📍New Delhi / Kuwait | 4 Apr, 2026, 1:59 PM
International Mine Awareness Day 2026: International Day for Mine Awareness and Assistance in Mine Action is being celebrated today worldwide. This day reminiscent of the dangers that remain in the ground and sea for a long time even after the battle is over. Under the ground are the dangers that affect people’s life for years.
This issue has become more serious among the rising stress in West Asia and the ongoing confrontation in the US-Iran. Director General of the International Institute for Humanitarian Mine Action Studies (IIFOMAS) and Chairman Ritard Colonel Navneit M.P. Mittal, chairman of the Horrigation Group, told the defence news in a special conversation that the battle effect is not limited to just the battle, but it affects society, economy and upcoming generations for decades.
International Mine Awareness Day 2026: "You don’t have to negotiate, essential"
Expert Col of Defence and Post-Conflict Environmental Management Navneet Mittal Clearly say that the end of any corrosion occurs only by negotiation. Responsibility and understanding in any war is extremely important. He pointed out on his experience that the war causes equal damage to the common people of both sides.
वह कहते हैं, “युद्ध कोई समाधान नहीं है। यह कुछ समय के लिए दबाव जरूर बना सकता है, लेकिन आखिर में बातचीत से ही रास्ता निकलता है। मैंने खुद गाजा जैसे इलाकों में हालात देखे हैं, जहां लोग बेहद मुश्किल परिस्थितियों में जी रहे हैं। बमबारी का असर हर चीज पर पड़ता है, यात्रा, व्यापार और आम लोगों की जिंदगी सब प्रभावित होती है।”
उनका कहना है कि West Asia के कई देश सीधे तौर पर किसी एक पक्ष के साथ नहीं हैं, लेकिन वे अस्थिरता भी नहीं चाहते। “इन देशों के बीच भले दोस्ती न हो, लेकिन खुली दुश्मनी भी नहीं है। वे बस अपनी सुरक्षा की गारंटी चाहते हैं और यह नहीं चाहते कि मिसाइल या हमले उनके इलाके तक पहुंचें।” (International Mine Awareness Day 2026)
बढ़ते संघर्ष का वैश्विक असर
अमेरिका-ईरान वॉर को जिक्र करते हुए मित्तल कहते हैं, यह संघर्ष सीमित नहीं है। “अगर युद्ध लंबा चलता है तो दूसरे देशों की सहनशीलता की भी एक सीमा होती है। वे पूछना शुरू कर देंगे कि यह कब खत्म होगा।” उनके अनुसार, इसका असर पहले ही तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर दिखने लगा है। हवाई यात्रा, शिपिंग और सप्लाई चेन तक प्रभावित हो रहे हैं। (International Mine Awareness Day 2026)
बारूदी सुरंगें: युद्ध का सबसे खतरनाक हथियार
हॉर्मुज और खार्ग में ईरान की बारूदी सुरंग बिछाने की खबरों पर कर्नल मित्तल कहते हैं कि आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली बारूदी सुरंगें और समुद्री माइंस सबसे खतरनाक हथियारों में मानी जाती हैं।
वह कहते हैं, “हर साल औसतन 5 से 6 हजार लोग माइंस की वजह से मारे जाते हैं या घायल होते हैं।” लेकिन असली खतरा आंकड़ों से बड़ा है। “अगर सड़क पर एक्सीडेंट हो जाए तो लोग गाड़ी चलााना नहीं छोड़ते, उस रास्ते पर फिर भी चलते हैं। लेकिन अगर किसी इलाके में माइंस होने की खबर हो, तो कोई वहां कदम भी नहीं रखता। यही इसका सबसे बड़ा डर है।”
ईरान-अमेरिका तनाव में समुद्री माइंस का खतरा भी तेजी से बढ़ा है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे इलाकों में, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है।
