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AUSTRAHIND 2025: पर्थ में चल रही है भारत-ऑस्ट्रेलिया की सेनाओं के बीच जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज ‘ऑस्ट्राहिंद 2025’, आतंकवाद-रोधी अभियानों पर फोकस

AUSTRAHIND 2025

AUSTRAHIND 2025: भारत और ऑस्ट्रेलिया की सेनाओं के बीच इन दिनों जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज ‘ऑस्ट्राहिंद 2025’ चल रही है। यह इस एक्सरसाइज का चौथा संस्करण है, जो 13 अक्टूबर से 26 अक्टूबर तक ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर में आयोजित किया जा रहा है। इस साल के अभ्यास का मुख्य उद्देश्य दोनों सेनाओं के बीच जॉइंट आतंकवाद-रोधी अभियानों और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में सहयोग बढ़ाना है।

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AUSTRAHIND 2025

यह एक्सरसाइज दिखाती है कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। इसमें भारत और ऑस्ट्रेलिया की सेनाएं अर्बन और सेमी-अर्बन इलाकों में जॉइंट ट्रेनिंग कर रही हैं, ताकि वे आधुनिक युद्ध परिस्थितियों में मिलकर काम करने की क्षमता डेवलप कर सकें। इस दौरान सैनिकों ने कई टैक्टिकल ड्रिल्स और स्ट्रैटेजिक सिचुएशंस का अभ्यास किया।


‘ऑस्ट्राहिंद’ के दौरान दोनों सेनाओं ने संयुक्त रूप से काउंटर टेररिज्म, हाउस क्लियरिंग, होस्टेज रेस्क्यू और मल्टीनेशनल कोऑर्डिनेशन जैसे अभियान भी किए। इन अभियानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में भारत और ऑस्ट्रेलिया किसी भी संयुक्त मिशन, जैसे मानवीय सहायता या शांति स्थापना, में एक साथ कुशलता से काम कर सकें। सैन्य अभ्यास के अलावा, दोनों देशों के जवानों ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान किया। जवानों ने एक-दूसरे की परंपराओं और रीति-रिवाजों को साझा किया।

Indian Navy Commanders Conference 2025: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद नौसेना की पहली बड़ी कॉन्फ्रेंस, रणनीतिक तैयारियों पर रहेगा फोकस

Indian Navy Commanders Conference 2025
Indian Navy Commanders Conference 2025: Focus on Operation Sindoor, Combat Preparedness and Maritime Security (File Photo)

Indian Navy Commanders Conference 2025: भारतीय नौसेना की कमांडर्स कॉन्फ्रेंस नौसेना के टॉप अधिकारियों की सबसे बड़ी बैठक होती है। यह साल में दो बार आयोजित की जाती है, जहां रक्षा, सुरक्षा, ऑपरेशंस और भविष्य की योजनाओं पर बात होती है। 2025 में यह कॉन्फ्रेंस दो एडिशन में हो रही है। पहली अप्रैल में हो चुकी है, और दूसरी 22-24 अक्टूबर 2025 को नई दिल्ली में हो रही है। इस बार की यह कॉन्फ्रेंस इसलिए भी खास है, क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसका आयोजन हो रहा है।

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इस सम्मेलन में नौसेना की युद्धक तैयारियों, सैन्य अभियानों और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की मैरिटाइम पावर प्रोजेक्शन पर विशेष चर्चा की जाएगी। नौसेना के टॉप कमांडरों का फोकस इस बात पर है कि कैसे इंडियन नेवी, भारतीय थलसेना, भारतीय वायुसेना और भारतीय तटरक्षक बल के साथ मिलकर इंटरऑपरेबिलिटी और जॉइंट ऑपरेशन क्षमता को और मजबूत किया जा सके।

सम्मेलन के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कैबिनेट सचिव भी नौसेना अधिकारियों को संबोधित करेंगे और राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा नीति और ‘विकसित भारत 2047’ के विजन से जुड़ी सरकार की प्राथमिकताओं अपने विचार रखेंगे। सम्मेलन के एजेंडे में देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक हितों की रक्षा और महासागर विजन (म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्युरिटी अक्रोस ऑल रीजंस) को आगे बढ़ाना शामिल है।

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नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी अपने कमांडरों के साथ मिलकर हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा हालात, ट्रेनिंग, रिसोर्सेज और ऑपरेशनल आवश्यकताओं की समीक्षा करेंगे। इसमें विशेष रूप से वेस्टर्न और ईस्टर्न सीबोर्ड्स पर नौसेना की तैनाती और ‘मेक इन इंडिया’ के तहत स्वदेशी प्लेटफॉर्मों के डेवलपमेंट पर जोर दिया जाएगा।

सम्मेलन के दौरान सीडीएस, वायुसेना प्रमुख भी नौसेना की टॉप लीडरशिप के साथ चर्चा करेंगे। इन चर्चाओं का उद्देश्य जॉइंट प्लानिंग और संसाधनों के कुशल तरीके से इस्तेमाल को बढ़ावा देना है ताकि भविष्य की जटिल सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।

इस बार के सम्मेलन में आधुनिक तकनीकों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। नौसेना की चर्चा का एक प्रमुख हिस्सा इस पर भी होगा कि कैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और बिग डेटा एनालिटिक्स जैसी तकनीकों को कॉम्बैट ऑपरेशंस और निर्णय लेने प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है। ताकि नौसेना की डिजिटाइज्ड और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर क्षमता को और मजबूत बनाया जा सके।

Indian Navy Commanders Conference 2025

इससे पहले इसा पहला एडिशन इस साल अप्रैल मे आयोजित हुआ था, जो 5-11 अप्रैल तक चला था। इसे दो फेज में आयोजित किया गया था। पहला फेज 5 अप्रैल को कर्नाटक के कारवार में हुआ था, जिसका उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया था। पहले फेज में नौसेना की तैयारी, मॉडर्नाइजेशन और प्रोजेक्ट सीबर्ड (नया नौसेना बेस) का रिव्यू हुआ था।

वहीं दूसरा फेज 7-10 अप्रैल तक नई दिल्ली में आयोजित हुआ था। इसका फोकस जियोपॉलिटिकल चैलेंजेस, ऑपरेशन ब्रह्मा (लिटोरल देशों की मदद), और 7 मुख्य क्षेत्र युद्ध लड़ाई, फोर्स बिल्डिंग, लॉजिस्टिक्स, नई टेक, वर्कफोर्स, एजिलिटी और अन्य एजेंसियों से तालमेल रहा था। इसमें नौसेना का स्पेस विजन, ऑपरेशनल डेटा फ्रेमवर्क, नेवल एविएशन सेफ्टी, और ‘नेवी फॉर लाइफ एंड बियॉन्ड’ जैसे विजनरी डॉक्यूमेंट लॉन्च किए गए थे।

India ASEAN Summit 2025: भारतीय डिप्लोमेसी की बड़ी परीक्षा! क्वाड-ब्रिक्स के बीच कूटनीतिक संतुलन साधने कुआलालंपुर जाएंगे पीएम मोदी

India ASEAN Summit 2025
File Photo

India ASEAN Summit 2025: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले हफ्ते आसियान (एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस) सम्मेलन में हिस्सा लेने मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर जा रहे हैं। इस सम्मेलन पर भारत की कूटनीतिक भूमिका को लेकर पूरी दुनिया की नजरें होंगी। यह बैठक भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है। यह सम्मेलन 26 से 28 अक्टूबर तक चलेगा, जिसमें क्वाड और ब्रिक्स दोनों गुटों के टॉप लीडर्स एक ही मंच पर मौजूद होंगे।

