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Dalai Lama Successor: दलाई लामा को तिब्बत में स्थायी रूप से रखने को तैयार है चीन! किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है उत्तराधिकारी

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सेंट्रल तिब्बती प्रशासन (Central Tibetan Administration, CTA) के सिक्योंग (निर्वाचित नेता) पेनपा त्सेरिंग ने दलाई लामा की तिब्बत यात्रा और पुनर्जन्म के मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दलाई लामा तिब्बत की यात्रा करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उनकी सेहत इजाजत दे और चीन की ओर से कोई पाबंदी या शर्त न हो। यह यात्रा 1959 के बाद उनकी पहली तिब्बत यात्रा होगी...

📍धर्मशाला | 2 Jul, 2025, 9:25 PM

Dalai Lama Successor: तिब्बत के सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के अवसर पर ऐलान किया कि उनके उत्तराधिकारी का फैसला गदेन फोडरांग ट्रस्ट ही लेगा, यानि अगले अवतार की खोजबीन का अधिकार इस ट्रस्ट के पास ही होगा। बुधवार को 15वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में गदेन फोडरांग ट्रस्ट के वरिष्ठ अधिकारी सैमधोंग रिनपोछे ने कहा कि उनका उत्तराधिकारी किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है। वहीं, सेंट्रल तिब्बती प्रशासन (CTA) के सिक्योंग (निर्वाचित नेता) पेनपा त्सेरिंग ने कहा कि दलाई लामा तिब्बत की यात्रा करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उनकी स्वास्थ्य स्थिति अनुमति दे और चीन की ओर से कोई प्रतिबंध न हो।

Dalai Lama Successor: China Insists Control, Heir Can Be Any Gender or Nationality
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Dalai Lama Successor: क्या कहा सैमधोंग रिनपोछे ने?

धर्मशाला में आयोजित 15वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में दलाई लामा के 24 सितंबर 2011 में बनाए गदेन फोडरांग ट्रस्ट के वरिष्ठ अधिकारी सैमधोंग रिनपोछे ने कहा, 14वें दलाई लामा का स्वास्थ्य अच्छा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दलाई लामा ने अभी तक अपने उत्तराधिकारी (succession) के बारे में कोई लिखित निर्देश नहीं दिए हैं। उन्होंने साफ कहा कि दलाई लामा का पुनर्जन्म तय करने का अधिकार केवल गदेन फोडरंग ट्रस्ट के पास है।

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ट्रस्ट के वरिष्ठ अधिकारी और पूर्व कालोन त्रिपा (प्रधानमंत्री) रह चुके सैमधोंग रिनपोछे ने आगे कहा कि अगला दलाई लामा किसी भी लिंग या राष्ट्रीयता का हो सकता है, और उसका जन्म तिब्बत या चीन में होना अनिवार्य नहीं है। रिनपोछे ने चीन के उस दावे की निंदा की, जिसमें वह दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने का अधिकार रखता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार ही लिया जाएगा और इसमें बाहरी हस्तक्षेप (विशेष रूप से चीन का) स्वीकार्य नहीं होगा।

रिनपोछे ने यह भी बताया कि दलाई लामा ने हमेशा ऐसी व्यवस्था पर काम किया है, जो उनके बाद भी तिब्बती समुदाय को एकजुट और आत्मनिर्भर बनाए रखे। उन्होंने कहा, “दलाई लामा का मानना है कि उनकी व्यक्तिगत भूमिका समय के साथ कम महत्वपूर्ण होनी चाहिए, ताकि तिब्बती लोग अपनी संस्कृति और धर्म को खुद संभाल सकें।”

दलाई लामा ने दिया वीडियो संदेश

सम्मेलन के दौरान आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने एक वीडियो संदेश में स्पष्ट किया कि उनकी संस्था, यानी दलाई लामा की परंपरा, भविष्य में भी जारी रहेगी। उन्होंने कहा, “मैं यह पुष्टि करता हूं कि दलाई लामा की संस्था बनी रहेगी।” यह बयान सुनते ही धर्मशाला की लाइब्रेरी में मौजूद सौ से अधिक भिक्षुओं ने तालियां बजाकर अपना उत्साह व्यक्त किया। इस सम्मेलन में दुनिया भर के पत्रकार, तिब्बती समुदाय के लोग, समर्थक, हॉलीवुड अभिनेता रिचर्ड गेरे भी मौजूद थे। दलाई लामा ने यह भी जोर देकर कहा कि उनके पुनर्जनन की प्रक्रिया का एकमात्र अधिकार गदेन फोडरांग ट्रस्ट के पास है, जो तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार काम करता है। उन्होंने साफ कहा, “इस प्रक्रिया में कोई बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होगा।”

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चीन जाने के लिए तैयार हैं दलाई लामा

वहीं, सेंट्रल तिब्बती प्रशासन (Central Tibetan Administration, CTA) के सिक्योंग (निर्वाचित नेता) पेनपा त्सेरिंग ने दलाई लामा की तिब्बत यात्रा और पुनर्जन्म के मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दलाई लामा तिब्बत की यात्रा करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उनकी सेहत इजाजत दे और चीन की ओर से कोई पाबंदी या शर्त न हो। यह यात्रा 1959 के बाद उनकी पहली तिब्बत यात्रा होगी।

