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मेक इन इंडिया और iDEX के बावजूद क्यों सिस्टम में अटक जाते हैं डिफेंस स्टार्टअप्स? नई किताब ‘Unfolded’ में पूर्व ब्यूरोक्रेट ने किया खुलासा

भारत अभी भी रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर बहुत कम खर्च करता है। भारत जीडीपी का लगभग 0.7 फीसदी ही रिसर्च एंड डेपलपमेंट पर खर्च करता है, जबकि चीन और इजराइल जैसे देशों में यह काफी ज्यादा है...

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📍नई दिल्ली | 10 Mar, 2026, 11:56 AM

India MSME ecosystem problems: भारत की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई सेक्टर यानी माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज को हमेशा बहुत अहम माना जाता है। सरकारें अक्सर कहती हैं कि यही छोटे उद्योग देश की आर्थिक रीढ़ हैं। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक नई किताब ने इस सेक्टर की वास्तविक स्थिति को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

पूर्व ब्यूरोक्रेट और पॉलिसी एक्सपर्ट पी. शेष कुमार की किताब “अनफोल्डेड: व्हाट एल्स इंडियाज एमएसएमई एंड स्टार्टअप इकोसिस्टम?” (Unfolded: What Ails India’s MSME and Startup Ecosystem?) भारत के एमएसएमई और स्टार्टअप इकोसिस्टम की कमजोरियों और चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा करती है। इस किताब में लेखक ने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद अंतर को विस्तार से समझाने की कोशिश की है।

करीब 700 से अधिक पन्नों की इस किताब में 26 चैप्टर हैं, जिनमें भारत के छोटे उद्योगों, स्टार्टअप्स और खास तौर पर डिफेंस सेक्टर में काम करने वाले एमएसएमई की समस्याओं को गहराई से बताया गया है। (India MSME ecosystem problems)

पी. शेष कुमार का नजरिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे इस सिस्टम को बाहर से नहीं बल्कि अंदर से समझते हैं। वे पहले एमएसएमई मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी रह चुके हैं और नीति निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा भी रहे हैं। इसलिए किताब में उन्होंने केवल सैद्धांतिक चर्चा नहीं की, बल्कि अपने अनुभव और अवलोकन के आधार पर यह बताया है कि घोषणाओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच कितना बड़ा अंतर मौजूद है। (India MSME ecosystem problems)

India MSME ecosystem problems: भारतीय अर्थव्यवस्था में एमएसएमई की बड़ी भूमिका

भारत में एमएसएमई सेक्टर का योगदान बहुत बड़ा माना जाता है। विभिन्न सरकारी आंकड़ों के अनुसार यह सेक्टर देश के जीडीपी में 30 फीसदी से ज्यादा योगदान देता है। इसके अलावा करीब 11 करोड़ लोगों को रोजगार देने में भी एमएसएमई की महत्वपूर्ण भूमिका है।

हर साल बजट भाषण में इस सेक्टर को “भारतीय अर्थव्यवस्था की बैकबोन” कहा जाता है। लेकिन किताब में बताया गया है कि इस सेक्टर के सामने कई बुनियादी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं।

पी. शेष कुमार के मुताबिक भारत में केवल लगभग 14 फीसदी एमएसएमई को ही औपचारिक बैंकिंग सिस्टम से कर्ज मिल पाता है। इसका मतलब है कि अधिकांश छोटे उद्योगों को फाइनेंस के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

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किताब में यह भी बताया गया है कि एमएसएमई सेक्टर में 330 से 530 बिलियन डॉलर तक का क्रेडिट गैप मौजूद है। यानी छोटे उद्योगों को जितने वित्तीय संसाधनों की जरूरत है, उतने उपलब्ध नहीं हैं। (India MSME ecosystem problems)

नीतियों और योजनाओं के बावजूद समस्याएं

पिछले कई वर्षों में सरकार ने एमएसएमई सेक्टर के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें मुद्रा योजना, उद्यम रजिस्ट्रेशन, चैंपियंस प्लेटफॉर्म और रैंप प्रोग्राम जैसी पहल शामिल हैं।

लेकिन किताब में यह सवाल उठाया गया है कि इन योजनाओं का जमीनी स्तर पर असर कितना दिखाई देता है।

लेखक पी. शेष कुमार का कहना है कि अक्सर नई योजनाओं की घोषणा तो होती है, लेकिन उनके क्रियान्वयन में कई समस्याएं सामने आती हैं। छोटे उद्योगों तक इन योजनाओं का लाभ पूरी तरह नहीं पहुंच पाता।

इसके अलावा किताब में यह भी बताया गया है कि भारत में एमएसएमई से जुड़ा आखिरी व्यापक जनगणना सर्वे 2015 में हुआ था। ऐसे में कई नीतियां पुराने आंकड़ों के आधार पर बन रही हैं। (India MSME ecosystem problems)

नोटबंदी और कोविड का भी पड़ा असर

किताब में यह भी बताया गया है कि पिछले दशक में कुछ बड़े आर्थिक फैसलों का एमएसएमई सेक्टर पर गहरा असर पड़ा। नोटबंदी के दौरान कई छोटे उद्योगों को अचानक नकदी संकट का सामना करना पड़ा। इसके बाद कोविड महामारी ने भी हजारों छोटे कारोबारों को बंद होने की कगार पर पहुंचा दिया।

लेखक के अनुसार इन दोनों घटनाओं के बाद भी छोटे उद्योगों को पूरी तरह स्थिर होने में काफी समय लगा। (India MSME ecosystem problems)

