📍नई दिल्ली | 7 Feb, 2026, 8:49 AM
Rafale ITAR impact on India: राफेल फाइटर जेट के लिए अहम पार्ट बनाने वाली एक फ्रांसीसी कंपनी को अब एक अमेरिकी कंपनी ने खरीद लिया है। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या राफेल अब अमेरिका के आईटीएआर (इंटरनेशनल ट्रैफिक इन आर्म्स रेगुलेशंस) कानून के दायरे में आ सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर सिर्फ फ्रांस पर नहीं, बल्कि भारत जैसे उन देशों पर भी पड़ सकता है, जिन्होंने राफेल खरीदा है या खरीदने की तैयारी कर रहे हैं।
यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत इस समय राफेल से जुड़ी दो बड़ी योजनाओं पर काम कर रहा है- एक तरफ वायुसेना के लिए 114 नए राफेल लड़ाकू विमानों का प्रस्ताव है और दूसरी तरफ नौसेना के लिए राफेल मरीन की डील पर अमल शुरू हो चुका है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि असल मामला क्या है और भारत के लिए इसमें कितना जोखिम है। (Rafale ITAR impact on India)
Rafale ITAR impact on India: आईटीएआर-फ्री रहा है राफेल
मल्टी-रोल फाइटर जेट राफेल को फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन बनाती है। यह विमान हवा से हवा, हवा से जमीन, समुद्री हमलों और यहां तक कि न्यूक्लियर मिशन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। राफेल की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती रही है कि यह “आईटीएआर-फ्री” है।
आईटीएआर-फ्री होने का मतलब यह है कि इसमें अमेरिकी तकनीक या अमेरिकी कंट्रोल वाले पार्ट्स नहीं लगे होते। इसलिए अगर कोई देश राफेल खरीदता है, तो उसे अमेरिका से अलग से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं पड़ती। यही वजह है कि भारत, मिस्र, ग्रीस, इंडोनेशिया जैसे देशों ने राफेल को खरीदा। (Rafale ITAR impact on India)
फ्रांसीसी सप्लायर को अमेरिका ने खरीदा
दिसंबर 2025 में अमेरिका की लोअर ग्रुप नाम की कंपनी ने फ्रांस की एलएमबी एयरोस्पेस नामक कंपनी को करीब 433 मिलियन डॉलर में खरीद लिया। एलएमबी एयरोस्पेस एक छोटी लेकिन रणनीतिक कंपनी है, जो हाई-परफॉर्मेंस फैंस और ब्रशलेस मोटर्स बनाती है। ये वही पार्ट्स हैं, जो राफेल के कूलिंग सिस्टम में इस्तेमाल होते हैं। इसके अलावा ये पार्ट्स फ्रांस की न्यूक्लियर सबमरींस में भी लगते हैं।
इस साल जनवरी में फ्रांसीसी सरकार ने इस सौदे को मंजूरी दे दी, लेकिन फ्रांस की संसद में इस पर जबरदस्त विरोध हुआ। विपक्षी नेताओं ने कहा कि इससे फ्रांस की डिफेंस आटोनॉमी खतरे में पड़ सकती है। उनका तर्क था कि अगर कोई अमेरिकी कंपनी किसी अहम सप्लायर की मालिक बन जाती है, तो भविष्य में उस पर अमेरिकी कानून लागू हो सकते हैं। (Rafale ITAR impact on India)
आईटीएआर क्या है और इससे डर क्यों लगता है?
आईटीएआर यानी इंटरनेशनल ट्रैफिक इन आर्म्स रेगुलेशंस अमेरिका का एक सख्त कानून है। इसके तहत अमेरिका यह तय करता है कि उसके कंट्रोल में आने वाली रक्षा तकनीक या पार्ट्स किस देश को दिए जा सकते हैं, किस शर्त पर दिए जा सकते हैं और किन हालात में रोके जा सकते हैं।
अगर किसी वेपन सिस्टम का कोई भी अहम हिस्सा आईटीएआर के दायरे में आ जाता है, तो उसके एक्सपोर्ट, अपग्रेड या थर्ड पार्टी ट्रांसफर के लिए अमेरिकी मंजूरी जरूरी हो जाती है। कई देशों का अनुभव रहा है कि संकट या राजनीतिक मतभेद के समय अमेरिका इस कानून का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए करता है।
राफेल की बिक्री में फ्रांस अब तक यह भरोसा देता रहा है कि यह विमान पूरी तरह से अमेरिकी प्रभाव से मुक्त है। लेकिन एलएमबी एयरोस्पेस की अमेरिकी खरीद के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य में राफेल के कुछ पार्ट्स पर आईटीएआर लागू हो सकता है। (Rafale ITAR impact on India)
क्या राफेल तुरंत आईटीएआर के तहत आ जाएगा?
