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Saturday, August 30, 2025
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QRSAM Explained: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत को मिलने जा रही है नई एयर डिफेंस शील्ड, पाकिस्तान और चीन के सिस्टम से क्यों है बेहतर?

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भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखा कि पाकिस्तान ड्रोन जैसी सस्ते लेकिन खतरनाक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर सकता है। वहीं चीन पहले से ही अपने एयर डिफेंस को लगातार अपग्रेड कर रहा है। ऐसे में सीमावर्ती इलाकों जैसे राजस्थान, पंजाब, लद्दाख और अरुणाचल में QRSAM जैसी तुरंत जवाब देने वाले सिस्टम की तैनाती जरूरी हो गई है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, एक सीमित स्केल पर QRSAM की तैनाती हुई थी, और इसने पाकिस्तान द्वारा भेजे गए कुछ ड्रोनों को मार गिराया था। इसके बाद से इसे सेना में शामिल करने का फैसला लिया गया...
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📍नई दिल्ली | 12 Jun, 2025, 12:15 PM

QRSAM Explained: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ ड्रोन, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों से हमले की कोशिश की थी। पाकिस्तान की ओर से हुए मिसाइल, ड्रोन और एयरक्राफ्ट हमलों के बाद भारत को यह एहसास हुआ कि मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम कारगर तो है, लेकिन इसमें अब भी कुछ खामियां हैं। जिसके बाद QRSAM यानी क्विक रिएक्शन सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम को खरीदने का फैसला लिया गया। यह सिस्टम मॉडर्न वारफेयर की चुनौतियों से निपटने के लिए एडवांस सिस्टम से लैस है। यह सिस्टम ड्रोन, कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों और अचानक हुए हवाई हमलों से तुरंत निपट सकता है। QRSAM की लागत करीब 30,000 करोड़ रुपये होगी और रक्षा मंत्रालय जून में प्रस्तावित रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डीएसी की बैठक में इस सौदे की मंजूरी दे सकता है। जल्द ही खरीदने की मंजूरी देने वाला है।

क्यों जरूरी है QRSAM?

ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि आज के युद्ध में खतरे अचानक और बहुत तेजी से आते हैं। पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम किसी जगह पर स्थायी तौर पर तैनात होते हैं, ऐसे तेजी से बदलते हालात में हमेशा प्रभावी नहीं होते। वहीं QRSAM को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह चलते-चलते भी लक्ष्य को पहचान सकता है और उसे निशाना बना सकता है। इसे मोबाइल डिप्लॉयमेंट के लिए बनाया गया है, यानी सेना जहां रुकेगी, वहीं से इसे तैनात किया जा सकता है।

QRSAM की ताकत क्या है?

यह सिस्टम लगभग 30 किलोमीटर की रेंज में आने वाले किसी भी हवाई खतरे को पहचान कर उसे निशाना बना सकता है। चाहे वह फाइटर जेट हो, अटैक हेलिकॉप्टर, ड्रोन, या फिर क्रूज मिसाइल। इसकी रडार यूनिट्स और मिसाइल दोनों भारत में बनी हैं। यह सिस्टम पूरी तरह ‘ट्रैक-व्हील-शूट’ क्षमता रखता है यानी चलते वाहन से लक्ष्य की पहचान और उसे मार गिराना संभव है। यह 6×6 हाई मोबिलिटी व्हीकल्स पर तैनात किया जाता है, जिससे इसे युद्ध के मैदान में तेजी से ले जाया जा सकता है। चाहे रेगिस्तानी इलाका हो, पहाड़ी क्षेत्र हो या मैदानी क्षेत्र, QRSAM हर तरह के इलाके में प्रभावी ढंग से काम करता है।

इसमें मल्टीफंक्शन फायर कंट्रोल रडार (MFCR) लगा है, जो एक साथ कई टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है। इसके अलावा इसका बैटरी सर्विलांस रडार (BSR) 360 डिग्री कवरेज और 120 किमी तक की डिटेक्शन कैपेबिलिटी देता है। इसमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम (EOTS) लगा है, जो खराब मौसम या रडार जैमिंग की स्थिति में भी टारगेट को ट्रैक कर सकता है।

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ऑपरेशन सिंदूर से मिला सबक

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखा कि पाकिस्तान ड्रोन जैसी सस्ते लेकिन खतरनाक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर सकता है। वहीं चीन पहले से ही अपने एयर डिफेंस को लगातार अपग्रेड कर रहा है। ऐसे में सीमावर्ती इलाकों जैसे राजस्थान, पंजाब, लद्दाख और अरुणाचल में QRSAM जैसी तुरंत जवाब देने वाले सिस्टम की तैनाती जरूरी हो गई है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, एक सीमित स्केल पर QRSAM की तैनाती हुई थी, और इसने पाकिस्तान द्वारा भेजे गए कुछ ड्रोनों को मार गिराया था। इसके बाद से इसे सेना में शामिल करने का फैसला लिया गया।

