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क्यों कहा जाता है विशाखापत्तनम को ‘सबमरींस की कब्रगाह’? IFR-Milan 2026 के बीच गूंजेगी 1971 की जंग की कहानी

पीएनएस गाजी पाकिस्तान की सबसे पुरानी और लंबी दूरी की सबमरीन थी। उसका डूबना पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका था। इसलिए हर बार जब विशाखापत्तनम में बड़ा नौसैनिक आयोजन होता है, तो 1971 की यादें फिर ताजा हो जाती हैं...

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📍विशाखापत्तनम | 17 Feb, 2026, 6:43 PM

Visakhapatnam Submarine Graveyard: विशाखापत्तनम इन दिनों भारतीय नौसेना के तीन बड़े आयोजनों का गवाह बनने जा रहा है। विशाखापत्तनम में इन दिनों इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 और मिलन एक्सरसाइज जैसे बड़े कार्यक्रम हो रहे हैं। लेकिन यह शहर सिर्फ आधुनिक नौसैनिक ताकत का प्रतीक नहीं है, बल्कि इतिहास का भी गवाह है। यही वजह है कि विशाखापत्तनम को अक्सर “सबमरींस की कब्रगाह” कहा जाता है।

इस नाम के पीछे दो बड़ी घटनाएं जुड़ी हैं, द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानी सबमरीन आरओ-110 का डूबना और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस गाजी का समंदर में समा जाना। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

Visakhapatnam Submarine Graveyard: 1971 की जंग में पीएनएस गाजी को डुबोया था

दिसंबर 1971 का समय था। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो चुका था। पाकिस्तान की नौसेना की सबसे बड़ी ताकत मानी जाने वाली सबमरीन पीएनएस गाजी को एक खास मिशन पर भेजा गया था। उसका मकसद उस समय के भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत को निशाना बनाना था।

उस समय आईएनएस विक्रांत पूर्वी समुद्र में सक्रिय था और पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा बन चुका था। गाजी को विशाखापत्तनम के आसपास माइंस (समुद्री बारूदी सुरंगें) बिछाने और विक्रांत को ढूंढकर डुबाने का काम सौंपा गया था।

लेकिन 3 और 4 दिसंबर 1971 की रात को हालात बदल गए। भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस राजपूत ने समुद्र में संदिग्ध हलचल महसूस की और डेप्थ चार्ज गिराए। कुछ देर बाद जोरदार धमाका हुआ। अगले दिन समुद्र की सतह पर तेल के धब्बे और मलबा तैरता मिला। जांच में साफ हुआ कि पीएनएस गाजी डूब चुकी है। दरअसल भारतीय नौसेना ने आईएनएस राजपूत को आईएनएस विक्रांत का डेकोय (झांसा) बनाकर इस्तेमाल किया था, ताकि गाजी को फंसाया जा सके। जिसके बाद आईएनएस विक्रांत ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) पर नौसैनिक नाकाबंदी कर ली थी, जो युद्ध में निर्णायक साबित हुई थी। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

इस हादसे में सबमरीन पर सवार 93 पाकिस्तानी (11 अधिकारी और 82 नाविक) मारे गए। गाजी का मलबा विशाखापत्तनम तट से लगभग दो-ढाई किलोमीटर दूर फेयरवे ब्वॉय में करीब 100 मीटर गहराई में मिला। यह मलबा अब भी वहीं बरकरार है, और भारतीय नौसेना ने सम्मान के तौर पर इसे छेड़ा नहीं है।

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भारतीय नौसेना के तत्कालीन डाइविंग सपोर्ट शिप आईएनएस निस्तार ने उस समय गाजी के मलबे की खोज और जांच में अहम भूमिका निभाई थी। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

55 साल बाद फिर उसी जगह ‘निस्तार’

इतिहास की सबसे दिलचस्प बात यह है कि 1971 में जिस आईएनएस निस्तार ने गाजी के मलबे को खोजा था, उसी नाम का नया पूरी तरह स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट वेसल अब भारतीय नौसेना में शामिल हो चुका है।

यह नया आईएनएस निस्तार 18 जुलाई 2025 को नौसेना को सौंपा गया। यह देश का पहला स्वदेशी डाइविंग सपोर्ट वेसल है। इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 में यही निस्तार उसी समुद्र के पास मौजूद है, जहां गाजी की “कब्र” मानी जाती है।

पीएनएस गाजी पाकिस्तान की सबसे पुरानी और लंबी दूरी की सबमरीन थी। उसका डूबना पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका था। इसलिए हर बार जब विशाखापत्तनम में बड़ा नौसैनिक आयोजन होता है, तो 1971 की यादें फिर ताजा हो जाती हैं। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

