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ट्रंप के सलाहकार क्यों चाहते हैं ईरान युद्ध का ‘एग्जिट प्लान’? असली संकट तेल नहीं, बल्कि ये है

रिपोर्ट के अनुसार सलाहकारों को डर है कि अगर यह युद्ध लंबा चला तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और इसका राजनीतिक असर भी अमेरिका की घरेलू राजनीति पर पड़ सकता है...

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📍नई दिल्ली | 10 Mar, 2026, 12:58 PM

Iran war oil crisis: अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को हिला कर रख दिया है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ करीबी सलाहकार उन्हें ईरान युद्ध से निकलने की रणनीति तैयार करने की सलाह दे रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार सलाहकारों को डर है कि अगर यह युद्ध लंबा चला तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और इसका राजनीतिक असर भी अमेरिका की घरेलू राजनीति पर पड़ सकता है। खासकर 2026 के चुनावों के लिहाज से यह मुद्दा ट्रंप प्रशासन के लिए परेशानी बन सकता है।

हालांकि ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर इस तरह की किसी भी जल्दबाजी से इनकार किया है। उनका कहना है कि ईरान के खिलाफ चल रहा सैन्य अभियान “काफी हद तक पूरा हो चुका है” और यह उनकी शुरुआती योजना से भी आगे बढ़ चुका है।

व्हाइट हाउस ने भी यह साफ किया है कि फिलहाल किसी तत्काल युद्ध समाप्ति योजना की जरूरत नहीं है। लेकिन इसके बावजूद अंदरखाने चल रही चर्चाओं ने एक नई बहस छेड़ दी है। (Iran war oil crisis)

Iran war oil crisis: तेल की कीमतों में अचानक गिरावट

ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल देखी गई थी। कुछ ही दिनों में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। लेकिन हाल ही में यह कीमत अचानक गिरकर 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई। इस गिरावट के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं।

पहला कारण यह है कि जी-7 देशों ने रणनीतिक तेल भंडार के इस्तेमाल पर चर्चा शुरू कर दी है। अगर जरूरत पड़ी तो ये देश अपने स्ट्रैटेजिक ऑयल रिजर्व बाजार में उतार सकते हैं।

दूसरा कारण ट्रंप की हाल की बयानबाजी है, जिसमें उन्होंने कहा कि यह युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलेगा।

तीसरा कारण ईरान की तरफ से आया एक संकेत है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी आईआरजीसी ने संकेत दिया है कि अगर कुछ शर्तें पूरी होती हैं तो हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोला जा सकता है।

इन तीनों संकेतों के बाद बाजार में राहत की देखी गई और तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। (Iran war oil crisis)

लेकिन असली समस्या तेल नहीं, इंश्योरेंस है

कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे संकट को सिर्फ तेल की कीमतों के नजरिए से देखना एक बड़ी गलती हो सकती है। तेल की कीमतें अक्सर राजनीतिक बयान और खबरों के आधार पर ऊपर-नीचे होती रहती हैं। लेकिन समुद्री व्यापार और तेल आपूर्ति को नियंत्रित करने वाली असली व्यवस्था कहीं ज्यादा जटिल है।

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दरअसल हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज मरीन इंश्योरेंस होती है। अगर जहाजों को इंश्योरेंस कवर नहीं मिलता तो वे उस रास्ते से गुजर ही नहीं सकते।

यहीं से शुरू होता है इस संकट का असली आर्थिक पहलू।

सात बड़ी इंश्योरेंस कंपनियों का फैसला

मार्च की शुरुआत में दुनिया की सात बड़ी पी-एंड-आई क्लब्स ने एक बड़ा फैसला लिया। इन कंपनियों ने हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के लिए वॉर-रिस्क इंश्योरेंस कवरेज बंद कर दिया। ये कंपनियां वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 90 प्रतिशत इंश्योरेंस कवर देती हैं। इनमें गार्ड, स्कुल्ड, नॉर्थस्टैंडर्ड, लंदन पी-एंड-आई क्लब, स्टीमशिप म्यूचुअल, अमेरिकन क्लब और स्वीडिश क्लब जैसी कंपनियां शामिल हैं।

इन कंपनियों का कहना था कि मौजूदा युद्ध की स्थिति में जोखिम इतना ज्यादा बढ़ गया है कि इंश्योरेंस जारी रखना संभव नहीं है। (Iran war oil crisis)

क्या है सॉल्वेंसी-II

इस फैसले के पीछे एक बड़ा कारण यूरोपीय यूनियन का सॉल्वेंसी-II रेगुलेशन है। यह नियम यह तय करता है कि इंश्योरेंस कंपनियों के पास संभावित नुकसान को कवर करने के लिए कितना पूंजी भंडार होना चाहिए।

इस नियम के तहत मरीन वॉर इंश्योरेंस में जोखिम की गणना बहुत सख्ती से की जाती है। अगर किसी इलाके में युद्ध चल रहा हो तो कंपनियों को बहुत ज्यादा पूंजी रिजर्व रखना पड़ता है।

ईरान युद्ध के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट में हमलों, ड्रोन हमलों और जहाजों पर हमलों की घटनाएं तेजी से बढ़ गईं। इससे इंश्योरेंस कंपनियों के लिए जोखिम का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ गया।

