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India-China LAC Patrolling: कोर कमांडर स्तर की बातचीत में भारत ने उठाई थी फिर से पेट्रोलिंग बहाल करने की मांग, चीन बोला- “और समय चाहिए”

India-China LAC Patrolling

India-China LAC Patrolling: भारत और चीन के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर पिछले पांच साल से पेट्रोलिंग बंद है। जून 2020 में हुए गलवान संघर्ष के बाद से अभी तक पूर्वी लद्दाख में कई जगहों पर पूरी तरह से पेट्रोलिंग बहाल नहीं हो पाई है। गलवाान घटना के बाद तनाव कम करने के लिए दोनों देशों ने कुछ इलाकों में पेट्रोलिंग रोकने का फैसला किया था। इस फैसले को “मोरैटोरियम ऑन पेट्रोलिंग” कहा जाता है।

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अब हाल ही में दोनों देशों के बीच 23वीं कोर कमांडर स्तर की बैठक 25 अक्टूबर को लद्दाख के चुशुल-मोल्डो बॉर्डर पॉइंट पर आयोजित की गई थी। इस उच्च-स्तरीय सैन्य वार्ता में भारत ने इस मुद्दे को दोबारा उठाया है और कहा है कि पेट्रोलिंग बंद रहने से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सामान्य स्थिति बहाल नहीं हो पा रही है। बातचीत के दौरान भारतीय पक्ष ने साफ कहा कि मोरैटोरियम चार साल पहले अस्थायी रूप से लगाया गया था, लेकिन अब हालात शांत हैं और एलएसी पर कोई बड़ी घटना नहीं हुई है।

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भारतीय पक्ष के अनुसार, विश्वास का माहौल पहले की तुलना में बेहतर है और कई क्षेत्रों में कोई विवाद नहीं बचा है। इसलिए पेट्रोलिंग बहाल की जानी चाहिए। लेकिन चीनी कमांडर ने जवाब दिया कि उन्हें “थोड़ा और समय” चाहिए। सूत्रों का कहना है कि चीन की ओर से जो अधिकारी इस बैठक में शामिल हुए थे, वे हाल ही में नियुक्त हुए हैं और उन्हें अभी अपने हाई कमान से आगे की मंजूरी लेनी है। इसी वजह से उन्होंने तुरंत कोई फैसला नहीं दिया।

India-China LAC Patrolling

एलएसी के जिन इलाकों में पेट्रोलिंग पर रोक है, उनमें पीपी-16, पीपी-17 और पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट का बड़ा इलाका शामिल है। पैंगोंग झील करीब 130 किलोमीटर लंबी है और गलवान विवाद के बाद यही क्षेत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया था। पेट्रोलिंग रोकने के बाद इन इलाकों में पिछले कुछ वर्षों में कोई बड़ी घटना नहीं हुई है।

भारत का कहना है कि क्षेत्र में शांति बनी रहने के बावजूद चीनी सेना की कुछ टुकड़ियां एलएसी के पास अब भी मौजूद हैं। हालांकि सूत्रों ने बताया कि चीन की तैनाती पिछले साल की तुलना में थोड़ी कम हुई है। भारतीय पक्ष चाहता है कि पूरी तरह से डीस्‍केलेशन हो और दोनों देशों की सेनाएं अपने–अपने स्थायी बेस पर लौटें।

लद्दाख में भारतीय सेना की मौजूदगी बेहद मजबूत है। यहां सेना की 3 डिविजन और यूनिफॉर्म फोर्स की तैनाती है, जो किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहती है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी प्राथमिकता सीमा पर स्थिरता और हालात को अप्रैल 2020 से पहले जैसा बनाना है।

भारत–चीन संबंधों में हाल के दिनों में कुछ सकारात्मक संकेत भी देखे गए हैं। मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू हुई है, दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें भी शुरू हुई हैं सात ही, सिक्किम के नाथूला पास वाले व्यापार मार्ग को भी खोला गया है। यह ऐसे कदम हैं जो बताते हैं कि दोनों देश कुछ मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने के इच्छुक हैं। इसके साथ ही बीजिंग में मार्च महीने में डब्ल्यूएमसीसी यानी वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन की बैठक भी हुई थी। दोनों देशों के बीच जल्द ही फिर ऐसी बैठक होने की संभावना जताई जा रही है।

सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एससीओ की बैठक में शामिल होने के लिए हुई चीन यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई बातचीत ने भी माहौल को सकारात्मक बनाया है। हालांकि पेट्रोलिंग जैसे मुद्दों पर अभी स्पष्ट सहमति नहीं बनी है, लेकिन दोनों पक्ष बातचीत जारी रख रहे हैं ताकि तनाव दोबारा न बढ़े।

गलवान संघर्ष के बाद भारत ने सीमा पर तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास किया है। सड़कें, पुल, सुरंगें और एयरफील्ड लगातार बनाए और अपग्रेड किए जा रहे हैं। हाल ही में भारत ने चीन सीमा से सटे न्योमा एयरफील्ड को भी ऑपरेशन कर दिया है। जहां वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद सी-130जे ट्रांसपोर्ट उड़ा कर उसे वहां लैंड किया। इस एयरफील्ड के ऑपरेशनल होने से भारतीय सेना की तैनाती और लॉजिस्टिक क्षमता काफी मजबूत हुई है।

कुल मिलाकर, India-China LAC Patrolling भारत का रुख साफ है कि पेट्रोलिंग बहाल होनी चाहिए क्योंकि इससे एलएसी पर वास्तविक और स्थायी शांति की दिशा में कदम बढ़ेगा। वहीं, चीन की ओर से “और समय” मांगना बताता है कि बीजिंग फिलहाल हालात का आकलन कर रहा है और आगे के कदम सोच-समझकर उठाना चाहता है।

Explainer DRDO MP-AUV: समझें कैसे समंदर के नीचे बारूदी सुरंगे ढूंढेगा यह स्वदेशी रोबोट, नेवी को मिलेगी बड़ी ताकत

Explainer DRDO MP-AUV

Explainer DRDO MP-AUV: भारत की रक्षा अनुसंधान संस्था DRDO ने भारतीय नौसेना के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीक डेवलप की है। यह तकनीक समुद्र के नीचे छिपी बारूदी सुरंगों यानी माइन को तेजी से ढूंढ सकती है और उनकी पहचान कर सकती है। इसे एमपी-एयूवी, यानी मैन-पोर्टेबल ऑटोनोमस अंडरवॉटर व्हीकल कहा जाता है। आसान शब्दों में समझें तो यह एक छोटा, स्मार्ट और बेहद हल्का पानी के अंदर चलने वाला रोबोट है, जिसे एक या दो लोग आसानी से उठा सकते हैं और किसी भी जगह समुद्र में उतार सकते हैं।

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Explainer DRDO MP-AUV: डीआरडीओ की लैब ने किया तैयार

