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Preparation of countering China’s ‘String of Pearls’! The Indian Navy should have an amphibious aircraft, released the RFI

The biggest USP of the Amphibious Aircraft is that it can operate from the sea, lake and runway, three place. The Navy has cleaned that the aircraft should be able to fly both day and night, both time...

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📍New Delhi | 10 Jan, 2026, 2:00 PM

Indian Navy Amphibious Aircraft RFI: Indian Navy has decided to see the challenge from China in the Indian Ocean. Keeping in mind the operational needs of the Navy, the Ministry of Defence has released the RFI for fixed-wing amphibious aircraft. The Navy needs such four amphibious aircraft. The biggest feature of these aircraft will be that they will be able to take-offs and landings from both sea, lake-like water surfaces and prepared runways. Let’s use Naval Amphibious Aircraft for the first time of 1953.

Naval The move of the Andaman-Nikobar Islands is constantly growing and India’s responsibilities have already exceeded in the Indian Ocean region. The need for such planes was long felt to immediately reach natural disasters, search-saving campaigns and remote islands. Indian Navy Amphibious Aircraft RFI

Indian Navy Amphibious Aircraft RFI: How many aircraft and how long

According to the RFI released from the Indian Navy on January 7, Indian Navy Four AmphibianS. Aircraft wants to take lease for about four years. The lease weight will be in lease category, i.e. aircraft as well as facilities like crew, maintenance and insurance.

The advantage of the system is that the navy gets instant operational capacity and does not have to wait for long infrastructure or training. Indian Navy Amphibious Aircraft RFI

Why is Andaman-Nikobar the most important

However RFI में यह स्पष्ट नहीं है कि इन जहाजों का इस्तेमाल कहां किया जाएगा, लेकिन भारतीय नौसेना के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण अंडमान-निकोबार द्वीप समूह हैं। हाल ही में भारत सरकार का पूरा फोकस एएनआई यानी अंडमान-निकोबार आईलैंड्स पर है। यह द्वीप समूह भारत की मुख्य भूमि से करीब 1200 किलोमीटर दूर स्थित है और इसे रणनीतिक रूप से भारत का “अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर” भी कहा जाता है।

खास बात यह है कि अंडमान-निकोबार मलक्का स्ट्रेट के बेहद पास है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार करता है। वहीं, यहां से चीन का 80 फीसदी ऑयल इम्पोर्ट्स और 40 फीसदी ग्लोबल ट्रेड गुजरता है। यह मलक्का स्ट्रेट से 90-160 किमी दूर है, जो चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” स्ट्रैटेजी को काउंटर करता है।

पोर्ट ब्लेयर में भारत का एकमात्र ट्राई-सर्विस कमांड का मुख्यालय है, जो आर्मी, नेवी और एयर फोर्स को इंटीग्रेट करता है। यह 2001 में बनाया भारत का पहला थिएटर कमांड है। जहां नेवल बेस और एयरबेस दोनों मौजूद हैं। यहां से मैरीटाइम पैट्रोल, सबमरीन ट्रैकिंग, और जॉइंट ऑपरेशंस होते हैं। हाल के सालों में भारत सरकार ने यहां इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड किया है, ताकि चीन की बढ़ती चुनौती का सामना किया जा सके। यहां हाल में रनवे अपग्रेड, पोर्ट्स, और एयरफील्ड्स को डेवलप किया जा रहा है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

ग्रेट निकोबार के साथ-साथ अंडमान-निकोबार में पहले से मौजूद सैन्य ढांचे को भी मजबूत किया जा रहा है। कैंपबेल बे में स्थित आईएनएस बाज नेवल एयर स्टेशन मलक्का स्ट्रेट की साउदर्न एंट्री पर नजर रखता है। इसके अलावा कार निकोबार, पोर्ट ब्लेयर, शिबपुर और कैंपबेल बे सहित कुल चार प्रमुख एयरबेस को अपग्रेड किया जा चुका है, जिससे पूरे द्वीपसमूह की सैन्य क्षमता कई गुना बढ़ गई है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

