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पहलगाम के बाद पाकिस्तान ने AI से फैलाई थीं झूठी कहानियां, फर्जी नैरेटिव के लिए बना रहे CDS, सेना प्रमुख और IAF चीफ के डीफ फेक वीडियोज

पिछले चार महीनों में एडीजी स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस ने खुद 217 डीपफेक मामलों को चिन्हित किया, जिनमें से 164 भारतीय सेना से जुड़े थे...

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📍नई दिल्ली | 22 Jan, 2026, 7:26 AM

Pahalgam AI fake narrative: कश्मीर के पहलगाम में जब आतंकी घटना हुई, तब हालात केवल जमीन पर ही नहीं बिगड़े, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी एक अलग तरह की जंग शुरू हो गई। यह जंग बंदूक और बम से नहीं, बल्कि एआई-आधारित फेक नैरेटिव यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बनाए गए झूठे कंटेंट से लड़ी गई। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की जनवरी 2026 में जारी रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए फैलाई जा रही गलत सूचनाएं आज के दौर में सबसे खतरनाक सुरक्षा चुनौतियों में से एक बन चुकी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, एआई से बने फेक वीडियो, नकली सैटेलाइट इमेज और झूठे सैन्य दावे किसी भी संवेदनशील क्षेत्र में हालात को गलत तरीके से पेश कर सकते हैं।

सिपरी ने खास तौर पर पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत–पाकिस्तान के बीच हुए ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए चेताया है कि इन्फॉर्मेशन डोमेन में फैला झूठ जमीनी हालात से अलग एक नकली तस्वीर बना देता है, जिससे गलत आकलन और जल्दबाजी में लिए गए फैसले बड़े सैन्य टकराव की वजह बन सकते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर एआई आधारित डिसइन्फॉर्मेशन को समय रहते पहचाना और रोका नहीं गया, तो यह “मल्टी-डोमेन एस्केलेशन” को जन्म दे सकता है, जहां साइबर, सूचना और पारंपरिक सैन्य मोर्चे एक साथ भड़क सकते हैं। पहलगाम हमले के बाद सामने आए फेक नैरेटिव इसी खतरे का ताजा उदाहरण माने जा रहे हैं, जहां डिजिटल झूठ ने वास्तविक स्थिति को बिगाड़ने की कोशिश की। (Pahalgam AI fake narrative)

पहलगाम आतंकी हमले के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कुछ ही घंटों के भीतर ऐसी तस्वीरें, वीडियो और दावे वायरल होने लगे, जिनका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन उनका मकसद साफ था डर फैलाना, भ्रम पैदा करना और हालात को और भड़काना। (Pahalgam AI fake narrative)

Pahalgam AI fake narrative: फेक नैरेटिव क्या होता है?

फेक नैरेटिव का मतलब सिर्फ झूठी खबर नहीं होता। यह एक सोची-समझी रणनीति होती है, जिसे इस तरह पेश किया जाता है कि लोग उसे सच मान लें। इसमें आधी सच्चाई, भावनात्मक भाषा और डर पैदा करने वाले विजुअल्स का इस्तेमाल किया जाता है। पहलगाम मामले में भी ऐसा ही हुआ। कुछ पोस्ट्स में यह दावा किया गया कि बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया गया है, कहीं यह बताया गया कि सुरक्षा बलों को भारी नुकसान हुआ है, तो कहीं पूरी तरह से नकली तस्वीरें दिखाकर माहौल को सनसनीखेज बनाने की कोशिश की गई।

एआई की मदद से यह काम पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है। अब किसी को घंटों फोटो एडिटिंग करने की जरूरत नहीं पड़ती। कुछ सेकंड में डीपफेक वीडियो, एआई-जनरेटेड इमेज और नकली ऑडियो तैयार हो जाता है, जो असली जैसा दिखता है। (Pahalgam AI fake narrative)

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पहलगाम के बाद सोशल मीडिया पर क्या हुआ?

घटना के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर पोस्ट्स की बाढ़ आ गई। कुछ अकाउंट्स ने दावा किया कि यह हमला किसी बड़े युद्ध की शुरुआत है। कुछ ने यह दिखाने की कोशिश की कि हालात नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। यहां तक कि कुछ वीडियो ऐसे भी वायरल हुए, जो किसी और देश या पुराने संघर्ष से जुड़े थे, लेकिन उन्हें पहलगाम का बताकर शेयर किया गया।

समस्या यह थी कि इन पोस्ट्स को देखकर आम लोग घबरा गए। कई लोगों ने बिना जांचे-परखे इन्हें आगे शेयर कर दिया। देखते-ही-देखते फेक नैरेटिव सैकड़ों-हजारों लोगों तक पहुंच गया। यही वह बिंदु है जहां सूचना युद्ध खतरनाक बन जाता है। (Pahalgam AI fake narrative)

