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50 साल पुराने रूसी पेचोरा मिसाइल सिस्टम को मिली नई जान, अब बनेगा सुदर्शन चक्र का हिस्सा

साल 2020 में रक्षा मंत्रालय ने करीब 591 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट अल्फा डिजाइन को दिया। इसका मकसद था वायुसेना के 16 पेचोरा सिस्टम्स को पूरी तरह आधुनिक बनाना...

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📍बेंगलुरु | 30 Jan, 2026, 9:51 PM

Upgraded Pechora Missile System: भारतीय वायुसेना के पेचोरा सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम को भारतीय कंपनी अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज ने पूरी तरह अपग्रेड कर दिया है। हाल ही में इस अपग्रेडेड सिस्टम ने अपने अहम लाइव-फायर टेस्ट सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। यह अपग्रेड ऐसे समय पर हुआ है, जब हवाई खतरे तेजी से बदल रहे हैं। ड्रोन, क्रूज मिसाइल, लो-फ्लाइंग टारगेट और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे नए खतरे सामने हैं। ऐसे माहौल में पेचोरा जैसे पुराने सिस्टम को हटाने के बजाय उसे अपग्रेड करना भारतीय वायुसेना की एक सोची-समझी रणनीति है।

Upgraded Pechora Missile System: क्या है पेचोरा सिस्टम

पेचोरा मिसाइल सिस्टम, जिसे दुनिया एस-125 नेवा या पेचोरा के नाम से जानती है। इसे सोवियत दौर में विकसित किया गया था। भारत ने इसे 1970 के दशक में अपनी वायु रक्षा में शामिल किया था। उस समय यह सिस्टम दुश्मन के लड़ाकू विमानों और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले टारगेट्स के खिलाफ बेहद प्रभावी माना जाता था। इसकी रेंज 25-35 किमी थी, जो अपग्रेडेड वर्जन में 35 से ज्यादा हो गई है।

पिछले करीब 50 सालों में पेचोरा ने भारतीय वायुसेना की एयर डिफेंस में अहम भूमिका निभाई है। कई युद्ध अभ्यासों और वास्तविक हालात में इस सिस्टम ने अपनी विश्वसनीयता साबित की। लेकिन समय के साथ तकनीक बदलती गई और यही पेचोरा की सबसे बड़ी चुनौती बन गई।

6-7 मई को हुए ऑपरेशन सिंदूर में भी पेचोरा ने अहम भूमिका निभाई थी। यह पाकिस्तान की तरफ से आए स्वार्म ड्रोन्स, लोइटरिंग म्यूनिशंस, और लो-फ्लाइंग एरियल थ्रेट्स को इंटरसेप्ट करने में इस्तेमाल हुआ था। यह लेयर्ड एयर डिफेंस का हिस्सा था, जिसमें आकाश, ओसाका, एस-400 और स्पाइडर शामिल थे। वहीं कैनिबलाइजेशन तकनीक से पुराने यूनिट्स से पार्ट्स लेकर एक्टिव बैटरियों को ऑपरेशनल रखा गया। इस ऑपरेशन में अपग्रेडेड पेचोरा ने अपनी रिलायबिलिटी साबित की, और यह सुदर्शन चक्र (लेयर्ड एयर डिफेंस शील्ड) का हिस्सा बन रहा है। (Upgraded Pechora Missile System)

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क्यों जरूरी हो गया था अपग्रेड

आज की लड़ाई 1970 या 1980 के दशक जैसी नहीं रही। अब खतरा सिर्फ फाइटर जेट्स से नहीं है, बल्कि ड्रोन, क्रूज मिसाइल, लो-रडार सिग्नेचर टारगेट्स और स्वार्म अटैक्स से भी है। पुराने पेचोरा सिस्टम में एनालॉग टेक्नोलॉजी इस्तेमाल होती थी। इसमें वैल्व और ट्रांजिस्टर बेस्ड हार्डवेयर होता था, जिसे मेंटेन करना मुश्किल और महंगा होता जा रहा था।

इसके अलावा, रूस से स्पेयर पार्ट्स पर निर्भरता भी एक बड़ी समस्या बन चुकी थी। जियो-पॉलिटिकल हालात और सप्लाई चेन की दिक्कतों ने यह साफ कर दिया कि अगर पुराने सिस्टम्स को जिंदा रखना है, तो देश के भीतर ही उनका समाधान निकालना होगा।

यही वजह है कि भारतीय वायुसेना ने फैसला किया कि पेचोरा जैसे भरोसेमंद लेकिन पुराने सिस्टम को हटाने के बजाय उसे पूरी तरह अपग्रेड किया जाए। (Upgraded Pechora Missile System)