इस सिस्टम को डीआरडीओ की विशाखापट्टनम स्थित लैब नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लैबोरेटरी ने बनाया है। डीआरडीओ के मुताबिक यह तकनीक भारत की नौसेना को माइन वारफेयर यानी समुद्र में बिछाई गई माइन से निपटने की क्षमता में बड़ी बढ़ोतरी देगी। समुद्री माइन जहाजों, पनडुब्बियों और बंदरगाहों के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं, इसलिए उन्हें ढूंढना और पहचानना नौसेना की सबसे जरूरी जरूरतों में शामिल है।

Explainer DRDO MP-AUV: लगा है साइड-स्कैन सोनार

डीआरडीओ का यह नया एमपी-एयूवी आधुनिक तकनीकों से लैस है। इसमें साइड-स्कैन सोनार लगा है, जो पानी के भीतर समुद्र की सतह की डिटेल्ड तस्वीरें बनाता है। सोनार का काम “ध्वनि तरंगों” की मदद से आसपास की चीजों की पहचान करना होता है। इसके साथ ही इसमें अंडरवॉटर कैमरा लगा है, जो पानी के नीचे की साफ तस्वीरें भेज सकता है। इन दोनों सेंसरों की मदद से यह रोबोट उन वस्तुओं को खोज लेता है जो समुद्री माइन जैसी दिखती हैं।

 

डीप लर्निंग बेस्ड एआई एल्गोरिदम से लैस

लेकिन इसकी सबसे खास बात है इसमें मौजूद डीप लर्निंग आधारित एआई एल्गोरिदम। ये एल्गोरिदम यानी कंप्यूटर दिमाग रोबोट को यह समझने में सक्षम बनाते हैं कि सामने मिली वस्तु वास्तव में माइन है या नहीं। पहले यह काम नौसेना के ऑपरेटरों को खुद करना पड़ता था, जिसमें काफी समय लगता था। लेकिन अब यह सिस्टम खुद-ब-खुद सही पहचान कर लेता है, जिससे मिशन का समय काफी कम हो जाता है और मानवीय गलती की संभावना भी घट जाती है।

एक टीम की तरह काम कर सकते हैं कई एयूवी – Explainer DRDO MP-AUV

डीआरडीओ ने इस सिस्टम में अंडरवॉटर एकॉस्टिक कम्युनिकेशन यानी पानी के अंदर ध्वनि के जरिए एक-दूसरे से बात करने की क्षमता भी शामिल की है। इससे कई एयूवी एक टीम की तरह काम कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर एक रोबोट को कोई माइन जैसी वस्तु मिलती है, तो वह तुरंत बाकी रोबोट्स को सूचना भेज सकता है। इससे पूरा मिशन सुरक्षित हो जाता है।

पूरी तरह मैन-पोर्टेबल

हाल ही में इस एमपी-एयूवी के साथ किए गए ट्रायल्स डीआरडीओ के विशाखापट्टनम हार्बर में पूरे हुए, जहां सिस्टम को असली समुद्री परिस्थितियों में टेस्ट किया गया। डीआरडीओ ने बताया कि सभी महत्वपूर्ण पैरामीटर सफलतापूर्वक पूरे हुए और सिस्टम ने उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन किया।

इस रोबोट की खासियतों में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे पूरी तरह मैन-पोर्टेबल बनाया गया है। यानि यह भारी नहीं है और इसे आसानी से ले जाया जा सकता है। जबकि विदेशी सिस्टम महंगे भी हैं और आकार में बड़े भी। डीआरडीओ का यह सिस्टम इस मामले में भारत के लिए बेहद फायदेमंद होगा क्योंकि यह स्वदेशी है, हल्का है और कम लॉजिस्टिक सपोर्ट की जरूरत पड़ती

है।

डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने इस सिस्टम की तारीफ करते हुए कहा कि यह के लिए “एक बड़ा माइलस्टोन” है। उनके मुताबिक, यह सिस्टम नौसेना को कम समय में ज्यादा क्षेत्र में खोजबीन करने की क्षमता देगा और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगा।

भारत की समुद्री चुनौतियां पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी हैं। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियां, भारतीय जलसीमा के पास विदेशी ड्रोन और सबमरीन की मूवमेंट, तथा बढ़ती समुद्री तस्करी, इन सब परिस्थितियों में समुद्र के नीचे छिपे खतरों को पहचानने वाला यह सिस्टम भारतीय नौसेना के लिए बहुत उपयोगी होगा।

डीआरडीओ ने बताया कि एमपी-एयूवी आने वाले महीनों में उत्पादन के लिए तैयार हो जाएगा। कई इंडस्ट्री पार्टनर्स पहले से ही इसमें शामिल हैं। इसका मतलब है कि यह तकनीक केवल लैब में नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए पूरी तरह तैयार है।

India-US Maritime Cooperation: अमेरिकी दौरे पर भारतीय नौसेना प्रमुख, हिंद-प्रशांत में समुद्री साझेदारी हुई और मजबूत

India–US Maritime Cooperation
Adm Dinesh K Tripathi, held a series of high-level engagements with Adm Samuel J Paparo, Commander, Adm Stephen T Koehler, Commander US Pacific Fleet ;and Lt Gen James F Glynn, Commander U.S. Marine Forces Pacific.

India-US Maritime Cooperation: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी इन दिनों अमेरिका के आधिकारिक दौरे पर हैं। यह यात्रा दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। नौसेना की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह दौरा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में “मुक्त, समावेशी और नियम-आधारित” व्यवस्था को मजबूत बनाने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

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भारत और अमेरिका लंबे समय से समुद्री सुरक्षा में एक-दूसरे के साझेदार रहे हैं। चीन के बढ़ते प्रभाव और उसके दावों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र को और संवेदनशील बना दिया है। ऐसे समय में यह यात्रा न केवल सामरिक दृष्टि से अहम है, बल्कि दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे और समन्वय को भी दिखाती है।

एडमिरल त्रिपाठी की यह यात्रा 10 साल के उस फ्रेमवर्क के बाद हो रही है, जिसे भारत और अमेरिका ने 31 अक्टूबर 2025 को कुआलालंपुर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके अमेरिकी समकक्ष पीट हगसेथ के बीच हुई बैठक में साइन किया था। यह नया फ्रेमवर्क दोनों देशों के रक्षा संबंधों को नई दिशा देने का काम करेगा।

India-US Maritime Cooperation

अमेरिका पहुंचने के बाद भारतीय नौसेना प्रमुख की मुलाकातें अमेरिकी शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ हुईं। इनमें इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर एडमिरल सैमुअल जे. पापारो, यूएस पैसिफिक फ्लीट के कमांडर एडमिरल स्टीफन टी. कोहलर और यूएस मरीन फोर्सेज पैसिफिक के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जेम्स एफ. ग्लिन, शामिल हैं। इन बैठकों में मुख्य रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सामरिक सहयोग और समुद्री सुरक्षा पर चर्चा हुई।