आईएनएस निस्तार की खासियत

आईएनएस निस्तार लगभग 120 मीटर लंबा और करीब 10,000 टन वजनी जहाज है। यह करीब 18 नॉट की रफ्तार से चल सकता है। इसमें आधुनिक डाइविंग सिस्टम लगे हैं।

सबसे अहम बात यह है कि यह डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल (डीएसआरवी) को समुद्र में उतार सकता है। डीएसआरवी एक छोटा लेकिन बेहद एडवांस रेस्क्यू व्हीकल होता है, जो गहरे समुद्र में जाकर किसी फंसी हुई सबमरीन से 15-16 नाविकों को एक बार में निकाल सकता है।

अगर भविष्य में किसी भारतीय या दोस्त देश की पनडुब्बी को समुद्र में दुर्घटना हो जाए, तो निस्तार जैसे जहाज जीवनरक्षक साबित होंगे। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

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2024 में फिर सामने आया था गाजी का मलबा

फरवरी 2024 में मिलन एक्सरसाइज के दौरान भारतीय नौसेना के डीएसआरवी ने पीएनएस गाजी के मलबे को फिर से लोकेट किया। साइड स्कैन सोनार और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल की मदद से मलबे की तस्वीरें ली गईं। दरअसल भारतीय नौसेना ने मिलन 2024 में डीएसआरवी को डेमोंस्ट्रेट करने के लिए इस्तेमाल किया था। भारतीय नौसेना ने इसे “सबमरीन ग्रेवयार्ड” में ट्रेनिंग/टेस्टिंग के तौर पर इस्तेमाल किया था। हालांकि भारतीय नौसेना ने उसे छेड़ा नहीं। उसे युद्ध समाधि (वार ग्रेव) के रूप में सम्मान दिया गया। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

द्वितीय विश्व युद्ध में डूबी थी आरओ-110

विशाखापत्तनम के पास सिर्फ गाजी ही नहीं डूबी थी। 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सबमरीन आरओ-110 भी यहीं डूबी थी। आरओ-110 द्वितीय विश्व युद्ध के समय की एक जापानी पनडुब्बी थी। यह इंपीरियल जापानी नेवी की आरओ-100 क्लास की मध्यम आकार की तटीय अटैक सबमरीन थी। आज यह बंगाल की खाड़ी में विशाखापत्तनम के पास समुद्र की गहराई में पड़ी है।

आरओ-110 को 26 जनवरी 1943 को जापान के कोबे शिपयार्ड में लॉन्च किया गया था और 6 जुलाई 1943 को इसे आधिकारिक तौर पर सेवा में शामिल किया गया। इस पनडुब्बी पर 47 अधिकारी और नाविक तैनात थे। इसका वजन पानी की सतह पर करीब 600 टन और पानी के अंदर 800 टन से ज्यादा था। इसमें चार टॉरपीडो ट्यूब लगे थे और यह आठ टॉरपीडो ले जा सकती थी। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

फरवरी 1944 में इसकी आखिरी समुद्री कार्रवाई हुई। 11 या 12 फरवरी 1944 को यह सबमरीन कोलंबो से कोलकाता जा रहे मित्र राष्ट्रों के जहाजों के एक काफिले पर हमला कर रही थी। इसी दौरान इसने ब्रिटिश व्यापारी जहाज एसएस एस्फालियन पर दो टॉरपीडो दागे। हमले में छह लोगों की मौत हुई और जहाज को भारी नुकसान पहुंचा।

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हमले के बाद काफिले की सुरक्षा कर रहे जहाजों ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की। रॉयल इंडियन नेवी के एचएमआईएस जमुना और रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी के एचएमएएस लॉन्सेस्टन तथा एचएमएएस इप्सविच ने सोनार की मदद से पनडुब्बी का पता लगाया और उस पर डेप्थ चार्ज गिराए। कुछ देर बाद समुद्र की सतह पर तेल का बड़ा धब्बा और बुलबुले दिखाई दिए। इससे साफ हो गया कि आरओ-110 डूब चुकी है। पनडुब्बी पर सवार सभी 47 नाविक मारे गए। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

यह भी उल्लेखनीय है कि इससे पहले दिसंबर 1943 में आरओ-110 ने ब्रिटिश जहाज डेजी मोलर पर भी टॉरपीडो हमला किया था।

आज आरओ-110 का मलबा गाजी के आसपास ही विशाखापत्तनम तट के पास करीब 90 से 110 मीटर की गहराई में मौजूद है। 2024 में भारतीय नौसेना के डीप सबमर्जेंस रेस्क्यू व्हीकल ने इसे फिर से स्कैन किया, लेकिन सम्मान के कारण इसे वहीं छोड़ दिया गया। नौसेना इसे एक युद्ध समाधि मानती है और इसे उन सैनिकों का अंतिम विश्राम स्थल समझती है, जिन्होंने समुद्र में अपनी जान गंवाई। (Visakhapatnam Submarine Graveyard)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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