📍नई दिल्ली | 30 Dec, 2025, 2:01 PM
S4 SSBN Sea Trials: भारत ने अपनी चौथी न्यूक्लियर-पावर्ड बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBN) का ट्रायल शुरू कर दिया है। एस4 के नाम से जाने जानी वाली यह पनडुब्बी पिछले सप्ताह विशाखापत्तनम के शिपबिल्डिंग सेंटर से बाहर निकलकर समुद्र में ट्रायल्स के लिए रवाना हुई। यह अरिहंत-क्लास की आखिरी सबमरीन है और भारत के बेहद गोपनीय प्रोजेक्ट का अहम पड़ाव मानी जा रही है, जो करीब चार दशक पहले शुरू हुआ था।
S4 SSBN Sea Trials: 7,000 टन वजनी पनडुब्बी है एस4
एस4 लगभग 7,000 टन वजनी पनडुब्बी है और इसे खास तौर पर परमाणु हथियार ले जाने और दागने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें आठ के-4 सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) तैनात की जा सकती हैं, जिनकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर से ज्यादा है। ये मिसाइलें परमाणु वारहेड ले जाने में सक्षम हैं। यह चीन और पकिस्तान के लिए भारत की तरफ से समुद्र में बड़ा जवाब है।
S4 SSBN Sea Trials: सी ट्रायल करीब एक साल तक
रक्षा सूत्रों के मुताबिक, एस4 का सी ट्रायल करीब एक साल तक चलने की उम्मीद है। इन ट्रायल्स के दौरान पनडुब्बी के सभी अहम सिस्टम, जैसे न्यूक्लियर रिएक्टर, प्रोपल्शन, सोनार, नेविगेशन और वेपन सिस्टम्स की अलग-अलग परिस्थितियों में जांच की जाएगी। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो यह पनडुब्बी 2027 की शुरुआत तक भारतीय नौसेना में औपचारिक रूप से शामिल की जा सकती है।
S4 SSBN Sea Trials: 80 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी
एस4 को अरिहंत-क्लास की बाकी पनडुब्बियों से अलग और ज्यादा ताकतवर माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसमें स्वदेशी उपकरणों की हिस्सेदारी 80 फीसदी से ज्यादा है, जो अब तक बनी चारों पनडुब्बियों में सबसे अधिक है। इसका मतलब यह है कि भारत अब न्यूक्लियर सबमरीन टेक्नोलॉजी में पहले से कहीं ज्यादा आत्मनिर्भर हो चुका है। इसमें रिएक्टर से लेकर सेंसर और कॉम्बैट सिस्टम तक, बड़ी संख्या में भारतीय तकनीक का इस्तेमाल हुआ है।
S4 SSBN Sea Trials: भारत के पास दो ऑपरेशनल एसएसबीएन
इस समय भारत के पास समुद्र में चार एसएसबीएन हैं। इनमें से दो पनडुब्बियां पूरी तरह सेवा में हैं और दो ट्रायल्स के अलग-अलग चरणों में हैं। पहली पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत को 2016 में कमीशन किया गया था और उसने 2018 में अपनी पहली डिटरेंट पेट्रोल पूरी की थी। दूसरी पनडुब्बी आईएनएस अरिघात अगस्त 2024 में नौसेना में शामिल हुई। तीसरी पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन अपने सभी सी ट्रायल्स लगभग पूरे कर चुकी है और इसके 2026 के अंत तक कमीशन होने की उम्मीद है। अब एस4 के ट्रायल्स शुरू होने के साथ ही भारत का एसएसबीएन बेड़ा एक अहम पड़ाव पर पहुंच गया है।
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— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 28, 2025
1984 से शुरू होती है एसएसबीएन की कहानी
भारत की न्यूक्लियर सबमरीन यात्रा की कहानी 1984 से शुरू होती है, जब सरकार ने एडवांस्ड टेक्नोलॉजी व्हीकल (एटीवी) प्रोजेक्ट की नींव रखी थी। उस समय लक्ष्य था कि भारत खुद की न्यूक्लियर पनडुब्बी डेवलप करे, ताकि देश की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह मजबूत हो सके। इसके तहत शुरुआती योजना तीन एसएसबीएन बनाने की थी, लेकिन बदलते रणनीतिक हालात और तकनीकी जरूरतों को देखते हुए बाद में इसमें बदलाव किए गए।
