सा – INS Androth in Indian Navy

आईएनएस अंद्रोथ दरअसल, आईएनएस अर्नाला क्लास के 16 जहाजों में से दूसरा है। इस क्लास के जहाज पुराने अभय-क्लास कोरवेट्स की जगह ले रहे हैं। पहले आठ जहाज कोलकाता स्थित जीआरएसई द्वारा बनाए जा रहे हैं जबकि बाकी आठ कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा तैयार किए जा रहे हैं। सभी जहाज 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री से बनाए जा रहे हैं और इनकी डिलीवरी 2025 से 2028 के बीच चरणबद्ध तरीके से होगी।

INS Androth in Indian Navy को 18 जून को कमीशन किया गया था, जबकि आईएनएस अंद्रोथ 6 अक्टूबर को शामिल हुआ। आने वाले महीनों में इसी क्लास के अन्य जहाज जैसे आईएनएस अरिहंत, आईएनएस अमिनिदिवि, आईएनएस अंजादिवी और आईएनएस अजय भी नौसेना में शामिल होने की प्रक्रिया में हैं। सभी जहाज भारतीय द्वीपों के नाम पर रखे गए हैं, जो राष्ट्रीय एकता और समुद्री विरासत का प्रतीक हैं।

2035 तक हों 200 युद्धपोत और पनडुब्बियां

भारतीय नौसेना लगातार अपनी समुद्री ताकत को तेजी से मजबूत बनाने की दिशा में बढ़ रही है। लक्ष्य है कि वर्ष 2035 तक भारतीय नौसेना के पास 200 से अधिक युद्धपोत और पनडुब्बियां हों, ताकि देश के विशाल समुद्री हितों की रक्षा की जा सके और चीन व पाकिस्तान से समुद्री मोर्चे पर बढ़ती दोहरी चुनौतियों का मुकाबला किया जा सके।

वर्तमान में भारतीय शिपयार्ड्स में 55 छोटे-बड़े युद्धपोतों का निर्माण लगभग 99,500 करोड़ रुपये की लागत से चल रहा है। इसके अलावा, नौसेना को 74 नए जहाजों और पोतों के स्वदेशी निर्माण के लिए 2.35 लाख करोड़ रुपये की स्वीकृति मिल चुकी है। इनमें नौ डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां, सात अगली पीढ़ी की स्टेल्थ फ्रिगेट्स, आठ एंटी-सबमरीन वारफेयर कोरवेट्स और 12 माइन-काउंटरमेजर वेसल शामिल हैं।

वर्तमान में नौसेना के पास 140 युद्धपोत

नौसेना भविष्य में चार अगली पीढ़ी के 10,000 टन डिस्प्लेसमेंट वाले डेस्ट्रॉयर्स और एक दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर बनाने पर भी विचार कर रही है, जो पुराने आईएनएस विक्रमादित्य की जगह लेगा। वर्तमान में नौसेना के पास कुल 140 युद्धपोत हैं, जिनमें 17 डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां और दो एसएसबीएन शामिल हैं, साथ ही 250 से अधिक विमान और हेलिकॉप्टर भी हैं।

2035 तक यह संख्या 200 युद्धपोत और पनडुब्बियों तथा 350 नौसैनिक विमानों तक पहुंचाने की योजना है। चीन के पास फिलहाल 370 युद्धपोतों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है और वह हिंद महासागर में अपना प्रभाव तेजी से बढ़ा रहा है। वहीं पाकिस्तान को भी चीन से आधुनिक हंगोर-क्लास पनडुब्बियां मिलने वाली हैं, जिससे उसकी समुद्री क्षमता में बड़ा इजाफा होगा।

INS Androth commissioning marks a significant milestone in India’s naval modernisation and self-reliance drive. Commissioned on 6 October 2025 at Naval Dockyard, Visakhapatnam, INS Androth is the second Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft (ASW-SWC) built by GRSE, Kolkata with over 80% indigenous content. Designed for coastal and shallow water operations, it features advanced sonar, weapons, and waterjet propulsion systems for high manoeuvrability. The vessel enhances India’s anti-submarine warfare capabilities, maritime surveillance, and coastal defence, showcasing the Indian Navy’s focus on Aatmanirbharta and indigenous innovation. This induction strengthens India’s maritime security architecture significantly.

India Air Defence Network: देश की ‘अदृश्य दीवार’ में शामिल होंगे 6 से 7 हजार रडार और कई सैटेलाइट्स, ढाल और तलवार दोनों बनेगा मिशन सुदर्शन चक्र

India Air Defence Network

India Air Defence Network: भारत अब अपने एयर डिफेंस सिस्टम को चाक-चौबंद करने में जुट गया है। मिशन सुदर्शन चक्र के तहत देश में एक ऐसा मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस नेटवर्क बनाया जा रहा है, जो दुश्मन के विमानों, मिसाइलों और ड्रोन को बेहद दूर से ही पहचान लेगा और उन्हें वक्त रहते ही तबाह कर देगा। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर मिशन सुदर्शन चक्र का एलान किया था और कहा था कि यह मिशन भारत की डिफेंस स्ट्रक्चर को मजबूती देगा।

Pakistan air defence failure: गुस्से में पाकिस्तान, ब्रह्मोस के आगे फेल हुए चीनी एयर डिफेंस सिस्टम, चीन बोला- ‘ब्रह्मोस को रोकने के लिए नहीं किया डिजाइन’

मिशन सुदर्शन चक्र में 6 से 7 हजार रडार

मिशन सुदर्शन चक्र के तहत पूरे देश में 6,000 से 7,000 रडार लगाए जाएंगे। इनमें ओवर-द-होराइजन रडार शामिल होंगे, जो दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को उनकी सीमा से सैकड़ों किलोमीटर दूर से ही ट्रैक कर सकते हैं। ये सभी रडार एक साथ जुड़कर इंटिग्रेटेड कमांड नेटवर्क में डेटा भेजेंगे। साथ ही, स्पेस-बेस्ड सैटेलाइट्स के जरिए अंतरिक्ष से निगरानी की जाएगी। ये दोनों मिल कर एक ऐसा एयर डिफेंस इकोसिस्टम करेंगे जो भारत के ऊपर किसी भी दिशा से आने वाले खतरे को तुरंत पहचान सकेगा।

India Air Defence Network – ओवर-द-होराइजन रडार: सीमा पार से निगरानी

ओवर-द-होराइजन रडार ऐसी तकनीक पर आधारित होते हैं जो वायुमंडल की परावर्तित तरंगों का इस्तेमाल करके हजारों किलोमीटर दूर तक निगरानी करने में सक्षम होते हैं। इनका उपयोग दुश्मन की सीमा के भीतर तक हवाई गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाएगा। ये रडार पाकिस्तान और चीन की हवाई गतिविधियों को शुरुआत में ही ट्रैक कर भारत को इंटरसेप्शन का पर्याप्त समय देंगे।

डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स और लेजर सिस्टम भी होंगे शामिल

