📍मुंबई | 16 Oct, 2026, 4:22 PM
Project-75i Submarine Deal: भारतीय नौसेना के लिए छह नई एडवांस्ड सबमरीन बनाने वाले प्रोजेक्ट-75(आई) प्रोग्राम में भारत और जर्मनी के बीच बातचीत आगे बढ़ी है। मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) ने 15 अक्टूबर को जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) के वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल से बातचीत की। बैठक में दोनों कंपनियों के बीच कमर्शियल टर्म्स और पार्टनरशिप फ्रेमवर्क पर चर्चा की।
Project-75i Submarine Deal: अंतिम चरण में बातचीत!
TKMS के मुख्य वित्तीय अधिकारी डॉ. माइकल गोएट्ज के नेतृत्व में आए प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी एमडीएल के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर कैप्टन जगमोहन और कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने की। एमडीएल के आधिकारिक अपडेट के मुताबिक, बातचीत में रचनात्मक प्रगति हुई। दोनों कंपनियों ने दीर्घकालिक साझेदारी को मजबूत करने और भारतीय नौसेना के इस रणनीतिक कार्यक्रम पर मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई।
इससे पहले 8 अक्टूबर को जर्मन राजदूत जैस्पर वीक ने रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह से मुलाकात की थी। इस बैठक में भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई, जिसमें प्रोजेक्ट-75(आई) भी शामिल था।
क्या है प्रोजेक्ट-75(आई)?
प्रोजेक्ट-75(आई) भारतीय नौसेना का एक महत्वपूर्ण पनडुब्बी निर्माण कार्यक्रम है। इसके तहत छह नई डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरीन बनाई जानी हैं। इनका निर्माण मुंबई स्थित एमडीएल में होना है, जबकि जर्मनी की टीकेएमएस टेक्नोलॉजीी साझेदार के तौर पर डिजाइन, इंजीनियरिंग और एडवांस टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराने में भूमिका निभाएगी।
इस कार्यक्रम में भारत में पनडुब्बी निर्माण की क्षमता बढ़ाने, आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने और घरेलू रक्षा उद्योग की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। (Project-75i Submarine Deal)
एआईपी टेक्नोलॉजी से होंगी लैस
इस कार्यक्रम की प्रमुख टेक्नोलॉजीी खूबियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी एआईपी सिस्टम शामिल है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को अपनी बैटरियां चार्ज करने के लिए समय-समय पर सतह के करीब आना या स्नॉर्कल की मदद से हवा लेनी पड़ती है। इस दौरान उनके सामने दुश्मन के सेंसरों से पकड़े जाने का जोखिम बढ़ सकता है।
एआईपी टेक्नोलॉजी पनडुब्बी को पानी के भीतर लंबे समय तक काम करने में मदद करती है। इससे उसे बार-बार सतह के करीब आने की जरूरत कम हो सकती है और उसकी गुप्त रूप से काम करने की क्षमता बढ़ती है।
टीकेएमएस के पास फ्यूल-सेल बेस्ड (पॉलीमर इलेक्ट्रोलाइट मेंबरेन) एआईपी टेक्नोलॉजी है। इस टेक्नोलॉजी में ईंधन और ऑक्सीजन के बीच होने वाले कंट्रोल्ड केमिकल प्रोसेस से बिजली पैदा की जाती है। इस बिजली का इस्तेमाल पनडुब्बी के सिस्टम चलाने में किया जा सकता है। (Project-75i Submarine Deal)

टीकेएमएस के डिजाइन पर आधारित होंगी पनडुब्बियां
प्रोजेक्ट-75(आई) के लिए टीकेएमएस के टाइप-212 और टाइप-214 फैमिली से जुड़ी टेक्नोलॉजी को आधार बनाने की चर्चा रही है। हालांकि, भारतीय नौसेना की जरूरतों के मुताबिक प्रस्तावित पनडुब्बियों के डिजाइन और कॉन्फिगरेशन को तैयार करना होगा।
आधुनिक पनडुब्बी की क्षमता केवल उसके आकार या पानी के भीतर रहने की अवधि से तय नहीं होती। उसके सोनार, संचार प्रणाली, नेविगेशन उपकरण, हथियारों और सिग्नेचर मैनेजमेंट का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।
सोनार सिस्टम पानी के भीतर मौजूद अन्य पनडुब्बियों, जहाजों और अलग-अलग गतिविधियों का पता लगाने में मदद करता है। वहीं, कम शोर पैदा करने वाला डिजाइन पनडुब्बी की मौजूदगी का पता लगाना कठिन बना सकता है। हथियार और कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम उसे पहचान किए गए टारगेट के खिलाफ कार्रवाई करने में मदद देते हैं। (Project-75i Submarine Deal)
