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क्या नाग चिन्ह वाले भैरव कमांडोज ले रहे हैं पैरा स्पेशल फोर्सेस की जगह? जानिए दोनों में असली फर्क

भैरव कमांडोज की ट्रेनिंग का सबसे बड़ा फोकस ड्रोन वॉरफेयर पर है। इसीलिए इसे पूरी तरह से ड्रोन-इंटीग्रेटेड यूनिट बनाया गया है। यहां हर जवान को ड्रोन उड़ाने की ट्रेनिंग दी जाती है...

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📍नई दिल्ली | 17 Jan, 2026, 7:05 AM

Bhairav Battalion vs Para SF: इस साल जयपुर में हुई आर्मी डे पर कई नए हथियारों के साथ भैरव लाइट कमांडो बटालियन के जवान भी कदमताल करते दिखे। परेड में राजपूताना राइफल्स और सिख लाइट इन्फैंट्री से जुड़े इन विशेष कंटिंजेंट्स ने पहली बार परेड में हिस्सा लिया। वहीं गणतंत्र दिवस परेड में भी ये लोगों का ध्यान आकर्षित करेंगे। उनकी वर्दी, चाल और सबसे ज्यादा चर्चा में रहा उनका इनसिग्निया, जिसमें नाग वासुकी और कमांडो डैगर बना हुआ है। यहीं से लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि क्या ये नई यूनिट पैरा स्पेशल फोर्सेस जैसी है? क्या भैरव बटालियन पैरा एसएफ की जगह ले रही है या दोनों की भूमिका अलग है?

असलियत यह है कि पैरा एसएफ और भैरव बटालियन दोनों अलग-अलग जरूरतों के लिए बनाई गई यूनिट्स हैं। दोनों की ट्रेनिंग, काम करने का तरीका और ऑपरेशनल रोल अलग है। इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा और देखना होगा कि भारतीय सेना ने यह बदलाव क्यों किए। (Bhairav Battalion vs Para SF)

Bhairav Battalion vs Para SF: भारतीय सेना की सबसे पुरानी और खतरनाक स्पेशल यूनिट

पैरा स्पेशल फोर्सेस, जिन्हें आमतौर पर पैरा एसएफ कहा जाता है, भारतीय सेना की सबसे अनुभवी और घातक यूनिट मानी जाती है। इसकी जड़ें दूसरे विश्व युद्ध तक जाती हैं। आजादी के बाद इसे पैराशूट रेजिमेंट के तहत संगठित किया गया।

पैरा एसएफ का मुख्य काम होता है दुश्मन की जमीन में घुसकर डीप स्ट्राइक, क्रॉस बॉर्डर रेड, काउंटर टेररिज्म, सर्जिकल स्ट्राइक, होस्टेज रेस्क्यू और स्पेशल रिकॉनिसेंस जैसे मिशन करना। ये वही यूनिट है जिसने म्यांमार में उग्रवादी ठिकानों पर कार्रवाई की, एलओसी के पार सर्जिकल स्ट्राइक की और कई गुप्त ऑपरेशन अंजाम दिए।

पैरा एसएफ के बारे में कहा जाता है कि उन्हें मौत से मुंह मोड़ना नहीं, बल्कि उसका सामना करना सिखाया जाता है। पैरा एसएफ के जवान खुद को “फैंटम” या “घोस्ट ऑपरेटर्स” कहते हैं क्योंकि वो बिना ट्रेस के आते-जाते हैं। उन्हें शत्रुजीत यानी “शत्रुओं का विजेता” भी कहा जाता है, जो दर्शाता है कि दुश्मन को हर हाल में जीतना है।

पैरा एसएफ की पहचान उसकी मैरून बेरेट और बलिदान बैज से होती है, जो हर किसी को नहीं मिलती। (Bhairav Battalion vs Para SF)

पैरा एसएफ की ट्रेनिंग: सबसे मुश्किल चयन प्रक्रिया

पैरा एसएफ में जाना आसान नहीं होता। सेना के किसी भी हिस्से से जवान इसके लिए वॉलंटियर कर सकता है, लेकिन असली चुनौती इसके बाद शुरू होती है। सबसे पहले होता है प्रोबेशन पीरियड, जो करीब 90 दिन का होता है। इसमें जवानों को बेहद कठिन फिजिकल और मेंटल टेस्ट से गुजरना पड़ता है। नींद की कमी, कम खाना, लंबी दौड़, भारी वजन के साथ मार्च, पहाड़, जंगल और रेगिस्तान सब कुछ झेलना पड़ता है। इस दौरान 80 से 85 फीसदी जवान हिम्मत हार कर बाहर हो जाते हैं।