दूसरे देशों के मुकाबले कहां खड़े हैं हम

किताब में लेखक ने भारत की तुलना दूसरे देशों के मॉडल से भी की है। उन्होंने जर्मनी के मिटेलस्टैंड मॉडल का उदाहरण दिया है, जहां छोटे और मध्यम उद्योगों को कम ब्याज पर फाइनेंसिंग मिलती है और स्किल ट्रेनिंग सिस्टम मजबूत है।

इसी तरह चीन के “लिटिल जायंट्स प्रोग्राम” का जिक्र किया गया है, जिसमें छोटे लेकिन तकनीकी रूप से मजबूत उद्योगों को सरकारी सहयोग दिया जाता है।

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ब्राजील के टैक्स सिस्टम का भी उदाहरण दिया गया है, जहां छोटे कारोबारों के लिए टैक्स प्रक्रिया को सरल बनाया गया है। इन उदाहरणों के जरिए किताब में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि भारत में भी सुधार की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। (India MSME ecosystem problems)

स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी सवाल

किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी केंद्रित है। लेखक का कहना है कि भारत में स्टार्टअप्स को लेकर काफी उत्साह है, लेकिन कई बार वास्तविक बिजनेस मॉडल से ज्यादा ध्यान वैल्यूएशन और फंडिंग पर दिया जाता है।

उन्होंने कुछ चर्चित कंपनियों के उदाहरण देते हुए बताया है कि जब बिजनेस वैल्यू की जगह निवेशकों की उम्मीदों पर ज्यादा जोर दिया जाता है, तो लंबे समय में समस्याएं सामने आ सकती हैं।

किताब में यह भी कहा गया है कि भारत अभी भी रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर बहुत कम खर्च करता है। भारत जीडीपी का लगभग 0.7 फीसदी ही रिसर्च एंड डेपलपमेंट पर खर्च करता है, जबकि चीन और इजराइल जैसे देशों में यह काफी ज्यादा है। (India MSME ecosystem problems)

डिफेंस सेक्टर में भी कम नहीं हैं एमएसएमई की चुनौतियां

किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डिफेंस सेक्टर में काम करने वाले एमएसएमई और स्टार्टअप्स की समस्याओं पर भी केंद्रित है। भारत में सरकार लंबे समय से आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के तहत डिफेंस प्रोडक्शन में छोटे उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने की बात कर रही है।

दरअसल पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, और iDEX जैसी पहल के जरिए डिफेंस सेक्टर में एमएसएमई और स्टार्टअप्स की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की है। नीति स्तर पर यह एक बड़ा बदलाव माना जाता है, क्योंकि लंबे समय तक रक्षा उत्पादन मुख्य रूप से बड़े सार्वजनिक उपक्रमों और विदेशी कंपनियों के हाथ में रहा है। लेकिन किताब के अनुसार जब इन नीतियों को जमीन पर लागू किया जाता है, तो कई ऐसी संस्थागत बाधाएं सामने आती हैं जो छोटे उद्यमों के लिए आगे बढ़ना मुश्किल बना देती हैं। (India MSME ecosystem problems)

DGQA कराता है लंबा इंतजार

डिफेंस सेक्टर में काम करने वाले कई स्टार्टअप्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती DGQA यानी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ क्वालिटी एश्योरेंस की प्रक्रिया बताई गई है।

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किताब में एक उदाहरण दिया गया है जिसमें एक छोटे एमएसएमई ने सेना के लिए रेडियो सिस्टम डेवलप किया था। लेकिन उसकी टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल थी कि कंपनी को सालों तक इंतजार करना पड़ा।

टेस्टिंग कई बार टलती रही, दस्तावेजों में छोटी गलतियों पर फाइलें वापस लौटा दी गईं और बार-बार नए परीक्षण की मांग की गई। इस तरह की प्रक्रिया छोटे उद्योगों के लिए काफी मुश्किल हो जाती है। (India MSME ecosystem problems)

भुगतान में देरी भी बड़ी समस्या

किताब में यह भी बताया गया है कि डिफेंस सेक्टर में पेमेंट में देरी एमएसएमई के लिए गंभीर समस्या बन जाती है। एमएसएमई मंत्रालय के समाधान पोर्टल पर हजारों शिकायतें दर्ज हैं जिनमें कंपनियों ने भुगतान में देरी की शिकायत की है। छोटे उद्योगों के लिए यह स्थिति और भी मुश्किल होती है क्योंकि उनके पास बड़े उद्योगों जैसी वित्तीय क्षमता नहीं होती।

टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी

कई डिफेंस स्टार्टअप्स के सामने एक और समस्या टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। कई बार उन्हें अपने उत्पादों के परीक्षण के लिए सरकारी प्रयोगशालाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, जहां पहले से ही भारी काम का दबाव होता है।
इस वजह से नए उत्पादों की टेस्टिंग और प्रमाणन में काफी समय लग जाता है।

लेखक पी. शेष कुमार का कहना है कि भारत में एमएसएमई सेक्टर को सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है, बल्कि जरूरत ईमानदार समीक्षा, बेहतर डेटा और प्रभावी क्रियान्वयन की है। अगर नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद अंतर को कम किया जाए, तो एमएसएमई और स्टार्टअप सेक्टर भारत की अर्थव्यवस्था को और मजबूत बना सकते हैं। (India MSME ecosystem problems)

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  • News Desk

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