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मलेशियाई विदेश मंत्री मोहम्मद हसन ने बीते सप्ताह यह पुष्टि की थी कि प्रधानमंत्री मोदी ईस्ट एशिया समिट में शामिल होंगे, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के प्रतिनिधि भी हिस्सा लेंगे। इसके साथ ही ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा बतौर ऑब्जर्वर शामिल होंगे।

यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब भारत अगले साल क्वाड और ब्रिक्स दोनों सम्मेलनों की मेजबानी करेगा। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत की “संतुलित विदेश नीति” को परखने का एक बड़ा अवसर मानी जा रही है। भारत इन दोनों गुटों, एक ओर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के गठबंधन क्वाड, और दूसरी ओर रूस-चीन वाले ब्रिक्स समूह के बीच एक ब्रिज का काम करेगा।

India ASEAN Summit 2025

भारत इस वर्ष क्वाड शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाला था, लेकिन हाल के महीनों में भारत-अमेरिका संबंधों में आए तनाव के चलते इसे 2026 तक टाल दिया गया। वहीं, भारत अगले साल ब्रिक्स की भी अध्यक्षता करेगा और 11 सदस्यीय संगठन का शिखर सम्मेलन भी आयोजित करेगा।

विदेश मंत्रालय के आर्थिक संबंध सचिव सुधाकर दलेला ने हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में कहा था कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य वर्तमान में अनिश्चितताओं से भरा है। इनवेस्ट्मेंट फ्लो, ब्याज दरों और सप्लाई चेन में असंतुलन के चलते विकास दरों में गिरावट आई है। उन्होंने कहा कि भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता ऐसे समय में करेगा जब “ग्लोबल साउथ” के देशों को कई आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, कुआलालंपुर में पीएम मोदी की यात्रा के दौरान अमेरिका और भारत के अधिकारी एक द्विपक्षीय बैठक की रूपरेखा पर भी काम कर रहे हैं। यदि यह बैठक होती है, तो यह मोदी-ट्रंप के बीच इस साल की यह पहली आमने-सामने की बातचीत होगी। इस मुलाकात में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, व्यापार समझौते और क्वाड सम्मेलन की नई तारीखों पर भी चर्चा हो सकती है।

अमेरिका के “अमेरिका फर्स्ट” सिद्धांत और रूस-चीन के बढ़ते सहयोग के बीच भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपू्र्ण है। एक ओर भारत रूस से रक्षा तकनीक और तेल की खरीद जारी रखे हुए है, वहीं दूसरी ओर वह अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर रहा है। वहीं, पीएम मोदी का आसियान दौरा भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को प्रदर्शित करने का भी मौका होगा।

आसियान सम्मेलन में भारत की प्राथमिकता आसियान-इंडिया ट्रेड इन गुड्स एग्रीमेंट की समीक्षा पर रहेगी। यह समझौता दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ भारत के व्यापार को नई दिशा देने में मदद करेगा। इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी दक्षिण एशिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग, समुद्री स्थिरता और आर्थिक साझेदारी पर भी अपने विचार सबके सामने रखेंगे।

भारत की नीति हमेशा से “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” पर आधारित रही है, जिसके तहत वह आसियान देशों के साथ राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को गहरा करने पर जोर देता है। यह नीति चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के साथ-साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की उपस्थिति को और मजबूत करती है।

क्वाड समूह के भीतर भी भारत की भूमिका महत्वपूर्ण है। पिछले साल भारत ने गणतंत्र दिवस के मौके पर क्वाड नेताओं को आमंत्रित किया था, लेकिन उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पन्नून केस के चलते यह न्यौता अस्वीकार कर दिया था। उसके बाद क्वाड शिखर सम्मेलन सितंबर 2024 में अमेरिका में हुआ। वहीं, इस बार ट्रंप के नेतृत्व में रूसी तेल खरीद और ब्रिक्स मुद्रा गठबंधन के चलते अमेरिका का रुख थोड़ा कठोर है।

कुआलालंपुर सम्मेलन में इन सभी राजनीतिक परिस्थितियों के बीच प्रधानमंत्री मोदी का एजेंडा बेहद व्यस्त रहेगा। आसियान नेताओं के साथ औपचारिक वार्ता के अलावा, वे क्वाड और ब्रिक्स से जुड़े कई नेताओं से द्विपक्षीय बैठकों में भी मिल सकते हैं।

इस बीच, आसियान सचिवालय ने भी भारत की भूमिका को सराहते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की “समान दूरी की कूटनीति” ने क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में योगदान दिया है। भारत न केवल इंडो-पैसिफिक में एक संतुलन शक्ति के रूप में उभरा है, बल्कि वैश्विक व्यापार और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में भी अहम भागीदार बनता जा रहा है।

Lucknow Navy Museum: लखनऊ में बनेगा नौसेना शौर्य संग्रहालय, INS Gomati और TU-142 विमान की दिखेगी झलक

Lucknow Navy Museum
INS Gomati

Lucknow Navy Museum: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ अब जल्द ही देश के पहले नेवी म्यूजियम का घर बनने जा रही है। नौसेना शौर्य संग्रहालय (Nausena Shaurya Sangrahalaya) नाम से बन रहा यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना और उत्तर प्रदेश सरकार की साझेदारी में तैयार हो रहा है। यह संग्रहालय एकाना स्टेडियम के पास लगभग 15,800 वर्गमीटर क्षेत्र में बनाया जा रहा है, जिसकी लागत 23 करोड़ रुपये है।

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परियोजना का 20 फीसदी निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। अधिकारियों के अनुसार, अब ध्यान नौसेना की विरासत को दर्शाने वाले आर्टिफैक्ट्स के परिवहन और इंस्टॉलेशन पर है। संग्रहालय में आईएनएस गोमती वॉरशिप के अवशेष, टीयू-142 नौसैनिक विमान और एसके-42बी हेलीकॉप्टर प्रदर्शित किए जाएंगे। ये विमान और हेलीकॉप्टर तमिलनाडु के आईएएस राजाली एयर स्टेशन से लखनऊ लाए जाएंगे।

आईएनएस गोमती को मई 2022 में 34 साल की शानदार सेवा के बाद डीकमीशन किया गया था। अधिकारियों ने बताया कि इसके प्रमुख हिस्सों जैसे मस्तूल, एंकर, और प्रतीक चिह्न को यहां प्रदर्शित किया जाएगा। साथ ही एक नौसेना शौर्य वाटिका भी तैयार की जा रही है, जहां जहाज के अन्य हिस्सों को खुले संग्रहालय में दिखाया जाएगा।

परियोजना का उद्देश्य भारतीय नौसेना के गौरवशाली इतिहास को सम्मान देना और युवाओं को सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करना है। यह संग्रहालय उत्तर प्रदेश सरकार और नौसेना के सहयोग से विकसित किया जा रहा है ताकि लोग भारत की समुद्री शक्ति और वीरता से परिचित हो सकें।

Lucknow Navy Museum

संग्रहालय में डिजिटल और इंटरैक्टिव तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। यहां टचस्क्रीन डिस्प्ले, प्रोजेक्शन वॉल्स, और 360-डिग्री कॉकपिट सिमुलेशन की सुविधा होगी, जिसमें पर्यटक विमान के टेकऑफ और पनडुब्बी कंट्रोल रूम का भी अनुभव ले सकेंगे। परियोजना के दूसरे चरण में इन डिजिटल अनुभवों के साथ ओपन-एयर डिस्प्ले तैयार किए जाएंगे।