डिफेंस सूत्रों और विशेषज्ञों की राय में इसका जवाब है- नहीं, कम से कम तुरंत नहीं। सिर्फ कंपनी का मालिक बदल जाने से किसी सिस्टम की कानूनी स्थिति अपने आप नहीं बदलती। मौजूदा राफेल विमानों पर इसका कोई तात्कालिक असर नहीं पड़ेगा।
लेकिन चिंता भविष्य को लेकर है। अगर आने वाले समय में एलएमबी के बनाए पार्ट्स को अमेरिकी कानूनों के तहत “डिफेंस क्रिटिकल” घोषित किया गया, या उनमें अमेरिकी तकनीक जोड़ी गई, तो आईटीएआर लागू हो सकता है। अमेरिका का पिछला रिकॉर्ड बताता है कि वह नियमों की व्याख्या अपने हित में करता है, जिससे अनिश्चितता बनी रहती है। (Rafale ITAR impact on India)
फ्रांस में क्यों मचा राजनीतिक बवाल?
फ्रांस में राफेल सिर्फ एक विमान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक है। फ्रांसीसी नेता अक्सर कहते हैं कि राफेल खरीदने का मतलब है वॉशिंगटन से आजादी। यही वजह है कि संसद में लगभग सभी दलों ने इस सौदे पर सवाल उठाए।
सरकार का कहना है कि उसने सौदे में सख्त शर्तें लगाई हैं। जैसे कि एलएमबी की मैन्युफैक्चरिंग फ्रांस में ही रहेगी, फ्रांसीसी मिलिट्री कॉन्ट्रैक्ट्स सुरक्षित रहेंगे और सरकार के पास वीटो का अधिकार होगा। लेकिन आलोचकों को डर है कि कागजों की शर्तें भविष्य की राजनीतिक हकीकत के सामने कमजोर पड़ सकती हैं। (Rafale ITAR impact on India)
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
भारत के पास इस समय 36 राफेल विमान हैं, जो भारतीय वायुसेना की ताकत का अहम हिस्सा हैं। इसके अलावा भारत ने 2025 में नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन विमानों की डील साइन की है, जो स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर तैनात होंगे।
सबसे बड़ा मामला 114 नए राफेल विमानों का है, जिन पर करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। भारत ने राफेल को इसलिए चुना था क्योंकि यह अमेरिकी नियंत्रण से मुक्त माना जाता था। अगर भविष्य में आईटीएआर की आशंका बढ़ती है, तो भारत के लिए स्पेयर्स, अपग्रेड और लॉन्ग-टर्म सपोर्ट को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
हालांकि, जानकारों का कहना है कि भारत के साथ फ्रांस का रिश्ता रणनीतिक है और फ्रांस भारत को भरोसे में लिए बिना कोई कदम नहीं उठाएगा। फिर भी, यह एक ऐसा जोखिम है जिसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। (Rafale ITAR impact on India)
अन्य देशों पर क्या असर पड़ सकता है?
राफेल सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों की वायुसेना का अहम हिस्सा है। मिस्र, ग्रीस, इंडोनेशिया जैसे देश भी इसे इसलिए चुनते हैं क्योंकि इसमें अमेरिकी दखल नहीं होता। अगर यह धारणा कमजोर पड़ती है, तो राफेल की भविष्य की एक्सपोर्ट अपील पर असर पड़ सकता है।
हालांकि फ्रांस के पास कुछ विकल्प हैं। वह या तो वैकल्पिक सप्लायर्स खोज सकता है, या एलएमबी एयरोस्पेस के मामलों में सख्त सरकारी नियंत्रण बनाए रख सकता है। भारत के लिए जरूरी है कि वह किसी भी नई डील में आईटीएआर से जुड़े क्लॉज को साफ-साफ समझे और अपने हित सुरक्षित रखे।
फिलहाल, फरवरी 2026 तक की स्थिति में कोई तात्कालिक खतरा नहीं दिखता। लेकिन आज के दौर में डिफेंस डील सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सप्लाई चेन और कानून भी उतने ही अहम हो गए हैं। लेकिन अमेरिकी कंपनी की खरीद ने यह दिखा दिया है कि ग्लोबल डिफेंस इंडस्ट्री में एक छोटा सा बदलाव भी बड़े रणनीतिक सवाल खड़े कर सकता है। (Rafale ITAR impact on India)


