📍नई दिल्ली | 12 Feb, 2026, 9:53 PM
114 Rafale deal: फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की अगले हफ्ते होने वाली भारत यात्रा से पहले भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल लड़ाकू विमानों की बहुप्रतीक्षित डील को गुरुवार को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल यानी डीएसी ने “एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी” यानी एओएन दे दी है। इस सौदे की अनुमानित कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसे भारत की अब तक की सबसे बड़ी फाइटर जेट खरीद माना जा रहा है।
लेकिन एओएन मिलने के बावजूद कॉन्ट्रैक्ट साइन होने में एक साल या उससे ज्यादा समय लग सकता है। आम लोगों के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि जब मंजूरी मिल गई, तो फिर देरी क्यों? इसका जवाब समझने के लिए पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझना जरूरी है। (114 Rafale deal)
114 Rafale deal: एओएन का मतलब क्या है?
एओएन का मतलब है कि सरकार ने सैद्धांतिक रूप में मान लिया है कि यह खरीद जरूरी है। यानी वायुसेना को 114 मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट चाहिए और इस दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। लेकिन एओएन मिलना अंतिम मंजूरी नहीं होती। इसके बाद कई और चरण पूरे करने होते हैं। (114 Rafale deal)
कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की अंतिम मंजूरी
एओएन के बाद अंतिम मंजूरी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) से मिलती है। यह समिति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बैठती है। सूत्रों का कहना है कि इस मामले में सीसीएस की बैठक शुक्रवार को बुलाई जा सकती है, जहां इसे अंतिम मंजूरी दी जा सकती है। बड़े रक्षा सौदों पर यह समिति अंतिम फैसला लेती है।
सूत्रों का कहना है कि फ्रांस के राष्ट्रपति की यात्रा से पहले सरकार इसके सभी प्रोसिजर पूरे लेना चाहती है, ताकि बाद में डील में कोई रुकावट न आने पाए। हालांकि सूत्रों का कहना है कि सीसीएस की बैठक के बावजूद सरकारी स्तर पर पूरी फाइल प्रक्रिया, वित्तीय जांच और शर्तों की समीक्षा में समय लगना सामान्य बात है। इसलिए डील पर आखिरी महर लगने में एक साल तक का वक्त लग सकता है। (114 Rafale deal)
कीमत तय करना सबसे बड़ी चुनौती
114 राफेल की डील बहुत बड़ी है। इसमें केवल विमान ही नहीं, बल्कि हथियार पैकेज, ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत में मैन्युफैक्चरिंग सुविधा भी शामिल है।
#DAC gives green signal to the much-awaited #MRFA deal 🚨
Acceptance of Necessity (AON) has now been granted — a major step forward for the Indian Air Force’s long-pending fighter modernisation.
The #Rafale journey has seen nearly 25 years of delays, debates, policy shifts and… pic.twitter.com/Krsz4YYifE— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) February 12, 2026
फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन से कीमत तय करने में लंबी बातचीत होगी। 2016 में जब 36 राफेल विमानों की डील हुई थी, तब भी कीमत और हथियार पैकेज को लेकर लंबी बातचीत चली थी। इस बार सौदा बहुत बड़ा है। इसमें सिर्फ विमान ही नहीं, बल्कि मीटियोर बीवीआर मिसाइल, स्कैल्प क्रूज मिसाइल, मेंटेनेंस पैकेज, ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स और लॉन्ग-टर्म सपोर्ट भी शामिल होंगे। हर चीज की अलग-अलग कीमत तय होती है। इसके अलावा रुपये और यूरो के बीच विनिमय दर में उतार-चढ़ाव भी अंतिम लागत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन कमेटी को हर बिंदु पर विस्तार से चर्चा करनी होगी। (114 Rafale deal)