उन्होंने कहा, “समुद्री माइंस दो तरह की होती हैं, कुछ एक जगह बंधी रहती हैं और कुछ पानी में तैरती रहती हैं। तैरने वाली माइंस ज्यादा खतरनाक होती हैं, क्योंकि वे बहकर कहीं भी पहुंच सकती हैं और बड़ा हादसा कर सकती हैं।” International Mine Awareness Day 2026)
डबल एज्ड वेपन: लगाने वाला भी फंसता है
बारूदी सुरंगों को कर्नल मित्तल “दो धार वाली तलवार” बताते हैं। उनके मुताबिक, “जो देश माइंस बिछाता है, उसे यह भी पता होता है कि एक दिन उसे ही इन्हें हटाना पड़ेगा। लेकिन जब तक ये जमीन में रहती हैं, तब तक पूरा इलाका ठप हो जाता है।” उन्होंने बताया कि माइंस का सबसे बड़ा असर डर होता है, जो पूरे इलाके को बेकार बना देता है। यहां तक कि न तो वहां खेती की जा सकती है और न ही वहां कोई इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप हो सकता है। पूरा इलाका नो मेंस लैंड में बदल जाता है।
दशकों तक जिंदा रहती हैं माइंस
लैंड माइंस की सबसे खतरनाक बात यह है कि वे दशकों तक सक्रिय रह सकती हैं। कर्नल मित्तल बताते हैं, “कई बार 10-15 साल बाद भी अनफटे गोला-बारूद मिलते हैं। किसी भी युद्ध में 2-5 फीसदी हथियार अनफटे रह जाते हैं।”
कर्नल मित्तल ने कुवैत का उदाहरण देते हुए बताया कि 1991 के गल्फ वॉर खत्म होने के 12-13 साल बाद भी हमें अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस (UXO) मिलते रहे। आमतौर पर सफाई (माइन क्लीयरेंस) बाद भी 2-3 प्रतिशत विस्फोटक जमीन में रह जाते हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी टीम अब तक दुनिया भर में 1 लाख 77 हजार से ज्यादा अनफटे गोला-बारूद को हटाकर नष्ट कर चुकी है और 400 मिलियन वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन को सुरक्षित बनाया जा चुका है। वहीं अकेले कुवैत में होराइजन ग्रुप ने 50,000 से अधिक अनएक्सप्लोडेड ऑर्डिनेंस को हटाया है।

विकास पर पड़ता है सीधा असर
माइंस की वजह से कई देशों में बड़े इलाके पूरी तरह बेकार हो जाते हैं। वहां न खेती हो सकती है, न घर बन सकते हैं और न ही कोई विकास कार्य हो सकता है।
मित्तल के अनुसार, “यूक्रेन में माइंस हटाने के लिए करीब 35 अरब डॉलर की जरूरत होगी और इसमें दशकों लग सकते हैं। गाजा में यह खर्च लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। जब तक जमीन से बारूदी सुरंगें नहीं हटाई जाती, तब तक वह किसी काम की नहीं होती।”
माइंस हटाने का काम धीमा और कठिन
बारूदी सुरंगों को हटाना बेहद कठिन और खतरनाक प्रक्रिया है। इसमें कई चरण होते हैं, पहले सर्वे किया जाता है, फिर माइंस को ढूंढा जाता है, उसके बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाया जाता है।
मित्तल बताते हैं, “एक व्यक्ति एक दिन में मुश्किल से 20 वर्ग मीटर क्षेत्र ही साफ कर पाता है। यह बहुत धीमा और जोखिम भरा काम है। कई बार मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन हर कदम बहुत सावधानी से उठाना पड़ता है।”
उन्होंने बताया कि कई जगहों पर कुत्तों और चूहों जैसे जानवरों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो माइंस की पहचान करने में मदद करते हैं। लेकिन अंत में इंसान को ही जाकर उन्हें हटाना पड़ता है। इसके अलावा ड्रोन तकनीक का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है। (International Mine Awareness Day 2026)
युद्ध के बाद भी जारी रहती है लड़ाई