अधिकारियों ने बताया कि विशेषज्ञ इस संग्रहालय के डिजाइन और थीमेटिक इंस्टॉलेशन पर काम कर रहे हैं, ताकि प्रदर्शनी में प्रामाणिकता और तकनीकी सटीकता बनी रहे। यह संग्रहालय न केवल एक टूरिस्ट आकर्षण बनेगा, बल्कि देश की समुद्री विरासत और नौसेना की बहादुरी का प्रतीक भी होगा।

India Defence Upgrade: डीएसी की बैठक में हो सकता है एलपीडी डील, पिनाका रॉकेट और MR-SAM मिसाइलों पर फैसला

India Defence Upgrade
Defence Minister Rajnath Singh

India Defence Upgrade: भारत की रक्षा तैयारियों में एक बड़ा कदम उठाते हुए डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड ने तीन अहम स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है। इन प्रस्तावों पर अंतिम फैसला 23 अक्टूबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल की बैठक में लिया जा सकता है।

इन प्रस्तावों में नौसेना और वायुसेना के लिए मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम, थलसेना के लिए 1000 पिनाका रॉकेट, और नौसेना के लिए चार लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक जहाजों की डील शामिल है।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, भारत डायनेमिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम को भारतीय नौसेना और वायुसेना में शामिल किया जाएगा। दोनों सेनाओं को लगभग 300-300 मिसाइलें मिलेंगी। इन मिसाइलों की रेंज करीब 100 किलोमीटर है, और यह दुश्मन के हवाई और मिसाइल हमलों को मार गिराने में सक्षम हैं। यह सिस्टम पहले भी तीनों सेनाओं में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा चुका है।

India Defence Upgrade

वहीं, भारतीय सेना को पिनाका मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की 1000 रॉकेटों की खेप मिलेगी। पिनाका का लेटेस्ट वर्जन गाइडेड पिनाका है, जिसकी रेंज 90 किलोमीटर तक है। यह ऑर्डर 2024 के अंत में सेवा में आए अपडेटेड पिनाका वर्जन का रिपीट ऑर्डर हो सकता है।

इसके साथ ही भारतीय सेना के लिए स्पेशल कमांड एंड कंट्रोल वाहन की खरीद को भी मंजूरी दी गई है, जो एयर डिफेंस नेटवर्क के लिए जरूरी कम्यूनिकेशन एंड सर्वेलेंस सिस्टम्स को मजबूत करेंगे।

तीसरा और सबसे बड़ा प्रस्ताव नौसेना के लिए है। इसमें 33,000 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले चार लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक जहाज शामिल हैं। ये बड़े एम्फीबियस वारफेयर शिप होंगे, जिनका वजन लगभग 20,000 टन होगा। ये जहाज सैनिकों, टैंकों और हेलीकॉप्टरों को समुद्र से तटीय इलाकों तक पहुंचाने में मदद करेंगे। इस पर अंतिम मंजूरी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी से ली जाएगी। सूत्रों ने बताया कि ये जहाज आईडीडीएम यानी इंडिजेनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड कैटेगरी में होंगे, जिससे भविष्य में इनका निर्यात भी संभव होगा।

नौसेना सूत्रों के अनुसार, इन एलपीडी जहाजों में रोल्स रॉयस एमटी-30 इंजन और इंटीग्रेटेड फुल इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। यह भारतीय नौसेना के इतिहास में पहली बार होगा जब ऐसे हाई-टेक इंजन किसी भारत में बने जहाज में लगाए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक डीपीबी की मंजूरी के बाद अब सभी प्रस्तावों को रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) के सामने रखा जाएगा। इस बैठक में रक्षा सचिव आरके सिंह, सीडीएस जनरल अनिल चौहान और तीनों सेनाओं के प्रमुख मौजूद रहेंगे। दिलचस्प बात यह है कि डीएसी की बैठक उसी दिन हो रही है जिस दिन नौसेना कमांडरों का सम्मेलन भी प्रस्तावित है। दोनों बैठकें दीपावली के बाद एक ही दिन आयोजित की जाएंगी।

Rafale 114 Fighter Deal: सरकार बोली- नए राफेल में हो 75 फीसदी तक स्वदेशी कंटेंट! जबकि तेजस में है केवल 65 फीसदी, क्या डील पर लगेगा ब्रेक?

Rafale 114 Fighter Deal
Rafale 114 Fighter Deal May Face Delay Over 75% Indigenous Content Demand; Tejas LCA Currently at 65%

Rafale 114 Fighter Deal: भारत और फ्रांस के बीच प्रस्तावित 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के प्रस्ताव पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के इस प्रस्ताव पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी है। मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना के प्रस्ताव को “अधूरा” बताया है। सूत्रों ने बताया कि इस अहम डील को आगे बढ़ाने से पहले और गहन चर्चा की जरूरत है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वायुसेना अपनी स्क्वाड्रन क्षमता को बनाए रखने के लिए नए फाइटर जेट्स की मांग कर रही है।

Made in India Rafale Jets: वायुसेना को चाहिए 114 ‘मेक इन इंडिया’ राफेल जेट्स, रक्षा मंत्रालय को भेजा प्रस्ताव, 2 लाख करोड़ रुपये की है डील

सूत्रों के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने दसा एविएशन के साथ बातचीत बढ़ाने के निर्देश दिए हैं ताकि डील को आत्मनिर्भर भारत की नीति के मुताबिक बनाया जा सके। मंत्रालय का मानना है कि इस सौदे में स्वदेशी उत्पादन का हिस्सा 70 से 75 फीसदी तक होना चाहिए, जबकि वर्तमान प्रस्ताव में यह केवल 10 से 15 फीसदी बताया गया है।

वहीं इस मामले पर विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत में बन रहे स्वदेशी तेजस फाइटर जेट में लगभग 59.7 फीसदी से 65 फीसदी तक ही स्वदेशी कंटेंट है, तो राफेल में इसे 70 से 75 फीसदी तक बढ़ाना समझ से परे है।

Rafale 114 Fighter Deal: तेजस में केवल 65 फीसदी तक ही स्वदेशी कंटेंट

सैन्य मामलों के जानकार और पूर्व सैन्य अधिकारी रोहित वत्स का कहना है कि सरकार को रक्षा सौदों के साथ “म्यूजिकल चेयर” खेलना बंद कर देना चाहिए। अगर उसे लगता है कि राफेल बहुत महंगा सौदा है, तो साफ-साफ कह दे, लेकिन इस मामले पर बेवजह की खींचतान न करे। क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है।

वह आगे कहते हैं कि रक्षा मंत्रालय में कुछ अधिकारी 75 फीसदी स्वदेशी कंटेंट की मांग कर रहे हैं, जबकि हमारे अपने तेजस विमान में भी अब तक हम 75 फीसदी स्वदेशी कंटेंट भी हासिल नहीं कर पाए हैं। न तो हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और न ही डीआरडीओ समय पर कोई डिलीवरी कर पा रहे हैं, और न ही विदेशी आयात समय पर आ रहे हैं।

बता दें कि एचएएल और डीआरडीओ की 2023-24 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक तेजस एमके1 में करीब 59.7 फीसदी स्वदेशी सामग्री है। इसमें एयरफ्रेम, एवियोनिक्स, और कुछ सिस्टम्स जैसे उत्तम एईएसए रडार शामिल हैं। वहीं, इसके एडवांस वर्जन तेजस एमके1ए में स्वदेशी कंटेंट को 65 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य है। इसमें उत्तम एईएसए रडार, स्वदेशी अस्त्र, रुद्रम मिसाइल्स और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम शामिल हैं।