कई कंपनियों के लिए यह स्थिति उनके पूंजी नियमों का उल्लंघन करने जैसी हो गई। इसलिए उन्होंने कवरेज वापस लेने का फैसला किया। (Iran war oil crisis)

युद्ध खत्म होने पर भी तुरंत नहीं लौटेगा व्यापार

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर युद्ध कल खत्म भी हो जाए तो भी हॉर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का सामान्य व्यापार तुरंत शुरू नहीं होगा। इंश्योरेंस कंपनियों को अपने जोखिम मॉडल को फिर से अपडेट करना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार इसके लिए कम से कम 12 से 24 महीने का समय लग सकता है। इस दौरान उन्हें यह देखना होगा कि क्षेत्र में हमले पूरी तरह बंद हुए हैं या नहीं और जहाजों के लिए जोखिम कितना कम हुआ है।

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यानी युद्ध राजनीतिक रूप से खत्म हो सकता है, लेकिन आर्थिक असर काफी लंबे समय तक बना रह सकता है।

तेल बाजार इस खतरे को समझ रहा है

तेल की कीमतें इस जोखिम को पहले ही ध्यान में रख चुकी हैं। यही वजह है कि कीमतें गिरने के बावजूद अभी भी युद्ध से पहले के स्तर तक नहीं पहुंची हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान कीमतों में लगभग 20 से 25 डॉलर प्रति बैरल का अतिरिक्त प्रीमियम शामिल है। यह प्रीमियम सिर्फ युद्ध का नहीं बल्कि इंश्योरेंस संकट का प्रीमियम है। बाजार यह मानकर चल रहा है कि हॉर्मुज स्ट्रेट से सामान्य व्यापार शुरू होने में काफी समय लग सकता है। (Iran war oil crisis)

हॉर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण

हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता है। अगर यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है तो इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

अमेरिका की सैन्य लागत भी बढ़ रही है

ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान की लागत भी तेजी से बढ़ रही है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार युद्ध के पहले दो दिनों में ही अमेरिका ने करीब 5.6 बिलियन डॉलर के हथियार इस्तेमाल कर लिए। इनमें टॉमहॉक क्रूज मिसाइल, एयर डिफेंस इंटरसेप्टर और अन्य एडवांस्ड प्रिसीजन हथियार शामिल थे। रिपोर्टों के अनुसार अब अमेरिकी सेना महंगे प्रिसीजन हथियारों की बजाय अपेक्षाकृत सस्ते लेजर-गाइडेड बम का इस्तेमाल बढ़ाने की योजना बना रही है। इससे अभियान की लागत कुछ हद तक कम हो सकती है। (Iran war oil crisis)

हथियारों के भंडार को लेकर चिंता

अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने यह चिंता भी जताई है कि लंबे युद्ध से अमेरिका के एडवांस्ड हथियारों का भंडार तेजी से कम हो सकता है। अमेरिका पहले से ही यूक्रेन युद्ध के दौरान बड़ी मात्रा में हथियार भेज चुका है। इसके अलावा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के साथ संभावित टकराव को देखते हुए भी हथियारों का पर्याप्त भंडार जरूरी माना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से थाड एयर डिफेंस सिस्टम के कुछ हिस्सों को मध्य पूर्व भेजने का फैसला किया है। इसके अलावा पैट्रियट मिसाइल सिस्टम की भी अतिरिक्त तैनाती की जा रही है। (Iran war oil crisis)

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वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

ईरान युद्ध का असर केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं है। कई एशियाई और यूरोपीय शेयर बाजारों में भारी गिरावट देखी गई है। कुछ अनुमानों के अनुसार इस संकट के कारण वैश्विक बाजारों से सैकड़ों अरब डॉलर की पूंजी गायब हो चुकी है। इसके अलावा यूरोप में गैस की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी देखी गई है। अगर हॉर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बंद रहता है तो यह संकट और गहरा सकता है। (Iran war oil crisis)

भारत जैसे देशों पर भी असर

भारत जैसे देश भी इस संकट से अछूते नहीं रह सकते। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात करता है। इनमें से बड़ी मात्रा मध्य पूर्व से आती है और उसका एक बड़ा हिस्सा हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आता है। अगर इस मार्ग में अवरोध जारी रहता है तो भारत के लिए तेल की कीमतें और आयात लागत दोनों बढ़ सकती हैं। हालांकि भारत के पास कुछ स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व मौजूद हैं, जो सीमित समय तक आपूर्ति बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

अगर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध का राजनीतिक समाधान भी निकल जाता है, तब भी आर्थिक असर लंबे समय तक जारी रह सकता है। युद्ध को समाप्त करना राजनीतिक निर्णय हो सकता है, लेकिन समुद्री व्यापार और इंश्योरेंस प्रणाली को सामान्य स्थिति में लौटने में समय लगेगा।

यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस संकट की असली समयरेखा राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था तय करेगी। और जब तक इंश्योरेंस बाजार सामान्य नहीं होता, तब तक दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत समुद्री तेल आपूर्ति जोखिम में बनी रह सकती है। (Iran war oil crisis)

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