India-US Maritime Cooperation दोनों पक्षों ने अपनी बातचीत में समुद्री सुरक्षा, समुद्री सहयोग, इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाने, और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संयुक्त अभियानों को आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया। चर्चाओं में समुद्री सूचना साझा करने की व्यवस्था को और मजबूत करने पर भी सहमति बनी। आईपीएमडीए और हिंद महासागर क्षेत्र के इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर जैसे प्लेटफॉर्म इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

एडमिरल त्रिपाठी और अमेरिकी अधिकारियों के बीच हुई बैठकों में समुद्री रास्तों की सुरक्षा, महत्वपूर्ण अंडरसी इन्फ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा, और मानवीय सहायता तथा राहत अभियानों में संयुक्त कार्रवाई जैसे मुद्दों पर भी गहन चर्चा हुई। इसके अलावा खोज एवं बचाव मिशन, समुद्री डकैती के खिलाफ संयुक्त प्रयास और समुद्र में अन्य गैर-पारंपरिक चुनौतियों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

इस यात्रा का एक बड़ा फोकस दोनों नौसेनाओं के बीच होने वाले द्विपक्षीय और बहुपक्षीय अभ्यासों को और मजबूत करना रहा। इनमें मालाबार, पासेक्स, सीएमएफ मिलन जैसे अभ्यास शामिल हैं। बातचीत में इन अभ्यासों को और कॉम्प्लेक्स, डायनामिक एंड हाई-लेवल बनाने पर भी जोर दिया गया ताकि दोनों सेनाओं की संयुक्त युद्ध क्षमता मजबूत हो सके।

India-US Maritime Cooperation इस दौरान एमर्जिंग टेक्नॉलॉजीज पर भी गहरी चर्चा हुई। दोनों देशों ने अन्मैन्ड, ISR यानी इंटेलिजेंस-सर्विलांस-रिकॉनेसेन्स टेक्नोलॉजी, साइबर और स्पेस-एनेबल्ड मैरिटाइम ऑपरेशंस में सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह क्षेत्र भविष्य की समुद्री सुरक्षा के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।

भारतीय नौसेना की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भारत अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर भी बातचीत आगे बढ़ा रहा है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया था कि भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद कम करने के बाद अमेरिका भारत के निर्यात पर लगाई गई 50 फीसदी टैरिफ में कमी कर सकता है।

CDS on Indian Defence Industry: निजी डिफेंस कंपनियों पर बरसे सीडीएस चौहान, बोले- सिर्फ मुनाफा नहीं, देशभक्ति भी जरूरी

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CDS General Anil Chauhan

CDS on Indian Defence Industry: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने भारतीय प्राइवेट डिफेंस कंपनियों को साफ संदेश दिया है कि केवल मुनाफा कमाने की सोच से देश की सुरक्षा जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं। उन्होंने कहा कि देश की रक्षा तैयारियों में काम करने वाली कंपनियों को अपने काम में थोड़ी देशभक्ति और राष्ट्रीय भावना जरूर दिखानी चाहिए।

जनरल चौहान ने यह बात यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूशन में आयोजित एक सेमिनार के दौरान कही। सीडीएस का यह बयान तब आया है, जब कई घरेलू कंपनियों पर आरोप लग रहे हैं कि वे इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत दिए गए काम को तय समय पर पूरा नहीं कर रही हैं।

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उन्होंने कहा कि भारतीय सेना ने पांचवे और छठवें इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के लिए जब कई कंपनियों से बात की, तो अधिकांश ने जितना वादा किया, उतना काम पूरा नहीं कर पाए। सीडीएस के मुताबिक, यह स्थिति “अस्वीकार्य” है, क्योंकि डिफेंस प्रोक्योरमेंट में देरी का सीधा असर सेना की क्षमता पर पड़ता है।

CDS on Indian Defence Industry: इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट क्या है?

इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें सेना बिना लंबी सरकारी प्रक्रियाओं के 300 करोड़ रुपये तक के तुरंत कॉन्ट्रैक्ट खुद साइन कर सकती है। इसका उद्देश्य है युद्ध या तनाव की स्थिति में जरूरी हथियार, उपकरण और सिस्टम तुरंत खरीदे जा सकें।

लेकिन सीडीएस के अनुसार, कई भारतीय कंपनियां इस व्यवस्था का फायदा उठाते हुए समय पर डिलीवरी नहीं कर रही हैं, जिससे ऑपरेशनल जरूरतें प्रभावित हो रही हैं।

“70 फीसदी स्वदेशी”- सीडीएस ने झूठे दावों पर जताई नाराजगी

सीडीएस जनरल चौहान ने यह भी कहा कि कई कंपनियां दावा करती हैं कि उनका प्रोडक्ट “70 फीसदी इंडिजिनस (स्वदेशी)” है, लेकिन जांच में यह गलत पाया जाता है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में गलत जानकारी देना बेहद गंभीर है। कई कंपनियां केवल आउटसाइड से आयातित उत्पादों को भारत में असेंबल करके उसे स्वदेशी बताती हैं, जबकि वास्तविक स्वदेशी कंटेंट बहुत कम होता है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि कंपनियों को अपनी असली क्षमता के बारे में पारदर्शी होना चाहिए, ताकि सेना को गलत उम्मीदों में न रखा जाए।

CDS on Indian Defence Industry: क्या कहा इंडस्ट्री ने?

उद्योग जगत के सूत्रों ने स्वीकार किया कि सीडीएस की चिंताएं सही हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि देरी केवल भारतीय कंपनियों की तरफ से ही नहीं होती।

सूत्रों के अनुसार, अमेरिका, फ्रांस, इजराइल और रूस जैसी बड़ी विदेशी कंपनियों ने भी कई प्रोजेक्ट समय पर डिलीवर नहीं किए।

फिर भी, भारतीय निजी कंपनियों से उम्मीद ज्यादा इसलिए की जाती है क्योंकि वे “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” के प्रमुख स्तंभ हैं और उनसे उच्च स्तर की विश्वसनीयता की अपेक्षा की जाती है।

कौन-कौन सी भारतीय कंपनियां निर्यात कर रही हैं?