Rafale 114 Fighter Deal: अधूरा है “स्टेटमेंट ऑफ केस”

सूत्रों का कहना है कि भारतीय वायुसेना का 114 राफेल की खरीद को लेकर “स्टेटमेंट ऑफ केस” प्रस्ताव मंत्रालय को अधूरा लगा है। इसमें उत्पादन जिम्मेदारी, लागत मूल्य और लोकल कंटेंट की स्पष्ट रूपरेखा नहीं दी गई थी। सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय की प्राथमिकता अब केवल विमान खरीदने की नहीं, बल्कि भारत में रक्षा उद्योग की आत्मनिर्भरता बढ़ाने की है।

सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि 114 विमानों में से अधिकतर का निर्माण भारत में होना चाहिए। कुछ विमान फ्रांस से फ्लाई-अवे कंडीशन में आएंगे, लेकिन बाकी का निर्माण भारत में एक साझेदारी मॉडल के तहत किया जाएगा। इस मॉडल के लिए दसा को किसी भारतीय डिफेंस कंपनी के साथ संयुक्त रूप से मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करनी होगी।

Rafale 114 Fighter Deal: एमआरओ फैसिलिटी लगाना चाहती है दसा

अधिकारियों के मुताबिक, यह सौदा लगभग 2 लाख करोड़ रुपये (करीब 25 अरब डॉलर) का हो सकता है। सरकार चाहती है कि इसका अधिकांश भाग भारत में तैयार हो, जिससे देश के रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिले। इससे सरकारी और निजी दोनों रक्षा कंपनियों को काम मिलेगा।

वहीं, दसा एविएशन भी भारत में बड़े निवेश के लिए तैयार है और उसने संकेत दिए हैं कि वह हैदराबाद में राफेल कंपोनेंट्स के प्रोडक्शन के लिए साझेदारी करने की इच्छुक है। इस सौदे के तहत दसा एविएशन ने हैदराबाद में एक मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल सेंटर स्थापित करने की भी पेशकश की है। इस सेंटर न केवल राफेल के रखरखाव में मदद मिलेगा बल्कि आने वाले समय में अन्य फाइटर प्लेटफॉर्म्स की सर्विसिंग भी कर सकेगा।

डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड में भेजा जाएगा प्रस्ताव

वहीं, रक्षा मंत्रालय की आपत्तियों के बाद यह प्रस्ताव अब डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड को भेजा जाएगा। वहां दसा और भारतीय वायुसेना के प्रतिनिधि विस्तृत रिपोर्ट पेश करेंगे। यह बोर्ड डिफेंस सेक्रेटरी की अध्यक्षता में काम करता है और उसकी सिफारिशें आगे डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) को भेजी जाएंगी।

माना जा रहा है कि चर्चाओं के बाद डील को फिर से संशोधित प्रारूप में मंजूरी मिल सकती है। शुरुआती अनुमान है कि 2026 तक इस डील को अंतिम रूप दिया जा सकता है, और पहले 18 विमान उसी साल भारत को मिल सकते हैं।

Rafale 114 Fighter Deal: 28-29 एक्टिव फाइटर स्क्वाड्रन

बता दें कि वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास लगभग 28-29 एक्टिव फाइटर स्क्वाड्रन हैं, जो 1965 से भी कम है। जबकि जरूरत लगभग 42 स्क्वाड्रन की है। हाल ही में 26 सितंबर को मिग-21 बाइसन के दो स्क्वाड्रन भी रिटायर हुए हैं। पुराने जैगुआर, मिराज-2000 और मिग-29 फाइटर जेट्स भी अपनी उम्र की समाप्ति तक पहुंच चुके हैं और ये विमान धीरे-धीरे सेवा से बाहर हो रहे हैं। इसी कमी को पूरा करने के लिए मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट यानी एमआरएफए प्रोग्राम शुरू किया गया था।

36 राफेल अंबाला और हाशीमारा में तैनात

हालांकि भारतीय वायुसेना के पास पहले से ही 36 राफेल फाइटर जेट्स हैं, जो अंबाला और हाशीमारा में तैनात हैं। अंबाला पश्चिमी मोर्चे (पाकिस्तान सीमा) और हाशीमारा पूर्वी मोर्चे (चीन सीमा) के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। हरियाणा स्थित अंबाला में 17वीं स्क्वाड्रन है, जिसे “गोल्डन एरो” के नाम से जाना जाता है, यह स्क्वाड्रन 1 सितंबर 2020 को शुरू हुई थी। वहीं, पश्चिमी बंगाल के हाशीमारा में 101वीं स्क्वाड्रन है, जिसे “फाल्कन्स ऑफ चंब एंड अखनूर” कहा जाता है। यह स्क्वाड्रन 29 जुलाई 2021 को शुरू की गई थी।

भारत को मिलेंगे एफ4.1-एफ5 स्टैंडर्ड वैरिएंट

ये 36 राफेल जेट 2016 में हुई गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट डील का हिस्सा थे। अब जो 114 राफेल की खरीद होनी है है, वह एक अलग कॉन्ट्रैक्ट होगा। इसमें सभी विमानों को एफ4.1 स्टैंडर्ड में अपग्रेडेड एवियोनिक्स और इंडिया स्पेसिफिक एनहेंसमेंट यानी आईएसई फीचर्स के साथ लाया जाएगा। 2016 में हुई गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट डील में एफ3-आर वैरिएंट खरीदे गए थे। वहीं, एफ4.1 स्टैंडर्ड में नेट-सेंट्रिक वारफेयर, एआई-सपोर्टेड डिसीजन मेकिंग और हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस के लिए ऑप्टिमाइज्ड किया जाएगा।

एफ4.1 के तहत शुरुआती 18 विमान फ्लाई-अवे कंडीशन में 2026 से मिल सकते हैं, जबकि बाकी भारत में बनेंगे। वहीं, कहा जा रहा है कि आईएसई इंटीग्रेशन में अभी देरी हो सकती है, उसके भी 2026 तक फाइनल होने की उम्मीद जताई रही है। सूत्रों ने बताया कि एफ4.1 में कई फीचर एफ5 वर्जन वाले होंगे। इसमें छठी पीढ़ी के लेजर वेपंस भी होंगे। जिनमें से कुल 114 में 70 से ज्यादा फाइटर जेट एफ5 वर्जन हो सकते हैं।

एफ4.1 वैरिएंट में क्या होगा खास

राफेल एफ4.1 स्टैंडर्ड के तहत राफेल को आरबीई2 एईएसए रडार से लैस किया जाएगा, जिससे लंबी रेंज पर टार्गेट डिटेक्शन, बेहतर जैम-रेजिलिएंस और माइका एनजी जैसी नई मिसाइलों को लगाया जाएगा। साथ ही इसमें इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सुइट स्पेक्ट्रा को और अधिक एआई-ड्रिवन सेंसर और काउंटरमेजर्स मिलेंगे ताकि स्टेल्थ-लाइक सुरक्षा और इमर्जिंग थ्रेट्स से सुरक्षा बेहतर हो। कॉकपिट और कम्युनिकेशन सिस्टम में एआई एल्गोरिद्म, सैटेलाइट लिंक और सॉफ्टवेयर-डिफाइन्ड रेडियो शामिल होंगे, जिससे रीयल-टाइम डेटा शेयरिंग और फ्लाइट-टू-फ्लाइट कनेक्टिविटी मजबूत होगी।

