📍नई दिल्ली | 14 Feb, 2026, 3:12 PM
IFR 2026 INS Vikrant CBG: विशाखापत्तनम में 15 फरवरी से 25 फरवरी के बीच होने जा रहे इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और एक्सरसाइज मिलन को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। भारतीय नौसेना के इन दो बड़े मेगा इवेंट्स में भारतीय नौसेना का स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पूरे लावलश्कर के साथ दिखाई देगा। इस दौरान वे शिप भी शोकेस होंगे जो आईएनएस विक्रांत के साथ कैरियर बैटल ग्रुप (सीबीजी) के साथ प्रमुख भूमिका में नजर आते हैं। यह पहली बार होगा जब इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में स्वदेशी एयरक्राप्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत हिस्सा लेगा।
18 फरवरी को होने वाले इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के मुख्य कार्यक्रम में भारतीय सेनाओं की सुप्रीम कमांडर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समुद्र में तैनात युद्धपोतों की समीक्षा करेंगी। इस अवसर पर आईएनएस विक्रांत भारतीय नौसेना के “सेंटर ऑफ अट्रैक्शन” के रूप में रहेगा। यह भारत का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है, जिसे देश में ही तैयार किया गया है। हालांकि इस दौरान विक्रांत सीबीजी की फॉर्मेशन में नहीं होगा, लेकिन सीबीजी में शामिल शिप जरूर दिखेंगे। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
IFR 2026 INS Vikrant CBG: क्या होता है कैरियर बैटल ग्रुप?
कैरियर बैटल ग्रुप का मतलब है एयरक्राफ्ट कैरियर के चारों तरफ तैनात ऐसे युद्धपोत, जो उसे हर दिशा से सुरक्षा देते हैं और जरूरत पड़ने पर हमला भी कर सकते हैं। यह एक मल्टी-लेयर्ड सिक्युरिटी घेरा होता है, जिसमें उसके साथ डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, सपोर्ट शिप और कई बार पनडुब्बियां भी शामिल रहती हैं। सीबीजी केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर की नौसेनाएं जिनके पास एयरक्राफ्ट कैरियर हैं, वे इस ग्रुपिंग को ऑपरेट करती हैं।
भारतीय नौसेना का सीबीजी स्थायी रूप से तय नहीं होता। यह ऑपरेशन, खतरे के स्तर और अभ्यास के अनुसार बदलता रहता है। आमतौर पर इसमें 8 से 12 सरफेस वॉरशिप शामिल होते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
केंद्र में रहेगा आईएनएस विक्रांत
मिलन के सी फेज में आईएनएस विक्रांत ऑपरेशनल ड्रिल में भाग ले रहा है। करीब 45 हजार टन वजनी यह विशाल युद्धपोत 262 मीटर लंबा है और लगभग 28 नॉट्स की अधिकतम गति हासिल कर सकता है। इसमें करीब 1600 नौसैनिक तैनात रह सकते हैं। यह एक साथ लगभग 30 एयरक्राफ्ट ऑपरेट किया जा सकते हैं, इसमें मिग-29के फाइटर जेट, एमएच-60आर मल्टी रोल हेलीकॉप्टर, कामोव-31 अर्ली वार्निंग हेलीकॉप्टर, चेतक, रोमियो हेलीकॉप्टर और एएलएच ध्रुव जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। यह एसटीओबार सिस्टम पर आधारित है, जिसमें शॉर्ट टेक ऑफ और अरेस्टेड रिकवरी की सुविधा होती है।
इस बार का फ्लीट रिव्यू इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि लगभग छह दशक बाद किसी स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को इस स्तर पर प्रदर्शित किया जाएगा।
इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू के तुरंत बाद 19 फरवरी से एक्सरसाइज मिलन 2026 शुरू होगी, जो 25 फरवरी तक चलेगी। यह अभ्यास विशाखापत्तनम और बंगाल की खाड़ी में दो चरणों हार्बर फेज और सी फेज में आयोजित किया जाएगा। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
सीबीजी में डेस्ट्रॉयर्स की भूमिका अहम
