📍नई दिल्ली | 17 Mar, 2026, 3:14 PM
Asymmetric Warfare US-Iran War: पश्चिम एशिया में चल रहा अमेरिका-ईरान युद्ध अब असिमेट्रिक वारफेयर यानी असमान युद्ध की रणनीति की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है। हाल ही में ईरान समर्थित एक मिलिशिया ने अमेरिकी दूतावास के ऊपर एक छोटा फर्स्ट-पर्सन-व्यू यानी एफपीवी ड्रोन उड़ाया और करीब दो मिनट तक पूरे इलाके की निगरानी की। यह ड्रोन बेहद कम ऊंचाई पर उड़ रहा था और इसे किसी भी तरह रोका नहीं जा सका। रूस-यूक्रेन वॉर के बाद यह असिमेट्रिक वारफेयर का सबसे ताजा उदाहरण है।
यह घटना इराक की राजधानी बगदाद के ग्रीन जोन इलाके की है, जहां अमेरिकी दूतावास स्थित है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे सुरक्षित इलाकों में माना जाता है। इसके बावजूद ड्रोन ने दूतावास के अंदर की इमारतों, गाड़ियों और अमेरिकी झंडे तक की तस्वीरें रिकॉर्ड कर लीं। बाद में इस वीडियो को सार्वजनिक रूप से जारी किया गया। (Asymmetric Warfare US-Iran War)
Asymmetric Warfare US-Iran War: पहले हमले में नष्ट हुआ था रडार सिस्टम
इस घटना से कुछ दिन पहले दूतावास पर एक और हमला हुआ था। इस हमले में एक आत्मघाती ड्रोन ने दूतावास की छत पर लगे एक महत्वपूर्ण रडार सिस्टम को निशाना बनाया था। यह रडार सिस्टम Saab Giraffe-1X था, जो दूतावास की सुरक्षा के लिए बेहद अहम माना जाता है।
यह रडार सिस्टम C-RAM डिफेंस सिस्टम को जानकारी देता था। C-RAM एक ऐसा सिस्टम है, जो रॉकेट, आर्टिलरी और मोर्टार जैसे खतरों को हवा में ही नष्ट कर देता है। लेकिन रडार के नष्ट होने के बाद यह सिस्टम प्रभावी रूप से काम नहीं कर पाया।
यह घटना इसी रणनीति का एक उदाहरण मानी जा रही है। इसमें ईरान समर्थित मिलिशिया ने पहले दूतावास के रडार सिस्टम को एक सस्ते आत्मघाती ड्रोन से नष्ट किया और फिर कुछ ही समय बाद एक छोटे एफपीवी ड्रोन के जरिए पूरे इलाके की निगरानी की। यह ड्रोन करीब दो मिनट तक बिना किसी रोक-टोक के उड़ता रहा। इस घटना ने दिखाया कि कैसे सस्ती तकनीक से महंगी सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी जा सकती है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)
सस्ते ड्रोन से महंगे सिस्टम्स को चैलेंज
इस घटना ने एक बड़ी बात सामने रखी है कि आधुनिक युद्ध में अब केवल ताकत ही नहीं, बल्कि रणनीति भी अहम हो गई है। जिस ड्रोन का इस्तेमाल किया गया, उसकी लागत बहुत कम बताई जा रही है। यह ड्रोन सामान्य बाजार में मिलने वाले उपकरणों से तैयार किया गया था।
इसके विपरीत, अमेरिकी दूतावास की सुरक्षा में लगे सिस्टम बहुत महंगे हैं। C-RAM सिस्टम एक मिनट में हजारों गोलियां दाग सकता है, जिसकी लागत बहुत ज्यादा होती है। ऐसे में सस्ते ड्रोन से महंगे सिस्टम को चुनौती दी जा रही है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)
फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन की नई तकनीक
इस ड्रोन की एक खास बात यह भी थी कि इसमें फाइबर-ऑप्टिक गाइडेंस का इस्तेमाल किया गया था। इसका मतलब यह है कि यह ड्रोन रेडियो सिग्नल के बजाय तार के जरिए कंट्रोल किया जाता है।
इस तकनीक की वजह से इसे जाम करना मुश्किल हो जाता है। आमतौर पर ड्रोन को रेडियो फ्रीक्वेंसी जैमिंग से रोका जा सकता है, लेकिन इस तरह के ड्रोन पर यह तरीका काम नहीं करता।
इन ड्रोन की लागत बहुत कम होती है, जबकि इन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले सिस्टम काफी महंगे होते हैं। यही कारण है कि एक छोटा और सस्ता ड्रोन भी बड़े सैन्य सिस्टम पर भारी पड़ सकता है। जब ऐसे कई ड्रोन एक साथ इस्तेमाल किए जाते हैं, तो यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)