मित्तल का कहना है कि युद्ध कागजों पर खत्म हो सकता है, लेकिन जमीन पर रहने वाले लोगों के लिए यह लंबे समय तक खत्म नहीं होता। हर कदम पर जान का जोखिम होता है, क्योंकि यह पता नहीं होता कि जमीन के नीचे क्या छिपा है। यही वजह है कि माइंस को “साइलेंट किलर” भी कहा जाता है।
उन्होंने कहा, “माइंस वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए हर कदम जिंदगी और मौत के बीच का फैसला होता है। यही युद्ध की असली सच्चाई है।”
आज जब दुनिया नए संघर्षों का सामना कर रही है, तब यह समझना जरूरी हो गया है कि युद्ध का असर सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। जमीन के नीचे छिपी बारूदी सुरंगें उस खतरे की याद दिलाती हैं, जो दशकों तक तक बना रहता है।
वह कहते हैं, दुनिया आज जब नए संघर्षों का सामना कर रही है, तब यह समझना जरूरी है कि युद्ध की असली कीमत सिर्फ लड़ाई में नहीं, बल्कि उसके बाद की लंबी और कठिन प्रक्रिया में चुकानी पड़ती है। (International Mine Awareness Day 2026)
लैंडमाइन की लागत 3 डॉलर, हटाने का खर्च 2000 डॉलर तक
लागत के लिहाज से देखें तो लैंडमाइन्स एक बेहद खतरनाक असमानता पैदा करती हैं। कर्नल नवनीत मित्तल बताते हैं कि एक लैंडमाइन बिछाने में मुश्किल से 3 डॉलर, यानी करीब 250 रुपये खर्च होते हैं, लेकिन जब उसे हटाने की बारी आती है, तो यही लागत बढ़कर 1000 से 2000 डॉलर, यानी लगभग 80 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच जाती है।
यानी जो हथियार सस्ते में तैयार होकर जमीन में दबा दिए जाते हैं, उन्हें हटाने में कई गुना ज्यादा पैसा और संसाधन लगते हैं। इसी वजह से युद्ध खत्म होने के बाद असली आर्थिक बोझ शुरू होता है, क्योंकि तब देशों को अपने ही इलाकों को सुरक्षित बनाने के लिए भारी खर्च उठाना पड़ता है।
कर्नल मित्तल इस खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि दुनिया भर के आंकड़े बताते हैं कि हर 5000 लैंडमाइन्स को साफ करते समय एक व्यक्ति की जान चली जाती है। यानी यह सिर्फ महंगा काम ही नहीं, बल्कि बेहद जानलेवा भी है।
आज स्थिति यह है कि दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लाखों वर्ग किलोमीटर जमीन लैंडमाइन्स और अनफटे विस्फोटकों से प्रभावित है। इन इलाकों को सुरक्षित बनाने के लिए अरबों डॉलर की जरूरत है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली फंडिंग काफी कम है। पिछले दस वर्षों में यह फंडिंग औसतन 700 से 800 मिलियन डॉलर सालाना ही रही है, जबकि जरूरत इससे कई गुना ज्यादा है।
यही कारण है कि कई देशों में युद्ध खत्म होने के बाद भी जमीन सालों तक उपयोग के लायक नहीं बन पाती और विकास की रफ्तार थम जाती है। (International Mine Awareness Day 2026)
खतरनाक काम में महिलाओं की बढ़ रही भागीदारी
माइन क्लीयरेंस जैसे खतरनाक काम में अब महिलाएं भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। मित्तल बताते हैं कि 2008-09 के आसपास श्रीलंका में माइंस हटाने की मुहिम के दौरान महिलाओं को भी इस काम में शामिल करना शुरू किया गया था। हमने महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू किया और उन्होंने शानदार काम किया। आज यह एक ऐसा क्षेत्र बन गया है, जहां जेंडर इक्वालिटी साफ दिखाई देती है।”
माइन एक्शन के पांच स्तंभ
कर्नल मित्तल ने बताया कि माइंस से निपटने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, उसे माइन एक्शन कहा जाता है। इसके पांच मुख्य हिस्से होते हैं- माइंस को हटाना, लोगों को जागरूक करना, पीड़ितों की मदद करना, हथियारों के भंडार को नष्ट करना और माइंस पर रोक लगाने के प्रयास करना।