इस मिशन में रडार और सैटेलाइट्स के अलावा डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स को भी जोड़ा जा रहा है। ये हाई-पावर लेजर हथियार होते हैं जो दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल या एयरक्राफ्ट को हवा में ही नष्ट कर सकते हैं। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन ने हाल ही में इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम का सफल परीक्षण किया है। इसमें क्विक रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल (QRSAM), वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस (VSHORADS) और 5 किलोवॉट लेजर को एक साथ जोड़ा गया। यह सिस्टम सुदर्शन चक्र की ढाल का अहम हिस्सा बनेगा।

स्ट्रैटेजिक और टैक्टिकल स्तर पर कवरेज

सुदर्शन चक्र नेटवर्क को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह रणनीतिक और टैक्टिकल दोनों स्तरों पर हवाई खतरों का सामना कर सके। लंबी दूरी के मिसाइल सिस्टम, मध्यम दूरी की एयर डिफेंस गन, एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी, सैटेलाइट्स और रडार, सबको एक साथ जोड़कर एक लेयर्ड डिफेंस आर्किटेक्चर तैयार किया जाएगा। यह सिस्टम दुश्मन के किसी भी हवाई खतरे को कई स्तरों पर ट्रैक और इंटरसेप्ट कर सकेगा।

एआई और क्वांटम टेक्नोलॉजी से डेटा एनालिसिस

हाल ही में सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने इस मिशन को भारत का “आयरन डोम” या “गोल्डन डोम” बताया था। उन्होंने कहा था कि इतनी बड़ी संख्या में रडार और सैटेलाइट से आने वाले डेटा को रियल टाइम में एनालाइज करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड कंप्यूटेशन, बिग डेटा, डेटा एनालिटिक्स, लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स और क्वांटम टेक्नोलॉजी जैसी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया जाएगा।

उन्होंने कहा था कि यह सिस्टम “ढाल और तलवार” दोनों की तरह काम करेगा। यानी यह न सिर्फ रक्षा करेगा बल्कि दुश्मन के हवाई खतरों को पहले ही नष्ट करने में सक्षम होगा।

फिलहाल भारत का India Air Defence Network मुख्य रूप से रणनीतिक सैन्य ठिकानों की सुरक्षा पर केंद्रित है। लेकिन सुदर्शन चक्रमिशन इस कवरेज को बढ़ाकर देश के मुख्य शहरों, औद्योगिक केंद्रों और संवेदनशील इलाकों तक ले जाएगा। यानी न सिर्फ सीमाओं पर, बल्कि यह देश के हर कोने में हवाई खतरों से सुरक्षा करेगा।

2030 तक 52 नए सैटेलाइट होंगे लॉन्च 

भारत ने अपनी स्पेस सर्विलांस क्षमता को बढ़ाने के लिए स्पेस-बेस्ड सर्विलांस प्रोग्राम के तीसरे चरण में 2030 तक 52 नए सर्विलांस सैटेलाइट्स लॉन्च करने की योजना बनाई है। ये सैटेलाइट्स सुदर्शन चक्र नेटवर्क से जुड़ेंगे और हवा, अंतरिक्ष और जमीन के बीच डेटा का एक सुरक्षित चैनल बनाएंगे और हवा, अंतरिक्ष और जमीन के बीच एक हाई-स्पीड डेटा चेन बनाएंगे।

AK-630 मोबाइल एयर डिफेंस गन सिस्टम की  खरीद

ऑपरेशन सुदर्शन के तहत भारतीय सेना ने सीमावर्ती इलाकों और आबादी वाले केंद्रों को दुश्मन के ड्रोन, रॉकेट और लाइटर म्युनिशन जैसे खतरों से बचाने के लिए छह AK-630 मोबाइल एयर डिफेंस गन सिस्टम की आपातकालीन खरीद शुरू की है। 30 मिमी गन सिस्टम की रेंज 4 से 6 किलोमीटर है और यह प्रति मिनट 3000 राउंड फायर करने में सक्षम है, जिससे नजदीकी दूरी पर हवाई खतरों को प्रभावी ढंग से नष्ट किया जा सकेगा। यह सभी मौसम में काम करने वाले सिस्टम सेना के आकाशतीर कमांड-एंड-कंट्रोल नेटवर्क से जुड़ा होगा। ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस कदम को तेजी से लागू किया जा रहा है।

India Air Defence Network – स्वदेशी निर्माण पर जोर

इस मिशन में अधिकांश प्लेटफॉर्म्स भारत में ही विकसित और निर्मित किए जाएंगे। डीआरडीओ, सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियां, निजी रक्षा उद्योग और कई अनुसंधान संस्थान इसमें शामिल होंगे। वहीं, कुछ विशेष टेक्नोलॉजी विदेशों से भी खरीदी जा सकती है, लेकिन India Air Defence Network की रीढ़ स्वदेशी तकनीक होगी। वहीं, इस मिशन में सशस्त्र बलों के साथ-साथ पैरामिलिट्री फोर्सेज, रक्षा सार्वजनिक उपक्रम, निजी क्षेत्र और अनुसंधान संस्थान शामिल होंगे। सभी को एक साझा नेटवर्क में जोड़कर एक ऐसा इकोसिस्टम बनाया जाएगा जो किसी भी हवाई खतरे पर तुरंत प्रतिक्रिया दे सके।

India Air Defence Network is being rapidly modernised to counter evolving aerial threats through an integrated, multi-layered shield. Under Mission Sudarshan Chakra, India is linking over-the-horizon radars, satellites, missile systems like S-400, and directed energy weapons into a single nationwide air defence network. This advanced system will monitor, detect, identify, and neutralise hostile aircraft, drones, and missiles across the country. With over 6,000 radars and 52 surveillance satellites planned, India aims to build a robust, real-time air defence grid to safeguard its skies and strategic assets. This network reflects India’s growing defence capabilities and technological self-reliance.

S-400 Air Defence System: भारत खरीद सकता है पांच और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम, चीनी पीएल-15 मिसाइलों का भी तोड़ निकालने की तैयारी

S-400 Air Defence System

S-400 Air Defence System: भारत और रूस के बीच एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की पांच और यूनिट्स खरीदने को लेकर बातचीत चल रही है। रक्षा मंत्रालय के टॉप अफसर इस हफ्ते मॉस्को में रूसी अधिकारियों के साथ मुलाकात करेंगे। इस बैठक में तय किया जाएगा कि ये सिस्टम भारत सीधे खरीदेगा या कुछ यूनिट्स का निर्माण देश में ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी के तहत किया जाएगा।

India Su-57 Fighter Jets: ऑपरेशन सिंदूर में वायुसेना को हुई थी ये दिक्कत, इसलिए चाहिए Su-57 फाइटर जेट्स, 2026 तक आएगा S-400

यह फैसला ऐसे समय में लिया जा रहा है जब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एस-400 ने पाकिस्तान के जबरदस्त नुकसान पहुंचाया था। आलम ये था कि 10 मई को सीजफायर के एलान से पहले तक पाकिस्तान वायुसेना अपने फाइटर जेट्स को सिंधु नदी के पूर्वी इलाके में उड़ान भरने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी।

