📍नई दिल्ली/बेंगलुरु | 9 Apr, 2026, 11:46 PM
Atmanirbharta in Defence Technology: भारतीय सेना और डिफेंस सिस्टम में अक्सर हथियार को लेकर आत्मनिर्भरता की बात की जाती है, लेकिन अब इस सोच में बदलाव देखने को मिल रहा है। ‘रण संवाद 2026’ कार्यक्रम में चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने साफ कहा कि आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ देश में हथियार बनाना नहीं है, बल्कि असली जरूरत तकनीक पर पूरा नियंत्रण हासिल करना है।
Atmanirbharta in Defence Technology: सिर्फ हथियार बनाना ही आत्मनिर्भरता नहीं
एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि अगर कोई देश सिर्फ हथियार बना लेता है, लेकिन उसके सॉफ्टवेयर, डेटा और सिस्टम पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं है, तो वह पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं माना जा सकता।
उन्होंने समझाया कि आज के आधुनिक हथियार सिर्फ मशीन नहीं होते, बल्कि उनमें सॉफ्टवेयर, एन्क्रिप्शन और डेटा सिस्टम बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। अगर इन पर नियंत्रण नहीं होगा, तो किसी भी संकट के समय दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
टेक्नोलॉजी पर कंट्रोल क्यों जरूरी
उन्होंने कहा कि रक्षा क्षेत्र में “आर्किटेक्चर” यानी सिस्टम का पूरा स्ट्रक्चर, सॉफ्टवेयर, डेटा स्टैंडर्ड और अपग्रेड साइकिल बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
अगर इन चीजों का कंट्रोल अपने पास नहीं होगा, तो जरूरत पड़ने पर सिस्टम को बदलना या अपडेट करना भी मुश्किल हो सकता है। इसका सीधा असर ऑपरेशन पर पड़ता है।
थिएटराइजेशन पर भी सहमति
एयर मार्शल दीक्षित ने यह भी बताया कि भारतीय सेनाओं के “थिएटराइजेशन” यानी तीनों सेनाओं को एक साथ जोड़कर काम करने की योजना पर 90 प्रतिशत से ज्यादा सहमति बन चुकी है।
इसका मतलब है कि सेना, वायुसेना और नौसेना अलग-अलग काम करने के बजाय एक साझा सिस्टम के तहत ऑपरेशन करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
सिर्फ हथियारों की संख्या से नहीं मापी जाती ताकत
उन्होंने कहा कि किसी देश की सैन्य ताकत सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसके पास कितने हथियार या प्लेटफॉर्म हैं। असल ताकत इस बात से तय होती है कि वह कितनी तेजी से अलग-अलग सोर्सेज से मिली जानकारी को जोड़कर एक साफ तस्वीर बना सकता है और उस आधार पर कितनी जल्दी फैसले ले सकता है।
एयर मार्शल दीक्षित ने बताया कि आज के युद्ध में डेटा और नेटवर्क सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं। अगर सिस्टम साइबर अटैक या इलेक्ट्रॉनिक हमले के दौरान भी काम करता रहे, तो वही असली मजबूती मानी जाती है। साथ ही, अगर कोई सिस्टम खराब हो जाए, तो उसे कितनी जल्दी फिर से चालू किया जा सकता है, यह भी उतना ही जरूरी है।
मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की असली समझ
उन्होंने कहा कि मल्टी-डोमेन ऑपरेशन का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि तीनों सेनाएं एक साथ बैठकर चर्चा करें।
असल मायने में इसका मतलब है कि सभी सेनाएं मिलकर रियल टाइम में ऑपरेशन करें और एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाकर काम करें।
ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख
एयर मार्शल दीक्षित ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि इस ऑपरेशन ने साफ दिखा दिया कि अब युद्ध एक ही क्षेत्र से नहीं जीता जा सकता। जमीन, हवा, समुद्र, साइबर और अन्य सभी क्षेत्रों में एक साथ काम करना जरूरी हो गया है। हर डोमेन एक-दूसरे को सपोर्ट करता है और तभी सही नतीजे मिलते हैं।
उन्होंने कहा कि युद्ध की मूल प्रकृति भले ही वही हो, लेकिन उसका तरीका बहुत तेजी से बदल रहा है। अब युद्ध चरणों में नहीं चलता, बल्कि एक साथ कई स्तरों पर होता है। एक छोटा सा कदम भी कुछ ही मिनटों में बड़े रणनीतिक असर डाल सकता है।
एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि इन सभी बदलावों को देखते हुए सेना को अपने प्रशिक्षण, उपकरण और ऑपरेशन के तरीके में बदलाव करना जरूरी है। अब लक्ष्य यह है कि सभी सिस्टम एक साथ मिलकर काम करें और किसी भी स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें।