हालांकि, मित्तल का कहना है कि इन सभी में बराबर ध्यान नहीं दिया जाता। “ज्यादातर बजट माइंस हटाने में खर्च हो जाता है, जबकि पीड़ितों की मदद के लिए बहुत कम पैसा मिलता है।” (International Mine Awareness Day 2026)
पीड़ितों के लिए जरूरी है पुनर्वास
माइंस से प्रभावित लोगों को लंबे समय तक इलाज और सहारे की जरूरत होती है। कई लोगों के हाथ-पैर चले जाते हैं और उन्हें कृत्रिम अंग की जरूरत होती है।
मित्तल कहते हैं, “विक्टिम असिस्टेंस बहुत जरूरी है। इसमें मेडिकल केयर, प्रोस्थेटिक्स और पुनर्वास शामिल है। भारत ने जयपुर फुट जैसे प्रोग्राम के जरिए कई देशों में मदद की है।”
PPP मॉडल से निकल सकता है रास्ता
कर्नल नवनीत मित्तल माइन क्लियरेंस के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल को एक प्रभावी समाधान मानते हैं। वह कहते हैं कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल में कंपनियां माइंस क्लियर कर विकास कार्य कर सकती हैं। उनके अनुसार, कंपनियां युद्ध प्रभावित जमीन को “एडॉप्ट” करें, वहां खुद माइन हटाने का काम करें और उसके बाद उसी जमीन पर खेती, खनन या इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करें। इससे एक साथ कई फायदे होते हैं। देश को सुरक्षित और उपयोगी जमीन मिलती है, कंपनियों को संसाधन और निवेश का अवसर मिलता है, जबकि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुलते हैं। इस तरह यह मॉडल विकास और पुनर्निर्माण दोनों को साथ लेकर चलता है। (International Mine Awareness Day 2026)
भारत की भूमिका: ग्लोबल साउथ में नेतृत्व का है मौका
कर्नल नवनीत मित्तल के मुताबिक अगर हम ग्लोबल साउथ की बात करते हैं, तो हमें इन देशों की मदद करनी चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी भी है और अवसर भी। वह कहते हैं कि ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों पर लैंडमाइंस और अनफटे विस्फोटकों का सबसे ज्यादा असर देखने को मिलता है। अफ्रीका के अंगोला, मोजाम्बिक और सूडान, दक्षिण एशिया के श्रीलंका और अफगानिस्तान, दक्षिण-पूर्व एशिया के कंबोडिया और लाओस, और मध्य पूर्व के इराक, सीरिया और गाजा जैसे इलाके आज भी इस खतरे से जूझ रहे हैं। इन देशों में समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि यहां संसाधन कम हैं, अर्थव्यवस्था कमजोर है और कई जगह लंबे समय तक युद्ध चलता रहा है।
कर्नल नवनीत मित्तल का मानना है कि भारत को इस क्षेत्र में आगे आकर नेतृत्व करना चाहिए। भारत माइन एक्शन प्रोग्राम शुरू कर सकता है, पूर्व सैनिकों को इसमें शामिल कर सकता है और श्रीलंका की तरह दूसरे देशों को सीधी मदद दे सकता है।
वह कहते हैं, “आज दुनिया एक ग्लोबल विलेज बन चुकी है। एक जगह का संघर्ष पूरी दुनिया को प्रभावित करता है। अगर दूसरे देश अस्थिर हैं, तो उसका असर हम पर भी पड़ेगा। भारत के पास तकनीकी क्षमता और अनुभव है, इसलिए उसे आगे आना चाहिए।” (International Mine Awareness Day 2026)
Author
Harendra Chaudhary is active in defence journalism and is associated with RakshaSamachar.com. They have long been covering strategic news, defence policies and national security related issues involving Indian Army, Navy and Air Force. In his career of journalism, Harendra has written detailed articles on Parliament’s activities, military campaigns, India-Pak and India-China border dispute, defence procurement and ‘Make in India’ defence projects. They are known for deep understanding and analytical approach of defense cases.






