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Explainer: कैंटोनमेंट से लेकर बीटिंग रिट्रीट तक: पढ़ें- कैसे तीनों सेनाओं ने मिटाई ब्रिटिश दौर की छाप

सेना के अधिकारियों का मानना है कि जब एक सैनिक रोज ऐसी सड़कों पर चलता है या ऐसी इमारतों में रहता है, जिनके नाम औपनिवेशिक अतीत से जुड़े हों, तो यह अनजाने में ही उस मानसिकता को आगे बढ़ाता है...

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📍नई दिल्ली | 6 Feb, 2026, 11:53 AM

Indian Army colonial names removed: भारत को आजाद हुए सात दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन आज भी देश की कई संस्थाओं में ब्रिटिश दौर की छाप कहीं-न-कहीं दिखाई देती रही है। खासकर सेना के कैंटोनमेंट इलाकों में ऐसी सड़कें, इमारतें और कॉलोनियां थीं, जिनके नाम सीधे तौर पर औपनिवेशिक शासन की याद दिलाते थे। अब इसी विरासत को पीछे छोड़ते हुए भारतीय सेना ने एक बड़ा फैसला लिया है।

भारतीय सेना ने देशभर में अपने इस्टैब्लिशमेंट्स के भीतर मौजूद 246 सड़कों, इमारतों, कॉलोनियों और मिलिट्री फैसिलिटीज के नाम बदल दिए हैं। खास बात यह है कि इनके नाम ब्रिटिश काल से जुड़े हुए थे। भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने यह फैसला औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह बाहर निकलने और भारतीय वीरता, बलिदान और सैन्य परंपरा को पहचान देने के मकसद से उठाया है। (Indian Army colonial names removed)

Indian Army colonial names removed: क्यों जरूरी था नाम बदलने का यह फैसला?

आज भी कई कैंटोनमेंट इलाकों में मॉल रोड, क्वींस लाइन, किर्बी प्लेस, मैल्कम लाइंस जैसे ब्रिटिश नाम मौजूद थे। ये नाम उस दौर की याद दिलाते हैं, जब भारत पर ब्रिटिश शासन था और भारतीय सैनिक विदेशी हुक्मरानों के अधीन काम करते थे।

सेना के अधिकारियों का मानना है कि जब एक सैनिक रोज ऐसी सड़कों पर चलता है या ऐसी इमारतों में रहता है, जिनके नाम औपनिवेशिक अतीत से जुड़े हों, तो यह अनजाने में ही उस मानसिकता को आगे बढ़ाता है। इसलिए जरूरत महसूस की गई कि सैनिकों के रहने, ट्रेनिंग और काम करने की जगहों पर भारत के अपने नायकों और परंपराओं की छाप हो।

इस बदलाव के जरिए सेना यह संदेश देना चाहती है कि भारत की सेनाएं अब पूरी तरह अपनी जड़ों से जुड़कर आगे बढ़ रही हैं। ब्रिटिश शासन की याद दिलाने वाले नामों की जगह अब ऐसे नाम होंगे, जो भारतीय वीरों, युद्ध नायकों और महान सैन्य नेतृत्व को सम्मान देते हैं। (Indian Army colonial names removed)

246 नामों में क्या-क्या बदला गया?

भारतीय सेना के अनुसार, कुल 246 नामों में बदलाव किया गया है। इन्हें चार मुख्य कैटेगरीज में बांटा गया है। इनमें 124 सड़कें, 77 कॉलोनियां (रिहायशी इलाके), 27 इमारतें और अन्य सैन्य सुविधाएं, और 18 अन्य स्थान, जैसे पार्क, ट्रेनिंग एरिया, स्पोर्ट्स ग्राउंड, गेट, हेलीपैड आदि शामिल हैं।

भारतीय सेना के अनुसार, यह बदलाव देशभर के अलग-अलग कैंटोनमेंट और सैन्य स्टेशनों में लागू किया गया है। इसमें सड़कों, रिहायशी कॉलोनियों, इमारतों और कई अन्य सुविधाओं के नाम शामिल हैं। मकसद यह था कि केवल किसी एक जगह नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में एक समान बदलाव दिखे।

सेना का कहना है कि जहां-जहां ब्रिटिश अधिकारियों, शाही परिवार या औपनिवेशिक प्रतीकों से जुड़े नाम थे, उन्हें हटाकर भारतीय पहचान से जुड़े नाम रखे गए हैं। (Indian Army colonial names removed)

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दिल्ली कैंटोनमेंट में बदले ये नाम

दिल्ली कैंटोनमेंट में अधिकारियों के रहने की जगह किर्बी प्लेस को अब केनुगुरुसे विहार नाम दिया गया है। यह नाम परम वीर चक्र विजेता कैप्टन नियोटेनो केनुगुरुसे के सम्मान में रखा गया है। इसी तरह, दिल्ली की जानी-पहचानी मॉल रोड अब अरुण खेत्रपाल मार्ग के नाम से जानी जाएगी, जो 1971 के युद्ध में शहीद हुए सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरता के प्रति सम्मान है।

