📍नई दिल्ली | 26 Mar, 2026, 3:45 PM
Strait of Hormuz Crisis: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान द्वारा इस रास्ते पर सख्ती बढ़ाने के बाद जहाजों की आवाजाही आसान नहीं रह गई है। कई जहाज फंसे हुए हैं और वैश्विक तेल बाजार में हलचल देखी जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इसी रास्ते से सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, इराक और ईरान जैसे देशों से तेल और गैस की सप्लाई होती है। दुनिया की कुल तेल और एलएनजी सप्लाई का करीब 20 से 25 फीसदी हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
हर दिन लगभग 20 से 21 मिलियन बैरल तेल इस रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े देश इसी रास्ते पर निर्भर हैं। भारत के लिए यह रास्ता और भी अहम है, क्योंकि देश अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से मंगाता है।
Strait of Hormuz Crisis: ईरान की सख्ती से बढ़ी दिक्कतें
हाल के दिनों में ईरान ने इस रास्ते पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। उसने साफ कर दिया है कि केवल वही जहाज इस रास्ते से गुजर सकते हैं, जिन्हें उसकी मंजूरी मिली हो। बताया जा रहा है कि ईरान उन देशों के जहाजों को प्राथमिकता दे रहा है, जिनसे उसके अच्छे संबंध हैं, और भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें गुजरने की अनुमति दी गई है।
ईरान ने यह भी चेतावनी दी है कि बिना अनुमति के आने वाले जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। इसी वजह से अब कोई भी जहाज बिना अनुमति के इस रास्ते से गुजरने की हिम्मत नहीं कर रहा है।
संकरे रास्ते से बढ़ा जोखिम
होर्मुज जलडमरूमध्य बहुत संकरा है। इसके सबसे पतले हिस्से में जहाजों के आने-जाने के रास्ते की चौड़ाई तीन किलोमीटर से भी कम है। जहाजों के लिए अलग-अलग लेन बनाई गई हैं ताकि टक्कर न हो।
लेकिन इस संकरे रास्ते की वजह से हर जहाज को ईरान के तटीय क्षेत्र के बेहद करीब से गुजरना पड़ता है। इससे ईरान के लिए हर जहाज पर नजर रखना आसान हो जाता है। यही कारण है कि यहां से गुजरना अब पहले जैसा आसान नहीं रहा।
वहीं, तनाव बढ़ने के बाद इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी कमी आई है। पहले रोजाना लगभग 130 से 140 जहाज इस रास्ते से गुजरते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर 5 से 6 जहाज प्रतिदिन रह गई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह करीब 95 प्रतिशत की गिरावट है, जो अभूतपूर्व मानी जा रही है। इसके चलते हजारों जहाज इस रास्ते के आसपास फंसे हुए हैं और सुरक्षित रास्ता मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
मंजूरी के बिना नहीं मिल रही एंट्री
अब इस रास्ते से गुजरने के लिए जहाजों को पहले से अनुमति लेनी पड़ रही है। इसके लिए शिपिंग कंपनियों को ईरान से जुड़े अधिकारियों को जहाज की पूरी जानकारी देनी होती है। इसमें जहाज की पहचान, मालिक, माल, गंतव्य और क्रू से जुड़ी जानकारी शामिल होती है।
इन सभी दस्तावेजों की गहराई से जांच की जाती है। इसके बाद ही तय होता है कि जहाज को आगे बढ़ने की अनुमति दी जाएगी या नहीं। खास तौर पर तेल और गैस ले जाने वाले जहाजों को प्राथमिकता दी जा रही है।
आईआरजीसी की निगरानी में पूरा सिस्टम
इस पूरे सिस्टम की निगरानी आईआरजीसी कर रहा है। यही संगठन तय करता है कि कौन सा जहाज इस रास्ते से गुजर सकता है। जब किसी जहाज को अनुमति मिल जाती है, तो उसे एक विशेष कोड दिया जाता है और आगे बढ़ने के निर्देश दिए जाते हैं। जैसे ही जहाज संकरे हिस्से के पास पहुंचता है, उससे रेडियो के जरिए संपर्क किया जाता है और उसकी पहचान की पुष्टि की जाती है। इसके बाद पेट्रोल बोट्स उस जहाज को एस्कॉर्ट करते हुए आगे ले जाती हैं, ताकि वह सुरक्षित तरीके से इस रास्ते को पार कर सके।
ट्रांजिट चार्ज को लेकर भी चर्चा
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि इस रास्ते से गुजरने के लिए भारी शुल्क लिया जा रहा है। विदेशी मीडिया में इसे “तेहरान टोल बूथ” तक कहा गया है। बताया गया है कि कुछ जहाजों से सुरक्षित रास्ता देने के बदले बड़ी रकम मांगी जा रही है। हालांकि ईरान ने इन दावों को खारिज कर दिया है। फिर भी यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि इस रास्ते से गुजरना अब महंगा और जटिल हो गया है।
भारत पर भी सीधा असर
भारत इस रास्ते पर काफी हद तक निर्भर है। देश अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से मंगाता है। इसके अलावा एलएनजी की सप्लाई भी इसी रास्ते से होती है।
हालांकि मौजूदा स्थिति में भारत के जहाजों को गुजरने की अनुमति मिली हुई है, लेकिन पूरे क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण चिंता बनी हुई है। शिपिंग कंपनियां भी सावधानी बरत रही हैं और कई जहाज सुरक्षित रास्ते का इंतजार कर रहे हैं।
लंबी कतार में खड़े जहाज
तनाव बढ़ने के बाद इस रास्ते के दोनों ओर जहाजों की लंबी कतार लग गई है। कई जहाज कई दिनों से इंतजार कर रहे हैं कि कब उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति मिलेगी।
अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों के मुताबिक, हजारों जहाज इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं। इससे यह साफ है कि स्थिति सामान्य नहीं है और आवाजाही पर बड़ा असर पड़ा है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर वैश्विक बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। तेल की कीमतों में तेजी आई है और सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। कई देशों में ऊर्जा संकट की स्थिति बनने लगी है। जहाजों की आवाजाही रुकने से न केवल तेल और गैस, बल्कि अन्य सामान की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर पड़ रहा है।