जो जवान इस चरण को पार करता है, उसे आगे जंगल वॉरफेयर, माउंटेन वॉरफेयर, डेजर्ट ऑपरेशंस, कॉम्बैट फ्री फॉल, डाइविंग, हेलिबोर्न ऑपरेशन जैसी एडवांस ट्रेनिंग दी जाती है। पूरी ट्रेनिंग को पूरा होने में 9 से 12 महीने तक लगते हैं। (Bhairav Battalion vs Para SF)

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भैरव बटालियन: आधुनिक युद्ध के लिए नई सोच

अब बात करते हैं भैरव लाइट कमांडो बटालियन की। यह करीब 250 सैनिकों की टीम है। यह यूनिट 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद शुरू हुई भारतीय सेना की ट्रांसफॉर्मेशन योजना का हिस्सा है। पिछले कुछ सालों में हुए युद्धों, खासकर रूस-यूक्रेन युद्ध और ड्रोन वारफेयर से सेना ने सीखा कि हर काम के लिए स्पेशल फोर्स भेजना जरूरी नहीं।

कुख सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा है कि ये घातक प्लाटून और पैरा कमांडोज के बीच एक गैप था, जिसे भरना जरूरी था। जिसके बाद भैरव कमांडोज अस्तित्व में आए।

भारतीय सेना को सीमा पर ऐसे यूनिट्स चाहिए थे जो बहुत तेज हों, टेक्नोलॉजी से लैस हों, कम समय में हमला कर सकें, साथ ही ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और हाइब्रिड थ्रेट से भी निपट सकें। इसी जरूरत को देखते भैरव बटालियन का जन्म हुआ। (Bhairav Battalion vs Para SF)

भैरव नाम और नाग वासुकी का महत्व

भैरव भगवान शिव का ही एक रूप है, जो निर्भीकता और अजेयता का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव के गले में हमेशा नाग वासुकी रहता है। यही वजह है कि भैरव बटालियन के इनसिग्निया में नाग वासुकी और कमांडो डैगर को शामिल किया गया है। इस यूनिट का मोटो है- “अदृश्य और अदम्य”, यानी जो दिखे नहीं और जिसे रोका न जा सके।

भैरव बटालियन का स्ट्रक्चर

भैरव बटालियन पैरा एसएफ से साइज में छोटी होती है। एक बटालियन में करीब 200 से 250 जवान, 7 से 8 अधिकारी होते हैं। इनका मकसद है लीन और मोबाइल यूनिट बनाना, जो जल्दी मूव कर सके। इनकी तैनाती ज्यादातर एलएसी, एलओसी और संवेदनशील बॉर्डर सेक्टरों में की जा रही है।

भैरव बटालियन के लिए जवानों का चयन बेहद सोच-समझकर किया जाता है। सेना की अलग-अलग शाखाओं जैसे इन्फैंट्री, आर्टिलरी, एयर डिफेंस और सिग्नल्स से हैंडपिक्ड जवान चुने जाते हैं। चयन के दौरान फिजिकल फिटनेस के साथ-साथ मानसिक मजबूती पर भी खास ध्यान दिया जाता है। ऐसे जवानों को प्राथमिकता दी जाती है जिन्होंने पहले घाटक प्लाटून, कमांडो कोर्स, माउंटेन वॉरफेयर या जंगल वॉरफेयर जैसी कठिन ट्रेनिंग में अच्छा प्रदर्शन किया हो। (Bhairav Battalion vs Para SF)

