📍नई दिल्ली | 24 Aug, 2025, 12:42 PM
Rashtriya Rifles in Jammu Kashmir: जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था में केंद्र सरकार एक बड़े बदलाव पर विचार कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार चाहती है कि भारतीय सेना की विशेष आतंकवाद-रोधी इकाई राष्ट्रीय राइफल्स (Rashtriya Rifles – RR) को घाटी के शहरी और ग्रामीण इलाकों से हटाकर अंतरराष्ट्रीय सीमा और एलओसी पर तैनात किया जाए। वहीं, आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) को सौंपी जाए।
सूत्रों के मुताबिक रक्षा मंत्रालय और गृह मंत्रालय के बीच इस मुद्दे पर लगातार बैठकें हो रही हैं। हालांकि अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम जम्मू-कश्मीर की बदलती परिस्थितियों के मद्देनजर एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव साबित होगा।
Rashtriya Rifles in Jammu Kashmir: पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़ी चर्चा
अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की थी। जांच में सामने आया कि इस हमले में शामिल आतंकवादी सीमा पार से कुछ महीने पहले ही घुसपैठ करके आए थे। इसके बाद सरकार की राय बनी कि सीमाओं की सुरक्षा में प्रशिक्षित राष्ट्रीय राइफल्स को एलओसी और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तैनात करना चाहिए।
सुरक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि सेना की ताकत का इस्तेमाल सीमा की सुरक्षा के लिए करना अधिक उचित है, जबकि आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने के लिए अर्धसैनिक बलों को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।
Rashtriya Rifles in Jammu Kashmir: स्थानीय लोगों की है मांग
सूत्रों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर की मौजूदा स्थिति को देखते हुए आंतरिक सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ सबसे उपयुक्त विकल्प है। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय राइफल्स सीमा की सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित हैं, जबकि सीआरपीएफ देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है। यह बदलाव एक संतुलित कदम होगा।”
रक्षा मामलों से जुड़े जानकारों का मानना है कि केवल सीआरपीएफ ही नहीं बल्कि सीमा सुरक्षा बल (BSF) को भी जम्मू-कश्मीर की आंतरिक सुरक्षा में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “बीएसएफ ने 1990 के दशक में कश्मीर में आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाई थी। इसलिए सरकार को बीएसएफ की तैनाती पर भी विचार करना चाहिए।”
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DRDO has successfully carried out the maiden flight-tests of the Integrated Air Defence Weapon System (IADWS) off Odisha’s coast.
The IADWS brings together Quick Reaction Surface-to-Air Missiles (QRSAM), Very Short Range Air Defence… pic.twitter.com/1stZ97t5pU— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 24, 2025
घाटी के स्थानीय लोग और नेताओं की अक्सर मांग रही है कि इस इलाके को केवल सुरक्षा के नजरिए से न देखा जाए। अब सरकार का दावा है कि स्थिति बदल गई है, इसलिए सेना को आंतरिक ड्यूटी से हटाकर सीमा पर लगाया जा रहा है। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब किसी भी कानून-व्यवस्था की समस्या से निपटने में सक्षम हैं। वहीं अब आतंकवाद संबंधी घटनाओं में कमी आने से सरकार का फोकस सीमा सुरक्षा पर शिफ्ट हो रहा है।
सेना की विशेष विशेष काउंटर-इंसरजेंसी फोर्स है आरआर
राष्ट्रीय राइफल्स की स्थापना 1990 के दशक में उस समय की गई थी जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद तेजी से फैल रहा था। यह यूनिट भारतीय सेना के जवानों से बनी एक विशेष काउंटर-इंसरजेंसी फोर्स है, जिसने घाटी में आतंकवाद से निपटने में अहम भूमिका निभाई। कारगिल युद्ध के बाद मंत्रियों के एक समूह ने सिफारिश की थी कि सीमा सुरक्षा बल (BSF) को अपनी प्राथमिक भूमिका यानी सीमाओं की रक्षा पर केंद्रित किया जाए और जम्मू-कश्मीर में आंतरिक सुरक्षा का दायित्व सीआरपीएफ को सौंपा जाए। इसी रणनीति के तहत 2005 के आसपास सीआरपीएफ ने बीएसएफ की जगह पूरी तरह से ले ली थी। अब सरकार एक बार फिर सुरक्षा ढांचे में बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है।