सीडीएस ने किया अपग्रेडेड रनवे का उद्घाटन

पोर्ट ब्लेयर यानी श्री विजया पुरम से 535 किमी दक्षिण में कार निकोबार एयर फोर्स बेस में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने 2 जनवरी को ही अपग्रेडेड रनवे का उद्घाटन किया है। जिसमें 2.7 किमी लंबा और 43 मीटर चौड़ा रनवे बनाया गया है जो हेवी एयरक्राफ्ट जैसे फाइटर्स, ट्रांसपोर्टर्स को सपोर्ट करता है। साथ ही, कई एयरक्राफ्ट एक साथ पार्क, रिफ्यूल और टर्नअराउंड हो सकें इसके लिए रनवे को एक्सपेंड भी किया गया है। साथ ही, नया टैक्सी ट्रैक भी बनाया है, जो इमरजेंसी रनवे के रूप में यूज हो सकता है। इसके अलावा फ्यूल स्टोरेज, लॉजिस्टिक्स फैसिलिटी, और सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को भी बढ़ाया गया। यहां से मलक्का स्ट्रेट के साउदर्न एप्रोच पर नजर रखी जा सकती है। मैरीटाइम सर्विलांस, डिटरेंस, और रैपिड रिस्पॉन्स बढ़ाती है।

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इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत ग्रेट निकोबार में एक डीप-सी इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भी बनाया जा रहा है, जहां बड़े कंटेनर शिप सीधे आकर कार्गो उतार सकेंगे। अभी भारत का करीब 75 फीसदी ट्रांसशिप्ड कार्गो सिंगापुर, कोलंबो और दूसरे विदेशी पोर्ट्स पर हैंडल होता है। सरकार का मानना है कि ग्रेट निकोबार पोर्ट के चालू होने के बाद यह कार्गो भारत में ही हैंडल किया जा सकेगा, जिससे समय और लागत दोनों की बचत होगी और भारत को बड़ा आर्थिक फायदा मिलेगा।

प्रोजेक्ट का दूसरा अहम हिस्सा एक ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जिसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वहां वाइड-बॉडी एयरक्राफ्ट, यहां तक कि ए-380 जैसे बड़े विमान भी उतर सकें। यह एयरपोर्ट न सिर्फ सिविल एविएशन के लिए बल्कि जरूरत पड़ने पर मिलिट्री ऑपरेशंस में भी अहम भूमिका निभा सकेगा। इसके अलावा यहां एक आधुनिक टाउनशिप, पावर प्लांट और इकोनॉमिक जोन भी डेवलप किया जा रहा है, ताकि लंबी अवधि में यह इलाका आत्मनिर्भर बन सके। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

ग्रेट Nicobar प्रोजेक्ट का एक बेहद अहम पहलू इसका मिलिट्री और स्ट्रैटेजिक रोल है। इस द्वीप पर नया एयरफील्ड और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होने से भारतीय नौसेना और वायुसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से एसेट्स डिप्लॉय करने की सुविधा मिलेगी। खासकर म्यांमार के कोको आइलैंड जैसे ठिकानों पर चीन की गतिविधियों पर नजर रखने में ग्रेट निकोबार की भूमिका बेहद अहम हो जाएगी। इसके जरिए भारतीय नौसेना और वायुसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से एसेट्स डिप्लॉय करने की क्षमता मिलेगी। ऐसे में यहां भारत की मजबूत मौजूदगी समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

