📍नई दिल्ली | 15 Nov, 2025, 4:23 PM
CDS on Indian Defence Industry: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने भारतीय प्राइवेट डिफेंस कंपनियों को साफ संदेश दिया है कि केवल मुनाफा कमाने की सोच से देश की सुरक्षा जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं। उन्होंने कहा कि देश की रक्षा तैयारियों में काम करने वाली कंपनियों को अपने काम में थोड़ी देशभक्ति और राष्ट्रीय भावना जरूर दिखानी चाहिए।
जनरल चौहान ने यह बात यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूशन में आयोजित एक सेमिनार के दौरान कही। सीडीएस का यह बयान तब आया है, जब कई घरेलू कंपनियों पर आरोप लग रहे हैं कि वे इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत दिए गए काम को तय समय पर पूरा नहीं कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय सेना ने पांचवे और छठवें इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के लिए जब कई कंपनियों से बात की, तो अधिकांश ने जितना वादा किया, उतना काम पूरा नहीं कर पाए। सीडीएस के मुताबिक, यह स्थिति “अस्वीकार्य” है, क्योंकि डिफेंस प्रोक्योरमेंट में देरी का सीधा असर सेना की क्षमता पर पड़ता है।
CDS on Indian Defence Industry: इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट क्या है?
इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें सेना बिना लंबी सरकारी प्रक्रियाओं के 300 करोड़ रुपये तक के तुरंत कॉन्ट्रैक्ट खुद साइन कर सकती है। इसका उद्देश्य है युद्ध या तनाव की स्थिति में जरूरी हथियार, उपकरण और सिस्टम तुरंत खरीदे जा सकें।
लेकिन सीडीएस के अनुसार, कई भारतीय कंपनियां इस व्यवस्था का फायदा उठाते हुए समय पर डिलीवरी नहीं कर रही हैं, जिससे ऑपरेशनल जरूरतें प्रभावित हो रही हैं।
“70 फीसदी स्वदेशी”- सीडीएस ने झूठे दावों पर जताई नाराजगी
सीडीएस जनरल चौहान ने यह भी कहा कि कई कंपनियां दावा करती हैं कि उनका प्रोडक्ट “70 फीसदी इंडिजिनस (स्वदेशी)” है, लेकिन जांच में यह गलत पाया जाता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में गलत जानकारी देना बेहद गंभीर है। कई कंपनियां केवल आउटसाइड से आयातित उत्पादों को भारत में असेंबल करके उसे स्वदेशी बताती हैं, जबकि वास्तविक स्वदेशी कंटेंट बहुत कम होता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि कंपनियों को अपनी असली क्षमता के बारे में पारदर्शी होना चाहिए, ताकि सेना को गलत उम्मीदों में न रखा जाए।
CDS on Indian Defence Industry: क्या कहा इंडस्ट्री ने?
उद्योग जगत के सूत्रों ने स्वीकार किया कि सीडीएस की चिंताएं सही हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि देरी केवल भारतीय कंपनियों की तरफ से ही नहीं होती।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका, फ्रांस, इजराइल और रूस जैसी बड़ी विदेशी कंपनियों ने भी कई प्रोजेक्ट समय पर डिलीवर नहीं किए।
फिर भी, भारतीय निजी कंपनियों से उम्मीद ज्यादा इसलिए की जाती है क्योंकि वे “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” के प्रमुख स्तंभ हैं और उनसे उच्च स्तर की विश्वसनीयता की अपेक्षा की जाती है।
कौन-कौन सी भारतीय कंपनियां निर्यात कर रही हैं?
दिलचस्प बात यह है कि कई भारतीय रक्षा कंपनियां टाटा, एल एंड टी, कल्याणी ग्रुप, एसएमपीपी, एमकेयू, एसएसएस डिफेंस दुनिया के कई देशों को हथियार और सैन्य उपकरण निर्यात कर रही हैं।
हालांकि भारतीय सेना ने अभी तक कई उत्पादों को या तो सीमित संख्या में खरीदा है या ऑर्डर देने की प्रक्रिया में देरी हो रही है।
इसका मतलब यह है कि उत्पादन क्षमता और वैश्विक मार्केट दोनों मौजूद हैं, लेकिन “इंडिजिनस कैपेबिलिटी” और “डिलीवरी टाइमलाइन” को लेकर सवाल उठते रहते हैं।
सीडीएस जनरल चौहान ने साफ कहा कि रक्षा सुधार “वन-वे स्ट्रीट” नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना के साथ काम करने वाली हर कंपनी को अपनी क्षमता, तकनीकी कौशल और उत्पादन क्षमता के बारे में ईमानदार होना चाहिए।
किसी कॉन्ट्रैक्ट में देरी होने का मतलब है, सेना की ऑपरेशनल क्षमता कम होना, सीमा पर तैनात सैनिकों की जरूरतें समय पर पूरी न होना, जिसका राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है।
CDS on Indian Defence Industry सीडीएस ने कहा कि यह जिम्मेदारी बहुत बड़ी है, इसलिए निजी कंपनियों को अपने काम में समयबद्धता और गुणवत्ता दोनों सुनिश्चित करनी चाहिए।