दिल्ली कैंटोनमेंट की सड़कों की बात करें तो यहां कुछ सड़कों के नाम पहले जैसे ही रखे गए हैं, जबकि कई प्रमुख सड़कों को नए भारतीय नाम दिए गए हैं। पोलो रोड और परेड रोड के नामों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। वहीं टिग्रिस रोड को अब होशियार सिंह मार्ग कहा जाएगा।

कैसल रोड अब मानेकशॉ मार्ग के नाम से जानी जाएगी, जो फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के सम्मान में है। मॉड रोड (डीसीबी रोड) को थिमय्या मार्ग का विस्तार नाम दिया गया है। लॉरी रोड अब रामास्वामी परमेश्वरन मार्ग कहलाएगी, जबकि जिमनैजियम रोड का नया नाम पद्मपाणि आचार्य मार्ग रखा गया है। तिमारपुर इलाके की प्रोबिन रोड को अब शैतान सिंह मार्ग नाम दिया गया है और कोतवाली रोड को कैप्टन अनुज नय्यर रोड कहा जाएगा। (Indian Army colonial names removed)

दिल्ली कैंटोनमेंट की रिहायशी कॉलोनियों में भी कई पुराने नाम बदले गए हैं। अधिकारियों के लिए बनी बेयर्ड प्लेस कॉलोनी को अब अनुज नय्यर विहार नाम दिया गया है। इसी तरह किर्बी प्लेस को पहले ही केनुगुरुसे विहार नाम दिया जा चुका है। टुबरक लाइन/टोब्रुक लाइन (जो सेबर मेस के पीछे स्थित है) को अब गुरदयाल विहार कहा जाएगा।

वहीं, तिमारपुर की किंग्सवे कैंप कॉलोनी का नाम बदलकर जोगिंदर सिंह विहार कर दिया गया है। निकलसन लाइन अब दिगेंद्र कुमार विहार कहलाएगी, जबकि निकलसन रेंज को नया नाम टॉरस बैटल रेंज दिया गया है। खैबर लाइन (एमसी के पीछे) को अब्दुल हमीद विहार नाम दिया गया है, जो 1965 के युद्ध के नायक कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद के सम्मान में है। टिग्रिस मॉड लाइन (कैवेलरी रोड पर) अब जदुनाथ विहार के नाम से जानी जाएगी और पोल्ट्री फार्म (डिफेंस सिविल एरिया) को राम चंदर विहार नाम दिया गया है।

इसके अलावा, अन्य सैन्य परिसरों में भी नाम बदले गए हैं। ऑचिनलेक सैनिक आरामगृह को अब सोमनाथ सैनिक आरामगृह कहा जाएगा। (Indian Army colonial names removed)

दूसरे शहरों के कैंटोनमेंट्स के भी बदले नाम

अंबाला कैंटोनमेंट में पैटरसन रोड क्वार्टर्स का नाम बदलकर धन सिंह थापा एन्क्लेव कर दिया गया है। यह नाम परम वीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा की बहादुरी की याद दिलाएगा। मथुरा कैंटोनमेंट में मौजूद न्यू हॉर्न लाइन अब अब्दुल हमीद लाइंस कहलाएगी, जो 1965 के युद्ध में दुश्मन के टैंकों को नष्ट करने वाले कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद को समर्पित है।

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जयपुर कैंटोनमेंट में क्वींस लाइन रोड का नाम बदलकर सुंदर सिंह मार्ग रखा गया है। वहीं, बरेली कैंटोनमेंट में न्यू बर्डवुड लाइन अब थिमय्या कॉलोनी के नाम से जानी जाएगी, जो भारतीय सेना के प्रतिष्ठित जनरल के.एस. थिमय्या की याद में है।

मध्य प्रदेश के महू कैंटोनमेंट में मैल्कम लाइंस को अब पीरू सिंह लाइंस नाम दिया गया है। यह नाम परम वीर चक्र विजेता कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह की वीरता की याद दिलाएगी। (Indian Army colonial names removed)

देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री अकादमी में भी ब्रिटिश दौर के नाम बदले गए हैं। यहां कोलिन्स ब्लॉक को नुब्रा ब्लॉक और किंग्सवे ब्लॉक को कारगिल ब्लॉक नाम दिया गया है, जो भारतीय सैन्य इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों से जुड़े हैं।

कोलकाता में मौजूद ऐतिहासिक फोर्ट विलियम का नाम अब विजय दुर्ग कर दिया गया है। यह बदलाव खास तौर पर प्रतीकात्मक माना जा रहा है, क्योंकि यह औपनिवेशिक सत्ता के प्रतीक रहे किले को भारतीय विजय और संप्रभुता से जोड़ता है।