दिलचस्प बात यह है कि कई भारतीय रक्षा कंपनियां टाटा, एल एंड टी, कल्याणी ग्रुप, एसएमपीपी, एमकेयू, एसएसएस डिफेंस दुनिया के कई देशों को हथियार और सैन्य उपकरण निर्यात कर रही हैं।

हालांकि भारतीय सेना ने अभी तक कई उत्पादों को या तो सीमित संख्या में खरीदा है या ऑर्डर देने की प्रक्रिया में देरी हो रही है।

इसका मतलब यह है कि उत्पादन क्षमता और वैश्विक मार्केट दोनों मौजूद हैं, लेकिन “इंडिजिनस कैपेबिलिटी” और “डिलीवरी टाइमलाइन” को लेकर सवाल उठते रहते हैं।

सीडीएस जनरल चौहान ने साफ कहा कि रक्षा सुधार “वन-वे स्ट्रीट” नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना के साथ काम करने वाली हर कंपनी को अपनी क्षमता, तकनीकी कौशल और उत्पादन क्षमता के बारे में ईमानदार होना चाहिए।

किसी कॉन्ट्रैक्ट में देरी होने का मतलब है, सेना की ऑपरेशनल क्षमता कम होना, सीमा पर तैनात सैनिकों की जरूरतें समय पर पूरी न होना, जिसका राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है।

CDS on Indian Defence Industry सीडीएस ने कहा कि यह जिम्मेदारी बहुत बड़ी है, इसलिए निजी कंपनियों को अपने काम में समयबद्धता और गुणवत्ता दोनों सुनिश्चित करनी चाहिए।

Dubai Airshow 2025: सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम और LCA तेजस दिखाएंगे दुबई एयरशो में जलवा

Dubai Airshow 2025
Suryakiran Aerobatic Team and Tejas fighters landed at Al Maktoum Airbase, Dubai.

Dubai Airshow 2025: भारतीय वायुसेना की एक बड़ी टीम दुबई एयरशो 2025 में हिस्सा लेने के लिए अल मक्तूम एयरबेस पर पहुंच गई है। इस टीम में सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम और स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान शामिल हैं। यह एयर शो 17 से 21 नवंबर 2025 तक आयोजित किया जाना है।

Guwahati Air display: गुवाहटी में ब्रह्मपुत्र के किनारे ब्रह्मोस के साथ सुखोई-30 ने दिखाए जलवे, ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार चिकन नेक कॉरिडोर के पास वायुसेना ने दिखाई ताकत

दुबई (Dubai Airshow 2025) सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम और LCA तेजस दिखाएंगे दुबई एयरशो में जलवापहुंचने पर वायुसेना ने अपने आधिकारिक एक्स–हैंडल पर लिखा कि “दुबई एयर शो के लिए, सूर्यकिरण एरोबेटिक्स टीम और तेजस लड़ाकू विमान समेत वायुसेना के दस्ते ने अल मकतूम एयरबेस पर लैंडिंग की है।” सूर्यकिरण टीम ने भी सोशल प्लेटफॉर्म पर संदेश दिया कि “हेलो दुबई! सूर्यकिरण टीम अल मकतूम एयरपोर्ट पर उतर गई है, दुबई एयर शो 2025 में हिस्सा लेने के लिए।”

सूत्रों के अनुसार, इस तैनाती का उद्देश्य भारत की हवाई क्षमता को दुनिया के सामने पेश करना और मिडिल ईस्ट में डिफेंस डिप्लोमेसी बढ़ाना है। एयर शो में 1,500 से अधिक एग्जीबीटर्स, 490 से अधिक प्रतिनिधिमंडल और 200 से अधिक विमान हिस्सा ले रहे हैं।

Dubai Airshow 2025

सूर्यकिरण टीम 1996 में बनाई गई थी और यह हॉक एमके-132 विमान से प्रदर्शन करती है। पिछले वर्षों में इसने 700 से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनों में भाग लिया है और इसकी सटीक फॉर्मेशन और करतब विश्व प्रसिद्ध हैं। इस बार ‘मेक इन इंडिया’ के तहत डेवलप किए गए तेजस विमान भी इसमें शामिल है।

दुबई (Dubai Airshow 2025) के अल मकतूम एयरबेस पर पहुंचने के बाद वायुसेना के विंग कमांडर अशिष सुधीर मोगे ने बताया कि भारतीय दल में करीब 180 सदस्य शामिल हैं। वायुसेना अधिकारियों ने बताया कि इस पूरे अभियान के लिए बड़े स्तर पर तैयारी की गई है। सूर्यकिरण टीम ने सीधे उड़ान भरी, जबकि कुछ उपकरणों और स्टाफ को सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130J जैसे सैन्य परिवहन विमानों द्वारा भेजा गया है।

दुबई एयरशो (Dubai Airshow 2025) में भारतीय वायुसेना का प्रदर्शन दुनिया की कई प्रसिद्ध टीमों के साथ होगा। इसमें सऊदी हाक्स, रूसी नाइट्स और यूएई की अल फुर्सान जैसी टीमें भी शामिल हैं। एयर शो में तेजस और सूर्यकिरण के स्टैटिक व एयर डिस्प्ले दोनों होने हैं। स्टैटिक डिस्प्ले में विमान को करीब से देखने का अवसर होगा, जबकि एयर डिस्प्ले में सूर्यकिरण टीम अपनी फॉर्मेशन फ्लाइंग और करतब दिखाएगी। तेजस भी अपनी मैन्यूवेरेबिलिटी और एरोडायनामिक क्षमता का प्रदर्शन करेगा।

Gajraj Corps: 16,000 फीट पर भारतीय सेना का अनोखा कारनामा, जवानों को रसद की सप्लाई के लिए बनाई हाई एल्टीट्यूड मोनो रेल

Gajraj Corps high High Altitude Mono Rail System India

Gajraj Corps: अरुणाचल प्रदेश के कई दुर्गम इलाकों में भारतीय सेना तैनात है। कई इलाके तो ऐसे हैं जहां तक रसद पहुंचा बेहद मुश्किल होता है। लेकिन एक कहावत है, “आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है।” भारतीय सेना ने कुछ ऐसा ही किया। 16,000 फीट की अत्यंत कठिन ऊंचाई पर कामेंग हिमालय में रसद सप्लाई के लिए भारतीय सेना ने एक ऐसा ही कारगर तरीका निकला।

भारतीय सेना की गजराज कोर ने इस इलाके में एक स्वदेशी हाई एल्टीट्यूड मोनो रेल सिस्टम को सफलतापूर्वक डेवलप किया औऱ उसे तैनात भी किया। यहां मौसम, भूगोल और कटे हुए रास्ते सेना की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।

Indian Army Vidyut Rakshak: भारतीय सेना को ‘विद्युत रक्षक’ को मिला पेटेंट, भारतीय सेना के मेजर राजप्रसाद ने किया है डेवलप

Gajraj Corps: पहाड़ियां बेहद खड़ी और पथरीली

कामेंग सेक्टर भारत-चीन सीमा के पास स्थित एक ऐसा इलाका है, जहां मौसम अचानक बदल जाता है, सर्दियों में तापमान -30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और बर्फीले तूफान कई दिनों तक रास्तों को बंद कर देते हैं। यहां की पहाड़ियां बेहद खड़ी और पथरीली हैं, जिन पर सामान ढोना या बड़ी संख्या में जवानों तक जरूरी सामान की सप्लाई करना अक्सर असंभव हो जाता है। सेना की फॉरवर्ड पोस्टें कई बार लंबे समय तक बाहरी संपर्क से कट जाती हैं और जिससे सप्लाई लाइन पर असर पड़ता है। ऐसे कठिन माहौल में गजराज कोर ने एक ऐसा उपाय खोज निकाला है, जो न सिर्फ तकनीकी रूप से बेहद कुशल है, बल्कि बेहद व्यावहारिक भी है।