अल्फा डिजाइन को क्यों मिली जिम्मेदारी

बेंगलुरु की अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज लिमिटेड पहले से ही भारतीय सेना और वायुसेना के लिए कई स्वदेशी सिस्टम डेवलप कर चुकी है। थर्मल इमेजिंग फायर कंट्रोल यूनिट, सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो, लेजर टारगेट डिजाइनटर और मिसाइल लॉन्च डिटेक्शन सिस्टम जैसे प्रोजेक्ट्स में कंपनी का अनुभव रहा है।

साल 2020 में रक्षा मंत्रालय ने करीब 591 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट अल्फा डिजाइन को दिया। इसका मकसद था वायुसेना के 16 पेचोरा सिस्टम्स को पूरी तरह आधुनिक बनाना। यह एक बड़ा भरोसा था, क्योंकि पहली बार किसी निजी भारतीय कंपनी को इतने पुराने और संवेदनशील मिसाइल सिस्टम के अपग्रेड की जिम्मेदारी दी गई थी। (Upgraded Pechora Missile System)

अपग्रेड में क्या-क्या बदला गया

इस अपग्रेड को सिर्फ “मरम्मत” कहना सही नहीं होगा। दरअसल पेचोरा को अंदर से पूरी तरह नया बना दिया गया है। सबसे पहले इसके ट्रैकिंग रडार सिस्टम को पूरी तरह डिजिटल किया गया। पुराने एनालॉग सिग्नल प्रोसेसिंग की जगह अब आधुनिक डिजिटल प्रोसेसिंग सिस्टम लगाए गए हैं। इससे टारगेट को पकड़ने, ट्रैक करने और मिसाइल को गाइड करने की क्षमता कई गुना बेहतर हो गई है।

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रडार का नया ट्रांसमीटर और रिसीवर चेन लगाया गया है। पुराने वैल्व और ट्रांजिस्टर आधारित हिस्सों की जगह अब आधुनिक सेमीकंडक्टर चिप्स इस्तेमाल हो रहे हैं, जो ज्यादा भरोसेमंद और कम मेंटेनेंस वाले हैं। (Upgraded Pechora Missile System)

ऑपरेटर्स के लिए केबिन को भी पूरी तरह मॉडर्न बनाया गया है। अब वहां डिजिटल डिस्प्ले, डेटा कलेक्शन सिस्टम और हेल्थ मॉनिटरिंग यूनिट्स लगी हैं। इससे सिस्टम की हालत को रियल-टाइम में देखा जा सकता है।

ऑटोमेशन बढ़ने से केबिन में काम करने वाले क्रू की संख्या भी कम हो गई है। यानी अब कम लोग ज्यादा सटीक और तेजी से फैसले ले सकते हैं।

इसके अलावा, मिसाइल कॉम्प्लेक्स के मैकेनिकल हिस्सों को भी या तो रिफर्बिश किया गया है या पूरी तरह बदला गया है, ताकि सिस्टम अगले कई वर्षों तक बिना बड़ी दिक्कत के काम करता रहे। (Upgraded Pechora Missile System)

पोखरण में हुआ असली इम्तिहान

किसी भी हथियार प्रणाली के लिए सबसे बड़ा टेस्ट मैदान में होता है। अपग्रेडेड पेचोरा सिस्टम का यूजर फायरिंग ट्रायल राजस्थान के पोखरण रेंज में हुआ। यह ट्रायल नवंबर 2025 से दिसंबर 2025 के बीच चले।

इन ट्रायल्स में यह देखा गया कि नया डिजिटल सिस्टम असली हालात में कितना भरोसेमंद है। टारगेट डिटेक्शन, ट्रैकिंग, मिसाइल लॉन्च और इंटरसेप्शन- हर स्टेज पर सिस्टम ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन किया। यही वजह है कि इसे एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। (Upgraded Pechora Missile System)

वायुसेना को क्या मिलेगा फायदा

अपग्रेडेड पेचोरा सिस्टम भारतीय वायुसेना की लेयर्ड एयर डिफेंस स्ट्रैटेजी का अहम हिस्सा बनेगा। इसे मिशन सुदर्शन चक्र के तहत शामिल किया जा रहा है, जिसका मकसद ड्रोन से लेकर हाई-स्पीड फाइटर जेट तक हर खतरे से देश को सुरक्षित रखना है।

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जब तक आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएम और दूसरे नए सिस्टम पूरी संख्या में तैनात नहीं हो जाते, तब तक अपग्रेडेड पेचोरा एक मजबूत ब्रिज का काम करेगा। (Upgraded Pechora Missile System)

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  • News Desk

    रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"

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