वहीं, इंडिया स्पेसिफिक एनहेंसमेंट्स में राफेल को अस्त्र एमके1 और एमके2 से लैस किया जाना है। साथ ही स्वदेशी वियोंड विजुअल रेंज वाली मिसाइलों, ब्रह्मोस एनजी और रूद्रम जैसी एंटी-रेडिएशन मिसाइलों को भी लगाया जा सकेगा। इसके अलावा थैलेस स्कॉर्पियन स्टाइल हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले का भारतीय वेरिएंट, और जीसैट-7ए सैटेलाइट को भी जोड़ा जाएगा।

PM Modi Diwali INS Vikrant: पीएम मोदी ने नौसेना के साथ INS विक्रांत पर मनाई दीपावली, कहा- ‘ऑपरेशन सिंदूर में उड़ाई थी पाकिस्तान की नींद’

PM Modi Diwali INS Vikrant
Prime Minister Narendra Modi toured the flight deck of INS Vikrant

PM Modi Diwali INS Vikrant: गोवा तट से दूर अरब सागर की लहरों पर भारतीय नौसेना के स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर इस बार दिवाली का नजारा बिल्कुल अलग था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 अक्टूबर 2025 को भारतीय नौसेना के अधिकारियों और जवानों के साथ समुद्र में दिवाली मनाई। यह वही युद्धपोत है जो कुछ माह पहले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कराची पोर्ट को उड़ाने के लिए तैयार था, और जिसकी मौजूदगी भर से पड़ोसी देश की नींद उड़ गई थी।

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PM Modi Diwali INS Vikrant: “विक्रांत” नाम से बेचैन पाकिस्तान

प्रधानमंत्री मोदी ने आईएनएस विक्रांत के डेक पर नौसेना के अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि आईएनएस विक्रांत केवल एक युद्धपोत नहीं, बल्कि 21वीं सदी के भारत के परिश्रम, प्रतिभा और संकल्प का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान “विक्रांत” का नाम सुनते ही पाकिस्तान में बेचैनी फैल गई थी। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर नौसेना कर्मियों की शौर्य की सराहना करते हुए कहा कि यह युद्धपोत भारत की सैन्य ताकत का शानदार उदाहरण है।

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देखा मिग-29के फाइटर जेट्स का लैंडिंग अभ्यास

प्रधानमंत्री ने जहाज के फ्लाइट डेक का दौरा किया, जहां मिग-29के फाइटर जेट्स तैनात थे। उन्होंने इन लड़ाकू विमानों के दिन और रात में टेकऑफ तथा लैंडिंग अभ्यास को करीब से देखा और नौसैनिक पायलटों के कौशल की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि एयरक्राफ्ट कैरियर को ऑपरेट करना केवल तकनीकी क्षमता नहीं, बल्कि अद्भुत अनुशासन और साहस का प्रतीक भी है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि “विक्रांत” भारत की सामरिक तैयारी का प्रमाण है, जो दुश्मन को युद्ध शुरू होने से पहले ही भयभीत कर देता है। उन्होंने कहा, “यह वॉरशिप केवल लोहा और स्टील नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के आत्मविश्वास और परिश्रम से बना है। यह आत्मनिर्भर भारत की उस ताकत का प्रतीक है, जो दुश्मन के मन में खौफ पैदा कर देती है।”

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उगते सूरज का अद्भुत नजारा

मोदी ने आईएनएस विक्रांत पर बिताई रात का अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने जहाज से समुद्र पर उगते सूरज का अद्भुत नजारा देखा, जो उनके लिए एक भावनात्मक पल था। उन्होंने कहा, “इस जहाज पर एक ओर अनंत आकाश है और दूसरी ओर असीम सागर। इन दोनों के बीच खड़ा ‘विक्रांत’ भारत की उस शक्ति का प्रतीक है, जो हर चुनौती को अवसर में बदल देता है।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने नौसेना कर्मियों के जोश, अनुशासन और देशभक्ति को करीब से देखा। उन्होंने कहा कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले इन सैनिकों के साथ दिवाली मनाना उनके लिए सौभाग्य की बात है।

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आठ से दस वॉरशिप्स की तैनाती

गोवा और कर्णाटक तट से सटे समुद्र में आईएनएस विक्रांत के साथ आठ से दस वॉरशिप्स की तैनाती हाल के सालों में नौसेना की सबसे बड़ी ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट रही है। यह तैनाती 22 अप्रैल के पहलगाम आतंकी हमले के बाद की गई थी, जब भारत ने समुद्री सीमा पर सतर्कता बढ़ाई थी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज भारत की सेना, नौसेना और वायुसेना न केवल सीमाओं की रक्षा कर रही हैं, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी दे रही हैं कि भारत किसी भी चुनौती से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने कहा, “आईएनएस विक्रांत ने साबित कर दिया है कि भारत की शक्ति और आत्मनिर्भरता का युग अब पूरी तरह शुरू हो चुका है।”

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नौसेना, वायुसेना और थलसेना के कॉर्डिनेशन ने पाकिस्तान को झुकने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने इस अभियान को भारतीय सेनाओं की “तीनों शाखाओं की एकजुटता” का सर्वोत्तम उदाहरण बताया।

मोदी ने कहा कि भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। उन्होंने बताया कि 2014 से अब तक भारतीय नौसेना में औसतन हर साल 40 नए युद्धपोत या पनडुब्बियां शामिल की गई हैं। उन्होंने कहा, “ब्रह्मोस और आकाश जैसी मिसाइलों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी क्षमता साबित की है। आज ‘ब्रह्मोस’ नाम सुनकर ही कई देशों में भय पैदा हो जाता है। दुनिया के कई देश इसे खरीदना चाहते हैं।”

रक्षा निर्यात 30 गुना बढ़ा

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत अब वैश्विक रक्षा निर्यातक देशों की श्रेणी में प्रवेश कर रहा है। पिछले 11 वर्षों में भारत का रक्षा निर्यात 30 गुना बढ़ा है। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि भारत दुनिया के शीर्ष रक्षा निर्यातक देशों में शामिल हो।”

अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने आईएनएस विक्रांत के कमीशनिंग के दौरान भारतीय नौसेना द्वारा उपनिवेशकालीन प्रतीक को छोड़कर छत्रपति शिवाजी महाराज से प्रेरित नया नौसेना ध्वज अपनाने की बात भी याद की। उन्होंने कहा कि यह न केवल परंपरा का नवीनीकरण था, बल्कि आत्मनिर्भरता और भारतीयता का प्रतीक भी है।

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मोदी ने कहा कि स्वदेशी तकनीक से बने आईएनएस विक्रांत के समुद्र में गर्जन करते हुए आगे बढ़ने से यह संदेश जाता है कि भारत किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा, “भारत की नौसेना अब आत्मनिर्भरता के नए युग में प्रवेश कर चुकी है। रक्षा उत्पादन में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है और आज लगभग हर 40 दिनों में एक नया शिप या पनडुब्बी भारतीय नौसेना में शामिल हो रहा है।”

प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि आत्मनिर्भर भारत के अभियान के तहत देशभर में सैकड़ों रक्षा स्टार्टअप्स और उद्योग नई ऊर्जा के साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह नया भारत न केवल अपने लिए सुरक्षा कवच बना रहा है, बल्कि दुनिया के लिए भी रक्षा उत्पादों का विश्वसनीय साझेदार भी बन रहा है।