Gajraj Corps: खराब मौसम में हेलिकॉप्टर नहीं भर पाते उड़ान

Gajraj Corps ,सेना द्वारा निर्मित यह हाई एल्टीट्यूड मोनो रेल सिस्टम पूरी तरह भारतीय इंजीनियरिंग और स्थानीय संसाधनों के सहयोग से विकसित किया गया है। सेना के इंजीनियरों ने लंबे समय तक इलाके का अध्ययन किया और पाया कि इस ऊंचाई पर पारंपरिक सप्लाई तरीके कारागर नहीं हैं। जब मौसम खराब होता है, तब हेलिकॉप्टर उड़ान नहीं भर पाते और बर्फ जमने या भूस्खलन की वजह से रास्ते पूरी तरह बंद हो जाते हैं। कई बार सैनिकों को कंधों पर भारी वजन उठाकर घंटों चलना पड़ता है, जिससे न सिर्फ समय बर्बाद होता है बल्कि जोखिम भी बढ़ जाता है। इसी को देखते हुए सेना ने ऐसा समाधान खोजा, जिसे किसी भी मौसम में, दिन और रात दोनों समय इस्तेमाल किया जा सके।

Gajraj Corps: ढो सकता है 300 किलो तक वजन

यह मोनो रेल सिस्टम एक मजबूत स्टील ट्रैक पर आधारित है, जिसके सहारे एक विशेष रूप से डिजाइन की गई ट्रॉली खड़ी चट्टानों और ढलानों के बीच ऊपर-नीचे चलती है। इसे इतनी मजबूती से तैयार किया गया है कि यह बर्फ, तूफान और तेज हवाओं में भी बिना रुके काम कर सके। यह सिस्टम एक बार में 300 किलो से अधिक वजन ले जाने में सक्षम है। इसका मतलब है कि गोला-बारूद, राशन, पानी, ईंधन, इंजीनियरिंग उपकरण, वायरलेस सेट, मेडिकल सप्लाई और अन्य भारी सामान अब बिना किसी देरी के दुर्गम पोस्टों तक पहुंचाई जा सकती है। यह वही सामान है, जिसकी कमी के कारण कई बार फॉरवर्ड पोस्टों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता था।

इस सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब सप्लाई लाइन हर मौसम में चालू रहती है। जब सड़कें बंद होती हैं, तब भी मोनो रेल बिना रुके अपना काम करती रहती है। तत्काल जरूरत की वस्तुओं जैसे दवाइयां या गोला-बारूद को तेजी से पहुंचाना संभव हो गया है। मोनो रेल के शुरू होने के बाद सप्लाई संबंधी समस्याएं काफी हद तक खत्म हो गई हैं।

Gajraj Corps: मोनो रेल सिस्टम स्ट्रेचर का भी करता है काम

वहीं, अगर किसी जवान को चोट लग जाए, तो पहाड़ों में उसे नीचे तक लाना बेहद कठिन काम होता है। हेलिकॉप्टर कई बार लैंड नहीं कर पाते और पथरीले रास्तों पर स्ट्रेचर लेकर चलना भी जोखिम भरा होता है। अब मोनो रेल सिस्टम पर स्ट्रेचर रखकर घायल सैनिक को सुरक्षित और तेजी से नीचे लाया जा सकता है। इससे जान बचाने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है और यह सुविधा पहाड़ों में संचालित होने वाले अभियानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

इन-हाउस किया तैयार

गजराज कोर ने इसे पूरी तरह इन-हाउस तैयार किया है। इसमें किसी निजी कंपनी द्वारा न कोई मशीन दी गई और न ही कोई विदेशी उपकरण इस्तेमाल किए गए। स्थानीय परिस्थितियों, मौसम और इलाके की प्राकृतिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए इस सिस्टम को इंजीनियरों ने खुद डिजाइन किया, तैयार किया और इसे फिट किया। सिस्टम को जगह पर लगाने के बाद कई स्तरों पर इसका परीक्षण किया गया और यह पाया गया कि यह बिना किसी कठिनाई के 24 घंटे काम कर सकता है। इसके बाद सेना ने इसे पूरी तरह ऑपरेशनल घोषित कर दिया।

कामेंग सेक्टर LAC के पास होने के कारण सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां किसी भी समय आपात स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में जरूरी सामान का समय पर पहुंचना बेहद आवश्यक होता है। मोनो रेल सिस्टम ने इस चिंता को बहुत हद तक दूर कर दिया है। इस सिस्टम के कारण सैनिकों पर शारीरिक बोझ कम हुआ है और खतरनाक रास्तों पर आने-जाने की जरूरत कम हो गई है।

16,000 फीट की ऊंचाई पर ऐसा Gajraj Corps प्रोजेक्ट लगाना अपने-आप में एक इंजीनियरिंग चुनौती है। इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन कम होती है, तापमान अत्यंत कम होता है और मशीनें जल्दी खराब होती हैं। लेकिन सेना ने इन सभी बाधाओं को पार करके इसे सफलतापूर्वक पूरा किया।

Su-30MKI ASPJ: सुखोई-30 को मिलेगा नया “अदृश्य कवच”, छू भी नहीं पाएंगी दुश्मन की मिसाइलें, स्वदेशी जैमर पॉड के लिए जारी की RFI

Su-30MKI ASPJ

Su-30MKI ASPJ: भारतीय वायुसेना अपने सबसे भरोसेमंद सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमानों के बेड़े को और एडवांस बनाने की तैयारी कर रही है। वायुसेना ने हाल ही में एयरक्राफ्ट सेल्फ-प्रोटेक्शन जैमर (एएसपीजे) सिस्टम की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) जारी किया है। यह सिस्टम विमान को दुश्मन के रडार, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक हमलों से बचाने में मदद करेगा।

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यह खरीद प्रक्रिया पूरी तरह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम से जुड़ी है। अक्टूबर के आखिर में जारी आरएफआई के तहत वायुसेना चाहती है कि इन जैमर पॉड्स में कम से कम 50 फीसदी स्वदेशी सामग्री हो। इस खरीद के तहत सभी 100 एएसपीजे पॉड और उससे जुड़े उपकरणों की डिलीवरी 36 महीनों के भीतर पूरी की जानी है।

Su-30MKI ASPJ: सुपर सुखोई प्रोग्राम का हिस्सा

यह पहल भारतीय वायुसेना के महत्वाकांक्षी सुपर सुखोई प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसके तहत 260 से ज्यादा सुखोई-30 विमानों को 4.5 जनरेशन के स्तर तक अपग्रेड किया जा रहा है। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 65,000 करोड़ रुपये है और इसमें नया AESA रडार, नया ग्लास कॉकपिट, आधुनिक सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और नई मिसाइलें शामिल होंगी।