हालांकि, पेनपा त्सेरिंग ने यह भी बताया कि चीन ने एक सख्त शर्त रखी है, यदि दलाई लामा तिब्बत जाते हैं, तो उन्हें वहां स्थायी तौर पर रहना होगा। वहीं, इस शर्त पर दलाई लामा का जवाब था, “अगर मुझे तिब्बत और चीन जाने का मौका मिलता है, तो मैं जरूर जाऊंगा, लेकिन मैं वहां स्थायी तौर पर नहीं रहूंगा, क्योंकि वहां स्वतंत्रता नहीं है।” लेकिन मैं वहां नहीं रहूंगा, क्योंकि वहां कोई स्वतंत्रता नहीं है।’ त्सेरिंग ने कहा, यह पुनर्जन्म से भी जुड़ा है जहां परम पावन कहते हैं ‘मैं एक स्वतंत्र दुनिया में जन्म लूंगा’। पेनपा त्सेरिंग ने इस बयान को दोहराते हुए कहा कि दलाई लामा का यह रुख तिब्बत के लोगों के हक में है और उनकी वापसी का मकसद केवल तीर्थयात्रा या सांस्कृतिक संरक्षण होना चाहिए, न कि चीन की शर्तों पर बंधना।

पेनपा त्सेरिंग ने चीन के पुनर्जन्म दावों का भी विरोध किया। उन्होंने कहा, “तिब्बती लोग कभी भी चीन के उस दावे को स्वीकार नहीं करेंगे, जिसमें वह दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने की बात करता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह तिब्बती बौद्ध परंपराओं पर आधारित होगी।” उन्होंने सम्मेलन में मौजूद लोगों से अपील की कि वे एकजुट रहें और दलाई लामा की इच्छाओं को पूरा करने के लिए मिलकर काम करें।

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पेनपा त्सेरिंग ने 6 जुलाई 2025 से शुरू होने वाले दलाई लामा की 90वें जन्मदिन के उत्सव को “करुणा का वर्ष” (Year of Compassion) के रूप में मनाने की बात कही।

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पहले भी जता चुके हैं तिब्बत वापसी की इच्छा

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब दलाई लामा ने तिब्बत जाने की इच्छा जताई है। दलाई लामा ने कहा है कि वे ल्हासा के जोखांग मंदिर और पोटाला पैलेस जैसे पवित्र जगहों की तीर्थयात्रा करना चाहते हैं। 2014 में एक साक्षात्कार में, उन्होंने कहा था कि वह बिना किसी राजनीतिक मकसद के एक साधारण तीर्थयात्री के रूप में तिब्बत जाना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह तब तक नहीं लौटेंगे, जब तक वहां “वास्तविक स्वतंत्रता” नहीं होती। वह यह मानते हैं कि उनकी वापसी केवल तब होनी चाहिए जब तिब्बती लोगों को आत्म-सम्मान और सांस्कृतिक आजादी मिले।

1980 के दशक से, दलाई लामा ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग छोड़कर “मध्य मार्ग दृष्टिकोण” अपनाया, जिसमें तिब्बत के लिए वास्तविक स्वायत्तता की मांग की गई। 1987 की पांच सूत्री शांति योजना और 1988 के स्ट्रासबर्ग प्रस्ताव में, उन्होंने तिब्बत में स्वायत्त सरकार की स्थापना का प्रस्ताव रखा, जिसमें उनकी वापसी की संभावना शामिल थी।

1959 के बाद, दलाई लामा और चीन के बीच कई बार बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। 1979 में डेंग शियाओपिंग के सुधारों के बाद, दलाई लामा के भाई ग्यालो थोंडुप के जरिए संपर्क हुआ। 1982, 1984, और 2002-2008 के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन चीन ने दलाई लामा को “अलगाववादी” मानकर उनकी शर्तें ठुकरा दीं। 2002 में, दलाई लामा ने एक संक्षिप्त तीर्थयात्रा के लिए तिब्बत जाने की इच्छा जताई, लेकिन यह प्रस्ताव भी अस्वीकार हुआ। 2008 में तिब्बत में बड़े विरोध प्रदर्शनों के बाद, बातचीत फिर शुरू हुई, लेकिन बेनतीजा रही। चीन ने शर्त रखी कि दलाई लामा तिब्बत को चीन का हिस्सा मानें और “अलगाववादी गतिविधियां” छोड़ें।

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Chinese foreign ministry spokesperson Mao Ning

चीन ने दोहराया पुराना दावा

2 जुलाई 2025 दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर दिए बयान के बाद चीन ने को फिर से दोहराया कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने का अधिकार उसके पास है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा, “दलाई लामा और पंचेन लामा जैसे प्रमुख बौद्ध गुरुओं के पुनर्जन्म को ‘गोल्डन अर्न’ यानी सुनहरे कलश रस्म के जरिए और केंद्रीय सरकार की मंजूरी से चुना जाना चाहिए।” यह रस्म 1793 में किंग राजवंश के दौरान शुरू हुई थी, और चीन इसे अपनी सत्ता का आधार मानता है। जिसमें संभावित नामों को एक सुनहरे पात्र में रखा जाता है और लॉटरी के माध्यम से उत्तराधिकारी तय किया जाता है। निंग ने कहा कि चीन धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता की नीति का पालन करता है।

ऐसे होता है पुनर्जन्म

तिब्बती परंपरा में माना जाता है कि एक वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु की आत्मा उसकी मृत्यु के बाद एक बच्चे के शरीर में पुनर्जन्म लेती है। दलाई लामा की वेबसाइट के अनुसार, 6 जुलाई, 1935 को वर्तमान किंघई प्रांत में एक किसान परिवार में जन्मे ल्हामो धोंडुप के रूप में 14वें दलाई लामा के पुनर्जन्म की पहचान भी दो साल बच्चे में की गई थी। दलाई लामा की वेबसाइट के अनुसार, एक वरिष्ठ भिक्षु की देखरेख में कई संकेतों के आधार पर एक खोज दल ने उनकी पहचान की थी। उन्हें अब दुनिया के सबसे प्रभावशाली धार्मिक व्यक्तियों में से एक माना जाता है। उन्हें 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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