छह पनडुब्बियों के निर्माण में स्वदेशीकरण पर जोर
प्रोजेक्ट-75(आई) में स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी बढ़ाना भी महत्वपूर्ण लक्ष्य है। इसके तहत पहली पनडुब्बी के लिए कम से कम 45 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री और छठी पनडुब्बी तक इसे 60 प्रतिशत करने का लक्ष्य है।
इसमें उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक्स, केबलिंग, पाइपिंग, सहायक मशीनरी और दूसरे जरूरी सिस्टम के लिए भारतीय कंपनियों की भागीदारी भी शामिल होगी। (Project-75i Submarine Deal)
लागत और मंजूरी की प्रक्रिया
प्रोजेक्ट-75(आई) की अनुमानित लागत लगभग 70,000 करोड़ से 90,000 करोड़ रुपये तक है। प्रोजेक्ट के लिए 2018 में एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी दी गई थी। इसके बाद कॉन्सेप्ट डिजाइन एग्रीमेंट अगस्त 2025 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। इसके बाद सितंबर 2025 से कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन शुरू हुई, जबकि कॉस्ट नेगोशिएशन कमेटी का काम जनवरी 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य था। वहीं, प्रोजेक्ट को मई 2026 में वित्त मंत्रालय की मंजूरी मिल गई है। इसके बाद इस कार्यक्रम को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी सीसीएस की अंतिम मंजूरी और कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत का इंतजार है। (Project-75i Submarine Deal)
कब तक होगी डिलीवरी
वहीं, कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद लगभग दो से तीन साल के भीतर स्टील कटिंग और पनडुब्बी के स्ट्रक्चर का निर्माण शुरू हो जाएगा। इसके बाद बाकी पांच पनडुब्बियों की डिलीवरी लगभग हर साल एक की दर से करने की योजना है। सभी छह पनडुब्बियों की डिलीवरी में कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद लगभग 10 से 12 साल लग सकते हैं। माना जा रहा है कि पहली पनडुब्बी की डिलीवरी 2033-2034 के आसपास और पूरी छह पनडुब्बियों की डिलीवरी 2038-2039 तक होने का अनुमान है। (Project-75i Submarine Deal)
अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियों की खरीद भी शामिल
भारतीय रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने 1 अक्टूबर को कहा था कि प्रोजेक्ट-75(आई) और अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियों की खरीद, दोनों पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट-75(आई) अंतिम चरण में है। इसका प्रस्ताव सक्षम प्राधिकारी के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा जा चुका है। वहीं, अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियों का प्रस्ताव भी विचाराधीन है, लेकिन यह अभी प्रोजेक्ट-75(आई) जितने एडवांस फेज में नहीं पहुंचा है। रक्षा सचिव ने स्पष्ट किया कि इन पनडुब्बियों का निर्माण पूरी तरह भारत में ही किया जाएगा।
इससे पहले, 23 सितंबर 2026 को जर्मनी के राजदूत जैस्पर वीक ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि जर्मनी की ओर से प्रोजेक्ट-75(आई) समझौते पर हस्ताक्षर करने की सभी तैयारियां पूरी हैं। उन्होंने कहा, “जर्मनी की ओर से हम इस पर कल ही हस्ताक्षर कर सकते हैं। अब यह भारत की ओर से लिया जाने वाला फैसला है।” राजदूत के मुताबिक, जर्मनी की तरफ से सभी जरूरी दस्तावेज और मंजूरियां पूरी हो चुकी हैं और अब भारत सरकार के फैसले का इंतजार है। (Project-75i Submarine Deal)
Author
Harendra Chaudhary is active in defence journalism and is associated with RakshaSamachar.com. They have long been covering strategic news, defence policies and national security related issues involving Indian Army, Navy and Air Force. In his career of journalism, Harendra has written detailed articles on Parliament’s activities, military campaigns, India-Pak and India-China border dispute, defence procurement and ‘Make in India’ defence projects. They are known for deep understanding and analytical approach of defense cases.