सुखोई-30 भारतीय वायुसेना की रीढ़ है और फिलहाल वायुसेना के लगभग 60 फीसदी फाइटर जेट्स इसी कैटेगरी के हैं। यह विमान 2002 से सेवा में है और इसे लगातार अपडेट किया जा रहा है। इस विमान में पहले से ही ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल जैसे एडवांस वेपंस लगे हुए हैं। अब इन नए एएसपीजे पॉड के आने से विमान की सर्वाइवल क्षमता और बढ़ जाएगी।

Su-30MKI ASPJ: क्या है एएसपीजे

वायुसेना ने आरएफआई में एएसपीजे के लिए कई तकनीकी शर्तें तय की हैं। इसमें AESA आधारित जामिंग तकनीक,डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमरी (डीआरएफएम), 360-डिग्री कवरेज, गैलियम नाइट्राइड (GaN) बेस्ड ट्रांसमीटर और रियल-टाइम थ्रेट अडप्टेशन जैसी क्षमताएं शामिल हैं। डीआरएफएम तकनीक दुश्मन के रडार को भ्रमित करने और फॉल्स टारगेट बनाने के लिए इस्तेमाल होती है। इसका इस्तेमाल कई आधुनिक लड़ाकू विमानों में किया जाता है।

यह पूरा सिस्टम सुखोई-30 के मौजूदा एवियोनिक्स, जैसे रडार वार्निंग रिसीवर (आरडब्ल्यूआर), मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और डेटा लिंक के साथ पूरी तरह इंटीग्रेट किया जाएगा। एएसपीजे पॉड विमान के अंडर-विंग पाइलॉन पर लगाया जाएगा और इससे विमान की उड़ान क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

Su-30MKI ASPJ: इन कंपनियों ने बनाए एएसपीजे

भारत के कई स्वदेशी रक्षा उद्योग इस परियोजना में भाग लेने के लिए तैयार हैं। चेन्नई की कंपनी डेटा पैटर्न ने पहले ही अपने टैलोन शील्ड एएसपीजे पॉड का डेमो पेश किया है जो गैलियम नाइट्राइड (GaN) बेस्ड एईएसए का इस्तेमाल करता है। इस सिस्टम ने सुखोई-30 पर ग्राउंड टेस्ट पूरा कर लिया है और फ्लाइट टेस्ट जारी हैं। यह सिस्टम विदेश से काफी सस्ता है और लगभग 70 फीसदी तक स्वदेशी है।

इसके अलवा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड भी डीआरडीओ की डेवलपमेंट एजेंसी डीएआरई के साथ मिलकर इस पॉड को बना रही है। बीईएल इजराइल की एल्टा कंपनी के साथ तकनीकी सहयोग कर सकती है, क्योंकि एल्टा का स्कॉर्पस सिस्टम दुनिया का सबसे आधुनिक स्टैंड-ऑफ जैमर माना जाता है।

इसके अलावा एलएंटी डिफेंस भी डीआरएफएम तकनीक पर काम कर रही है। इस परियोजना में कई एमएसएमई भी शामिल होंगी जो पावर एम्प्लीफायर, आरएफ मॉड्यूल, डिजिटल प्रोसेसर और अन्य सब-इक्विपमेंट बनाएंगी। इस तरह यह परियोजना भारत में एक बड़ा डिफेंस सप्लाई चेन नेटवर्क तैयार करेगी।

Su-30MKI ASPJ: स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर आर्किटेक्चर

वायुसेना ने आरएफआई में यह भी उल्लेख किया है कि यह परियोजना न केवल सुखोई-30 के लिए, बल्कि भविष्य के कई लड़ाकू विमानों जैसे तेजस एमके-1ए, तेजस एमके-2 और एमएससीए के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम के डेवलपमेंट में भी मदद करेगी। एएसपीजे पॉड को “स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिकक वारफेयर आर्किटेक्चर” के तौर पर देखा जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान महसूस हुई थी जरूरत

सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सुखोई-30 में एएसपीजे की काफी जरूरत महसूस की गई थी। उस समय पाकिस्तान के साथ सीमा पर हुए संघर्ष में इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर क्षमताए बेहद अहम साबित हुई थीं। रिपोर्टों के अनुसार, सुखोई-30 विमानों को कई बार दुश्मन के रडार और मिसाइल लॉक से बचने के लिए आक्रामक और रक्षात्मक इलेक्ट्रॉनिक उपायों का सहारा लेना पड़ा था। एएसपीजे पॉड की कमी महसूस की गई थी क्योंकि पुराने सैप-518 और ईएल/एल-8222 पॉड अब मॉडर्न वारफेयर की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे थे।

इसी के चलते https://indianairforce.nic.in/ ने इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को प्राथमिकता दी और एएसपीजे के लिए आरएफआई जारी कर दी। एएसपीजे पॉड के आने के बाद सुखोई-30 की इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा 30 से 40 फीसदी तक बढ़ने की संभावना है। क्योंकि जामिंग सिस्टम दुश्मन के फायर-कंट्रोल रडार को जैम कर सकता है, बल्कि जीपीएस सिग्नल को प्रभावित कर सकता है और विमान के आसपास एक ‘इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा घेरा’ तैयार कर सकता है।

सूत्रों का कहना है कि अगले साल की शुरुआत तक चयनित कंपनियों को रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया जाएगा। अनुमान है कि 2027 तक प्रोटोटाइप तैयार हो सकते हैं और 36 महीनों में सभी 100 एएसपीजे पॉड वायुसेना को मिल जाएंगे।

LAC geo-tagging: लद्दाख में सेना ने पूरी की जियो-टैगिंग, चीन के दावों को गलत बताने के लिए बड़ी तैयारी

LAC geo-tagging
File Photo

LAC geo-tagging: पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर जारी गतिरोध के बीच भारतीय सेना ने सर्दियों की तैयारी तेज कर दी है। यह लगातार छठवां साल है जब भारतीय सैनिक कठोर ठंड, बर्फबारी और दुर्गम इलाकों में तैनात रहेंगे। हालांकि 2024 में भारत और चीन के बीच डिसएंगेजमेंट तो जरूर हो गया था, लेकिन डी-एस्केलेशन अभी तक नहीं हुआ है। दोनों देशों के सैनिक अभी भी बड़े पैमाने पर एलएसी के दोनों तरफ तैनात हैं।

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सेना के अधिकारियों ने बताया कि इस बार की सर्दियों के लिए सेना का फोकस दो अहम बातों पर है जियो-टैगिंग का पूरा होना और सर्विलांस नेटवर्क को मजबूत करना। इन दोनों कदमों को सर्दियों में तैनाती और पेट्रोलिंग की चुनौती को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