अरिहंत-क्लास की पहली पनडुब्बी का स्ट्रक्चर 1998 में रखा गया था, उसी साल जब भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किए थे। हालांकि तकनीकी जटिलताओं और गोपनीयता के चलते इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में लंबा समय लगा। आईएनएस अरिहंत को 2009 में लॉन्च किया गया और 2016 में कमीशन किया गया। इसके बाद धीरे-धीरे इस क्लास की अगली पनडुब्बियों पर काम आगे बढ़ा।
एस5 क्लास पनडुब्बियों की तैयारी
अरिहंत और अरिघात लगभग एक जैसी डिजाइन की पनडुब्बियां हैं। दोनों की लंबाई 110 मीटर से ज्यादा है और इनका वजन करीब 6,000 टन है। इनमें चार वर्टिकल लॉन्च ट्यूब्स हैं, जिनसे या तो 16 के-15 मिसाइलें या फिर चार के-4 मिसाइलें दागी जा सकती हैं। लेकिन तीसरी और चौथी पनडुब्बी, यानी अरिधमान और एस4, को थोड़ा बड़ा बनाया गया है। इनके डिजाइन में 10 मीटर का अतिरिक्त सेक्शन जोड़ा गया है, जिससे इनमें चार अतिरिक्त के-4 मिसाइलें रखी जा सकती हैं। इस तरह ये पनडुब्बियां ज्यादा दूरी तक मार करने में सक्षम हो गई हैं।
एस4 भविष्य में आने वाली बड़ी एस5 क्लास पनडुब्बियों के बीच की कड़ी है। एस5 क्लास की पनडुब्बियां करीब 13,500 टन वजनी होंगी, यानी अरिहंत-क्लास से लगभग दोगुनी। इन नई पनडुब्बियों में ज्यादा मिसाइलें, ज्यादा लंबी रेंज और ज्यादा एडवांस सिस्टम होंगे। एटीवी प्रोजेक्ट के तहत एस5 क्लास की पहली दो पनडुब्बियों का निर्माण पहले ही शुरू हो चुका है। उम्मीद है कि पहली एस5 पनडुब्बी 2030 के शुरुआती वर्षों में सेवा में आएगी और 2030 के दशक के अंत तक कुल चार एस5 एसएसबीएन नौसेना को मिल जाएंगी।
हालांकि एस4 का नाम अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन नौसेना के पुराने रिवाज को देखते हुए माना जा रहा है कि इसका नाम भी “अरि” से शुरू होगा। संस्कृत में “अरि” का अर्थ दुश्मन होता है, और इसी वजह से अरिहंत, अरिघात और अरिधमान जैसे नाम चुने गए हैं।
सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी बढ़ी
रणनीतिक नजरिए से एस4 का समुद्र में उतरना भारत के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। एसएसबीएन ऐसी पनडुब्बियां होती हैं, जो दुश्मन के लिए ढूंढ पाना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि इन्हें परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का सबसे सुरक्षित हिस्सा माना जाता है। अगर किसी देश पर अचानक परमाणु हमला हो जाए, तब भी समुद्र में छिपी एसएसबीएन जवाबी हमला कर सकती है। इसे ही “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” कहा जाता है।
के-4 मिसाइलों की लंबी रेंज की वजह से भारत को एक और रणनीतिक बढ़त मिलती है। अब भारतीय एसएसबीएन को दुश्मन के तट के पास जाने की जरूरत नहीं होगी। वे हिंद महासागर या बंगाल की खाड़ी जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाकों से ही अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती हैं। इससे पनडुब्बियों की सुरक्षा और मिशन की सफलता दोनों बढ़ जाती हैं।
एस4 के सी ट्रायल्स की शुरुआत इस बात का संकेत है कि भारत अब उस स्तर के करीब पहुंच रहा है, जहां वह लगातार समुद्र में कम से कम एक एसएसबीएन तैनात रख सके। इसे “कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस” कहा जाता है। इसके लिए आमतौर पर चार से पांच एसएसबीएन की जरूरत मानी जाती है, ताकि कुछ पनडुब्बियां पेट्रोलिंग पर हों, कुछ मेंटनेंस में और कुछ ट्रेनिंग या ट्रायल्स में हों। (S4 SSBN Sea Trials)
चीन के पास 6 ऑपरेशनल एसएसबीएन