300 किमी पीछे चले गए थे पाक के जेट्स

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने चीन से खरीदे लंबी दूरी के हथियारों से भारतीय एयरबेस आदमपुर और भुज को निशाना बनाया। शुरुआती हमलों के बाद जब भारत ने अपना एस-400 एक्टिव किया तो पाकिस्तान इतना घबरा गया कि उसने अपने सभी एयर एसेट्स को 300 किलोमीटर पीछे खींच लिया। 10 मई को पाकिस्तान का कोई भी फाइटर जेट भारतीय सीमा के पास उड़ान नहीं भर सका।

इसी दौरान भारतीय एस-400 ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 314 किलोमीटर दूर एक पाकिस्तानी अवॉक्स विमान को मार गिराया था। इसके अलावा एस-400 ने उत्तर में पाकिस्तान के एप-16 और जेएफ-17 विमानों को भी निशाना बनाया। इन हमलों ने एस-400 को केवल एक “स्टैंड-ऑफ वेपन” नहीं, बल्कि एक प्रभावी डिटरेंस हथियार बना दिया।

बाकी दो 2026 के आखिर तक डिलीवरी

अक्टूबर 2018 में भारत ने रूस के साथ 5.43 बिलियन डॉलर (लगभग 40,000 करोड़ रुपये) की डील पर दस्तखत किए थे, जिसके तहत पांच एस-400 सिस्टम खरीदे जाने थे। इन पांच में से तीन स्क्वाड्रन भारत को पहले ही मिल चुके हैं और बाकी दो 2026 के आखिर तक मिल जाएंगे।

अब दोनों देशों के बीच अलग से पांच सिस्टम की खरीदने को लेकर सहमति बन चुकी है। कीमत 2018 की दर से सालाना बढ़ोतरी के साथ तय की गई है। योजना के अनुसार तीन सिस्टम भारत सीधे खरीदेगा और बाकी दो का निर्माण भारतीय प्राइवेट सेक्टर कंपनियों के सहयोग से किया जाएगा।

S-400 Air Defence System – नई डील गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट

एस-400 खरीद की नई डील गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट होगी। इसके तहत भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल की सुविधा भी बनाई जाएगी। इसके लिए प्राइवेट सेक्टर को भी शामिल किया जाएगा, ताकि सिस्टम की सर्विसिंग भारत में ही हो सके। सूत्रों के अनुसार एस-500 सिस्टम की खरीद की खबरें गलत हैं। रूस का एस-500 फिलहाल डिजाइन के स्तर पर है और उसका निर्यात शुरू नहीं हुआ है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 5 दिसंबर को भारत की यात्रा पर आने वाले हैं। माना जा रहा है कि इससे पहले इस नई डील को हरी झंडी दी जा सकती है।

क्या कहा था वायुसेना प्रमुख ने

हाल ही में भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह से जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया था कि क्या भारत अतिरिक्त S-400 Air Defence System देगा, तो उनका कहना था, “यह तो साफ है कि इस सिस्टम ने अच्छा प्रदर्शन किया है। ऐसे और सिस्टम की जरूरत है, और इसकी संख्या पर कोई सीमा नहीं है कि कितने खरीदे जा सकते हैं। अभी मैं इस पर ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा कि हमारी योजना क्या है, हम और खरीदेंगे या कितनी संख्या में खरीदेंगे उन्होंने कहा कि यह एक प्रभावी हथियार प्रणाली साबित हुई है। हमारे अपने सिस्टम भी डेवलप हो रहे हैं, इसलिए इस पर फैसला लिया जाएगा।”

उनका इस बयान से संकेत मिलते हैं कि वायुसेना एस-400 से संतुष्ट है और भविष्य में अधिक यूनिट्स की खरीद पर विचार किया जा सकता है।

भारत का 7,000 किलोमीटर से अधिक लंबा तटीय क्षेत्र और उत्तरी सीमाएं रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हैं। मौजूदा एस-400 स्क्वाड्रन इनका एक बड़ा हिस्सा कवर करते हैं, लेकिन पूरे देश में 360° कवरेज के लिए और यूनिट्स की जरूरत है।

नए सिस्टम भारतीय तटवर्ती इलाकों, उत्तरी कमान क्षेत्र और समुद्री इलाकों की सुरक्षा के लिए तैनात किए जा सकते हैं। इससे किसी भी संभावित हमले की स्थिति में भारत की रेस्पॉन्स क्षमता और बढ़ जाएगी।

पीएल-15 मिसाइलों का तोड़

इसके अलावा भारत, रूस से आरवीवी-बीडी एयर-टू-एयर मिसाइल की भी मांग कर रहा है जिसकी रेंज 200 किलोमीटर से अधिक है। इसे सुखोई-30 एमकेआई फ्लीट में लगाया जाएगा। पाकिस्तान पहले से चीनी पीएल-15 मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा है। आरवीवी-बीडी को सुखोई-30 एमकेआई में इंटीग्रेट करने के लिए ऑन-बोर्ड रडार अपग्रेड की जरूरत होगी।

भारत के स्वदेशी सिस्टम भी तैयार

S-400 Air Defence System के साथ-साथ भारत अपने स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम्स पर भी काम कर रहा है। डीआरडीओ के बनाए आकाश, मीडियम रेंज सरफेस टू एय़र मिसाइल और अन्य लंबी दूरी के मिसाइल सिस्टम भी भारतीय नेटवर्क का हिस्सा बन रहे हैं। एस-400 ने इस नेटवर्क में लंबी दूरी के टारगेट इंटरसेप्शन में एक “गेम चेंजर” की भूमिका निभाई है। इसकी मारक क्षमता 300 किसी से ज्यादा है और यह पाकिस्तान में अंदर तक घुस कर मार कर सकता है।

India is in advanced talks with Russia to acquire five additional S-400 air defence systems, boosting its long-range defensive capabilities. The S-400 played a decisive role during Operation Sindoor, deterring Pakistan’s air operations and neutralising key targets. The deal, expected before President Putin’s visit to India, includes both direct purchases and joint production with Indian firms. This move aims to strengthen India’s air defence along its vast borders and coastline while enhancing indigenous capabilities. The S-400’s proven effectiveness positions it as a critical asset in India’s evolving defence strategy and security architecture.