नक्सल-माओवादी हिंसा का किया जिक्र

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने नक्सल-माओवादी हिंसा पर भी बात की और कहा कि देश अब इस आतंकी चुनौती से लगभग मुक्त हो चुका है। उन्होंने बताया कि 2014 से पहले देश के करीब 125 जिले नक्सली हिंसा की चपेट में थे, जबकि अब यह संख्या घटकर सिर्फ 11 जिलों तक सीमित रह गई है। उन्होंने कहा, “आज सौ से अधिक जिले पहली बार आजादी की हवा में सांस ले रहे हैं और गर्व के साथ दिवाली मना रहे हैं।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि इन क्षेत्रों में अब स्कूल, सड़कें और अस्पताल बन रहे हैं, जहां कभी माओवादियों ने विकास को रोक रखा था। उन्होंने सुरक्षा बलों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि देश उनके साहस और बलिदान का ऋणी है।

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Bara Khana

दीपावली की शाम प्रधानमंत्री ने नौसेना कर्मियों द्वारा प्रस्तुत देशभक्ति कार्यक्रम में भाग लिया। इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ऑपरेशन सिंदूर पर आधारित प्रस्तुति थी। बाद में प्रधानमंत्री अधिकारियों और नौसैनिकों के परिवारों के साथ पारंपरिक ‘बड़ा खाना’ में भी शामिल हुए।

BrahMos missiles: ऑपरेशन सिंदूर 2.0 में पाकिस्तान में तहलका मचाएंगी 800 किमी रेंज वाली ब्रह्मोस मिसाइलें!

BrahMos missiles
BrahMos missiles

BrahMos missiles: भारत आने वाले सालों में पहले से ज्यादा लंबी रेंज की ब्रह्मोस मिसाइलें शामिल करने की योजना बना रहा है। आने वाले दो वर्षों में भारतीय सशस्त्र बलों में 800 किलोमीटर रेंज वाली नई ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें शामिल की जाएंगी। इसके साथ ही 200 किलोमीटर रेंज वाली ‘अस्त्र मार्क-2’ एयर-टू-एयर मिसाइलों का प्रोडक्शन भी 2026-27 तक शुरू हो जाएगा।

BrahMos Lucknow Facility: “मिसाइल कैपिटल” से रवाना हुआ ब्रह्मोस का पहला बैच, रक्षा मंत्री बोले– अब पाकिस्तान का हर इंच हमारी पहुंच में

800 किमी रेंज ब्रह्मोस का ट्रायल

सूत्रों के अनुसार, 800 किमी रेंज ब्रह्मोस का ट्रायल चल रहा है। इसमें एक मॉडिफाइड रैमजेट इंजन और कई टेक्निकल अपग्रेड भी किए गए हैं। इन मिसाइलों को पारंपरिक (नॉन-न्यूक्लियर) वर्जन के तौर पर डेवलप किया जा रहा है। लक्ष्य है कि 2027 के आखिर तक यह मिसाइल पूरी तरह तैनाती के लिए तैयार हो जाए।

इस समय भारतीय नौसेना और वायुसेना के पास 450 किमी रेंज वाली ब्रह्मोस मिसाइलें हैं, जो मैक 2.8 की रफ्तार (आवाज की गति से लगभग तीन गुना) से उड़ती हैं। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इन्हीं मिसाइलों का प्रयोग पाकिस्तान की सीमा के भीतर आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमलों के लिए किया गया था। ऑपरेशन सिंदूर में पूरी दुनिया ने ब्रह्मोस की ताकत देखी कि कैसे भारत के पारंपरिक हथियारों में ब्रह्मोस सबसे भरोसेमंद और घातक सिस्टम बन चुकी है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, 800 किमी रेंज वाली मिसाइल का डेवलपमेंट लगभग पूरा हो चुका है। अब सिर्फ कुछ और ट्रायल किए जाने बाकी हैं, जिसमें यह टेस्ट किया जाएगा कि इंटरनल इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और एक्सटर्नल सैटेलाइट नेविगेशन भरोसेमंद हैं या नहीं।

सॉफ्टवेयर अपग्रेड के जरिए बदलाव

एक बार सभी परीक्षण पूरे होने के बाद नौसेना अपनी मौजूदा 450 किमी रेंज वाली ब्रह्मोस को 800 किमी वर्जन में सॉफ्टवेयर अपग्रेड के जरिए बदल सकेगी। इसके लिए फायर कंट्रोल सिस्टम के ग्राफिकल यूजर इंटरफेस और अन्य सेटिंग्स में मामूली बदलाव ही करने होंगे।

सूत्रों ने बताया कि मिसाइल और लॉन्चर का मूल स्ट्रक्चर समान रहेगा, इसलिए नौसेना और थलसेना पहले 800 किमी वर्जन को शामिल करेंगी, जबकि एयर-लॉन्च्ड वर्जन को थोड़ा समय और लगेगा।

200 किमी रेंज वाली ‘अस्त्र मार्क-2’

वहीं, डीआरडीओ ‘अस्त्र मार्क-2’ मिसाइल की रेंज को 160 किमी से बढ़ाकर 200 किमी से अधिक कर रहा है। इस मिसाइल का इंजन और ट्रेजेक्टरी सिस्टम अपग्रेड किया जा रहा है ताकि यह ज्यादा थ्रस्ट और लंबे समय तक बर्न टाइम प्रदान करे। फिलहाल भारतीय वायुसेना अपने सुखोई-30 एमकेआई और तेजस लड़ाकू विमानों के लिए 280 अस्त्र मार्क-1 मिसाइलें शामिल कर रही है।

सूत्रों के अनुसार, वायुसेना ने शुरुआती तौर पर 700 अस्त्र मार्क-2 मिसाइलों के इंडक्शन का ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है। इसके बाद ‘अस्त्र मार्क-3’ पर काम शुरू होगा, जिसमें सॉलिड-फ्यूल डक्टेड रैमजेट प्रोपल्शन सिस्टम जोड़ा जाएगा। इससे रेंज 350 किमी तक बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन इसके ऑपरेशनल होने में अभी तीन साल का समय लग सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अस्त्र मिसाइल सीरीज भारत की वायुसेना के लिए निर्णायक होगी क्योंकि यह भविष्य में रूस, फ्रांस और इज़राइल से आयात की जाने वाली महंगी मिसाइलों का विकल्प बनेगी।

नौसेना ने 220 से अधिक ब्रह्मोस मिसाइलें खरीदी

ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ हुए विभिन्न सौदों का मूल्य अब तक 58,000 करोड़ से अधिक पहुंच चुका है। ये मिसाइलें भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इस्तेमाल कर रही हैं। पिछले साल मार्च में रक्षा मंत्रालय ने नौसेना के लिए 19,519 करोड़ रुपये का सबसे बड़ा सौदा किया था, जिसके तहत 220 से अधिक ब्रह्मोस मिसाइलें खरीदी गईं। इस समय नौसेना के लगभग 20 युद्धपोत, जिनमें नवीनतम डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट्स शामिल हैं, वर्टिकल लॉन्च सिस्टम से लैस ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने वायुसेना के लिए भी 110 एयर-लॉन्च्ड ब्रह्मोस मिसाइलों की मंजूरी दी, जिसकी अनुमानित कीमत 10,800 करोड़ रुपये है।