नागालैंड के रंगापहार मिलिट्री स्टेशन में स्थित स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स को अब लैशराम ज्योतिन सिंह स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स नाम दिया गया है, जबकि जखामा मिलिट्री स्टेशन में स्पीयर लेक मार्ग अब हंगपन दादा मार्ग के नाम से जाना जाएगा। ये दोनों नाम अशोक चक्र विजेताओं की बहादुरी को सम्मान देते हैं। (Indian Army colonial names removed)

सिर्फ नाम नहीं, सोच बदलने की कोशिश

सेना का मानना है कि इस बदलाव का सबसे बड़ा असर मनोवैज्ञानिक स्तर पर होगा। जब कोई जवान “अब्दुल हमीद लाइंस” या “अरुण खेत्रपाल मार्ग” में रहता है, तो उसे रोज उन नायकों की कहानी याद आती है, जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

सेना की यह पहल नई पीढ़ी के सैनिकों को यह सिखाने का तरीका भी है कि सेना की परंपरा सिर्फ हथियारों और वर्दी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें इतिहास, बलिदान और मूल्य भी शामिल हैं। (Indian Army colonial names removed)

नेवी और एयर फोर्स में भी बदलाव

जहां सेना ने बड़े पैमाने पर नाम बदलने का अभियान चलाया है, वहीं भारतीय नेवी और भारतीय एयर फोर्स ने भी औपनिवेशिक विरासत को हटाने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन उनका तरीका थोड़ा अलग रहा है।

नेवी ने 2022 में नेवल एन्साइन बदला गया और ब्रिटिश प्रतीक हटाए गए। नौसेना ने सैंट जॉर्ज क्रॉस हटाया गया। वहीं, अब नौसेना का झंडा भारतीय परंपरा और छत्रपति शिवाजी महाराज से प्रेरित है। इसके अलावा कई ब्रिटिश काल की रस्मों और प्रतीकों को भी धीरे-धीरे बदला जा रहा है।

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वहीं, एयर फोर्स में आजादी के बाद ही 1950 में “रॉयल इंडियन एयर फोर्स” से “रॉयल” शब्द हटाया गया था। वहीं, इंसिग्निया में टूडर क्राउन की जगह अशोक शेर और अन्य भारतीय प्रतीक लगाए गए। इसके अलावा परेड, संगीत और परंपराओं में भारतीय तत्वों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही, रैंक नामों और प्रक्रियाओं को लेकर भी चर्चा चल रही है। (Indian Army colonial names removed)

राष्ट्रपति भवन में लगी परम वीर दीर्घा गैलरी

16 दिसंबर 2025 को विजय दिवस के मौके पर, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में 21 परम वीर चक्र से सम्मानित वीरों की नई गैलरी परम वीर दीर्घा का उद्घाटन किया। पुरानी व्यवस्था में राष्ट्रपति भवन के गलियारों में पहले 96 ब्रिटिश एड-डी-कैंप्स (एडीसी) की पोर्ट्रेट्स लगी हुई थीं। जो ब्रिटिश काल के दौरान वायसराय या गवर्नर-जनरल के सहायक अधिकारी होते थे, और उनके पोर्ट्रेट्स औपनिवेशिक युग की याद दिलाते थे। (Indian Army colonial names removed)

बीटिंग रिट्रीट समारोह भी ब्रिटिश दौर की छाया से निकला बाहर

बीटिंग रिट्रीट समारोह में सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा चर्चा में रहा बदलाव ब्रिटिश क्रिश्चियन हिम्न ‘Abide with Me’ को हटाना रहा। यह गीत 1950 से हर साल समारोह के आखिर में बजता था, जब सूरज ढलता था और झंडे को उतारा जाता था। इसे महात्मा गांधी का पसंदीदा गीत माना जाता था, इसलिए यह परंपरा दशकों तक चली। लेकिन 2022 से यह गीत पूरी तरह हटा दिया गया। उसकी जगह ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को शामिल किया गया, जो 1962 के युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को समर्पित है।

बीटिंग रिट्रीट में पहले सिर्फ ‘Abide with Me’ ही नहीं, बल्कि कई और विदेशी और ब्रिटिश दौर की मार्चिंग ट्यून्स भी बजती थीं। इनमें कर्नल बोगी मार्च, संस ऑफ द ब्रेव और कुछ स्कॉटिश पाइप धुनें शामिल थीं। हालांकि, इन्हें एक झटके में नहीं हटाया गया। 2011 के बाद से ही धीरे-धीरे विदेशी धुनों को कम किया जाने लगा। 2016 तक आते-आते, ज्यादातर परफॉर्मेंस भारतीय संगीतकारों और भारतीय धुनों पर आधारित हो गई थीं। लेकिन अब बीटिंग रिट्रीट पूरी तरह भारतीय संगीत पर टिका हुआ समारोह बन चुका है। (Indian Army colonial names removed)

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