📍नई दिल्ली | 7 Jan, 2026, 1:27 PM
IAF AWACS RFI: भारतीय वायुसेना ने अपनी हवाई निगरानी और एयरस्पेस मैनेजमेंट क्षमता को मजबूत करने के लिए छह एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल यानी अवॉक्स विमानों की खरीद के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (RFI) जारी की है। इस प्रस्ताव के तहत केवल विमान ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़े ग्राउंड सेगमेंट इक्विपमेंट और जरूरी सुविधाओं को भी शामिल किया गया है।
यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है, जब वायुसेना को उत्तर और पश्चिमी सीमाओं पर लगातार बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मॉडर्न वॉरफेयर में हवा में दूर से निगरानी रखने वाले प्लेटफॉर्म की भूमिका काफी अहम मानी जाती है, क्योंकि इन्हीं के जरिए दुश्मन के विमानों, ड्रोन और मिसाइल गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। (IAF AWACS RFI)
IAF AWACS RFI: चाहिए 10 घंटे की एंड्योरेंस क्षमता
आरएफआई में वायुसेना ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस प्रोजेक्ट के लिए कौन सा विमान प्लेटफॉर्म चुना जाएगा, लेकिन तकनीकी जरूरतों को काफी स्पष्ट तरीके से बताया गया है। आरएफआई के मुताबिक, चुने जाने वाले विमान में कम से कम 10 घंटे की एंड्योरेंस होनी चाहिए या फिर उसमें मिड-एयर रिफ्यूलिंग की क्षमता होनी जरूरी है। इसके अलावा विमान की सर्विस सीलिंग 45,000 फीट तक होनी चाहिए। (IAF AWACS RFI)
वायुसेना ने यह भी शर्त रखी है कि अवॉक्स विमान ऐसे एयरफील्ड से भी ऑपरेट करने में सक्षम हों, जो करीब 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित हों। यह जरूरत खास तौर पर भारत के हई एल्टीट्यूड इलाकों को ध्यान में रखते हुए रखी गई है, जहां से ऑपरेशन करना मुश्किल होता है। (IAF AWACS RFI)
मिशन सिस्टम की बात करें तो आरएफआई में एक एडवांस मिशन सूट की मांग की गई है। इसमें 360 डिग्री स्कैन करने की क्षमता होनी चाहिए, ताकि छोटे और धीमी गति से उड़ने वाले टारगेट्स से लेकर हाई-स्पीड और हाइपरसोनिक व्हीकल्स तक की पहचान की जा सके। इसके साथ ही सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन और कम्युनिकेशन सिस्टम, सुरक्षित डेटा लिंक और सेल्फ-प्रोटेक्शन मेजर्स भी जरूरी बताए गए हैं। (IAF AWACS RFI)
फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास कुल पांच ऑपरेशनल AWACS/AEW&C प्लेटफॉर्म हैं। इनमें तीन बेरिएव ए-50 शामिल हैं, जो रूसी आईएल-76 एयरफ्रेम पर बने हैं और जिनमें इजरायली सेंसर लगे हैं। ये विमान करीब दो दशक पहले वायुसेना में शामिल किए गए थे। इसके अलावा वायुसेना के पास दो नेत्रा AEW&C विमान भी हैं। नेत्रा सिस्टम का तीसरा विमान अभी डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स के पास है। (IAF AWACS RFI)
डीआरडीओ इस समय नेत्रा सिस्टम के और एडवांस वर्जन पर भी काम कर रहा है। नए मिशन सूट में करीब 15 एयरबोर्न सब-सिस्टम और कई ग्राउंड-बेस्ड एलिमेंट्स शामिल किए जाने की योजना है। इसका उद्देश्य वायुसेना की निगरानी क्षमता को और ज्यादा मजबूत बनाना है।
पिछले महीने डीआरडीओ ने अपने आईएसटीएआर (इंटेलिजेंस, सर्विलांस, टारगेट एक्विजिशन एंड रिकॉनिसेंस) प्रोग्राम के लिए कनाडा के बॉम्बार्डियर ग्लोबल 6500 ट्विन-इंजन बिजनेस जेट को प्लेटफॉर्म के रूप में चुना था। हालांकि यह प्रोग्राम अवॉक्स से अलग है, लेकिन इससे यह संकेत मिलता है कि भविष्य में बिजनेस जेट आधारित प्लेटफॉर्म्स पर भी ज्यादा भरोसा किया जा सकता है। (IAF AWACS RFI)
भारतीय वायुसेना की मौजूदा जरूरतों को देखते हुए उसे कुल 12 AEW&C/AWACS विमानों की जरूरत है। संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति की एक रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई थी कि वायुसेना ने छह-छह विमानों के दो अलग-अलग प्रोग्राम शुरू किए हैं, इसके अलावा एक स्पेशल रोल एयरक्राफ्ट का प्रस्ताव भी है। (IAF AWACS RFI)
अगर चीन और पाकिस्तान से तुलना की जाए तो वायुसेना का मौजूदा अवॉक्स बेड़ा पड़ोसी देशों के मुकाबले छोटा माना जाता है। चीन के पास इस समय करीब 20 शानक्सी केजे-500, चार केजे-200 और चार केजे-2000 अवॉक्स प्लेटफॉर्म हैं। वहीं पाकिस्तान के पास चार चीनी जेडडीके-03 कराकोरम ईगल और आठ स्वीडिश साब 2000 एराई प्लेटफॉर्म हैं। इनमें से एक विमान को लेकर यह दावा भी किया गया था कि उसे हालिया ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नुकसान पहुंचा था। (IAF AWACS RFI)
वायुसेना के अधिकारियों का कहना है कि अवॉक्स केवल एक रडार विमान नहीं होता, बल्कि यह एक “सिस्टम ऑफ सिस्टम्स” होता है। इसमें रडार, आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड या फो (आईएफएफ), इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, कमांड एंड कंट्रोल और बैटल मैनेजमेंट जैसी क्षमताएं एक साथ काम करती हैं। इससे एयर डिफेंस, फाइटर कंट्रोल और संयुक्त अभियानों में काफी मदद मिलती है। (IAF AWACS RFI)
आरएफई जारी होने के बाद अब देशी और विदेशी एयरोस्पेस कंपनियों से जवाब मिलने की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके आधार पर आगे का एक्विजिशन प्रोसेस तय किया जाएगा। (IAF AWACS RFI)


