📍नई दिल्ली | 27 Jan, 2026, 6:11 PM
ReArm Initiative explainer: यूरोप एक बार फिर अपने सिक्योरिटी स्ट्रक्चर को नए सिरे से खड़ा करने की तैयारी में है। दशकों तक शांति, कूटनीति और अमेरिका की सुरक्षा के भरोसे रहने के बाद अब यूरोपीय संघ ने साफ संकेत दे दिया है कि वह अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाना चाहता है। शीत युद्ध के बाद लंबे समय तक यूरोपीय देशों ने यह मान लिया था कि बड़े युद्ध अब अतीत का हिस्सा बन चुके हैं और भविष्य में कूटनीति, आर्थिक साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ही सुरक्षा की गारंटी होंगी। इसी भरोसे यूरोप ने न सिर्फ अपने रक्षा खर्च में कटौती की, बल्कि अमेरिका और नाटो की सुरक्षा छतरी पर निर्भरता भी बढ़ा दी।
लेकिन बीते कुछ वर्षों में बदले वैश्विक हालात ने इस सोच को पूरी तरह झकझोर दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन की बढ़ती सैन्य ताकत, साइबर हमलों का खतरा और अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं ने यूरोप को यह एहसास करा दिया कि अब अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी उसे खुद उठानी होगी। इसी बदली हुई सोच से जन्म हुआ है ‘रीआर्म इनिशिएटिव’, जिसे अब आधिकारिक तौर पर रीडिनेस 2030 (Readiness 2030) कहा जाता है। (ReArm Initiative explainer)
यह पहल सिर्फ हथियार खरीदने या सेना मजबूत करने तक सीमित नहीं है। यह यूरोप की पूरी सुरक्षा सोच, रक्षा उद्योग, सप्लाई चेन और वैश्विक रणनीति को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश है। इस प्रक्रिया में भारत भी एक अहम और भरोसेमंद भागीदार के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। (ReArm Initiative explainer)
ReArm Initiative explainer: रीआर्म इनिशिएटिव क्या है
रीआर्म इनिशिएटिव का पूरा नाम रीआर्म यूरोप प्लान / रीडिनेस 2030 है। इस योजना को यूरोपीय कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने पेश किया था। शुरुआत में इसका नाम “रीआर्म यूरोप” रखा गया था, लेकिन इटली और स्पेन जैसे कुछ देशों को यह नाम जरूरत से ज्यादा आक्रामक लगा। उनका तर्क था कि “रीआर्म” शब्द यूरोप की शांत छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
इसी आपत्ति के बाद इस योजना को रीडिनेस 2030 के नाम से रीब्रैंड किया गया। नाम बदला, लेकिन उद्देश्य वही रहा। इस पहल का सीधा और स्पष्ट लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक यूरोप को सैन्य रूप से पूरी तरह तैयार किया जाए, ताकि वह किसी भी बड़े खतरे का सामना अपने दम पर कर सके। (ReArm Initiative explainer)
यूरोप को अचानक हथियारों की जरूरत क्यों पड़ी
पिछले तीन से चार दशकों में यूरोप ने डिफेंस को प्राथमिकता सूची में काफी नीचे रखा। शीत युद्ध के खत्म होने के बाद यह धारणा मजबूत हो गई थी कि अब यूरोप में बड़े पैमाने पर युद्ध की संभावना नहीं है। इसी सोच के चलते कई देशों ने अपनी सेनाओं का साइज घटाया, हथियारों के भंडार कम किए और रक्षा बजट में लगातार कटौती की।
लेकिन वर्ष 2022 में शुरू हुआ रूस-यूक्रेन युद्ध इस सोच पर करारा तमाचा साबित हुआ। इस युद्ध ने यह साफ कर दिया कि यूरोप के पास न तो पर्याप्त गोला-बारूद है और न ही लंबे समय तक युद्ध झेलने की तैयारी। इसके साथ ही यह भी उजागर हुआ कि यूरोप अब भी अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका और नाटो पर जरूरत से ज्यादा निर्भर है।
तीसरा बड़ा सबक यह था कि आधुनिक युद्ध सिर्फ टैंक और सैनिकों तक सीमित नहीं रह गए हैं। साइबर अटैक, ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर अब युद्ध का मुख्य हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में पुरानी रणनीतियां और कमजोर सिक्योरिटी स्ट्रक्चर यूरोप के लिए बड़ा जोखिम बन गए। (ReArm Initiative explainer)