LAC geo-tagging लगभग पूरी, प्रमुख जगहें डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज

LAC geo-tagging सूत्रों के मुताबिक, सेना ने इस साल एलएसी की कई महत्वपूर्ण जगहों, पेट्रोलिंग पॉइंट्स, चोटियों और लैंडमार्क्स का जियो-टैगिंग पूरा कर लिया है। जियो-टैगिंग के तहत हर स्थान को डिजिटल मैप में उसके सटीक लोकेशन डेटा के साथ दर्ज किया जाता है।

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स्थानीय कमांडर सर्दियों के बाद इन स्थानों का फील्ड-वेरिफिकेशन करेंगे। यह प्रक्रिया एलएसी की स्पष्ट पहचान, विवादित जगहों को समझने और भविष्य की सैन्य स्तर की बातचीत में मदद करने के लिए जरूरी है। अधिकारियों का कहना है कि इससे पेट्रोलिंग और निगरानी और अधिक व्यवस्थित ढंग से की जा सकेगी।

LAC geo-tagging: सर्दियों के लिए सैनिकों की पुनःतैनाती

कठिन सर्दियों में कई ऊंचे पोस्ट बर्फ से पूरी तरह कट जाते हैं। ऐसे में सेना कुछ फॉरवर्ड पोस्ट से अस्थायी रूप से सैनिकों को नीचे के प्लाटून और कंपनी स्तर के ठिकानों पर तैनात करती है। यह प्रक्रिया इस साल भी अपनाई जाएगी।

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सूत्रों ने बताया कि कुछ यूनिट्स में छुट्टियों के प्रतिशत में भी बदलाव किया जाएगा ताकि गर्मियों के समय अधिक सैनिक उपलब्ध रहें। इसका उद्देश्य है कि बर्फ गलने के बाद ऑपरेशनल डेंसिटी बढ़ाई जा सके।

निगरानी नेटवर्क और मजबूत 

भारतीय सेना ने इस साल एलएसी पर 24×7 निगरानी नेटवर्क को बढ़ाया जा रहा है। इसमें लॉन्ग-रेंज कैमरे, हाई-रिजॉल्यूशन सेंसर, ड्रोन और हाई-एल्टीट्यूड यूएवी, हेलीकॉप्टर आधारित विंटर सर्विलांस सॉर्टीज शामिल हैं। इन सिस्टम्स का उद्देश्य एलएसी के बड़े हिस्से पर नजर रखना है, ताकि अतिरिक्त पेट्रोलिंग की जरूरत कम हो और निगरानी लगातार जारी रहे।

सेना के एक अधिकारी ने बताया कि सर्दियों में भी यह निगरानी जारी रहेगी, और जब जरूरी होगा तभी सीमित संख्या में कोऑर्डिनेटेड पेट्रोलिंग की जाएगी।

एलएसी पर शांति, लेकिन भरोसे की कमी बरकरार

पिछले एक साल में एलएसी पर हालात शांत रहे हैं। 2024 में रूस के कजान शहर में हुई मोदी और शी की बातचीत के बाद देपसांग और देमचोक में डिसएंगेजमेंट पूरा हुआ और पेट्रोलिंग भी बहाल हुई। इसके बावजूद भरोसे की कमी बनी हुई है और दोनों ओर सैनिकों की तैनाती कम नहीं हुई है।

पूर्वी लद्दाख के सेक्टर में सेना की एक डिविजन तैनात है, जिसमें से दो ब्रिगेड रिजर्व रखी गई हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय राइफल्स की यूनिट्स भी इस क्षेत्र में तैनात हैं ताकि किसी आपात स्थिति पर तेजी से कार्रवाई की जा सके।

23वें दौर की भारत-चीन सैन्य वार्ता में सहमति

LAC geo-tagging पिछले दिनों चुशूल-मोल्डो में भारत और चीन के बीच 23वें दौर की सैन्य वार्ता हुई। दोनों पक्षों ने कहा कि मौजूदा मैकेनिज्म के माध्यम से किसी भी स्थिति का समाधान किया जाएगा और सीमा पर स्थिरता बनाए रखी जाएगी।

Pakistan drone ToT: पाकिस्तान गुपचुप कर रहा है यह खास ड्रोन डील, यूरोपियन कंपनी के साथ हुए गुप्त समझौते पर भारतीय एजेंसियों की नजर

Pakistan drone ToT
Pakistan Shahpar-II UAV (File Photo)

Pakistan drone ToT: भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इन दिनों पाकिस्तान और एक यूरोपीय ड्रोन कंपनी के बीच हुए कथित ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी समझौते पर कड़ी नजर रख रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह समझौता पाकिस्तान की सरकारी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हेवी इंडस्ट्रीज तक्षिला के साथ हुआ है, जिसे पाकिस्तान बेहद गोपनीय रखने की कोशिश कर रहा है।

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सूत्रों ने बताया कि यह पूरा मामला हाल के महीनों में तब सामने आया जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की ड्रोन गतिविधियों को बारीकी से मॉनिटर किया। अधिकारी के अनुसार, ऑपरेशन के बाद पाकिस्तान के सैन्य अधिकारी यूरोप, रूस और यूक्रेन के विभिन्न ड्रोन निर्माताओं से संपर्क में थे। उद्देश्य था ऐसे मिलिट्री ग्रेड मीडियम-एल्टीट्यूड लॉन्ग-एंड्योरेंस (MALE) ड्रोन हासिल करना, जो उसकी ड्रोन क्षमता बढ़ा सकते हैं।

Pakistan drone ToT

ये ड्रोन हाई एल्टीट्यूड पर उड़ान भर सकते हैं, और सर्विलांस के साथ अटैक भी कर सकते हैं। अगर यह डील पूरी होती है तो पाकिस्तान की ड्रोन वॉरफेयर कैपेबिलिटी में बड़ा बूस्ट मिलेगा। सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान अपनी ड्रोन फोर्स को डाइवर्सिफाई करना चाहता है ताकि सिर्फ तुर्की या चीन पर निर्भर न रहे। अगर यह डील पूरी हुई तो 2027-28 तक पाकिस्तान खुद MALE ड्रोन्स बना सकेगा।

ड्रोन टेक्नोलॉजी पर इन दिनों पूरी दुनिया का ध्यान है। रूस–यूक्रेन युद्ध में दोनों देशों ने ड्रोन का इस्तेमाल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर, मिलिट्री इंस्टालेशंस और लंबी दूरी के लक्ष्यों पर हमले करने के लिए किया है। कई बार ड्रोन ने सीमा से सैकड़ों किलोमीटर अंदर जाकर रिफाइनरी और लॉजिस्टिक हब को नुकसान पहुंचाया।