चीन की बात करें, तो पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी के पास 6 ऑपरेशनल एसएसबीएन हैं, जो मुख्य रूप से टाइप 094 (जिन-क्लास) हैं। ये चीन की सी-बेस्ड न्यूक्लियर डिटरेंस की रीढ़ हैं। पुरानी टाइप 092 (शिया-क्लास) अब लगभग रिटायर्ड या लिमिटेड रोल में है। नेक्स्ट जेनरेशन टाइप 096 (तांग-क्लास) कंस्ट्रक्शन में है, लेकिन अभी ऑपरेशनल नहीं हैं।
S4 SSBN Sea Trials: टाइप-094 है एस4 से बड़ी और भारी
चीन की टाइप-094 (जिन-क्लास) उसकी पहली पूरी तरह भरोसेमंद बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन मानी जाती है। टाइप-094 का पानी के नीचे डिस्प्लेसमेंट करीब 11 हजार टन है, जबकि भारत की एस4 लगभग 7 हजार टन की है। लंबाई में भी चीन की सबमरीन थोड़ी आगे है। इसका मतलब यह है कि चीनी सबमरीन ज्यादा बड़ी और भारी है, जबकि भारतीय सबमरीन तुलनात्मक रूप से कॉम्पैक्ट है। (S4 SSBN Sea Trials)
S4 SSBN Sea Trials: टाइप-094 में 12 लॉन्च ट्यूब
अब आते हैं मिसाइल क्षमता पर, तो एस4 में 8 वर्टिकल लॉन्च ट्यूब हैं, जिनमें के-4 बैलिस्टिक मिसाइलें लगती हैं। के-4 की रेंज 3,500 किलोमीटर से ज्यादा है, जो भारत को पाकिस्तान और चीन के बड़े हिस्से को कवर करने की क्षमता देती है।
चीन की टाइप-094 में 12 लॉन्च ट्यूब हैं। इसमें जेएल-2 या नया जेएल-3 मिसाइल सिस्टम लगाया जाता है। जेएल-3 की रेंज 10,000 किलोमीटर से भी ज्यादा मानी जाती है, यानी चीन अपनी सबमरीन से अमेरिका तक को निशाना बना सकता है। इस लिहाज से रेंज और मिसाइल संख्या में चीन आगे है।
लेकिन रणनीति सिर्फ रेंज से नहीं बनती। भारत की सोच अलग है। एस4 को बंगाल की खाड़ी जैसे सुरक्षित समुद्री इलाके में तैनात किया जा सकता है। वहां से बिना ज्यादा खतरा उठाए यह चीन के अहम इलाकों को कवर कर सकती है। यानी भारत को दूर तक जाने की जरूरत नहीं, अपनी ही सुरक्षित समुद्री सीमा से मजबूत जवाबी क्षमता मिल जाती है। (S4 SSBN Sea Trials)
बेहद शोर करती है चीन की टाइप-094
अब बात करते हैं स्टेल्थ की। एसएसबीएन जितनी कम आवाज करती है, उतनी ही ज्यादा सुरक्षित होती है। चीन की टाइप-094 को अक्सर “नॉइजी” यानी ज्यादा आवाज करने वाली सबमरीन माना गया है। शुरुआती वर्जन तो 1970 के दशक की सोवियत तकनीक से भी ज्यादा शोर करने वाले बताए गए। बाद में 094ए वैरिएंट में कुछ सुधार हुए, लेकिन फिर भी यह पश्चिमी देशों की आधुनिक सबमरीन से पीछे मानी जाती है।
भारत की अरिहंत-क्लास भी पूरी तरह साइलेंट नहीं मानी जाती, लेकिन एस4 में डिजाइन और टेक्नोलॉजी में सुधार किया गया है। 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सिस्टम होने के कारण भारत ने अपनी जरूरत के हिसाब से इसमें एकॉस्टिक यानी आवाज कम करने पर खास ध्यान दिया है। (S4 SSBN Sea Trials)
भारत का अपना प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर
रिएक्टर और तकनीक के मामले में भी फर्क है। एस4 में भारत का अपना बनाया प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर लगा है। यह आत्मनिर्भरता की बड़ी मिसाल है। चीन का रिएक्टर घरेलू जरूर है, लेकिन उसमें रूसी डिजाइन का असर साफ दिखता है। तकनीकी तौर पर दोनों देश अपने-अपने स्तर पर आगे बढ़े हैं, लेकिन भारत ने सीमित संसाधनों में ज्यादा स्वदेशी समाधान तैयार किए हैं।
अब आते हैं ऑपरेशनल स्थिति पर। चीन के पास इस समय करीब 6 टाइप-094 सबमरीन ऑपरेशनल मानी जाती हैं, जो नियमित रूप से गश्त पर जाती हैं। इससे चीन को लगातार समुद्र में परमाणु मौजूदगी मिलती है। भारत अभी उस स्तर पर पहुंचने की प्रक्रिया में है। एस4 के ट्रायल पूरे होने और अरिहंत-क्लास की चारों सबमरीन के सक्रिय होने के बाद भारत भी लगातार समुद्र में कम से कम एक एसएसबीएन रखने की स्थिति में आ जाएगा। इसे ही कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस कहा जाता है। (S4 SSBN Sea Trials)