मिलन के सी फेज में आईएनएस विक्रांत अपने कैरियर बैटल ग्रुप के साथ ऑपरेशनल ड्रिल में भाग ले रहा है। यह ग्रुप एंटी सबमरीन वॉरफेयर, एयर डिफेंस और सर्च एंड रेस्क्यू जैसे अभ्यास करेगा। कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और एंटी सबमरीन वॉरफेयर जहाज शामिल होते हैं, जो मिलकर एक सुरक्षा घेरा बनाते हैं।
इसमें सबसे अहम भूमिका डेस्ट्रॉयर्स और फ्रिगेट्स निभाते हैं। डेस्ट्रॉयर्स के तौर पर कोलकाता क्लास या विशाखापत्तनम क्लास जैसे गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर शामिल किए जाते हैं। उदाहरण के लिए आईएनएस कोलकाता (D63), आईएनएस मोरमुगाओ (D67) और आईएनएस सूरत (D69) जैसे बड़े युद्धपोत शामिल होते हैं। ये जहाज लंबी दूरी की एयर डिफेंस, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और एंटी-शिप मिसाइल क्षमता के लिए जाने जाते हैं और कैरियर को हवाई तथा समुद्री खतरों से बचाते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
एयरक्राफ्ट कैरियर को एस्कॉर्ट देते हैं फ्रिगेट्स
डेस्ट्रॉयर्स के बाद फ्रिगेट्स भी इस ग्रुप का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। तलवार क्लास के तहत आईएनएस ताबर, (F44) और आईएनएस तेग (F45) जैसे जहाज शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा नीलगिरी क्लास (प्रोजेक्ट 17ए, शिवालिक क्लास (प्रोजेक्ट 17) और ब्रह्मपुत्र क्लास (प्रोजेक्ट 16ए) के 2 से 3 फ्रिगेट भी तैनात किए जाते हैं।
इमें शिवालिक क्लास स्टेल्थ मल्टी-रोल फ्रिगेट्स हैं, जो एयर डिफेंस, एंटी-शिप (ब्रह्मोस), एंटी-सबमरीन वारफेयर और लैंड अटैक में अहम भूमिका निभाते हैं। कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर दो नीलगिरी या शिवालिक क्लास फ्रिगेट्स शामिल किए जाते हैं। इनमें से आईएनएस शिवालिक (F47), आईएनएस सतपुड़ा (F48) और आईएनएस सहयाद्री (F49) प्रमुख हैं। वहीं, नीलगिरी क्लास में इन तीनों में से किसी भी दो जहाजों को अक्सर आईएनएस विक्रांत के साथ तैनात देखा जाता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
शिवालिक क्लास को भारतीय नौसेना की पहली स्टेल्थ फ्रिगेट श्रेणी माना जाता है। इन जहाजों का मुख्य काम एयरक्राफ्ट कैरियर को एस्कॉर्ट देना और बहुस्तरीय सुरक्षा प्रदान करना होता है। इनमें श्टिल-1 और बराक-1 जैसी एयर डिफेंस मिसाइल प्रणालियां लगी होती हैं, जो हवाई खतरों से सुरक्षा देती हैं।
शिवालिक क्लास के अलावा विक्रांत के साथ ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स भी देखे जाते हैं। ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स सीबीजी की उस सुरक्षा परत का हिस्सा होते हैं, जो समुद्र के नीचे से आने वाले खतरों पर लगातार नजर रखती है और पूरे समूह को सुरक्षित बनाए रखने में अहम योगदान देती है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स की बात करें, तो ये भारतीय नौसेना के सबसे आधुनिक स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल युद्धपोत हैं। जो शिवालिक क्लास फ्रिगेट्स का अपग्रेडेड वर्जन हैं। इनमें बेहतर स्टेल्थ फीचर्स, कम रडार क्रॉस सेक्शन, आधुनिक सेंसर और अत्याधुनिक हथियार प्रणाली लगाई गई है। इसका मतलब है कि ये दुश्मन के रडार पर आसानी से पकड़ में नहीं आते और लंबी दूरी से सटीक वार करने में सक्षम हैं।
इस क्लास में कुल सात फ्रिगेट्स शामिल हैं। इनमें से तीन आईएनएस नीलगिरी (एफ33), आईएनएस हिमगिरी (एफ34) और आईएनएस उदयगिरी (एफ35) नेवी में कमीशन हो चुकी हैं। बाकी जल्द ही सेवा में शामिल हो जाएंगी। ये फ्रिगेट्स मल्टी रोल क्षमता वाली हैं। यानी ये हवा से आने वाले खतरे, समुद्र की सतह पर मौजूद दुश्मन जहाज और पानी के नीचे छिपी पनडुब्बियों – तीनों से मुकाबला कर सकती हैं। इनमें ब्रह्मोस एंटी शिप मिसाइल, बराक-8 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल, 76 मिमी मुख्य तोप, टॉरपीडो और एंटी सबमरीन रॉकेट सिस्टम लगाए गए हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