प्रस्तावित इंटीग्रेटेड रॉकेट फोर्स का हिस्सा

सूत्रों के अनुसार, 800 किमी रेंज वाली नई ब्रह्मोस का टेरेस्ट्रियल वर्जन भी प्रस्तावित इंटीग्रेटेड रॉकेट फोर्स का हिस्सा बनेगा। इस फोर्स में प्रलय बैलिस्टिक मिसाइल (400 किमी रेंज) और लॉन्ग-रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइलें (1000 किमी रेंज) भी शामिल की जाएंगी, जो निर्भय मिसाइल के अपग्रेडेड वेरिएंट हैं।

रक्षा सूत्रों ने बताया कि मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान वायुसेना ने चीन-निर्मित जे-10 लड़ाकू विमान तैनात किए थे, जो पीएल-15 मिसाइलों (200 किमी रेंज) से लैस थे। जिसके बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि भविष्य के युद्ध वियोंड विजुअल रेंज वाले होंगे और लंबी दूरी से फायर की जाने वाली मिसाइलें ही जीत में अहम भूमिका निभाएंगी। जिसके बाद भारत ने ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों की ज्यादा रेंज पर फोकस करना शुरू किया है।

सूत्रों के अनुसार, 800 किमी रेंज वाली ब्रह्मोस का अगला परीक्षण नवंबर-दिसंबर 2025 में होने की संभावना है। इसके सफल होने पर यह मिसाइल भारत की सबसे लंबी रेंज वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बन जाएगी। यह संस्करण पूरी तरह स्वदेशी इंजन, गाइडेंस सिस्टम और सॉफ्टवेयर से लैस होगा।

COAS Visits Uttarakhand: दीपावली के मौके पर जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने किया कुमाऊं का दौरा, जवानों को दी बधाई

COAS Visits Uttarakhand
Chief of the Army Staff, General Upendra Dwivedi visited forward posts in the central sector

COAS Visits Uttarakhand: भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने रविवार को सेंट्रल सेक्टर के अग्रिम इलाकों का दौरा किया, जहां उन्होंने सेना की ऑपरेशनल रेडीनेस और स्थानीय लोगों के साथ सिविल-मिलिट्री तालमेल की समीक्षा की। यह दौरा रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम नेपाल और चीन की सीमाओं के नजदीक कुमाऊं इलाके में हुआ।

Indian Army Vidyut Rakshak: भारतीय सेना को ‘विद्युत रक्षक’ को मिला पेटेंट, भारतीय सेना के मेजर राजप्रसाद ने किया है डेवलप

जनरल द्विवेदी ने पिथौरागढ़ और उससे सटे ऊंचे इलाकों में तैनात फॉर्मेशंस का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्हें एडवांस सर्विलांस सिस्टम्स, स्पेशलिस्ट मोबिलिटी प्लेटफॉर्म्स, और नेक्स्ट-जेन टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन जैसी आधुनिक क्षमताओं की जानकारी दी गई। उन्होंने मुश्किल पर्वतीय इलाकों में सैनिकों के साहस, अनुशासन और तकनीकी दक्षता की सराहना की।

सेना प्रमुख ने दुर्गम स्थानों पर तैनात जवानों से मुलाकात कर उनके जज्बे की तारीफ की और उन्हें दीपावली की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना हर परिस्थिति में देश की सुरक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है और “सर्विस बेफोर सेल्फ” की भावना से कार्य कर रही है।

अपने दौरे के दौरान जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने कुमाऊं रेजिमेंट की गौरवशाली परंपरा को नमन किया और ऑपरेशन सद्भावना और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के अंतर्गत चल रही योजनाओं की भी समीक्षा की, जिनमें गरब्यांग और कालापानी जैसे सीमावर्ती गांवों में टेंट-आधारित होमस्टे, हाइब्रिड पावर सिस्टम, सड़क निर्माण और पॉलीहाउस एग्रीकल्चर सपोर्ट शामिल हैं। उन्होंने कहा कि कुमाऊं में भारतीय सेना “स्ट्रेंग्थ विद कम्पैशन” की मिसाल पेश कर रही है, सीमाओं की रक्षा के साथ-साथ सीमावर्ती समुदायों को सशक्त बना रही है।

Explainer: जोरावर टैंक के ‘नाग’ की फुफकार दुश्मन के टैंकों पर पड़ेगी भारी, इसका ‘मैजिक’ मोड बैटलग्राउंड में बनेगा गेम चेंजर!

Explainer: How Zorawar Tank’s ‘Nag Mk II’ Missile Can Crush Enemy Armour with Its Deadly Top-Attack Mode- A True Battlefield Game Changer!

डीआरडीओ ने नाग एमके II एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (एटीजीएम) का सफल परीक्षण स्वदेशी जोरावर लाइट टैंक से किया है। राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में हुए इस ट्रायल ने यह साबित कर दिया कि भारत अब पहाड़ी इलाकों में भी अपने हल्के लेकिन घातक टैंकों से दुश्मन के भारी कवच वाले टैंकों को 10 किलोमीटर की दूरी से नष्ट कर सकता है। इस मिसाइल सिस्टम के आने से भारत अब ‘बियॉन्ड-विजुअल-रेंज (बीवीआर)’ टैंक वारफेयर में भी कैपेबल हो गया है। इसका मतलब है कि अब भारतीय टैंक दुश्मन को देखे बिना भी उसके टैंकों पर हमला कर सकते हैं।

Zorawar Tank ATGM Test: भारत का जोरावर टैंक पहली बार फायर करेगा स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल, रेगिस्तान में होगा बड़ा टेस्ट

जोरावर पर यह ट्रायल 17 अक्टूबर को किया गया था और इसमें मिसाइल ने सभी निर्धारित मानकों को सफलतापूर्वक पूरा किया। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह मिसाइल ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक पर आधारित है, यानी एक बार लॉन्च होने के बाद यह खुद लक्ष्य की पहचान कर उसे भेद सकती है। यह मिसाइल अपने ‘टॉप-अटैक’ या टॉप-अटैक मैजिक मोड के जरिए दुश्मन के टैंक को ऊपर से निशाना बनाती है, जहां उनका कवच सबसे कमजोर होता है।

जोरावर टैंक को डीआरडीओ के कॉम्बैट व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट ने डिजाइन किया है और इसे लार्सन एंड टुब्रो ने तैयार किया है। यह भारत का पहला स्वदेशी लाइटवेट टैंक है, जिसे खास तौर पर लद्दाख, अरुणाचल और सिक्किम जैसे ऊंचे इलाकों के लिए बनाया गया है।

इस टैंक का वजन मात्र 25 टन है, जो पारंपरिक टैंकों जैसे टी-72 या टी-90 से लगभग आधा है। हल्का होने के बावजूद इसकी मारक क्षमता बेहद घातक है। इसमें 105 मिमी की कोकरिल गन लगी है, जो फायर एंड फॉरगेट शेल्स दाग सकती है। इसके अलावा इस पर 8 नाग एमके II मिसाइलें तैनात की जा सकती हैं।

जोरावर की रफ्तार 70 किलोमीटर प्रति घंटा तक है और यह पानी में भी चल सकता है। इसके इंजन की शक्ति 1000 हॉर्सपावर है और यह ऊंचाई वाले इलाकों में भी ऑपरेशन कर सकता है। जोरावर में आधुनिक एआई-बेस्ड फायर कंट्रोल सिस्टम, नाइट विजन और एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम भी लगा है जो दुश्मन की मिसाइलों को बीच में ही नष्ट कर देता है।

नाग एमके II को क्यों कहा जा रहा दुश्मन के टैंकों का शिकारी

नाग एमके II मिसाइल डीआरडीओ के इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का हिस्सा है। यह नाग मिसाइल सीरीज का अपग्रेडेड वर्जन है। पहले वर्जन की तुलना में नाग एमके II की रेंज और सटीकता दोनों ही ज्यादा हैं।

