📍जबलपुर (मध्य प्रदेश) | 30 Jan, 2026, 1:03 PM
T-72 Tank Overhaul Jabalpur: मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में स्थित आर्मर्ड वीहिकल्स निगम लिमिटेड यानी एवीएनएल के तहत आने वाली व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (वीएफजे) में टी-72 मेन बैटल टैंकों के ओवरहॉल का काम औपचारिक रूप से शुरू हो गया है।
यह पूरा प्रोजेक्ट एक पायलट पहल के तौर पर शुरू किया गया है, जिसका फोकस भारतीय सेना के टी-72 मेन बैटल टैंकों के ओवरहॉल पर है। टी-72 सोवियत मूल का टैंक है, जो दशकों से भारतीय सेना की बख्तरबंद ताकत की रीढ़ बना हुआ है। भारत के पास करीब 2,400 से ज्यादा टी-72 टैंक हैं, जिनमें अजेय जैसे भारतीय अपग्रेडेड वेरिएंट भी शामिल हैं। इतने बड़े बेड़े को लंबे समय तक ऑपरेशनल बनाए रखने के लिए ओवरहॉल बेहद जरूरी हो जाता है। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)
T-72 Tank Overhaul Jabalpur: क्यों जरूरी है टी-72 टैंकों का ओवरहॉल
टी-72 टैंक भारतीय सेना की बख्तरबंद ताकत की रीढ़ माने जाते हैं। भले ही ये टैंक पुराने डिजाइन के हों, लेकिन आज भी सेना के पास इनकी संख्या काफी ज्यादा है। भारत ने टी-72 टैंकों को दशकों से इस्तेमाल किया है और समय-समय पर इनमें कई अपग्रेड भी किए गए हैं।
लेकिन हर टैंक की एक सीमित ऑपरेशनल लाइफ होती है। लगातार तैनाती, फायरिंग, रेगिस्तानी और पहाड़ी इलाकों में ऑपरेशन के कारण टैंकों के इंजन, ट्रांसमिशन, गन सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक हिस्सों पर असर पड़ता है। ऐसे में ओवरहॉल जरूरी हो जाता है।
ओवरहॉल का मतलब सिर्फ मामूली मरम्मत नहीं होता, बल्कि टैंक को लगभग पूरी तरह खोलकर उसके हर अहम हिस्से की गहराई से जांच की जाती है। इस प्रक्रिया में इंजन, ट्रांसमिशन, गन सिस्टम, आर्मर और इलेक्ट्रॉनिक्स को चेक किया जाता है। जो पार्ट खराब या कमजोर हो जाते हैं, उन्हें रिपेयर या रिप्लेस किया जाता है। इसके बाद टैंक को दोबारा असेंबल कर टेस्ट किया जाता है, ताकि वह फिर से नई जैसी हालत में मैदान में उतर सके। इस तरह के ओवरहॉल से टैंक की ऑपरेशनल लाइफ करीब 10 से 15 साल तक बढ़ जाती है। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)
टी-72 टैंक की खूबियां
टी-72 टैंक अपनी ताकत और भरोसेमंद डिजाइन के लिए जाना जाता है। इसमें 125 मिलीमीटर की मेन गन, करीब 1000 हॉर्सपावर का इंजन, और सड़क पर लगभग 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार की क्षमता होती है। इसका वजन करीब 41 टन होता है। भारत ने इन टैंकों को 1970 के दशक से इस्तेमाल करना शुरू किया था और समय के साथ इनमें कई अहम अपग्रेड भी किए गए, जिनमें ईआरए यानी एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर जैसे सुरक्षा सिस्टम शामिल हैं।
क्यों चुना गया एवीएनएल और वीएफजे को
अब तक T-72 टैंकों का बड़ा ओवरहॉल काम मुख्य रूप से तमिलनाडु के अवाड़ी स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री में होता रहा है। लेकिन सेना की जरूरतें बढ़ने के साथ वहां की क्षमता सीमित पड़ने लगी।
इसी को देखते हुए एवीएनएल ने फैसला लिया कि ओवरहॉल की क्षमता को बढ़ाया जाए। इसके लिए व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर को चुना गया। वीएफजे पहले से ही सेना के लिए कई तरह के वाहन और उपकरण बनाती रही है, इसलिए यहां जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और कुशल मानव संसाधन मौजूद था। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)
साल 2025 में वीएफजे को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर टी-72 टैंकों का ओवरहॉल करने की अनुमति दी गई। इसके बाद फैक्ट्री ने अपने स्ट्रक्चर को अपग्रेड किया, कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी और तय समय में पहला लक्ष्य पूरा किया।
एवीएनएल के सीएमडी संजय द्विवेदी ने कहा कि यह एक बेहद चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट था। पहली बार जबलपुर में इस स्तर पर टैंकों का ओवरहॉल किया गया, लेकिन टीम ने समयसीमा के भीतर काम पूरा कर दिखाया।
उन्होंने भरोसा दिलाया कि अब वीएफजे पूरी क्षमता के साथ टैंकों का ओवरहॉल करेगी और भारतीय सेना की जरूरतों को समय पर पूरा किया जाएगा।
मास्टर जनरल ऑफ सस्टेन्मेंट, एमजीएस के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल अमरदीप सिंह औजला ने भी वीएफजे और एवीएनएल की टीम की तारीफ की। उन्होंने कहा कि यह आसान काम नहीं था, लेकिन इसे सफलतापूर्वक पूरा कर यह साबित कर दिया गया है कि भविष्य में और भी बड़ा काम यहां से कराया जा सकता है। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)
सेना को क्या मिलेगा इसका फायदा
भारतीय सेना की ओवरऑल रणनीति के तहत वर्ष 2027 तक मौजूदा टी-72 टैंक फ्लीट को अपग्रेड करने पर खास जोर दिया गया है। इसका मकसद यह है कि जब तक नई पीढ़ी के प्लेटफॉर्म पूरी तरह सेवा में नहीं आ जाते, तब तक टी-72 टैंक आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक सक्षम बने रहें। इसी रणनीति के साथ आगे चलकर FRCV यानी फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल प्रोजेक्ट को लागू करने की योजना है, जिसके जरिए भारतीय सेना को पूरी तरह नए और अत्याधुनिक टैंक मिलेंगे। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)
इस प्रोजेक्ट से भारतीय सेना को कई स्तर पर फायदा होगा। सबसे बड़ा फायदा यह है कि टैंकों की उपलब्धता बढ़ेगी। जब टैंक लंबे समय तक ओवरहॉल के लिए फैक्ट्री में फंसे रहते हैं, तो यूनिट्स की ऑपरेशनल क्षमता प्रभावित होती है। अब जब एक और फैक्ट्री यह काम करेगी, तो टैंक जल्दी वापस सेना को मिलेंगे।
दूसरा फायदा यह है कि सेना को अपने पुराने लेकिन भरोसेमंद T-72 टैंकों को पूरी तरह हटाने की जल्दी नहीं पड़ेगी। जब तक नए प्लेटफॉर्म पूरी संख्या में नहीं आ जाते, तब तक ये ओवरहॉल किए गए टैंक सीमाओं पर मजबूती से तैनात रह सकेंगे।
तीसरा फायदा रणनीतिक है। भारत के सामने पश्चिमी और उत्तरी दोनों मोर्चों पर चुनौतियां हैं। ऐसे में बख्तरबंद ताकत का मजबूत रहना बेहद जरूरी है। ओवरहॉल किए गए टी-72 टैंक इसी जरूरत को पूरा करेंगे। (T-72 Tank Overhaul Jabalpur)