ब्रह्मपुत्र क्लास भारतीय नौसेना के ऐसे युद्धपोत हैं, जिनका मुख्य फोकस एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी पनडुब्बी रोधी अभियान पर होता है। करीब 3,850 टन वजनी ये फ्रिगेट पुराने गोदावरी क्लास के अपग्रेडेड संस्करण माने जाते हैं और समुद्र के नीचे छिपे खतरों से निपटने में खास भूमिका निभाते हैं।
कैरियर बैटल ग्रुप में आमतौर पर दो ब्रह्मपुत्र क्लास फ्रिगेट्स शामिल किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर आईएनएस ब्रह्मपुत्र (F31), आईएनएस बेतवा (F39) और आईएनएस ब्यास (F37) जैसे जहाज इस श्रेणी में आते हैं। इन तीनों में से किसी भी दो को अक्सर आईएनएस विक्रांत के नेतृत्व वाले सीबीजी के साथ तैनात किया जाता है। इनमें टॉरपीडो और आरबीयू-6000 रॉकेट लॉन्चर जैसी प्रणालियां लगी होती हैं, जो अंडरवाटर टारगेट्स के खिलाफ प्रभावी मानी जाती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
इसके अलावा तलवार क्लास फ्रिगेट्स भी आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप का अहम हिस्सा मानी जाती हैं। प्रोजेक्ट 11356 के तहत बनी ये रूसी डिजाइन वाली स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट्स हैं, जिन्हें मल्टी-रोल भूमिका के लिए तैयार किया गया है। इनमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, श्टिल-1 एयर डिफेंस सिस्टम और एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता मौजूद है।
2025-2026 की हाल की फॉर्मेशन और एक्सरसाइज की तस्वीरों तथा वीडियो विश्लेषण में अक्सर दो तलवार क्लास फ्रिगेट्स को विक्रांत के साथ देखा गया है। एक सामान्य फॉर्मेशन में केंद्र में आईएनएस विक्रांत होता है, दोनों ओर कोलकाता क्लास के डेस्ट्रॉयर तैनात रहते हैं, और तिरछी दिशा में शिवालिक क्लास, ब्रह्मपुत्र क्लास के साथ दो तलवार क्लास फ्रिगेट्स दिखाई देती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान भी तलवार क्लास के जहाज, जैसे आईएनएस तबार, आईएनएस तेग और आईएनएस त्रिखंड, विक्रांत सीबीजी के साथ तैनात रहे। एक्सरसाइज कोंकण 2025 में भी आईएनएस तेग ने विक्रांत के साथ जॉइंट ऑपरेशन में हिस्सा लिया था।
तलवार क्लास के अन्य जहाजों में आईएनएस तलवार, आईएएस तरकश और हाल में शामिल आईएनएस तुशील भी आते हैं। हालांकि सीबीजी की संरचना हर मिशन के अनुसार बदलती रहती है, लेकिन ब्रह्मोस से लैस होने के कारण तलवार और नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स ज्यादा खतरे वाले ऑपरेशनों में मजबूत एंटी-शिप क्षमता देते हैं और विक्रांत के सुरक्षा घेरे को और मजबूत बनाते हैं।
इसके अलावा इन फ्रिगेट्स की डिजाइन में स्टेल्थ फीचर्स शामिल हैं, जिससे रडार पर इनकी पहचान कम होती है। यही कारण है कि कैरियर बैटल ग्रुप में इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि ये न सिर्फ पनडुब्बियों और दुश्मन जहाजों पर नजर रखते हैं, बल्कि हवा से आने वाले हमलों से भी कैरियर की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
वहीं डेस्ट्रॉयर और फ्रिगेट की बात करें, तो डेस्ट्रॉयर बड़े होते हैं और ज्यादा ताकतवर होते हैं। इनकी एयर डिफेंस, एंटी-शिप (ब्रह्मोस), एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता छोटे फ्रिगेट्स के मुकाबले ज्यादा होती है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
कॉर्वेट्स भी होते हैं कैरियर बैटल ग्रुप में
आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप में अक्सर कॉर्वेट्स को भी शामिल किए जाते हैं। कॉर्वेट्स नौसेना में मध्यम आकार के युद्धपोत होते हैं, जो फ्रिगेट्स से छोटे लेकिन पेट्रोल क्राफ्ट या मिसाइल बोट्स से बड़े होते हैं। ये आमतौर पर 500 से 3,000 टन तक के डिस्प्लेसमेंट वाले होते हैं और मुख्य रूप से (तटीय और उथले समुद्र) में काम करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।
इनका मुख्य काम समुद्र के नीचे छिपी दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें निष्क्रिय करना होता है। किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर दुश्मन की सबमरीन से होता है, इसलिए सीबीजी में एक मजबूत एंटी-सबमरीन लेयर बनाना जरूरी माना जाता है। कॉर्वेट्स एस्कॉर्ट ड्यूटी भी निभाते हैं। जब जहाजों का समूह एक साथ यात्रा करता है, तो कॉर्वेट्स उन्हें पनडुब्बी या दुश्मन जहाजों से बचाने में मदद करते हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
कई कॉर्वेट्स ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों से लैस होते हैं। इसके अलावा ये सीमित एंटी-एयर वारफेयर क्षमता भी रखते हैं, यानी कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमान, हेलिकॉप्टर या ड्रोन से सुरक्षा कर सकते हैं। इसके लिए सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, जैसे बराक सीरीज, लगाई जाती हैं। फ्रिगेट्स की तुलना में कॉर्वेट्स सस्ते, तेज और उथले पानी में ज्यादा प्रभावी होते हैं। हालांकि इनकी मारक क्षमता और लंबी दूरी तक संचालन की क्षमता कुछ कम होती है। इसी कारण इन्हें कम स्तर के बहु-भूमिका युद्धपोत कहा जाता है, लेकिन आधुनिक समुद्री सुरक्षा में इनकी अहमियत बहुत ज्यादा है।
कामोर्टा क्लास को प्रोजेक्ट 28 के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय नौसेना की विशेष स्टेल्थ कॉर्वेट कैटेगरी है। इस क्लास के चारों जहाज आईएनएस कामोर्ता, आईएनएस कदमत्त, आईएनएस किल्टन और आईएनएस कवरत्ती सक्रिय सेवा में हैं। करीब 3,500 टन वजनी और 109 मीटर लंबे ये जहाज 25 नॉट्स से अधिक की रफ्तार पकड़ सकते हैं। इनमें आरबीयू-6000 रॉकेट लॉन्चर, वरुणास्त्र टॉरपीडो, एडवांस्ड सोनार सिस्टम और एंटी-सबमरीन हेलीकॉप्टर ऑपरेशन की क्षमता होती है। इनकी डिजाइन में स्टेल्थ फीचर्स शामिल हैं, जिससे रडार पर इनकी पहचान कम होती है और शोर स्तर भी कम रहता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
आईएनएस विक्रांत मुख्य रूप से वेस्टर्न कमांड से ऑपरेट होता है, जहां सबमरीन गतिविधियों की संभावना को ध्यान में रखते हुए एंटी-सबमरीन सुरक्षा बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में कामोर्टा क्लास कॉर्वेट्स सीबीजी के उस सुरक्षा घेरे का हिस्सा बनती हैं, जो समुद्र की सतह के नीचे से आने वाले खतरों पर नजर रखता है। हालांकि हर मिशन में इनकी संख्या तय नहीं होती, लेकिन खतरे के स्तर के अनुसार एक या दो कामोर्टा क्लास जहाज विक्रांत के साथ तैनात किए जा सकते हैं।
वहीं आईएनएस विक्रमादित्य के सीबीजी में आमतौर पर कोलकाता श्रेणी के डेस्ट्रॉयर, तलवार श्रेणी के फ्रिगेट और दीपक श्रेणी के टैंकर शामिल होते हैं। इस ग्रुप में कॉर्वेट्स हमेशा मुख्य हिस्सा नहीं होते, लेकिन जरूरत पड़ने पर इन्हें जोड़ा जा सकता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
रिप्लेनिशमेंट शिप्स होते हैं सीबीजी की लॉजिस्टिक्स रीढ़
फ्लीट सपोर्ट या रिप्लेनिशमेंट शिप्स किसी भी कैरियर बैटल ग्रुप की असली लॉजिस्टिक्स रीढ़ मानी जाती हैं। एयरक्राफ्ट कैरियर, डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट चाहे कितने भी आधुनिक क्यों न हों, अगर उन्हें समय-समय पर ईंधन, गोला-बारूद और जरूरी सामान न मिले, तो वे लंबे समय तक समुद्र में नहीं टिक सकते। यही काम ये सपोर्ट शिप्स करती हैं।