यह मिसाइल 4 से 10 किलोमीटर की दूरी तक टारगेट के निशाना बना सकती है। इसकी रफ्तार 250 मीटर प्रति सेकंड (लगभग 900 किमी/घंटा) है। इसमें लगा इंफ्रारेड इमेजिंग सीकर टारगेट की हीट को पहचान कर निशाना बनाता है, जिससे यह धुंध, रात और खराब मौसम में भी कारगर है।

“टॉप-अटैक मोड” फीचर है सबसे घातक

नाग एमके II की सबसे बड़ी खूबी है इसका “टॉप-अटैक मोड” फीचर, जो इसे और घातक बनाता है। मिसाइल पहले ऊंचाई पर जाती है और फिर गोता लगाते हुए टैंक की छत यानी टॉप पर वार करती है। आमतौर पर टैंकों का ऊपरी हिस्सा सबसे कमजोर होता है, जिससे टैंक का इंजन और क्रू दोनों निशाना बन जाते हैं।

भारतीय सेना के पास इस समय लगभग 3,500 से अधिक टैंक हैं, जिनमें से अधिकांश भारीभरकम हैं और पहाड़ी इलाकों में तैनात करने में मुश्किल होती है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद यह महसूस किया गया कि चीन के हल्के टैंकों के मुकाबले भारत को भी हल्के, मोबाइल और आधुनिक टैंक चाहिए। इसी के चलते “जोरावर प्रोजेक्ट” की शुरुआत हुई।

जोरावर टैंक में नाग एमके II मिसाइल के इंटीग्रेशन के बाद यह चीन के टाइप-15 और पाकिस्तान के वीटी-4 जैसे टैंकों के लिए काल बन गया है।

वहीं, जोरावर टैंक में नाग एमके II का इंटीग्रेशन भारत के ‘मेक-1’ कैटेगरी प्रोजेक्ट्स में आता है, यानी इसमें किसी विदेशी तकनीक या ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी की जरूरत नहीं। इसके अलावा यह सिस्टम भविष्य में भारत के मित्र देशों को निर्यात भी किया जा सकता है। डीआरडीओ ने पहले ही इस मिसाइल की एक्सपोर्ट कैटेगरी क्लियरेंस के लिए रक्षा मंत्रालय से अनुमति मांगी है।

नहीं बच पाएंगे चीन और पाकिस्तान के टैंक

नाग एमके II मिसाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह किसी भी आधुनिक टैंक के टॉप आर्मर (ऊपरी कवच) को आसानी से भेद सके। मिसाइल का वॉरहेड 8 किलोग्राम हाई-एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (हीट) है, जो 800 मिमी तक के आर्मर या कवच को भेदने में सक्षम है। जो चीन के टाइप-99 और पाकिस्तान के अल-खालिद टैंकों को एक ही वार में नष्ट करने के लिए काफी है। आधुनिक टैंकों में सबसे मोटा कवच आगे की तरफ (फ्रंट हल और टरेट) होता है, जो 600–800 मिमी तक होता है, जबकि ऊपर की छत पर यह सबसे कमजोर रहती है आमतौर पर सिर्फ 100–200 मिमी तक होती है।

चीन और पाकिस्तान के टैंकों की स्थिति इस लिहाज से कमजोर है। चीन का टाइप-99 टैंक में 700–750 मिमी का फ्रंट कवच है, लेकिन इसका टॉप आर्मर केवल 120–150 मिमी का है। वहीं, पाकिस्तान के अल-खालिद-1 और वीटी-4 (हैदर) टैंकों का फ्रंट कवच 650–700 मिमी और टॉप सिर्फ 100–130 मिमी मोटा है। पुराने टैंक जैसे अल-जरार या टाइप-85IIएपी में यह केवल 50–80 मिमी ही है।

जैवलिन और स्पाइक से भी पावरफुल है नाग एमके II

भारत की स्वदेशी नाग एमके II एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल अब अमेरिका की जैवलिन, इजराइल की स्पाइक, रूस की कॉर्नेट और चीन की एचजे-12/एचजे-10 जैसी आधुनिक मिसाइलों की कैटेगरी में आ गई है। यह मिसाइल इंफ्रारेड इमेजिंग गाइडेंस से लैस है और इसका वॉरहेड 800 मिलीमीटर तक के आर्मर को भेद सकता है। जबकि अमेरिकी जेवलिन और इजराइल की स्पाइक की रेंज क्रमशः 4 से 8 किलोमीटर तक है। नाग एमके II की रेंज सबसे ज्यादा है और यह मौसम या जामिंग की स्थिति में भी सटीक वार करती है।

अमेरिका की एफजीएम-148 जैवेलिन एक हल्की, पोर्टेबल मिसाइल है जिसका यूक्रेन युद्ध में सक्सेस रेट 95 फीसदी तक है। लेकिन इसकी रेंज मात्र 4 किमी है। वहीं, इजराइल की स्पाइक ईआर मिसाइल मल्टी-प्लेटफॉर्म है और 8 किमी तक काम करती है, लेकिन नाग एमके II इसे भी रेंज और पावर में पीछे छोड़ती है। चीन की एचजे-12 को “जेवलिन कॉपी” कहा जाता है, जिसकी रेंज 4 किमी है और यह इंफ्रारेड गाइडेड है, पर इसकी सटीकता नाग एमके II के मुकाबले कम है। चीन की दूसरी मिसाइल एचजे-10 की रेंज भले ही 10 किमी है, पर यह पुरानी सैकलॉस (वायर-गाइडेड) सिस्टम पर काम करती है, यानी यह फायर-एंड-फॉरगेट नहीं है।

रूस की कॉर्नेट मिसाइल की पेनेट्रेशन क्षमता भले 1,200 मिमी हो, लेकिन यह लेजर बीम-राइडिंग गाइडेंस पर आधारित है, जिससे ऑपरेटर खतरे में रहता है। इसके मुकाबले नाग एमके II लॉन्च के बाद खुद टारगेट को ट्रैक करती है, जिससे टैंक क्रू सुरक्षित रहता है।

नाग एमके II कीमत में भी है किफायती

वहीं, पाकिस्तान की बात करें तो उसके पास अब भी पुरानी बक्तर-शिकन मिसाइल है, जो चीन की एचजे-8 की कॉपी है। इसकी रेंज केवल 4 किलोमीटर है और यह वायर-गाइडेड है। उसका फायर-एंड-फॉरगेट वर्जन अभी सीमित मात्रा में है और भारतीय नाग नाग एमके II से कई साल पीछे है।

नाग एमके II मिसाइल कीमत के मामले में भी काफी किफायती है। इसकी प्रति यूनिट लागत लगभग 8 करोड़ रुपये (करीब 1 मिलियन डॉलर) आंकी गई है। इसके मुकाबले, अमेरिकी जैवलिन मिसाइल की कीमत करीब 15 करोड़ प्रति यूनिट है। इजराइल की स्पाइक मिसाइल की कीमत 10–12 करोड़ रुपये तक जाती है, जबकि रूस की कॉर्नेट मिसाइल लगभग 12 करोड़ रुपये में आती है। वहीं, चीन की एचजे-12 मिसाइल सस्ती है, जिसकी अनुमानित लागत 5–7 करोड़ प्रति यूनिट है, लेकिन उसकी रेंज केवल 4 किलोमीटर है और वह जैम-प्रूफ नहीं है।