INS Androth Commissioning: भारतीय नौसेना में सोमवार को शामिल होगा आईएनएस अंद्रोथ, दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगा कर करेगा तबाह

Indian Navy INS Androth Commissioning

INS Androth Commissioning: नौसेना 6 अक्टूबर को विशाखापट्टनम के नेवल डॉकयार्ड में आईएनएस अंद्रोथ को कमीशन करने जा रही है। यह दूसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट होगा, जिसे नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाएगा। नौसेना के ईस्टर्न नेवल कमांड के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल राजेश पेंढरकर इसे नेवी को समर्पित करेंगे।

Indian Navy Androth: समंदर में एंटी-सबमरीन वॉरफेयर को मिलेगी मजबूती, इस दिन भारतीय नौसेना में शामिल होगा अंद्रोथ 

INS Androth Commissioning होना से भारतीय नौसेना की क्षमताओं में बढ़ोतरी होगी। पिछले कुछ महीनों में नौसेना के बेड़े में कई अत्याधुनिक युद्धपोतों को शामिल किया गया है। इससे पहले इस साल 18 जून को भारतीय नौसेना को पहली एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट आईएनएस अर्नाला कमीशन की गई थी।

आईएनएस अंद्रोथ को कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने बनाया है, जिसमें में 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। वहीं, आईएनएस अंद्रोथ के शामिल होने से विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों में भारतीय नौसेना की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी। इससे पहले गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स ने पहली एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट आईएनएस अर्नाला को भी बनाया था।

हाल के महीनों में भारतीय नौसेना ने अर्नाला, निस्तार, उदयगिरी और नीलगिरि जैसे कई एडवांस वॉरशिप्स को अपने बेड़े में शामिल किया है। अब अंद्रोथ के जुड़ने के बाद नौसेना समुद्री अभियानों के पूरे स्पेक्ट्रम में संतुलित दिशा में आगे बढ़ रही है। आईएनएस अंद्रोथ के कमीशन होने के बाद नौसेना की ऑपरेशनल और स्ट्रैटेजिक क्षमताओं को मजबूत मिलेगी।

INS Androth Commissioning क्लास की है, जिसका नाम लक्षद्वीप के अंद्रोथ द्वीप के नाम पर रख गया है। यह पुराने पुरानी अभय-क्लास कोरवेट्स की जगह लेगी। इसकी लंबाई 77.6 मीटर और चौड़ाई 10.5 मीटर की है। इसका डिस्प्लेसमेंट 900 टन और ग्रॉस टनेज 1,490 टन है। 57 सदस्यों (7 अधिकारी सहित) के चालक दल वाली यह वाटर क्राफ्ट डीजल इंजन-वॉटरजेट प्रोपल्जन सिस्टम से ऑपरेट होती है। इसकी अधिकतम रफ्तार 25 नॉट्स है और 14 नॉट्स की स्पीड पर 1,800 नॉटिकल मील तक ऑपरेट कर सकती है। यह शैलो वाटर यानी उथले जल में ऑपरेशन के लिए डिजाइन की गई है।

इसमें एडवांस सोनार सिस्टम लगाया गया है, जिसमें हल-माउंटेड सोनार ‘अभय’ और लो-फ्रीक्वेंसी वेरिएबल डेप्थ सोनार शामिल हैं। हथियारों में लाइटवेट टॉरपीडोज, स्वदेशी एंटी-सबमरीन वॉरफेयर रॉकेट्स, 30 मिमी नेवल गन और दो 12.7 मिमी स्टेबलाइज्ड रिमोट कंट्रोल्ड गन शामिल हैं। साथ ही इसमें महिंद्रा डिफेंस का इंटीग्रेटेड एंटी-सबमरीन वॉरफेयर डिफेंस सूट लगा है, जो डिकॉय सिस्टम के रूप में काम करता है।

INS Androth Commissioning

यह शिप शैलो वाटर में पनडुब्बियों की डिटेक्शन, ट्रैकिंग और न्यूट्रलाइजेशन में सक्षम है। इसके अलावा यह समुद्री निगरानी, सर्च एंड रेस्क्यू, तटीय रक्षा, माइन बिछाने और लिटोरल जोन में सब-सर्फेस सर्विलांस में अहम भूमिका निभा सकती है। 13,440 करोड़ रुपये की लागत वाली 16 नावों की इस परियोजना को कोलकाता स्थित जीआरएसई और सीएसएल द्वारा बनाया जा रहा है। यह भारतीय महासागर क्षेत्र में चीनी और पाकिस्तानी पनडुब्बी खतरों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

Missile Production to private sector: चीन-पाकिस्तान की दोहरी चुनौती को देखते हुए सरकार का बड़ा फैसला, अब प्राइवेट कंपनियां भी बनाएंगी मिसाइल और गोला-बारूद

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Missile Production to private sector: भारत सरकार ने चीन-पाकिस्तान की दोहरी चुनौती को देखते हुए बड़ा फैसला लिया है। लंबे समय तक चलने वाले युद्ध की स्थिति में सेना के पास हथियारों की कमी न हो, इसके लिए सरकार ने मिसाइल और गोला-बारूद के उत्पादन को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया है। रक्षा मंत्रालय के इस फैसले को ‘आत्मनिर्भरता’ की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इस कदम से न केवल देश की उत्पादन क्षमता में इजाफा होगा बल्कि विदेशी निर्भरता भी कम होगी।

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Missile Production to private sector

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाल में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित किया कि भविष्य के युद्ध पारंपरिक तरीकों की बजाय स्टैंड-ऑफ वेपन्स और लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों से लड़े जाएंगे। इस ऑपरेशन में पाकिस्तान ने चीन निर्मित लॉन्ग रेंज एयर-टू-एयर और एयर-टू-सरफेस मिसाइलों का इस्तेमाल किया था, जिसके बाद भारत ने अपनी मिसाइल निर्माण नीति में अहम बदलाव करने का निर्णय लिया।

अब निजी कंपनियां बनाएंगी मिसाइल और गोला-बारूद

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने रेवेन्यू प्रोक्योमेंट मैनुअल में संशोधन किया है। पहले किसी भी निजी कंपनी को बम और गोला-बारूद निर्माण इकाई लगाने के लिए म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना जरूरी था। लेकिन अब इस अनिवार्यता को हटा दिया गया है।

इसका मतलब है कि अब निजी कंपनियां 105 मिमी, 130 मिमी, 150 मिमी आर्टिलरी शेल्स, पिनाका मिसाइल, 1000 पाउंड बम, मोर्टार बम, हैंड ग्रेनेड और छोटे व मध्यम कैलिबर की गोलियां और हथियार बना सकेंगी। इसके अलावा, रक्षा मंत्रालय ने डीआरडीओ को भी पत्र लिखकर यह बताया है कि मिसाइल विकास और Missile Production to private sector इंटीग्रेशन में निजी कंपनियों को शामिल करने का निर्णय लिया गया है।

बीडीएल और बीईएल तक सीमित नहीं रहेगा उत्पादन

अब तक भारत में मिसाइलों का निर्माण मुख्य रूप से भारत डायनेमिक्स लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों तक सीमित था। ये दोनों कंपनियां डीआरडीओ के तहत काम करती हैं और आकाश, एस्ट्रा, कॉन्कर्स, मिलन जैसी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और टॉरपीडो बनाती हैं।