इनका सबसे अहम काम अंडरवे रिप्लेनिशमेंट यानी यूएनआरईपी होता है। इसका मतलब समुद्र में चलते हुए जहाजों को ही डीजल, एविएशन फ्यूल, गोला-बारूद, भोजन, पानी और जरूरी स्पेयर पार्ट्स पहुंचाना है। यह ट्रांसफर जहाज के बराबर चलकर या पीछे से किया जाता है। कई सपोर्ट शिप्स पर हेलिपैड और हैंगर भी होते हैं, जिससे हेलीकॉप्टर ऑपरेशन और मेडिकल इवैक्यूएशन जैसे काम भी किए जा सकते हैं। आपदा या मानवीय सहायता के समय ये जहाज एचएडीआर ऑपरेशन में भी अहम भूमिका निभाते हैं। आम तौर पर कैरियर बैटल ग्रुप में एक या दो ऐसी शिप्स शामिल होती हैं और वे फॉर्मेशन के पीछे सुरक्षित दूरी पर रहती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
आईएनएस विक्रांत के साथ अक्सर दीपक क्लास फ्लीट टैंकर तैनात की जाती है। इस क्लास की प्रमुख शिप है आईएनएस दीपक (A50) है। लगभग 27,500 टन वजनी यह जहाज बड़े पैमाने पर ईंधन और सप्लाई ट्रांसफर करने में सक्षम है और एक साथ कई जहाजों को यूएनआरईपी दे सकता है। इसके अलावा आईएनएस शक्ति (A57) भी जरूरत पड़ने पर विक्रांत सीबीजी का हिस्सा बनती है।
साथ ही, आईएनएस आदित्य (A59) और आईएनएस ज्योति (A58) जैसे टैंकर भी लंबे डिप्लॉयमेंट में सपोर्ट देते हैं। भविष्य में बड़े एचएसएल क्लास सपोर्ट जहाज भी शामिल होने वाले हैं, जिससे समुद्र में भारत की ब्लू-वाटर क्षमता और मजबूत होगी। कुल मिलाकर, ये फ्लीट सपोर्ट शिप्स ही वह ताकत हैं जो विक्रांत और उसके कैरियर बैटल ग्रुप को हफ्तों और महीनों तक समुद्र में सक्रिय बनाए रखती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
गुपचुप विक्रांत को सुरक्षा देती हैं सबमरींस
आईएनएस विक्रांत के कैरियर बैटल ग्रुप में सबमरीन्स भी शामिल होती हैं, लेकिन ये सरफस पर दिखाई नहीं देतीं। ये पानी के भीतर तैनात रहकर पूरे ग्रुप को अंडरवाटर सुरक्षा देती हैं। इनका मुख्य काम एंटी-सबमरीन वारफेयर यानी दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनका पीछा करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय करना होता है। किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर दुश्मन की सबमरीन से माना जाता है, इसलिए सीबीजी में अंडरवाटर सुरक्षा बेहद अहम होती है।
ऑपरेशनल सिक्योरिटी के कारण भारतीय नौसेना हर मिशन में शामिल सबमरीन्स के नाम सार्वजनिक नहीं करती, लेकिन हाल की एक्सरसाइज और रिपोर्ट्स में देखा गया है कि आम तौर पर एक से तीन सबमरींस सीबीजी के साथ तैनात रहती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
विक्रांत के साथ सीबीजी में आदर्श तौर पर न्यूक्लियर पावर वाली अटैक सबमरीन, यानी एसएसएन, शामिल होनी चाहिए। चूंकि भारतीय नौसेना के पास कोई स्वदेशी ऑपरेशनल एसएसएन मौजूद नहीं है। इसी वजह से अभी सीबीजी की सुरक्षा के लिए कलवरी क्लास की डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन, जिन्हें एसएसके भी कहा जाता है, तैनात की जाती हैं। खासकर आईएनएस विक्रांत के साथ इन्हीं पनडुब्बियों को लगाया जाता है।
दुनिया की बड़ी नौसेनाएं, जैसे अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस, अपने कैरियर ग्रुप के साथ एसएसएन तैनात करती हैं। इसका कारण साफ है। न्यूक्लियर प्रोपल्शन की वजह से ऐसी पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। उन्हें बार-बार सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती। उनकी रफ्तार भी ज्यादा होती है और वे कैरियर के साथ तेज रफ्तार में चल सकती हैं। दुश्मन की पनडुब्बियों को खोजने, उनका पीछा करने और जरूरत पड़ने पर हमला करने में एसएसएन बहुत प्रभावी मानी जाती हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