इसके पीछे “मोजेक डिफेंस” रणनीति
इस तरह की रणनीति के पीछे ईरान की एक खास सैन्य सोच काम करती है, जिसे “मोजेक डिफेंस” कहा जाता है। इसमें सेना को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया जाता है, जो अलग-अलग जगहों पर स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। अगर एक जगह पर हमला होता है या नेतृत्व को नुकसान पहुंचता है, तब भी बाकी यूनिट्स अपना काम जारी रखती हैं। यही वजह है कि ईरान से जुड़े अलग-अलग समूह, जैसे लेबनान, इराक या यमन में सक्रिय संगठन, एक साथ कई मोर्चों पर कार्रवाई कर सकते हैं। (Asymmetric Warfare US-Iran War)
हमलों का लगातार एक जैसा पैटर्न
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला कोई अलग घटना नहीं है। अक्टूबर 2023 के बाद से इराक में अमेरिकी ठिकानों पर ऐसे कई हमले हो चुके हैं। इन हमलों का तरीका भी लगभग एक जैसा है। पहले किसी सिक्योरिटी सिस्टम की पहचान की जाती है, फिर उसे निशाना बनाया जाता है और उसके बाद अगले हमले में उस कमजोरी का फायदा उठाया जाता है। इस मामले में भी पहले रडार सिस्टम को नष्ट किया गया और फिर ड्रोन के जरिए निगरानी की गई।
हालांकि इस हमले की जिम्मेदारी ईरान समर्थित मिलिशिया ने ली है। यह मिलिशिया इराक में सक्रिय है और खुद को “इस्लामिक रेजिस्टेंस” का हिस्सा बताती है।
इनका कहना है कि यह कार्रवाई अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के जवाब में की गई है। इस पूरे क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है और अलग-अलग जगहों पर ऐसे हमले सामने आ रहे हैं। (Asymmetric Warfare US-Iran War)
अमेरिकी संसाधनों पर बढ़ रहा दबाव
असिमेट्रिक वारफेयर के कारण अमेरिका के सामने कई तरह की चुनौतियां और असर साफ दिखाई दे रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या इंटरसेप्टर की कमी से जुड़ी है। पैट्रियट और थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम सीमित संख्या में उपलब्ध हैं और लगातार हमलों के चलते इनके स्टॉक पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे हालात में हर छोटे ड्रोन या मिसाइल को रोकने के लिए महंगे इंटरसेप्टर का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे तेजी से संसाधन कम होते हैं। इसके साथ ही खाड़ी क्षेत्र के कई सहयोगी देश भी सीधे तौर पर एस्कॉर्ट मिशन में शामिल होने से हिचक रहे हैं, जिससे जिम्मेदारी और ज्यादा अमेरिका पर आ जाती है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)
दूसरी बड़ी चुनौती संसाधनों के बंटवारे की है, जिसे बैंडविड्थ ड्रेन कहा जा रहा है। एक तरफ बगदाद में दूतावास और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा करनी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा और वैश्विक सप्लाई चेन को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। इसके अलावा दुनिया के अन्य हिस्सों में भी अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बनी हुई है। ऐसे में समय, संसाधन और सैन्य ध्यान कई दिशाओं में बंट जाता है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर पूरा फोकस करना मुश्किल हो जाता है।
हालांकि असिमेट्रिक वारफेयर केवल ड्रोन तक सीमित नहीं है। इसमें कई तरह की रणनीतियां शामिल होती हैं। समुद्र में जहाजों को निशाना बनाना, माइंस बिछाना, छोटे बोट्स के जरिए हमला करना और साइबर या सूचना के माध्यम से दबाव बनाना भी इसी का हिस्सा हैं। फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में जो हालात बने हुए हैं, उनमें भी इस तरह की रणनीति का असर देखा जा रहा है। (Asymmetric Warfare US-Iran War)