इसी बीच अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और उनकी नई नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी ने यूरोप की चिंता और बढ़ा दी। अमेरिका ने साफ कर दिया कि उसकी पहली प्राथमिकता अब चीन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र है, न कि यूरोप। इसका मतलब यह था कि भविष्य में यूरोप को अमेरिकी सैन्य मदद सीमित तौर पर ही मिल सकती है। (ReArm Initiative explainer)
इन सभी कारणों ने मिलकर यूरोप को मजबूर कर दिया कि उसे अब खुद अपने पैरों पर खड़ा होना होगा।
रीआर्म इनिशिएटिव का सबसे बड़ा लक्ष्य
रीआर्म इनिशिएटिव का सबसे बड़ा और सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य है लगभग 800 बिलियन यूरो, यानी करीब 80 लाख करोड़ रुपये का डिफेंस इन्वेस्टमेंट जुटाना। यह राशि किसी एक बजट या एक स्रोत से नहीं आएगी। इसके लिए अलग-अलग वित्तीय रास्ते अपनाए जाएंगे, जिनमें सरकारी बजट, यूरोपीय संस्थानों की फंडिंग, लोन और प्राइवेट निवेश शामिल होंगे।
यूरोपीय संघ का मानना है कि अगर उसे 2030 तक पूरी तरह तैयार होना है, तो उसे रक्षा क्षेत्र में उसी स्तर का निवेश करना होगा, जैसा शीत युद्ध के दौर में किया गया था। (ReArm Initiative explainer)
रक्षा खर्च बढ़ाने की नई सोच
रीआर्म इनिशिएटिव के तहत यूरोपीय देशों से कहा गया है कि वे अपने रक्षा खर्च को धीरे-धीरे बढ़ाकर जीडीपी का 3.5 फीसदी तक ले जाएं। वर्ष 2024 में यह औसतन सिर्फ 1.9 फीसदी थी। यूरोप अब इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका है कि मजबूत अर्थव्यवस्था और सुरक्षित समाज के लिए मजबूत सेना भी जरूरी है। बिना पर्याप्त रक्षा क्षमता के न तो व्यापार सुरक्षित रह सकता है और न ही नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी दी जा सकती है। (ReArm Initiative explainer)
इस योजना के पांच बड़े स्तंभ
सेफ (SAFE) और संयुक्त खरीद की रणनीति
रीआर्म इनिशिएटिव का एक अहम हिस्सा है सेफ यानी सिक्योरिटी एक्शन फॉर यूरोप। इसके तहत यूरोपीय संघ कैपिटल मार्केट से करीब 150 बिलियन यूरो तक का लोन जुटाएगा। यह पैसा सदस्य देशों को दिया जाएगा ताकि वे मिलकर हथियार और रक्षा सिस्टम खरीद सकें।
इस संयुक्त खरीद का मकसद लागत कम करना, टैक्निकल स्टैंडर्ड्स एक जैसे रखना और आपसी तालमेल बढ़ाना है। मिसाइल डिफेंस सिस्टम, ड्रोन, एयर डिफेंस और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में इसका खास फोकस रहेगा। (ReArm Initiative explainer)
फिस्कल नियमों में छूट और ज्यादा खर्च की आजादी
यूरोपीय संघ के सख्त वित्तीय नियम आमतौर पर देशों को ज्यादा घाटा करने से रोकते हैं। लेकिन रीआर्म इनिशिएटिव के तहत रक्षा खर्च को लेकर इन नियमों में अस्थायी छूट दी गई है।
अब सदस्य देश बिना नियम तोड़े अपने जीडीपी का अतिरिक्त 1.5 फीसदी डिफेंस पर खर्च कर सकेंगे। इससे करीब 650 बिलियन यूरो का अतिरिक्त रक्षा निवेश संभव हो सकेगा। (ReArm Initiative explainer)
कोहेशन फंड और यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक की नई भूमिका
अब तक यूरोपीय संघ के कोहेशन फंड मुख्य रूप से क्षेत्रीय और सामाजिक विकास के लिए इस्तेमाल होते थे। लेकिन नई रणनीति के तहत इन फंड्स का कुछ हिस्सा रक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट्स में भी लगाया जा सकेगा।
इसके साथ ही यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक को रक्षा कंपनियों को ज्यादा लोन देने की अनुमति दी गई है। यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि पहले यह बैंक रक्षा क्षेत्र से दूरी बनाए रखता था। (ReArm Initiative explainer)
प्राइवेट निवेश को रक्षा क्षेत्र से जोड़ने की कोशिश
रीआर्म इनिशिएटिव सिर्फ सरकारी पैसे पर निर्भर नहीं रहना चाहता। यूरोपीय संघ चाहता है कि पेंशन फंड, इंश्योरेंस कंपनियां और बड़े निवेशक भी रक्षा उद्योग में निवेश करें।