लेकिन सशस्त्र बलों की जरूरतें अब इतनी बड़ी हो गई हैं कि केवल इन कंपनियों से मांग पूरी नहीं हो सकती। इसीलिए, रक्षा मंत्रालय ने पारंपरिक मिसाइलों के विकास में निजी क्षेत्र को लाने का फैसला किया है, जबकि सामरिक मिसाइलों का विकास डीआरडीओ के अधीन ही रहेगा।

ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने चीन से मिली लॉन्ग रेंज मिसाइलों और रॉकेट्स का इस्तेमाल किया। वहीं, भारत ने भी अपने आधुनिक एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के एक अवाक्स एयरक्राफ्ट (संभावित रूप से SAAB AEW या Dassault DAC-20 ELINT) को पंजाब प्रांत में 314 किलोमीटर अंदर गिराया। यह कार्रवाई 10 मई की सुबह हुई जिसने दिखाया कि भारत के पास लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता है।

वहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडल ईस्ट में संघर्ष के कारण हथियारों और गोला-बारूद की अंतरराष्ट्रीय मांग बहुत बढ़ गई है। ऐसे में भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि लंबी अवधि तक चले किसी संघर्ष के दौरान उसे विदेशी कंपनियों से महंगे दामों पर आपातकालीन खरीदारी न करनी पड़े।

रक्षा मंत्रालय के इस Missile Production to private sector फैसले से घरेलू रक्षा उद्योग को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। निजी कंपनियों के आने से उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, और भारतीय सशस्त्र बलों को समय पर और पर्याप्त मात्रा में गोला-बारूद उपलब्ध कराया जा सकेगा।

सरकार का मानना है कि भविष्य के युद्ध ब्रह्मोस, निर्भय, प्रलय और शौर्य जैसी मिसाइलों पर निर्भर होंगे, क्योंकि अब लड़ाकू विमानों का युग खत्म हो रहा है और ओवर-द-होराइजन मिसाइलों व एयर डिफेंस सिस्टम का युग शुरू हो चुका है।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत को पश्चिम में पाकिस्तान और उत्तर में चीन से दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तान को चीन से लगातार हथियारों की सप्लाई होती रहती है। इसलिए भारत को अपने मिसाइल स्टोरेज को मजबूत करना और उत्पादन क्षमता को घरेलू स्तर पर बढ़ाना रणनीतिक तौर पर जरूरी हो गया है।

Operation Sarp Vinash: 22 साल पहले में जम्मू की पहाड़ियों में चला था ऐतिहासिक मिलिट्री ऑपरेशन, अब लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने अपनी किताब में खोले राज

Operation Sarp Vinash: Lt Gen H.S. Lidder’s Book Revisits the Historic Counter-Terror Operation in Poonch
Operation Sarp Vinash: Lt Gen H.S. Lidder’s Book Revisits the Historic Counter-Terror Operation in Poonch

Operation Sarp Vinash Book launch: इस साल सुरक्षा बलों ने जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खात्मे के लिए ऑपरेशन सर्प विनााश 2.0 चलाया था। लेकिन जम्मू–कश्मीर में आज से 22 साल पहले चलाए ऑपरेशन सर्प विनाश के बारे में कम ही लोग जानते हैं। उस ऑपरेशन जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के नेटवर्क को समूल नष्ट कर दिया था।

लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एचएस लिड्डर ने Operation Sarp Vinash Book launch अपनी नई किताब  “ऑपरेशन सर्प विनाश” में उस ऐतिहासिक सैन्य ऑपरेशन के बारे में विस्तार से बताया है। इस किताब में भारतीय सेना द्वारा 2003–04 में जम्मू-पुंछ के इलाकों में चलाए गए ऐतिहासिक आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के कई अहम पहलुओं को पहली बार विस्तार से पेश किया है।

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लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) हरदेव सिंह लिड्डर ने बताया कि इस ऑपरेशन की योजना, क्रियान्वयन और परिणाम को समझे बिना आज की सुरक्षा चुनौतियों का आकलन अधूरा रहेगा। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन भारतीय सेना के इतिहास में एक मील का पत्थर था, क्योंकि यह एक ऐसा अभियान था, जिसमें आतंकवादियों को उनके मजबूत बिलों से बाहर निकालकर आतंकवाद के फन को कुचला गया।

बताई ऑपरेशन की अंदरूनी रणनीति

लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने बताया कि ऑपरेशन की योजना बेहद सावधानी से बनाई गई थी और इसका लक्ष्य आतंकवादियों को भागने का कोई रास्ता नहीं देना था। उन्होंने कहा कि आतंकियों की रणनीति हमेशा शूट एंड रन की होती है। इसे खत्म करने के लिए सेना ने ऑपरेशन को इस तरह डिजाइन किया कि आतंकवादी चारों ओर से घिर जाएं।

लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने कहा कि ऑपरेशन से पहले ही इलाके को चारों तरफ से कवर कर लिया गया था। उन्होंने 15 कोर के कमांडर को बताया था कि आतंकवादी भागने की कोशिश करेंगे, इसलिए सभी संभावित रास्तों को जाल की तरह बंद कर दिया गया।

जब आतंकवादी भागने लगे, तो 18 आतंकी घेराबंदी में मारे गए। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक ऐसा निर्णायक मोड़ था जिसने उस समय जम्मू-पुंछ क्षेत्र में आतंकवाद की रीढ़ तोड़ दी। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन के दौरान लॉन्चर, आर्टिलरी, और हेलिकॉप्टर जैसे सभी संसाधन तैयार रखे गए थे ताकि किसी भी स्थिति से निपटा जा सके। इस अभियान में सेना ने अपनी रणनीतिक और सामरिक क्षमता का प्रदर्शन किया।

लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने किताब में बताया है कि यह ऑपरेशन केवल आतंकियों की संख्या घटाने के लिए नहीं था, बल्कि उनके ठिकानों को स्थायी रूप से खत्म करने के लिए था। जब तक आतंकियों के सुरक्षित बेस मौजूद रहते हैं, तब तक आतंकवाद खत्म नहीं किया जा सकता। सेना ने इन बेसों को खत्म कर आतंकवाद की जड़ पर चोट की।

Operation Sarp Vinash: Lt Gen H.S. Lidder’s Book Revisits the Historic Counter-Terror Operation in Poonch
Operation Sarp Vinash: Author Lt Gen H.S. Lidder and Co-Author Jaishree

को-ऑथर जयश्री ने बताई किताब लिखने की वजह – Operation Sarp Vinash Book launch

किताब की को-ऑथर जयश्री ने भी इस मौके पर अपने अनुभव साझा किए। जयश्री ने कहा कि 2023 के अंत में उन्होंने लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर से लंबी बातचीत की थी, जिसमें उन्होंने ऑपरेशन सर्प विनाश के विवरण साझा किए। इसके बाद उन्होंने इस ऑपरेशन के इतिहास को दस्तावेज के रूप में सामने लाने का फैसला लिया।