सरकार ने संकेत दिया है कि पहली फेज में सेना को तीन QRSAM रेजिमेंट दी जाएंगी। प्रत्येक रेजिमेंट में छह लॉन्चर होंगे और हर लॉन्चर पर छह मिसाइलें होंगी। इस प्रकार एक रेजिमेंट में 36 मिसाइलें होंगी। यह सिस्टम DRDO ने बनाया है और पूरी तरह स्वदेश में ही बनाया गया है। QRSAM की मिसाइलों का निर्माण भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) द्वारा किया जाएगा और रडार व फायर कंट्रोल सिस्टम्स BEL बनाएगा।

सरकार के Make in India मिशन के तहत QRSAM को 90% से अधिक स्वदेशी कंपोनेंट्स के साथ डेवलप किया गया है। DRDO की अगुवाई में इस पर काम हुआ और इसके निर्माण में BEL, BDL और अन्य भारतीय रक्षा कंपनियों को शामिल किया गया। 2024 तक इसे 99% स्वदेशी बनाने का लक्ष्य है।

पुराने रूसी सिस्टम होंगे रिप्लेस

भारतीय सेना अभी भी एयर डिफेंस के लिए पुराने रूसी सिस्टम जैसे शिल्का, स्ट्रेला-10M, ओसा-AK, पिचौरा और तंगुष्का पर निर्भर है। इनमें से कई सिस्टम 70-80 के दशक में खरीदे गए थे और अब तकनीकी रूप से पुराने हो चुके हैं। उदाहरण के लिए, शिल्का एक ट्रैक गन सिस्टम है जो एक मिनट में 8000 राउंड फायर कर सकता है, लेकिन यह क्रूज मिसाइल या ड्रोन के खिलाफ ज्यादा असरदार नहीं है।

स्ट्रेला-10M जैसे सिस्टम सिर्फ 5 किमी तक असरदार होते हैं और उन्हें बार-बार रीलोड करना पड़ता है। वहीं तंगुष्का जैसे सिस्टम में मिसाइल की रेंज केवल 8 किलोमीटर है। OSA-AK में भी कई सीमाएं हैं, जो अब आधुनिक हवाई खतरों के सामने बहुत कारगर नहीं है।

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QRSAM इन सभी की जगह लेने जा रहा है क्योंकि यह न केवल रेंज में बेहतर है बल्कि अधिक मोबाइल, तेज और ऑल-वेदर ऑपरेशनल भी है। QRSAM की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे चलते-चलते तैनात किया जा सकता है। यानी सेना की टुकड़ी जहां रुकेगी, वहीं से यह सिस्टम टारगेट को खोज भी सकता है और हमला भी कर सकता है। यह दुर्गम और सीमावर्ती इलाकों में बेहतर काम कर सकता है, जहां पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम को सेटअप करना मुश्किल होता है।

ट्रायल्स में किया साबित

2020 से 2023 के बीच QRSAM के कई ट्रायल्स हुए, जिसमें 2019, 2020 और 2022 में चांदीपुर, ओडिशा के इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में हुए परीक्षण शामिल हैं। इन ट्रायल्स में दिन और रात दोनों समय, और हर तरह के मौसम में इसके काम करने की क्षमता को परखा गया। इन ट्रायल्स में इसने क्रूज मिसाइल और ड्रोन जैसे टारगेट्स को बेहद सटीकता से मार गिराया। DRDO ने इसकी डिजाइनिंग में इस बात का ध्यान रखा है कि यह सिस्टम रेगिस्तान से लेकर पहाड़ तक सभी टेरेन में काम कर सके।

QRSAM के शामिल होने से भारत की सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव आएगा। खासकर जब फॉरवर्ड लोकेशन्स पर टैंक या इंफैंट्री की मूवमेंट हो रही हो, तब यह सिस्टम उनके साथ चलकर उन्हें हवाई हमलों से बचाने में सक्षम होगा।

अब तक भारतीय सेना को सीमावर्ती इलाकों में स्थायी रूप से स्थापित एयर डिफेंस सिस्टम्स पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन QRSAM की तैनाती से ये सीमाएं खत्म हो जाएंगी।

QRSAM मिसाइल मैक 2.5-3 की सुपरसोनिक रफ्तार से निशाना बनाती है। यह मिड-कोर्स इनर्शियल नेविगेशन और टर्मिनल एक्टिव रडार होमिंग के जरिए सटीक निशाना लगाती है। इसका उच्च विस्फोटक प्री-फ्रैगमेंटेड वॉरहेड लक्ष्य को पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम है।