अंदाजा लगाया जा रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने कई विदेशी कंपनियों से संपर्क किया था। इनमें यूक्रेन की कंपनी अंतानोव और यूक्रोबोरोनप्रोम भी शामिल हैं। इसके अलावा ईस्टर्न यूरोप की प्राइवेट फर्म और रूस से भी संपर्क किया था। सूत्रों का कहना है कि यूक्रेन रूस के खिलाफ ड्रोन वॉर में एक्सपर्ट हो गया है। यूक्रेन की कंपनियां टीबी2 जैसी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करती हैं। वहीं पाकिस्तान पहले से यूक्रेनी टैंक इंजन्स लेता रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन सिस्टम ने भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मई 2025 की रात पाकिस्तान ने पूरे पश्चिमी मोर्चे पर कई बार ड्रोन और दूसरे म्यूनिशंस का इस्तेमाल किया, जिन्हें भारतीय सेनाओं ने प्रभावी तरीके से रोक दिया था। इस ऑपरेशन के बाद भारत ने ड्रोन वारफेयर से जुड़ी गतिविधियों की निगरानी और बढ़ा दी है।

Pakistan drone ToT के बारे में अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तान का यह संभावित ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी समझौता अगर आगे बढ़ता है, तो उसकी ड्रोन क्षमता में बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि भारत की सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे मसले को बेहद बारीकी से देख रही हैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान को ड्रोन या तकनीकी उपकरणों की डिलीवरी कब होगी, लेकिन भारतीय एजेंसियां इस सौदे से जुड़ी हर गतिविधि को मॉनिटर कर रही हैं।

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AH-64E Apache Helicopters
Indian Air Force’s First Batch Of 4 Number Of Apache Attack Helicopters (File Photo)

Apache Helicopter Delivery: भारतीय सेना के लिए अमेरिका से भेजे जा रहे तीन अपाचे हेलीकॉप्टरों को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। ये हेलीकॉप्टर भारत आने वाले थे, लेकिन बीच रास्ते में ही पूरी योजना बदल गई और हेलीकॉप्टरों को लेकर उड़ान भर रहे एंटोनोव एएन-124 कार्गो जहाज को अचानक अमेरिका लौटना पड़ा। सूत्रों का कहना है कि यह देरी साधारण तकनीकी वजहों से नहीं, बल्कि तुर्किये द्वारा एयरस्पेस परमिशन न देने की वजह से हुई है।

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Apache Helicopter Delivery

सूत्रों के अनुसार, 30 अक्टूबर को अपाचे हेलीकॉप्टरों को अमेरिका के एरिजोना राज्य के मेसा शहर में स्थित बोइंग फैसिलिटी से एंटोनोव एएन-124 विमान में लोड किया गया था। ये हेलीलॉप्टर भारत के लिए पेंट किए गए थे और भारतीय सेना को सौंपे जाने थे। इस कार्गो विमान ने 1 नवंबर को अमेरिका से उड़ान भरी और ब्रिटेन के ईस्ट मिडलैंड्स एयरपोर्ट पर लैंड किया। वहां यह विमान सामान्य से कहीं अधिक लगभग आठ दिनों तक खड़ा रहा।

आमतौर पर हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी में इतना लंबा स्टॉपओवर नहीं होता। कई दिनों तक इंतजार के बाद यह उम्मीद थी कि विमान भारत के लिए उड़ान भरेगा, लेकिन इसके उलट, विमान ने 8 नवंबर को वापस अमेरिका लौटने का फैसला लिया। विमान वापस मेसा गेटवे एयरपोर्ट पहुंच गया। यहां उतरने के बाद हेलीकॉप्टरों को वापस ग्राउंड पर उतारा गया और उनकी तस्वीरें भी सामने आईं, जिनमें वे रोटर ब्लेड हटाए हुए दिखाई दिए।

Apache Helicopter Delivery बोइंग की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि डिलीवरी लॉजिस्टिक इश्यूज की वजह से रोकी गई है। कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि वे ‘बाहरी कारणों’ से हुई इस दिक्कत की जांच कर रहे हैं और अमेरिकी सरकार व भारतीय सेना के साथ मिलकर समस्या को जल्द सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि कंपनी ने यह नहीं बताया कि दिक्कत कार्गो विमान में थी, या किसी कागजी कार्रवाई की वजह से। या फिर अनुमोदन में, या किसी फिर तकनीकी वजह से।

Apache Helicopter Delivery रक्षा और सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस बार डिलीवरी रूट तुर्किये के एयरस्पेस से होकर आने वाला था। पिछले बैच के समय अपाचे इसी रास्ते से भारत पहुंचे थे। लेकिन इस बार तुर्किये ने मंजूरी नहीं दी। इस वजह से विमान को कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं मिला और उसे अपाचे के साथ वापस अमेरिका लौटना पड़ा। भारतीय अधिकारियों ने अक्टूबर में तुर्किये के राष्ट्रीय दिवस समारोह में शामिल होने से इंकार कर दिया था। यह फैसला इसलिए लिया गया था क्योंकि तुर्किये ने पाकिस्तान का खुले तौर पर समर्थन किया था और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये ने बार-बार भारत के खिलाफ बयान दिए। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र मंचों पर कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की।

Apache Helicopter Delivery

हालांकि यह पहला मौका है जब इस कूटनीतिक तनाव का सीधा असर किसी डिफेंस डिलीवरी रूट पर देखने को मिला है। भारतीय सेना के लिए छह अपाचे हेलीकॉप्टरों का यह सौदा फरवरी 2020 में 796 मिलियन डॉलर की लागत से किया गया था। पहले तीन हेलीकॉप्टर जुलाई 2025 में भारत पहुंच चुके हैं और इनकी ट्रेनिंग महाराष्ट्र के नासिक स्थित आर्मी एविएशन ट्रेनिंग स्कूल में दी जा रही है। जहां ये हेलीकॉप्टर राजस्थान में जोधपुर के पास स्थित नागतालाओ आर्मी एविएशन बेस पर तैनात किए जाने हैं।

Apache Helicopter Delivery अपाचे हेलीकॉप्टर दुनिया के सबसे एडवांस अटैक हेलीकॉप्टरों में से एक माने जाते हैं। इन हेलीकॉप्टरों को “फ्लाइंग टैंक किलर” भी कहा जाता है। यह दुश्मन के टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां, हेलीकॉप्टर, ड्रोन को निशाना बना सकता है। एएच-64ई मॉडल में लॉन्गबो रडार, हेलफायर मिसाइलें, 30 एमएम चेन गन, नाइट-ऑपरेशन उपकरण और आधुनिक सेंसर लगे होते हैं, जिससे यह मुश्किल इलाकों में भी ऑपरेशन कर सकते हैं। अमेरिकी कंपनी बोइंग पहले भी भारतीय वायुसेना को 22 एएच-64ई हेलीकॉप्टर सौंप चुकी है। सेना अब इन्हीं हेलीकॉप्टरों का अपना बेड़ा तैयार कर रही है।