जयश्री ने बताया कि उनके लिए जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों के नाम और भूगोल शुरू में अनजान थे। लेकिन ऑपरेशन में शामिल वरिष्ठ अधिकारियों और सैनिकों की मदद से वे इस अभियान के हर चरण को समझ पाईं। उन्होंने कहा कि यह किताब उन लोगों के लिए है जो यह जानना चाहते हैं कि भारतीय सेना ने किस तरह कठिन परिस्थितियों में एक बड़े आतंकी गढ़ को ध्वस्त किया।

लोग पूछते थे “कितने आतंकवादी मारे गए”

बुक लॉन्च में लेफ्टिनेंट जनरल रमन धवन ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उस समय ऑपरेशन के दौरान उन पर काफी दबाव था और मीडिया में भी इसे लेकर खूब चर्चा हुई थी। कई वरिष्ठ अधिकारी इस ऑपरेशन को समझ नहीं पा रहे थे, क्योंकि उस दौर में आतंकवाद विरोधी अभियानों को सिर्फ “कितने आतंकवादी मारे गए” के आंकड़ों से आंका जाता था।

उन्होंने कहा कि 2001 से 2003 के बीच पुंछ-राजौरी क्षेत्र में हालात बेहद गंभीर थे। पहाड़ों और जंगलों से भरे इस इलाके में आतंकवादी 5,000 से 7,000 फीट की ऊंचाई पर बने अपने ठिकानों से सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों को निशाना बनाते थे। हर महीने औसतन 35-45 आतंकवादी मारे जाते थे, लेकिन इसके साथ ही 10-12 सुरक्षाकर्मी भी शहीद होते थे। कई बार जवानों और अधिकारियों को हर दूसरे दिन अपने साथियों की अंत्येष्टि में शामिल होना पड़ता था।

हिलकाका में चलाया था ऑपरेशन सर्प विनाश

उन्होंने बताया कि साल 2001 से लेकर 2003 के बीच जम्मू क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधियों में भारी बढ़ोतरी हुई थी। विशेष रूप से पुंछ-राजौरी के हिलकाका इलाकों में स्थिति बेहद गंभीर थी। पाकिस्तान से प्रशिक्षित आतंकवादी नियंत्रण रेखा पार कर इस घने जंगल और पहाड़ी क्षेत्र में आसानी से छिप जाते थे। इस इलाके की ऊंचाई 5,000 से 7,000 फीट तक थी।

हिलकाका का इलाका घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और बिना सड़कों वाला क्षेत्र था। नियंत्रण रेखा से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इन पहाड़ियों में आतंकवादी को प्राकृतिक गुफाएं और अस्थायी ‘धोक’ को अपना ठिकाना बनाते थे। गुर्जर-बकरवाल जनजातियां हर साल गर्मियों में यहां मवेशी चराने आती थीं और सर्दियों में खाली छोड़ जाती थीं। आतंकवादी इन्हीं खाली ‘धोक’ पर कब्जा कर लेते थे और सालों तक बिना रुकावट के गतिविधियां चलाते रहे। यह क्षेत्र इतना सुरक्षित माना जाता था कि आतंकवादी स्थानीय लोगों के साथ क्रिकेट तक खेलते थे।

रोमियो फोर्स और 163 इन्फैंट्री ब्रिगेड ने बनाई रणनीति

आतंकवाद को खत्म करने के लिए सेना ने मल्टी डायमेंशनल रणनीति अपनाई। ऑपरेशन की प्लानिंग गुप्त रखी गई। चार वरिष्ठ अधिकारियों तक ही रणनीति सीमित रही ताकि आतंकियों को भनक न लगे। पहाड़ियों में फिश नेट की तरह घेराबंदी कर आतंकियों को भागने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा गया। इस ऑपरेशन को नाम दिया गया ‘ऑपरेशन सर्प विनाश’। इसमें दो कोर श्रीनगर स्थित 15 कोर और नागरोटा स्थित 16 कोर ने मिलकर अभियान चलाया।

16 कोर की रिजर्व फॉर्मेशन 163 इन्फेंट्री ब्रिगेड को इलाके में भेजा गया। 9 पैरा कमांडो पहले से इलाके में सक्रिय थे और उन्होंने नई टुकड़ियों को रात के समय गाइड कर ऑपरेशन शुरू कराया। साथ ही वायुसेना की मदद से हेलिपैड और सप्लाई बेस बनाये गये ताकि दुर्गम क्षेत्रों में रसद और घायल सैनिकों को निकाला जा सके। स्थानीय गुर्जर-बकरवाल समुदाय से भी खुफिया जानकारी जुटाई गई।

सबसे अहम भूमिका 9 पैरा कमांडो की थी, जो पहले से इलाके में सक्रिय थे और इलाके से भलीभांति परिचित थे। इन कमांडो को गाइड बनाकर 163 इन्फेंट्री ब्रिगेड को रात के समय तीन दिशाओं से इलाके में उतारा गया। उद्देश्य था आतंकियों को चारों तरफ से घेरकर उनके ठिकानों पर सर्च एंड डिस्ट्रॉय अभियान चलाना।

65 आतंकवादियों को मार गिराया

सर्दियों के बाद मार्च के आखिरी सप्ताह में सेना की टुकड़ियां हिलकाका और आसपास के इलाकों में दाखिल हुईं। ऑपरेशन की प्लानिंग इस तरह से थी कि आतंकवादी भाग न सकें। वहीं, आतंकवादी भागने की कोशिश में 15 कोर की घात में फंस गए।

लगभग एक महीने तक चले इस ऑपरेशन में सेना ने 65 आतंकवादियों को मार गिराया, तीन को जिंदा पकड़ा और भारी मात्रा में युद्ध सामग्री बरामद की। इस दौरान पांच सैनिक शहीद हुए। आतंकियों के ठिकाने पूरी तरह नष्ट कर दिए गए और हिलकाका क्षेत्र को दोबारा भारत के नियंत्रण में सुरक्षित कर लिया गया और सुरक्षा बलों ने ऊंचाई वाले इलाकों में स्थायी चौकियां स्थापित कर दीं।

इस ऑपरेशन की खासियत यह थी कि इसे लिखित ऑपरेशन ऑर्डर के तहत, हेलिकॉप्टरों और मल्टी-डायरेक्शनल रणनीति के साथ अंजाम दिया गया। आमतौर पर आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन इतने बड़े पैमाने पर नहीं होते, लेकिन यह अभियान उस दृष्टि से ऐतिहासिक था। हिलकाका का इलाका ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों, घने जंगलों और सीमित रास्तों वाला था। कोई पक्की सड़कें नहीं थीं, जिससे सेना को पैदल और हवाई रास्तों से ऑपरेशन चलाना पड़ा। दुश्मन की नज़रों से बचकर रात में पहाड़ियों पर चढ़ाई करना सैनिकों के लिए बड़ी चुनौती थी। फिर भी भारतीय सेना ने बिना हिचके ऑपरेशन को अंजाम दिया।