सूत्रों के मुताबिक यह सौदा सरकार-से-सरकार यानी गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट मॉडल पर होगा। प्रस्ताव के मुताबिक 114 में से लगभग 18 विमान सीधे फ्रांस से तैयार हालत में आएंगे, जबकि बाकी 96 विमान भारत में बनाए या असेंबल किए जाएंगे। यही “मेक इन इंडिया” वाला हिस्सा है, जो इस डील को और जटिल बनाता है। भारत में निर्माण के दौरान कम से कम 50 से 60 फीसदी स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य रखा गया है। यही हिस्सा बातचीत को लंबा कर सकता है। (114 Rafale deal)
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और ‘मेक इन इंडिया’ की शर्तें
इस डील का बड़ा हिस्सा ‘मेक इन इंडिया’ से जुड़ा है। भारत चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा काम देश में हो। इसके लिए प्रोडक्शन लाइन लगानी होगी, इंजन और एवियोनिक्स सिस्टम के कुछ हिस्सों का स्थानीय निर्माण तय करना होगा, और भारतीय कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
दसॉ एविएशन टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के साथ साझेदारी कर रही है। लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने से पहले फैक्ट्री, उपकरण, गुणवत्ता जांच और ट्रेनिंग जैसी कई तैयारियां करनी होंगी। इन सब पर लंब समझौता करना पड़ता है, जिसमें समय लगता है। (114 Rafale deal)
बजट और वैश्विक हालात का असर
इतने बड़े सौदे के लिए बजट का प्रबंधन भी अहम है। डिफेंस कैपिटल बजेट सीमित होता है और कई बड़े प्रोजेक्ट एक साथ चल रहे हैं। इसके अलावा डॉलर और यूरो के मुकाबले रुपये की कीमत में उतार-चढ़ाव भी कुल लागत को प्रभावित करता है।
ग्लोबल सप्लाई चेन की स्थिति, यूरोप में उत्पादन क्षमता और अन्य अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर भी डिलीवरी शेड्यूल को प्रभावित कर सकते हैं। (114 Rafale deal)
वायुसेना के लिए क्यों जरूरी है यह डील?
एक और महत्वपूर्ण पहलू है भारतीय वायुसेना की मौजूदा स्थिति। स्वीकृत 42.5 स्क्वाड्रन की तुलना में अभी वायुसेना के पास लगभग 30 स्क्वाड्रन ही हैं। पुराने मिग-21 और अन्य विमान चरणबद्ध तरीके से बाहर हो रहे हैं। ऐसे में नए लड़ाकू विमानों की जरूरत तुरंत है। फिर भी प्रक्रिया को छोटा नहीं किया जा सकता, क्योंकि इतना बड़ा सौदा पारदर्शिता और नियमों के तहत ही आगे बढ़ता है। भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया “डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर” यानी डीएपी के तहत चलती है, जिसमें हर फेज का स्पष्ट स्ट्रक्चर होता है। (114 Rafale deal)
राफेल एक 4.5 पीढ़ी का ओम्नी रोल फाइटर है। यह हवा से हवा, हवा से जमीन, लंबी दूरी की स्ट्राइक और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे कई मिशन कर सकता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसकी भूमिका को लेकर वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी सकारात्मक टिप्पणी की थी। (114 Rafale deal)
डिलीवरी कब शुरू हो सकती है?
सूत्रों का मानना है कि अगर बातचीत तेजी से चली तो 2026 के अंत तक बिजनेस निगोशिएशन्स पूरी हो सकती है और 2027 की शुरुआत में समझौते पर हस्ताक्षर संभव हैं। वहीं, आमतौर पर ऐसे सौदों में कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के 3 से 4 साल बाद पहली डिलीवरी शुरू होती है। अगर 2027 में समझौता साइन होता है तो शुरुआती विमान 2030 के आसपास मिल सकते हैं। भारत में बनने वाले विमानों की पूरी डिलीवरी में 8 से 10 साल भी लग सकते हैं। (114 Rafale deal)
क्या देरी असामान्य है?
बड़े रक्षा सौदों में लंबी प्रक्रिया सामान्य बात है। पहले एमएमआरसीए टेंडर (2007) से लेकर 36 राफेल डील (2016) तक की कहानी भी लंबी रही थी। इस बार सरकार सरकार के बीच समझौता होने की संभावना है, जिससे प्रक्रिया कुछ तेज हो सकती है, लेकिन फिर भी एक साल का समय लगना असामान्य नहीं है। (114 Rafale deal)