इसके लिए सेविंग्स एंड इन्वेस्टमेंट यूनियन जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि प्राइवेट कैपिटल को डिफेंस सेक्टर की ओर मोड़ा जा सके। (ReArm Initiative explainer)
यूरोपीय रक्षा उद्योग को आत्मनिर्भर बनाना
यूरोपीय संघ ने इसके लिए व्हाइट पेपर ऑन यूरोपियन डिफेंस – रीडिनेस 2030 जारी किया है। इसका उद्देश्य यूरोप के भीतर ही मिसाइल डिफेंस, आर्टिलरी, ड्रोन, एयर डिफेंस, स्पेस और साइबर डिफेंस जैसी क्षमताओं को मजबूत करना है।
इसके साथ ही यूक्रेन की रक्षा उद्योग को भी यूरोपीय रक्षा ढांचे से जोड़ा जा रहा है, ताकि युद्ध के अनुभव का इस्तेमाल पूरे यूरोप की सुरक्षा के लिए किया जा सके। (ReArm Initiative explainer)
अमेरिका की नई रणनीति से बढ़ी यूरोप की चिंता
जनवरी 2026 में अमेरिका ने अपनी नई नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी जारी की, जिसमें चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक चुनौती बताया गया। इस दस्तावेज में साफ किया गया कि अमेरिका की प्राथमिकता अब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र है।
यूरोप के लिए यह एक स्पष्ट संकेत था कि भविष्य में उसे अपनी पारंपरिक रक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी। यही बयान यूरोप के लिए एक बड़े वेक-अप कॉल की तरह साबित हुआ। (ReArm Initiative explainer)
भारत का एंट्री पॉइंट कहां है
27 जनवरी यानी आज ही भारत और यूरोपीय संघ के बीच सिक्योरिटी एंड डिफेंस पार्टनरशिप पर हस्ताक्षर हुए। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कहा कि भारत की रक्षा इंडस्ट्री रीआर्म इनिशिएटिव में अहम भूमिका निभा सकती है।
यूरोपीय संघ अब हथियारों के लिए सीमित सप्लायर्स पर निर्भर नहीं रहना चाहता। वह सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई करना चाहता है और यहीं भारत एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में सामने आता है।
भारत और यूरोप का पुराना रक्षा रिश्ता
भारत और यूरोप के बीच रक्षा सहयोग कोई नई बात नहीं है। राफेल फाइटर जेट, स्कॉर्पीन सबमरीन और सी-295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे प्रोजेक्ट पहले से इस रिश्ते का हिस्सा हैं।
अब फर्क यह है कि भारत सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि यूरोपीय रक्षा सप्लाई चेन का सक्रिय हिस्सा बनता जा रहा है।
इसी के साथ-साथ भारत की निजी रक्षा कंपनियां भी यूरोप की मदद कर रही हैं। भारतीय कंपनियां यूरोपीय देशों को गोला-बारूद, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, नौसैनिक जहाजों की मरम्मत सेवाएं और नए तरह के बिना पायलट वाले सिस्टम (अनमैन्ड सिस्टम) सप्लाई कर रही हैं। दरअसल, यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने तेजी से अपने हथियार और सैन्य तैयारियां बढ़ानी शुरू की हैं, लेकिन इस दौरान वहां इन चीजों की कमी सामने आई है। ऐसे में भारत की निजी रक्षा कंपनियां इन जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। (ReArm Initiative explainer)
इंडियन ओशन में यूरोप की मौजूदगी
इस साझेदारी का एक अहम नतीजा यह भी है कि यूरोपीय संघ अब अपना एक लायजन ऑफिसर भारतीय नौसेना के इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर–इंडियन ओशन रीजन (आईएफसी-आईओआर) गुरुग्राम में तैनात करेगा।
इससे काउंटर पाइरेसी, समुद्री सुरक्षा और खतरे के आकलन में भारत और यूरोप के बीच तालमेल और मजबूत होगा।
रीआर्म इनिशिएटिव पर उठते सवाल
हर बड़ी योजना की तरह रीआर्म इनिशिएटिव पर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ देशों को चिंता है कि इससे सोशल और ग्रीन प्रोजेक्ट्स के लिए फंड कम हो सकता है। कुछ को डर है कि यूरोपीय संघ जरूरत से ज्यादा सेंट्रलाइज्ड हो रहा है।
इसके बावजूद ज्यादातर यूरोपीय देश मानते हैं कि मौजूदा वैश्विक हालात में यह कदम टालना संभव नहीं था। (ReArm Initiative explainer)



