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India Russia Defence Cooperation: आखिर भारत ने रूसी सु-57 और ड्रोन्स में क्यों नहीं दिखाई दिलचस्पी? बड़ी डिफेंस डील न होने के पीछे यह है वजह

2014 में पुतिन एक बार फिर भारत आए और एचएएल में बन रहे सु-30एमकेआई बेड़े के विस्तार पर सहमति बनी। इसके साथ ही नौसेना के लिए नए फ्रिगेट निर्माण और संयुक्त सैन्य अभ्यास इंदिरा को भी और मजबूत किया गया...

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📍नई दिल्ली | 11 Dec, 2025, 3:38 PM

India Russia Defence Cooperation: भारत और रूस के बीच रक्षा संबंध दशकों पुराने हैं, लेकिन इस बार जब राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा पर आए तो उम्मीद के मुताबिक उस हिसाब से रक्षा समझौते नहीं हुए, जैसे पहले देखने को मिलते थे। हालांकि रूस ने भारत को सु-57 फिफ्थ-जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर, लॉन्ग-रेंज ड्रोन और नई सबमरीन की पेशकश तो की, लेकिन भारत की तरफ से प्रतिक्रिया बेहद सीमित रही।

भारत और रूस के बीच रणनीतिक संबंधों का यह रिश्ता सोवियत काल से शुरू हुआ था। 1971 की भारत–सोवियत मैत्री संधि ने दोनों देशों को सुरक्षा, तकनीक और सैन्य सहयोग के एक नए दौर में प्रवेश कराया। इसी सिलसिले में 1973 में सोवियत नेता लियोनिद ब्रेजनेव भारत आए थे, जहां रक्षा साझेदारी को दीर्घकालिक रूप दिया गया। बाद में जब सोवियत संघ टूट गया और 1991 में रूस एक नए देश के रूप में उभरा, तब भारत और रूस ने अपने रिश्तों को नए सिरे से स्थापित किया।

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रूस के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन 1993 में भारत आए। उनका उद्देश्य सोवियत दौर में चले आ रहे सैन्य कार्यक्रमों को फिर से सक्रिय करना था। इस दौरान भारत ने रूस के साथ सैन्य-तकनीकी सहयोग को बहाल किया, मिग विमान और स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई पर सहमति बनी और दोनों देशों ने सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर समझ विकसित की।

वहीं राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का दौर भारत–रूस रक्षा साझेदारी के लिए सबसे अहम माना जाता है। पुतिन पहली बार 2000 में भारत आए, जहां दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी की औपचारिक घोषणा की। इसी यात्रा के बाद सु-30 लड़ाकू विमान का संयुक्त उत्पादन भारत में शुरू हुआ। पुतिन 2004 में फिर आए और ग्लोनेस जैसे रूसी नेविगेशन सिस्टम पर सहयोग शुरू हुआ, साथ ही ब्रह्मोस संयुक्त मिसाइल कार्यक्रम को और बढ़ाया गया। 2010 की यात्रा में दोनों देशों ने संबंधों को “विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा दिया, जो आज भी लागू है। इसी दौरान भारत–रूस हेलीकॉप्टर निर्माण, न्यूक्लियर सहयोग और रक्षा अनुसंधान का ढांचा तैयार हुआ।

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वहीं, 2014 में पुतिन एक बार फिर भारत आए और एचएएल में बन रहे सु-30एमकेआई बेड़े के विस्तार पर सहमति बनी। इसके साथ ही नौसेना के लिए नए फ्रिगेट निर्माण और संयुक्त सैन्य अभ्यास इंदिरा को भी और मजबूत किया गया। 2021 की उनकी बेहद महत्वपूर्ण यात्रा में S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की डील को औपचारिक रूप दिया गया। यह वही सिस्टम है जो भारत की एयर डिफेंस क्षमता का बड़ा हिस्सा बन गया है। इस यात्रा में 2+2 डायलॉग की शुरुआत भी हुई, जो रक्षा और विदेश नीति का संयुक्त ढांचा है।