भारत में स्वदेशी एसएसएन परियोजना अभी डिजाइन और विकास के चरण में है। माना जा रहा है कि 2030 के दशक में पहली स्वदेशी एसएसएन नौसेना में शामिल हो सकती है। रूस से लीज पर ली गई आईएनएस चक्रा अब सेवा में नहीं है और अगली लीज भी अभी समय ले रही है। इसलिए फिलहाल भारतीय नौसेना के पास सीबीजी के साथ स्थायी रूप से तैनात करने के लिए कोई एसएसएन उपलब्ध नहीं है।
ऐसी स्थिति में कलवरी क्लास की यानी स्कॉर्पीन क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। स्कॉर्पीन डिजाइन पर आधारित ये पनडुब्बियां काफी शांत यानी लो एकॉस्टिक सिग्नेचर वाली हैं। पानी के अंदर इनका पता लगाना आसान नहीं होता। इनके पास एंटी-शिप मिसाइल और भारी टॉरपीडो जैसे हथियार हैं। जरूरत पड़ने पर ये समुद्र में माइंस भी बिछा सकती हैं। इनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि ये दुश्मन की पनडुब्बियों की खोज और निगरानी कर सकती हैं, जिससे कैरियर की सुरक्षा मजबूत होती है।
कलवरी क्लास, यानी स्कॉर्पीन क्लास डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस में आईएनएस कलवरी, आईएनएस खंडेरी, आईएनएस करंज, आईएनएस वेला और आईएनएस वाग्शीर जैसी सबमरींस शामिल हैं। लगभग 1,800 टन वजनी ये सबमरीन्स स्टेल्थ क्षमता से लैस हैं और एक्सोसेट मिसाइल तथा हेवीवेट टॉरपीडो दागने में सक्षम हैं। पूर्वी नौसैनिक बेड़े के साथ विक्रांत के संचालन के दौरान इन्हें प्राथमिक अंडरवाटर एस्कॉर्ट माना जाता है। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)
जब आईएनएस विक्रांत समुद्र में ऑपरेशन पर निकलता है, तो उसके साथ डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट, फ्लीट टैंकर और एयर विंग के अलावा पनडुब्बियां भी तैनात रहती हैं। यही पनडुब्बियां समुद्र के नीचे एक सुरक्षा घेरा बनाती हैं। वे आसपास के क्षेत्र को साफ यानी सैनेटाइज करती हैं, ताकि कोई दुश्मन पनडुब्बी या जहाज पास न आ सके। हिंद महासागर के उथले और तटीय इलाकों में डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां काफी कारगर मानी जाती हैं। इसलिए मौजूदा हालात में विक्रांत के मुकाबले स्पीड कम होने के बाद भी कलवरी क्लास भारतीय सीबीजी के लिए एक प्रभावी समाधान साबित हो रही हैं।
अक्टूबर 2025 में हुई एक्सरसाइज कोंकण के दौरान एक कलवरी क्लास सबमरीन ने ब्रिटेन की नौसेना के साथ संयुक्त पनडुब्बी खोज अभ्यास में हिस्सा लिया था। इसी तरह ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान भी विक्रांत सीबीजी के साथ कवलरी क्लास सबमरीन्स की तैनाती देखी गई थी।
इसके अलावा शिशुमार क्लास और सिंधुघोष क्लास की कुछ पुरानी लेकिन सक्रिय सबमरींस भी जरूरत के अनुसार शामिल की जा सकती हैं। शिशुमार क्लास को टाइप 209/1500 के नाम से जाना जाता है। ये पुरानी जरूर हैं, लेकिन अब भी सक्रिय सेवा में है। इस श्रेणी में आईएनएस शाल्कि और आईएनएस शंकुश जैसी पनडुब्बियां शामिल हैं। अपनी विश्वसनीयता और ऑपरेशनल अनुभव के कारण ये अब भी नौसेना के बेड़े का हिस्सा बनी हुई हैं।
वहीं सिंधुघोष क्लास, जिसे किलो क्लास भी कहा जाता है, रूसी मूल की पनडुब्बियां हैं। इस श्रेणी में आीएनएस सिधुंरक्षक शामिल रही हैं। ये लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम हैं और कई वर्षों तक भारतीय नौसेना की अंडरवाटर स्ट्राइक क्षमता का आधार रही हैं। हालांकि समय के साथ इनकी जगह धीरे-धीरे आधुनिक कलवरी क्लास पनडुब्बियां ले रही हैं, जो ज्यादा स्टेल्थ और एडवांस तकनीक से लैस हैं। (IFR 2026 INS Vikrant CBG)