“सन्स ऑफ द सॉइल” कॉन्सेप्ट

भैरव बटालियन की एक खास बात है लोकल रिक्रूटमेंट। इसे सेना ने “सन्स ऑफ द सॉइल” पॉलिसी कहा है। जैसे राजस्थान सेक्टर में तैनात यूनिट में रेगिस्तान से परिचित जवान, और नॉर्थ ईस्ट में वहां के इलाके को समझने वाले सैनिक। खास बात ये है कि इसे अलग-अलग इलाक़े की ज़रूरतों के लिए कई तरह से तैयार किया गया है। रेगिस्तानी इलाके के लिये अलग भैरव बटालियन है तो जम्मू कश्मीर के लिये अलग और लद्दाख जैसे एरिया के लिये अलग। इससे जवानों को मौसम, जमीन और स्थानीय हालात समझने में फायदा मिलता है। ताकि स्थानीय इलाके से जुड़े जवानों को उसी क्षेत्र में तैनात किया जा सके।

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भैरव बटालियन मॉडर्न वॉरफेयर में मल्टी डोमेन ऑपरेंशन करना वाली फोर्स है। जिसे पांच महीने पहले ही तैयार किया गया है। (Bhairav Battalion vs Para SF)

भैरव बटालियन की ट्रेनिंग: स्पीड और टेक्नोलॉजी पर फोकस

भैरव लाइट कमांडो बटालियन की ट्रेनिंग भारतीय सेना की अब तक की सबसे आधुनिक और तेजी से तैयार की जाने वाली स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग मानी जा रही है। इस यूनिट की ट्रेनिंग को इस तरह डिजाइन किया गया है कि जवान बहुत कम समय में पूरी तरह ऑपरेशनल बन जाएं। आमतौर पर इसकी ट्रेनिंग तीन से चार महीने में पूरी कराई जाती है। शुरुआती दो से तीन महीने जवानों को इन्फैंट्री स्कूल महू, हाई एल्टीट्यूड वॉरफेयर स्कूल और काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वॉरफेयर स्कूल जैसे संस्थानों में रखा जाता है, जहां उन्हें बेसिक स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद करीब एक महीने के लिए इन जवानों को पैरा स्पेशल फोर्सेस यूनिट्स के साथ अटैच किया जाता है, ताकि उन्हें रियल ऑपरेशनल माहौल में काम करने का अनुभव मिल सके। (Bhairav Battalion vs Para SF)

इनकी ट्रेनिंग का फोकस

ऑपरेशनल ट्रेनिंग के दौरान भैरव बटालियन को क्रॉस बॉर्डर रेड, क्विक हिट एंड रन ऑपरेशन, काउंटर टेररिज्म और रैपिड इंसर्शन जैसे मिशनों के लिए तैयार किया जाता है। हेलिकॉप्टर के जरिए तेजी से उतारना, जमीन या पानी के रास्ते घुसपैठ करना और सीमित समय में मिशन पूरा कर वापस लौटना इस यूनिट की खास पहचान है। इन सभी क्षमताओं को एक्सरसाइज अखंड प्रहार जैसी सैन्य कवायदों में परखा भी जा चुका है, जहां रियल टाइम ऑपरेशनल वैलिडेशन किया गया। (Bhairav Battalion vs Para SF)

शेर, ड्रैगुनोव जैसे हथियारों से लैस

फिजिकल और मेंटल ट्रेनिंग के स्तर पर भैरव कमांडोज को बेहद कठिन परिस्थितियों में तैयार किया जाता है। इन्हें ऊंचे पहाड़ी इलाकों, रेगिस्तानी क्षेत्रों, घने जंगलों और रात के अंधेरे में ऑपरेशन करने की ट्रेनिंग दी जाती है। स्मोक कवर के बीच मूवमेंट, स्टेल्थ तरीके से आगे बढ़ना और अचानक हमला करना इनकी ट्रेनिंग का अहम हिस्सा है। जवानों को आधुनिक हथियारों जैसे क्लोज कॉम्बेट के लिये एके-203 राइफल, 1500 मीटर तक मार करने वाले ड्रैगुनोव स्नाइपर, लंबी दूरी तक दुश्मन के बड़े हथियारों को बर्बाकरने द वाले रॉकेट लांचर कार्ल गुस्ताफ रीकॉइललेस गन, एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल और मॉर्टार सिस्टम के इस्तेमाल में भी पारंगत बनाया जाता है। (Bhairav Battalion vs Para SF)