ऑपरेशन सर्प विनाश की अहमियत

लेफ्टिनेंट जनरल लिड्डर ने कहा कि सैकड़ों ऑपरेशन होते हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर, इतनी सफलता के साथ आतंकवाद विरोधी अभियान कम ही हुए हैं। इस ऑपरेशन को सैन्य अकादमियों में अध्ययन के लिए एक ‘स्टडी केस’ के रूप में लिया जाना चाहिए।

वहीं, लेफ्टिनेंट जनरल धवन ने बताया कि हिलकाका को खत्म कर सेना ने पाकिस्तान के संभावित युद्धकालीन रणनीतिक खतरे को भी समाप्त कर दिया। अगर वह क्षेत्र आतंकियों के हाथ में रहता, तो किसी भी संघर्ष की स्थिति में पाकिस्तान की घुसपैठ को बड़ी सामरिक बढ़त मिल सकती थी।

Operation Sarp Vinash Book launch हो चुकी है हर आप इस बुक को पढ़ना चाहते है तो ऑनलाइन खरीद सकते है।

POJK Protests Update: पाक के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में पांचवें दिन भी भड़का जनविरोध, सड़कों पर उतरे हजारों लोग, तस्वीरों में देखें

POJK Protests Update

POJK Protests Update: पाक के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में पिछले पांच दिनों से चल रहा जनविरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है। इंटरनेट और कॉलिंग सेवाओं की बंदी के बीच हजारों प्रदर्शनकारी राजधानी मुजफ्फराबाद की ओर मार्च कर रहे हैं। यह विरोध पाकिस्तान सरकार और जम्मू-कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी के बीच चल रही वार्ताओं के बावजूद और तेज हो गया है।

Protests in POJK: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों ने पाक को बताया चुड़ैल; कोटली से मुजफ्फराबाद तक हालात हुए बेकाबू

सेहंसा, कोटली, अरजा ब्रिज और झेलम वैली जैसे इलाकों में जनता का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। नागरिकों की कथित हत्याओं के बाद स्थानीय लोगों में उबाल है और उन्होंने पुलिस वाहनों व बुलडोजरों में आग लगाकर अपनी नाराजगी जाहिर की।

सेहंसा में हिंसा, अरजा ब्रिज पर नाकेबंदी

POJK Protests Update बीते 24 घंटों में सेहंसा में स्थिति सबसे अधिक तनावपूर्ण रही। नागरिकों की कथित हत्याओं के बाद गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने पुलिस वैन और सरकारी बुलडोजरों को आग के हवाले कर दिया। सरकारी संपत्तियों को भी आग के हवाले कर दिया गया।

अरजा ब्रिज पर प्रदर्शनकारियों ने नाकेबंदी कर लोगों और सामान की आवाजाही पूरी तरह बाधित हो गई है। बता दें कि यह इलाका पाकिस्तान-पीओजेके के बीच एक अहम संपर्क मार्ग है।

कोटली में पूर्ण बंद

कोटली शहर में शुक्रवार को पूर्ण बंद देखा गया। दुकानें बंद रहीं, सार्वजनिक परिवहन ठप रहे और लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ विरोध जताया। आजाद पट्टन और पलंदरी में भी लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। भीड़ खुलेआम पाकिस्तान सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रही है। प्रदर्शनकारी कह रहे हैं कि जब तक इंटरनेट सेवाएं बहाल नहीं होतीं और नागरिकों की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं होती, यह विरोध जारी रहेगा।

इंटरनेट बंदी के खिलाफ ब्रिटेन में भूख हड़ताल

पाकिस्तानी सरकार ने चार दिन पहले पूरे पीओजेके में इंटरनेट और कॉलिंग सेवाएं बंद कर दी थीं। इसके खिलाफ कई युवाओं ने ब्रिटेन स्थित पाकिस्तानी हाई कमीशन के बाहर टेंट लगाकर भूख हड़ताल शुरू कर दी है। उन्होंने घोषणा की है कि जब तक पीओजेके में इंटरनेट और कॉलिंग सेवाएं बहाल नहीं की जातीं, वे हड़ताल जारी रखेंगे।

झेलम वैली से मुजफ्फराबाद की ओर हजारों का मार्च

सुबह होते ही झेलम वैली में विरोध प्रदर्शन फिर से तेज हो गए। हजारों की संख्या में लोग राजधानी मुजफ्फराबाद की ओर कूच कर रहे हैं। कोहाला एंट्री पॉइंट पर सुबह से ही भारी भीड़ जमा है, जिसने पाकिस्तान से पीओजेके जाने वाले सड़क को पूरी तरह रोक दिया है। विभिन्न इलाकों से लोग लगातार मुज़फ्फराबाद पहुंच रहे हैं, जिससे राजधानी में तनाव और बढ़ गया है।

बातचीत का दूसरा चरण शुरू – POJK Protests Update

शुक्रवार की नमाज के बाद पाक प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ के सलाहकारों और अवामी एक्शन कमेटी के सदस्यों के बीच बातचीत का दूसरा दौर शुरू हुआ। पहले दौर की बातचीत गुरुवार को बेनतीजा रही थी। गुरुवार को कमेटी के सदस्यों ने स्पष्ट कहा था कि अगली बैठक तभी होगी जब इंटरनेट और कॉलिंग सेवाएं बहाल की जाएंगी। हालांकि, ढेरीकोट में हुई अलग बैठक में कमेटी ने पाकिस्तानी सरकार को एक और मौका देने का फैसला किया। भारतीय मानक समय के अनुसार, शुक्रवार को दोपहर 3:10 बजे मुजफ्फराबाद में बैठक का दूसरा दौर शुरू हुआ।

संवैधानिक संशोधन की बात

पाकिस्तान की संघीय संसदीय कार्य मंत्री चौधरी तारिक फजल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि पाकिस्तान सरकार कश्मीरियों के हित में की गई कई मांगों को स्वीकार करती है। हालांकि कुछ मांगें संवैधानिक संशोधन से जुड़ी हैं और उन पर विचार चल रहा है। उन्होंने अवामी एक्शन कमेटी से बातचीत जारी रखने की अपील की और कहा कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है।

COAS Visits Forward Areas: आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने किया राजस्थान के बॉर्डर इलाकों का दौरा, टेक्नोलॉजी एब्जॉर्प्शन पर दिया जोर

COAS Visits Forward Areas
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COAS Visits Forward Areas: भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने शुक्रवार को फॉरवर्ड इलाकों और बीकानेर मिलिट्री स्टेशन का दौरा कर सैनिकों की ऑपरेशनल रेडीनेस की रिव्यू की। इस दौरान उन्होंने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों, पूर्व सैनिकों, नागरिक गणमान्य व्यक्तियों और सैनिकों से मुलाकात की।

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दौरे के दौरान जनरल द्विवेदी ने सेना के आधुनिकीकरण, कॉम्बैट प्रिपेयर्डनेस, टेक्नोलॉजिकल कैपेबिलिटी को मजबूत करने और ऑपरेशनल एक्सीलेंस पर भारतीय सेना के फोकस को दोहराया।