डीजीआईएसपीआर ने फैलाईं फेक न्यूज

ऑपरेशन सिंदूर के पहले ही दिन डीपफेक वीडियो, एडिट किए गए फुटेज और झूठी जानकारियां सिर्फ सोशल मीडिया पर ही नहीं, बल्कि ऑफिशियल चैनलों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक के जरिए फैलाने की कोशिश की गई। पाकिस्तान ने सूचना के जरिये हमला करने की रणनीति अपनाई और यह सब पकिस्तानी सेना की एजेंसी डीजीआईएसपीआर (DGISPR) के जरिए किया गया। (Pahalgam AI fake narrative)

एक ही दिन में 15 लाख से ज्यादा साइबर अटैक

ऑपरेशन सिंदूर वाले दिन पाकिस्तान की तरफ से 7 एडवांस्ड पर्सिस्टेंट थ्रेट (APT) साइबर ग्रुप्स सक्रिय थे और 7 मई को एक ही दिन में 15 लाख से ज्यादा साइबर अटैक किए गए। यही नहीं, ऑपरेशन के पहले दिन ही नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर करीब 3 करोड़ साइबर हमले दर्ज किए गए।

पाकिस्तान की तरफ से बड़ी संख्या में यूट्यूब चैनल, एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट्स और सरकारी हैंडल्स का इस्तेमाल फेक न्यूज फैलाने के लिए किया गया। हैरानी की बात यह थी कि 30 से 40 मिनट के अंदर एक जैसी भाषा और एक जैसे मैसेज बड़ी संख्या में पोस्ट किए गए। उन्होंने कहा कि सिर्फ 43 समान थ्रेड्स से एक लाख से ज्यादा वीडियो तैयार कर दिए गए, ताकि एक ही झूठी कहानी को बार-बार फैलाया जा सके।

इस सूचना युद्ध में इन्फ्लुएंसर्स के जरिए लोगों की राय बदलने की कोशिश की गई। इस संदर्भ में ज्योति मल्होत्रा केस का जिक्र किया जा सकता है जो यह दिखाता है कि किस तरह प्रभावशाली चेहरों का इस्तेमाल किया गया। (Pahalgam AI fake narrative)

सेना प्रमुख से जुड़े 23 डीपफेक वीडियोज

ऑपरेशन सिंदूर के आठ महीने बाद भी यह सिलसिला अभी भी रुका नहीं है।  पिछले चार महीनों में 217 डीपफेक मामलों सामने आए, जिनमें से 164 भारतीय सेना से जुड़े थे। इनमें सीडीएस से जुड़े 9, थलसेना प्रमुख से जुड़े 23, वायुसेना प्रमुख से जुड़े 4 और नौसेना प्रमुख से जुड़े 3 डीपफेक शामिल हैं।

आज हालात ऐसे हो गए हैं कि जब भी कोई सैन्य प्रमुख किसी मंच से बोलता है, तो आधे घंटे के भीतर उसका एआई-आधारित डीपफेक वीडियो तैयार कर दिया जाता है, जिसमें बस थोड़े-बहुत बदलाव किए जाते हैं, ताकि वह पूरी तरह असली लगे। यह आज के दौर में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बेहद गंभीर चुनौती बन चुका है। (Pahalgam AI fake narrative)

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एआई कैसे बना रहा है झूठ को और खतरनाक?

पहले झूठी खबरें पहचानना थोड़ा आसान था। फोटो धुंधली होती थी, वीडियो की क्वालिटी खराब होती थी या भाषा में साफ गलती दिख जाती थी। लेकिन अब एआई ने यह फर्क लगभग खत्म कर दिया है। डीपफेक टेक्नोलॉजी किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज और हाव-भाव इतनी सफाई से कॉपी कर सकती है कि आम आदमी के लिए सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।

पहलगाम से जुड़े कुछ वीडियो में सुरक्षाबलों की कार्रवाई को गलत तरीके से दिखाया गया। कुछ में ऐसे बयान जोड़ दिए गए, जो कभी दिए ही नहीं गए थे। इन सबका मकसद सिर्फ एक था लोगों के दिमाग में शक और डर पैदा करना। (Pahalgam AI fake narrative)

क्यों होता है ऐसा फेक नैरेटिव?