ड्रोन वारफेयर: भैरव की सबसे बड़ी ताकत

भैरव कमांडोज की ट्रेनिंग का सबसे बड़ा फोकस ड्रोन वॉरफेयर पर है। इसीलिए इसे पूरी तरह से ड्रोन-इंटीग्रेटेड यूनिट बनाया गया है। यहां हर जवान को ड्रोन उड़ाने की ट्रेनिंग दी जाती है। सेना पहले ही 1 लाख से ज्यादा ड्रोन ऑपरेटर्स तैयार कर चुकी है।

सेना का नया सिद्धांत यह है कि ड्रोन किसी एक स्पेशलिस्ट तक सीमित न रहें, बल्कि हर सैनिक उन्हें इस्तेमाल कर सके। सर्विलांस ड्रोन, एफपीवी ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और ड्रोन स्वार्म जैसी तकनीकों को ट्रेनिंग का हिस्सा बनाया गया है। जवानों को यह सिखाया जाता है कि कैसे ड्रोन के जरिए दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी जाए, टारगेट की पहचान की जाए और जरूरत पड़ने पर तुरंत स्ट्राइक की जाए।

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जवानों को न केवल सर्विलांस बल्कि काउंटर ड्रोन ऑपरेशन की भी ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक जामिंग, ड्रोन को निष्क्रिय करना और दुश्मन के यूएएस सिस्टम को बेअसर करना शामिल है। इसके अलावा ड्रोन से मिले इनपुट को सीधे ग्राउंड ऑपरेशन से जोड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि टारगेट मिलने के बाद कार्रवाई में देरी न हो। (Bhairav Battalion vs Para SF)

पैरा एसएफ और भैरव बटालियन में असली फर्क

पैरा एसएफ जहां स्ट्रैटेजिक और डीप ऑपरेशन करती है, वहीं भैरव बटालियन टैक्टिकल और ऑपरेशनल लेवल पर काम करती है। पैरा स्पेशल फोर्सेस और भैरव बटालियन के बीच यही सबसे बड़ा अंतर है। पैरा एसएफ जहां रणनीतिक स्तर के, अंदर तक जाकर किए जाने वाले ऑपरेशंस के लिए जानी जाती है, वहीं भैरव बटालियन को टैक्टिकल और ऑपरेशनल लेवल पर तेजी से जवाब देने के लिए खड़ा किया गया है। भैरव कमांडोज का मकसद है सीमा पर उभरते खतरे को तुरंत दबाना, ताकि हालात बड़े टकराव में न बदलें और पैरा एसएफ जैसी यूनिट्स को बड़े और संवेदनशील मिशनों के लिए फ्री रखा जा सके।

कुल मिला कर पैरा एसएफ को तभी भेजा जाता है जब मिशन बहुत बड़ा और संवेदनशील हो। वहीं, भैरव बटालियन का काम है सीमा पर तुरंत जवाब, जिससे हालात बिगड़ने से पहले काबू में आ जाएं। (Bhairav Battalion vs Para SF)

Bhairav Battalion vs Para SF: क्यों जरूरी थी भैरव बटालियन?

पिछले कुछ सालों में देखा गया कि हर छोटी घुसपैठ या रेड के लिए पैरा एसएफ भेजना सही नहीं। इससे उनकी स्ट्रैटेजिक क्षमता पर असर पड़ता है।

भैरव बटालियन इस गैप को भरती है। ये यूनिट्स “फाइट टुनाइट” कॉन्सेप्ट पर काम करती हैं, यानी आदेश मिला और तुरंत कार्रवाई। जहां स्पीड, सरप्राइज, टेक्नोलॉजी और स्थानीय समझ को एक साथ जोड़कर दुश्मन पर बढ़त हासिल की जा सकती है।

2026 तक करीब 15 से ज्यादा भैरव बटालियन ऑपरेशनल हो चुकी हैं। कुल मिलाकर 23 से 25 बटालियन बनाने की योजना है। ये यूनिट्स रुद्र ब्रिगेड जैसे नए स्ट्रक्चर का हिस्सा होंगी, जहां इन्फैंट्री, ड्रोन और सपोर्ट यूनिट्स एक साथ काम करेंगी। भैरव की क्षमता देखते हुए इसे फिलहाल उत्तरी और पश्चिमी सीमा पर तैनात कर दिया गया है। (Bhairav Battalion vs Para SF)

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  • क्या नाग चिन्ह वाले भैरव कमांडोज ले रहे हैं पैरा स्पेशल फोर्सेस की जगह? जानिए दोनों में असली फर्क

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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