इसके बाद राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने 2008 में भारत का दौरा किया और नौसेना के लिए मिग-29के विमान तथा न्यूक्लियर सहयोग को आगे बढ़ाया। यह समय दोनों देशों की सैन्य साझेदारी को और व्यापक बनाने का था, खासकर नौसेना और एविएशन सेक्टर में खूब प्रगति हुई।

वहीं, इस बार दिसंबर 2025 में व्लादिमीर पुतिन एक बार फिर भारत आए। हालांकि इस यात्रा से पहले रूस ने सु-57 फिफ्थ-जेनरेशन जेट, एस-500 एयर डिफेंस सिस्टम, गेरान सीरीज के लॉन्ग-रेंज ड्रोन्स और नई सबमरीन पर सहयोग बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन भारत ने इन प्रस्तावों में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। हालांकि पुतिन की इस यात्रा में 19 व्यापारिक समझौते तो हुए, लेकिन कोई बड़ा रक्षा समझौता नहीं हुआ।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, रूस ने पुतिन की यात्रा से पहले कई दौर की बातचीत में भारत को अपने प्रमुख हथियार प्लेटफॉर्म जैसे गेरान सीरीज के कामिकाजे ड्रोन, सु-57 एयरक्राफ्ट और सबमरीन को लेकर प्रस्ताव दिया था। वहीं भारत के इन प्रस्तावों को लेकर ज्यादा रूचि न दिखाने की वजह यह रही कि भारत फिलहाल “इंडिजिनस प्रोडक्ट्स” यानी स्वदेशी डिफेंस सिस्टम के विकास पर ज्यादा ध्यान दे रहा है और किसी बड़े विदेशी प्लेटफॉर्म पर तत्काल फैसला लेने की स्थिति में नहीं है। सूत्रों ने बताया कि भारत ने स्पष्ट संकेत दिए कि वह अब अपने स्वदेशी रक्षा निर्माण को मजबूत करने पर अधिक ध्यान दे रहा है।

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हाल ही में लेह में आयोजित कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया कि भारत का रक्षा उत्पादन 2014 में 46,000 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 1.51 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। वहीं, रक्षा निर्यात भी पिछले दस वर्षों में लगभग 24,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह बदलाव भारत के लिए एक पैराडाइम शिफ्ट माना जा रहा है।

रूस की तरफ से प्रस्तावित गेरान ड्रोन्स ईरान के शाहेद-136 का इंडिजिनाइज्ड वर्जन हैं। यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना ने बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल किया। लेकिन भारतीय सेनाओं ने इन्हें खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखायी। भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी ड्रोन क्षमता स्वदेशी उद्योगों के साथ तेजी से विकसित कर रहा है और किसी विदेशी निर्भरता को बढ़ाना नहीं चाहता।

इससे पहले 29 अक्टूबर को मॉस्को में इंडिया-रशिया इंटर-गवर्नमेंटल कमिशन की वर्किंग ग्रुप मीटिंग हुई थी। इस बैठक में तीनों सेनाओं के सहयोग और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर चर्चा हुई और एक प्रोटोकॉल भी साइन किया गया। लेकिन वहां भी किसी बड़ी डिफेंस डील पर सहमति नहीं बनी।

पुतिन की यात्रा के दौरान भारत और रूस के बीच 19 समझौते जरूर हुए, लेकिन ये सभी मुख्य रूप से व्यापार और आर्थिक सहयोग से जुड़े थे। सु-57 या एस-500 एयर डिफेंस सिस्टम जैसे हाई एंड हथियारों पर कोई संयुक्त घोषणा नहीं हुई। यह साफ दिखाता है कि भारत फिलहाल रूस के बड़े हथियार प्लेटफॉर्म के बजाय अपनी घरेलू क्षमता को प्राथमिकता दे रहा है।

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