फेक नैरेटिव यूं ही नहीं फैलता। इसके पीछे कई मकसद होते हैं। पहला मकसद होता है अफरा-तफरी फैलाना। जब लोग डरते हैं, तो वे तर्क से नहीं, भावना से फैसले लेते हैं। दूसरा मकसद होता है राजनीतिक या रणनीतिक दबाव बनाना। अगर यह दिखा दिया जाए कि हालात बहुत खराब हैं, तो सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव बढ़ता है।

तीसरा और सबसे खतरनाक मकसद होता है एस्केलेशन यानी टकराव को बढ़ाना। अगर झूठे दावों के आधार पर कोई गलत फैसला लिया जाए, तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं। (Pahalgam AI fake narrative)

पहलगाम और मल्टी-डोमेन खतरा

आज की जंग सिर्फ जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं है। अब इसमें साइबर, स्पेस और इन्फॉर्मेशन डोमेन भी शामिल हो चुके हैं। यही बात अंतरराष्ट्रीय रिसर्च संस्थाएं भी लगातार कह रही हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की जनवरी 2026 की एक पॉलिसी पेपर में साफ कहा गया है कि एआई-आधारित डिसइन्फॉर्मेशन जैसे मल्टी-डोमेन टूल्स परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच भी हालात को खतरनाक मोड़ पर ले जा सकते हैं। खास तौर पर भारत-पाकिस्तान जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में यह जोखिम और ज्यादा है ।

इस रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर फेक नैरेटिव्स को समय रहते नहीं रोका गया, तो वे वास्तविक सैन्य हालात को गलत तरीके से पेश कर सकते हैं, जिससे गलत आकलन और गलत फैसले हो सकते हैं। (Pahalgam AI fake narrative)

सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती

पहलगाम के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने दोहरी चुनौती थी। एक तरफ जमीन पर हालात को काबू में रखना और दूसरी तरफ डिजिटल दुनिया में फैल रहे झूठ को रोकना। यह काम आसान नहीं होता, क्योंकि फेक कंटेंट सेकंडों में फैल जाता है, जबकि सच तक पहुंचने में वक्त लगता है।

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कई बार एजेंसियों को अपना कीमती समय और संसाधन सिर्फ इस बात पर लगाने पड़ते हैं कि कौन-सी खबर फर्जी है और उसे कैसे काउंटर किया जाए। यही वजह है कि आजकल सुरक्षा एजेंसियां इन्फ़ॉर्मेशन वॉरफेयर को भी उतनी ही गंभीरता से ले रही हैं, जितनी पारंपरिक सुरक्षा को। (Pahalgam AI fake narrative)

मीडिया और आम लोगों की भूमिका

फेक नैरेटिव के खिलाफ लड़ाई सिर्फ सरकार या सेना नहीं जीत सकती। इसमें मीडिया और आम लोगों की भूमिका सबसे अहम है। पहलगाम के मामले में भी देखा गया कि कुछ जिम्मेदार मीडिया संस्थानों ने बिना पुष्टि के खबरें नहीं चलाईं। उन्होंने आधिकारिक जानकारी का इंतजार किया और अफवाहों से दूरी बनाए रखी।

वहीं आम लोगों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे हर वायरल पोस्ट पर भरोसा न करें। किसी भी वीडियो या तस्वीर को शेयर करने से पहले यह सोचना जरूरी है कि इसका सोर्स क्या है और क्या यह जानकारी किसी भरोसेमंद जगह से आई है। (Pahalgam AI fake narrative)

फेक नैरेटिव का सबसे बड़ा खतरा

फेक नैरेटिव का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि लोग कुछ देर के लिए गुमराह हो जाते हैं। असली खतरा यह है कि यह भरोसे को कमजोर कर देता है। जब लोग यह नहीं समझ पाते कि क्या सच है और क्या झूठ, तो वे हर जानकारी पर शक करने लगते हैं। इससे समाज में तनाव बढ़ता है और हालात और बिगड़ते हैं।

पहलगाम जैसे संवेदनशील इलाके में यह खतरा और ज्यादा होता है, क्योंकि यहां की हर खबर का असर सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पड़ता है। (Pahalgam AI fake narrative)

कैसे रोका जाए एआई-फेक नैरेटिव?

आने वाले समय में एआई-आधारित फेक नैरेटिव और भी खतरनाक हो सकते हैं। इसलिए इससे निपटने के लिए ठोस रणनीति जरूरी है। सबसे पहले, टेक्नोलॉजी के स्तर पर ऐसे टूल्स विकसित करने होंगे, जो डीपफेक और फर्जी कंटेंट को जल्दी पहचान सकें।

दूसरा, लोगों को डिजिटली एजुकेट करना होगा, ताकि वे खुद समझ सकें कि कौन-सी जानकारी भरोसेमंद है और कौन-सी नहीं। तीसरा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी, ताकि वे फेक कंटेंट को फैलने से पहले रोक सकें। (Pahalgam AI fake narrative)

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  • पहलगाम के बाद पाकिस्तान ने AI से फैलाई थीं झूठी कहानियां, फर्जी नैरेटिव के लिए बना रहे CDS, सेना प्रमुख और IAF चीफ के डीफ फेक वीडियोज

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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