पाकिस्तान का LY-80 और चीन का HQ-9 सिस्टम

सबसे पहले बात करें रेंज की। QRSAM की अधिकतम मारक दूरी 25 से 30 किलोमीटर तक है। वहीं पाकिस्तान का LY-80 सिस्टम चीन की मदद से बनाया एक लो-टू-मीडियम एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसकी रेंज लगभग 40 किमी तक मानी जाती है। यह सिस्टम मोबाइल जरूर है, लेकिन इसके ट्रैकिंग और फायर कंट्रोल फीचर्स काफी हद तक पारंपरिक हैं। इसकी रडार क्षमता सीमित है और मल्टीटारगेट ट्रैकिंग की दक्षता QRSAM जैसी नहीं है।

दूसरी ओर चीन का HQ-9 सिस्टम लंबी दूरी के लिए डिजाइन किया गया है और यह S-300 की तकनीक पर आधारित है। HQ-9 के पास रेंज और एडवांस ट्रैकिंग सिस्टम जरूर हैं, लेकिन इसकी तैनाती प्रक्रिया धीमी और भारी है। यह सिस्टम स्थिर जगहों पर बेहतर काम करता है, जबकि मोबाइल वॉरफेयर की जरूरतें इससे पूरी नहीं होतीं।

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QRSAM क्यों है अलग और बेहतर?

QRSAM को DRDO ने भारतीय सेना की खास जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया है। यह सिस्टम ट्रैक-व्हील-शूट कैपेबिलिटी से लैस है – यानी चलते वाहन से ही लक्ष्य को ट्रैक करके मिसाइल दागी जा सकती है। यह विशेषता पाकिस्तान और चीन के सिस्टम में नहीं मिलती।

QRSAM की मारक दूरी करीब 30 किलोमीटर है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत है इसकी तेज तैनाती (Quick Deployment), हाई मोबिलिटी (Mobility) और मल्टीटारगेट क्षमता। इसमें दो अत्याधुनिक रडार सिस्टम BSR और MFCR — लगे हैं, जो 360-डिग्री कवरेज और 120 किमी तक की ट्रैकिंग क्षमता देते हैं। साथ ही इसमें Electro-Optical Tracking System (EOTS) है, जो बिना रडार के भी लक्ष्य खोज सकता है। इसके विपरीत, पाकिस्तान के LY-80 की रडार क्षमता सीमित है और चीन का HQ-9 सिस्टम भले ही लॉन्ग रेंज रडार से लैस हो, लेकिन उसकी रिस्पॉन्स टाइम धीमा है और वह क्लोज-इन थ्रेट्स को उसी फुर्ती से पकड़ नहीं सकता। वहीं QRSAM का रिएक्शन टाइम 6 सेकंड से भी कम है, और यह मात्र छह सेकंड में टारगेट को लॉक और फायर कर सकता है। वहीं, ट्रांसपोर्ट से फायर मोड में स्विच करने में LY-80 / HQ-16 का रिएक्शन टाइम ज्यादा समय लेता है।

टारगेट एंगेजमेंट

अगर टारगेट एंगेजमेंट की बात करें, तो उसमें QRSAM ज्यादा एडवांस्ड है। यह UAVs, फाइटर जेट, ड्रोन, हेलिकॉप्टर और क्रूज मिसाइल तक को सटीकता से निशाना बना सकता है। पाकिस्तान का LY-80 भी एयरक्राफ्ट और क्रूज मिसाइल के लिए सक्षम बताया गया है, लेकिन इसकी मल्टी-टारगेट एंगेजमेंट क्षमता सीमित है। चीन का HQ-9 लॉन्ग रेंज एयर थ्रेट जैसे बड़े फाइटर जेट्स और बैलिस्टिक मिसाइल को टारगेट करता है, लेकिन यह सिस्टम नजदीक के, तेज़ी से मूव करने वाले टारगेट्स के लिए उतना असरदायक नहीं माना जाता।

देता है रीयल टाइम प्रोटेक्शन

अब बात मोबिलिटी की करें तो QRSAM का सबसे बड़ा फायदा यही है कि यह हाई मोबिलिटी व्हीकल पर आधारित है और इसमें ट्रैक-व्हील-शूट की क्षमता है, यानी सेना की टुकड़ी के साथ-साथ चलते हुए भी यह मिसाइल फायर कर सकता है। पाकिस्तान का LY-80 भले ही मोबाइल हो, लेकिन इसकी तैनाती में ज्यादा समय लगता है। चीन का HQ-9 सिस्टम भारी और स्थिर होता है, जिसकी तैनाती युद्ध के बीच में करना बेहद मुश्किल होता है। HQ-9 और LY-80 मुख्य रूप से फिक्स्ड बेस सुरक्षा के लिए उपयोग किए जाते हैं, वहीं QRSAM एक पूरी तरह मोबाइल फोर्स के साथ मूव कर सकता है और यह टैंक रेजिमेंट या इन्फैंट्री कॉलम के साथ रीयल टाइम प्रोटेक्शन देता है।

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हरेंद्र चौधरी
हरेंद्र चौधरीhttp://harendra@rakshasamachar.com
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवादों, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। 📍 Location: New Delhi, in 🎯 Area of Expertise: Defence, Diplomacy, National Security

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