हर साल छिड़ती है बहस
राष्ट्रीय राइफल्स की स्थापना 1990 में हुई थी, और तब से पिछले 25 सालों में इसकी तैनाती को कम करने पर कई बहसें हुईं। 2011 से 2016 के बीच भारतीय सेना ने शहरों और गांवों से अपनी मौजूदगी कम करने की कोशिश की, जहां जिम्मेदारी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस को शिफ्ट करने की बात थी। इसकी वजह थी कि राष्ट्रीय राइफल्स मुख्य रूप से इन्फैंट्री बटालियनों से बनी है, और लंबे समय तक आंतरिक सुरक्षा में लगे रहने से सेना पर बोझ पड़ता है।
2022 में भी राष्ट्रीय राइफल्स की संख्या कम करने पर चर्चा हुई। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना था कि कश्मीर घाटी में आतंकवाद संबंधी घटनाओं में कमी आई है, और ओवर ग्राउंड नेटवर्क कमजोर हुए हैं। अनुच्छेद 370 हटने के बाद पर्यटन बढ़ा, व्यापार सुधरा, और सामान्य स्थिति की ओर कदम बढ़े, जिससे केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राइफल्स की मौजूदगी कम करने पर विचार किया। हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि अचानक बड़ा बदलाव नहीं करना चाहिए, क्योंकि सुरक्षा चुनौतियां बनी रह सकती हैं।
2023 की शुरुआत में सरकार ने कश्मीर घाटी के अंदरूनी इलाकों से सेना, जिसमें राष्ट्रीय राइफल्स शामिल है, को चरणबद्ध तरीके से हटाने पर विचार किया। यह चर्चा करीब दो साल से चल रही थी और एडवांस लेवल तक पहुंच गई थी। प्रस्ताव था कि सेना को सिर्फ नियंत्रण रेखा तक सीमित रखा जाए, और आंतरिक सुरक्षा सीआरपीएफ को सौंपी जाए। राष्ट्रीय राइफल्स की 63 बटालियनों को कम करके तीन चरणों में बदलाव करने की योजना थी, जिसमें हर बटालियन से दो कंपनियां कम की जातीं। इसका आधार था कि 2019 के बाद आतंकवाद में 50 फीसदी कमी आई है, लेकिन अंतिम फैसला राजनीतिक स्तर पर होना था।
उसी साल मई में जम्मू क्षेत्र से राष्ट्रीय राइफल्स की चरणबद्ध वापसी की योजना बनी, जहां तीन काउंटर-इंसर्जेंसी फोर्सेस डेल्टा फोर्स, रोमियो फोर्स और यूनिफॉर्म फोर्स की जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों को सौंपनी थी। लेकिन सीमा पार से हो रहे आतंकी हमलों की वजह से यह योजना अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। उस साल 17 हत्याएं हुईं, राजौरी और पुंछ में हमले हुए जिसमें सेना के जवान भी शामिल थे।
क्या कहते हैं गृह मंत्रालय के ताजा आंकड़े
गृह मंत्रालय के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में पिछले पांच सालों में आतंकवादी घटनाओं में 70 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। 2019 में आतंकवाद से जुड़ी 286 घटनाएं हुई थीं, जबकि 2024 में यह संख्या घटकर केवल 40 रह गई। इसी अवधि में सुरक्षा बलों पर हमलों की संख्या भी 96 से घटकर 5 रह गई। नागरिकों की हत्याओं के मामलों में भी उल्लेखनीय कमी आई है। 2019 में सुरक्षाकर्मियों की 77 हत्याएं हुई थीं, जबकि 2024 में यह आंकड़ा घटकर केवल सात रह गया।
चरणबद्ध बदलाव की योजना
सूत्रों के अनुसार सरकार की योजना है कि जम्मू और कश्मीर के कई जिलों से धीरे-धीरे राष्ट्रीय राइफल्स की टुकड़ियों को हटाया जाए और उनकी जगह सीआरपीएफ की बटालियनों को तैनात किया जाए। सीआरपीएफ के एक अधिकारी ने बताया कि उनकी यूनिट्स आधुनिक उपकरणों से लैस हैं और स्थानीय समुदाय के साथ बेहतर तालमेल रखती हैं। जम्मू क्षेत्र में तीन बटालियनों की तैनाती इसी रणनीति का पहला कदम है। उदयपुर और कठुआ में राष्ट्रीय राइफल्स की यूनिटों को हटाकर सीआरपीएफ को सौंपा जाएगा, जिससे आतंकियों की घुसपैठ को रोकने में सेना को नियंत्रण रेखा पर मजबूती मिलेगी। प्रत्येक बटालियन में लगभग 800 जवान होते हैं। माना जा रहा है कि यह बदलाव धीरे-धीरे कश्मीर घाटी तक भी पहुंचेगा। इससे राष्ट्रीय राइफल्स को पूरी तरह से एलओसी और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लगाया जा सकेगा।