सैनिकों से की सीधी बातचीत – COAS Visits Forward Areas

इस मौके पर थलसेना प्रमुख ने राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले वेटरंस को सम्मानित किया। इनमें लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह शेखावत (सेवानिवृत्त), लेफ्टिनेंट कर्नल बीरबल बिश्नोई (सेवानिवृत्त), रिसालदार भंवर सिंह (सेवानिवृत्त) और हवलदार नाकत सिंह (सेवानिवृत्त) शामिल थे।

उन्होंने सभी रैंकों से संवाद किया और बदलते युद्ध के स्वरूप पर जोर देते हुए बताया कि भारतीय सेना कैसे अनमैंड एरियल सिस्टम्स और काउंटर-UAS टेक्नोलॉजीज को अपने ऑपरेशनल स्पेक्ट्रम में तेजी से शामिल कर रही है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव सेना को नई चुनौतियों के प्रति अधिक अनुकूल और तैयार बनाएगा।

बीकानेर में सैनिकों और वेटरंस को संबोधित करते हुए जनरल द्विवेदी ने कठिन रेगिस्तानी और अर्ध-रेगिस्तानी इलाकों में डटे रहने वाले सैनिकों के समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा की सराहना की। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों में काम करने के लिए न केवल शारीरिक क्षमता बल्कि मानसिक मजबूती, बेहतर समन्वय और टेक्नोलॉजी की समझ की भी आवश्यकता होती है।

उन्होंने मल्टी-एजेंसी कोऑर्डिनेशन के प्रभावी मॉडल की प्रशंसा की और कहा कि इस कॉर्डिनेशन ने ऑपरेशनल एफिशिएंसी को और बढ़ाया है।

थलसेना प्रमुख ने अपने संबोधन में कहा कि युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और इस बदलाव से निपटने के लिए सभी स्तरों पर टेक्नोलॉजी एब्जॉर्प्शन को बढ़ाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन सिस्टम्स और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे क्षेत्रों में तेजी से इनोवेशन हो रहा है और भारतीय सेना इन तकनीकों को अपनी रणनीतियों में शामिल कर रही है।

उन्होंने बताया कि बदलते सुरक्षा परिदृश्य में भारतीय सेना का मकसद हर परिस्थिति में उच्च स्तरीय ऑपरेशनल तैयारी को बनाए रखना है।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि सशस्त्र बलों, सरकारी एजेंसियों, उद्योग जगत, शैक्षणिक संस्थानों और समाज के बीच सीमलेस सिनर्जी बनाए रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि व्होल-ओएफ-नेशन एप्रोच को अपनाकर ही भारत अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बना सकता है।

उन्होंने मिलिटरी-सिविल फ्यूजन को लेकर पूर्व सैनिकों के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि वेटरन्स का अनुभव और समर्पण भारत की डिफेंस प्रिपेयर्डनेस को और मजबूती देता है COAS Visits Forward Areas और यह भारत की बैटलफील्ड डॉमिनेंस में अहम भूमिका निभाता है।

Rajnath Singh on Terrorism: रक्षा मंत्री बोले- ऑपरेशन सिंदूर में हमने आतंकियों का धर्म नहीं पूछा, बल्कि आतंक को बनाया निशाना

Rajnath Singh on Terrorism

Rajnath Singh on Terrorism: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 की बालाकोट एयर स्ट्राइक और 2025 के ऑपरेशन सिंदूर को याद करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा अपनी गरिमा और संप्रभुता की रक्षा के लिए निर्णायक कार्रवाई की है।

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उन्होंने साफ कहा, “जब पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में हमने कार्रवाई की, तो हमने आतंकियों का धर्म नहीं पूछा। हमने आतंक पर निशाना साधा- न नागरिकों पर, न सैन्य ठिकानों पर।”

हैदराबाद में आयोजित जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के एक कार्यक्रम में बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत ने आतंकवाद के खिलाफ हर बार साफ और निर्णायक रुख अपनाया। उन्होंने बताया कि जब भी देश की गरिमा, सुरक्षा और नागरिकों की जान पर खतरा आया, तब भारत ने कभी समझौता नहीं किया।

उन्होंने कहा कि 2016 में नियंत्रण रेखा पार कर सर्जिकल स्ट्राइक की गई, 2019 में बालाकोट एयरस्ट्राइक में आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया गया और 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीमा पार आतंक के खिलाफ कड़ा एक्शन लिया गया। इन तीनों ऑपरेशनों ने दिखाया कि भारत किसी भी हमले को बिना जवाब दिए नहीं छोड़ता।

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राजनाथ सिंह ने जोर देकर कहा कि इन कार्रवाइयों में भारत ने कभी किसी नागरिक या सैन्य प्रतिष्ठान को निशाना नहीं बनाया। बल्कि लक्ष्य केवल आतंक और उसके ढांचे को ध्वस्त करना था।

कार्यक्रम में रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत की बढ़ती सैन्य और आर्थिक शक्ति का उद्देश्य किसी पर दबाव बनाना नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत, अध्यात्मिक परंपराओं और भगवान महावीर द्वारा सिखाए गए मानवीय आदर्शों की रक्षा करना है।

उन्होंने कहा कि भारत शांति में विश्वास करता है, लेकिन सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं करेगा। उन्होंने देशवासियों को आश्वस्त किया कि भारत अपनी रक्षा क्षमता को आधुनिक बना रहा है ताकि किसी भी चुनौती का सामना किया जा सके।

राजनाथ सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने रक्षा क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है। 2014 में भारत के रक्षा निर्यात लगभग 600 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 24,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है।

उन्होंने विश्वास जताया कि 2029 तक भारत के रक्षा निर्यात 50,000 करोड़ रुपये के स्तर को पार कर जाएगा। उन्होंने कहा कि तेजस फाइटर जेट, आकाश मिसाइल सिस्टम और अर्जुन टैंक जैसी स्वदेशी प्रणालियां अब भारतीय सशस्त्र बलों को और मजबूत बना रही हैं।

भारत बन रहा है दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब – Rajnath Singh on Terrorism

रक्षा मंत्री ने कहा, “आज भारत खिलौनों से लेकर टैंक तक सब कुछ बना रहा है। भारत तेजी से दुनिया के मैन्युफैक्चरिंग हब की ओर बढ़ रहा है। वह दिन दूर नहीं जब भारत पूरी दुनिया की फैक्ट्री बन जाएगा।”

उन्होंने हाल ही में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड से 97 हल्के लड़ाकू विमान खरीदने के समझौते का जिक्र किया, जिसमें 64 फीसदी से अधिक सामग्री स्वदेशी है। उन्होंने इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक अहम कदम बताया।

आर्थिक मोर्चे पर तेजी से उभर रहा भारत

Rajnath Singh on Terrorism राजनाथ सिंह ने बताया कि भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। 2030 तक भारत का जीडीपी 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे वह तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्टों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 2038 तक परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) के आधार पर भारत दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।