कई द्वीपों पर नहीं है रनवे

इन द्वीपों पर कई जगहों पर रनवे या एयरस्ट्रिप नहीं है। जहाज़ों के ज़रिये रसद पहुंचाने में कई बार दिन लग जाते हैं। ऐसे में एम्फीबियस एयरक्राफ्ट सीधे समुद्र पर उतरकर सैनिक, मेडिकल टीम, राहत सामग्री और उपकरण पहुंचा सकते हैं। अंडमान–निकोबार द्वीपसमूह में कुल मिलाकर करीब 500 से लेकर 836 द्वीप और छोटे-छोटे आइलेट्स शामिल हैं। इसमें कई निर्जन, चट्टानी और छोटे टापू भी गिने जाते हैं। इन सैकड़ों द्वीपों में से केवल 31 से 38 द्वीप ऐसे हैं, जहां स्थायी आबादी रहती है। इसके बावजूद, इतने बड़े द्वीपसमूह में वास्तविक रूप से काम करने लायक रनवे या एयरस्ट्रिप्स की संख्या बेहद कम है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

पूरे अंडमान-निकोबार में केवल चार रनवे

पूरे अंडमान–निकोबार क्षेत्र में केवल चार मुख्य एयरफील्ड ऐसे हैं, जहां से नियमित या रणनीतिक उड़ानें संभव हैं। इनमें पोर्ट ब्लेयर का वीर सावरकर इंटरनेशनल एयरपोर्ट सबसे अहम है, जो सिविल और सैन्य दोनों जरूरतों को पूरा करता है। इसके अलावा कार निकोबार में एयरफोर्स स्टेशन है, जो मुख्य रूप से मिलिट्री इस्तेमाल के लिए है। ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे में आईएनएस बाज नेवी एयर स्टेशन है, जो भारत का सबसे दक्षिणी एयरफील्ड माना जाता है, लेकिन इसका रनवे छोटा है और एक्सपेंड करने की प्रक्रिया चल रही है। उत्तरी अंडमान में शिबपुर के पास आईएनएस कोहासा एक फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस है, जहां सीमित लंबाई का रनवे मौजूद है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

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रनवे न होने से लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है असर

वहीं, रनवे की इस कमी का सबसे बड़ा असर लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है। अंडमान–निकोबार में ज्यादातर सप्लाई जहाजों के जरिए होती है। पोर्ट ब्लेयर से ग्रेट निकोबार जैसे दूरस्थ इलाकों तक जहाज से पहुंचने में दो से तीन दिन तक लग जाते हैं। मानसून, तूफान या खराब समुद्री हालात में यही सफर और लंबा हो जाता है या पूरी तरह रुक भी जाता है। ऐसे में जरूरी सामान, ईंधन, मेडिकल सप्लाई या स्पेयर पार्ट्स समय पर नहीं पहुंच पाते।

स्पेशल ऑपरेशंस के लिहाज से भी रनवे की कमी एक बड़ी बाधा है। मरीन कमांडो यानी मार्कोस या अन्य स्पेशल फोर्सेज को दूरस्थ द्वीपों पर तेजी से भेजना या वहां से निकालना आसान नहीं होता। इसी तरह मैरीटाइम पैट्रोल और सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशंस में भी यह कमी साफ नजर आती है, क्योंकि कई इलाकों में कोई हवाई बेस ही मौजूद नहीं है। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

इसलिए जरूरत है एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की

ऐसे में एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की जरूरत सामने आती है। फिक्स्ड विंग एम्फीबियस एयरक्राफ्ट ऐसे विमान होते हैं, जो समुद्र या झील के पानी से भी उतर सकते हैं और सामान्य रनवे से भी ऑपरेट कर सकते हैं। ये रनवे की कमी को लगभग पूरी तरह कवर कर लेते हैं। ऐसे विमान सीधे समुद्र की सतह पर उतरकर सैनिकों, मेडिकल टीम, राहत सामग्री या जरूरी उपकरणों को पहुंचा सकते हैं। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

किस तरह के ऑपरेशन होंगे

आरएफआई में साफ तौर पर बताया गया है कि इन विमानों का इस्तेमाल किन-किन कामों के लिए किया जाएगा। इनमें सबसे अहम भूमिका लॉन्ग रेंज सर्च एंड रेस्क्यू (एलआर-एसएआर) की होगी। इसके अलावा इन विमानों का इस्तेमाल ऑपरेशनल लॉजिस्टिक सपोर्ट, स्पेशल ऑपरेशन, ह्यूमैनिटेरियन एड और डिजास्टर रिलीफ और कैजुअल्टी इवैक्यूएशन में किया जाएगा।

अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे इलाकों में किसी समुद्री हादसे, जहाज दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा के समय यह विमान तुरंत मदद पहुंचाने में अहम साबित हो सकते हैं। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

समुद्र और जमीन दोनों से ऑपरेशन की क्षमता

एम्फीबियस एयरक्राफ्ट की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वह समुद्र, झील और रनवे, तीनों जगह से ऑपरेट कर सकता है। नौसेना ने साफ किया है कि विमान को दिन और रात, दोनों समय उड़ान भरने में सक्षम होना चाहिए और उसे इंस्ट्रूमेंट फ्लाइट रूल्स (आईएफआर) सर्टिफिकेशन प्राप्त होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि विमान खराब मौसम और कम विजिबिलिटी में भी सुरक्षित उड़ान भर सके। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

कोरोजन रेजिस्टेंट डिजाइन जरूरी

आरएफआई में यह भी कहा गया है कि विमान को समुद्री माहौल के अनुरूप बनाया गया होना चाहिए। समुद्र की नमक भरी हवा और नमी विमानों पर जल्दी असर डालती है, इसलिए कोरोजन रेजिस्टेंट डिजाइन अनिवार्य रखा गया है। इसके अलावा, विमान में आधुनिक नेविगेशन, कम्युनिकेशन और सुरक्षा सिस्टम होने चाहिए ताकि लंबी दूरी के ऑपरेशन के दौरान किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।

इसके साथ ही, विमान में एडवांस एवियोनिक्स, सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम, सैटेलाइट-आधारित नेविगेशन और सर्वाइवल इक्विपमेंट होना जरूरी बताया गया है। लॉन्ग रेंज सर्च एंड रेस्क्यू के लिए सेंसर और विजुअल एड्स की भी जरूरत रखी गई है, ताकि समुद्र में फंसे लोगों या दुर्घटनाग्रस्त जहाजों की पहचान तेजी से की जा सके। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

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अंडमान में आपदा प्रबंधन के लिए अहम

अंडमान-निकोबार क्षेत्र भूकंप और सुनामी जोन में आता है। 2004 की सुनामी के दौरान यह महसूस किया गया था कि अगर ऐसे विमान उपलब्ध होते, तो राहत और बचाव कार्य और तेज हो सकता था। एम्फीबियस एयरक्राफ्ट समुद्र पर उतरकर सीधे प्रभावित इलाकों के पास पहुंच सकते हैं। जहां जहाजों से पहुंचने में दो-तीन दिन लगते हैं, वहीं एम्फीबियस एयरक्राफ्ट कुछ घंटों में ही काम पूरा कर सकते हैं। ग्रेट निकोबार, लिटिल अंडमान या हैवलॉक जैसे द्वीपों पर, जहां रनवे नहीं है, वहां यह क्षमता बेहद अहम हो जाती है। ह्यूमैनिटेरियन एड और डिजास्टर रिलीफ ऑपरेशंस में ये विमान पानी पर उतरकर सीधे बचाव और मेडिकल इवैक्यूएशन कर सकते हैं।

लॉन्ग रेंज सर्च एंड रेस्क्यू में भी इनकी भूमिका अहम होती है। ये दिन-रात, इंस्ट्रूमेंट फ्लाइट रूल्स के तहत उड़ान भर सकते हैं और हजारों किलोमीटर तक ऑपरेट कर सकते हैं। स्पेशल ऑपरेशंस में मार्कोस जैसे यूनिट्स को चुपचाप ड्रॉप या पिकअप करना भी इनके जरिए संभव होता है। एंटी-पाइरेसी और एंटी-नार्कोटिक्स ऑपरेशंस में ये विमान समुद्र पर उतरकर संदिग्ध गतिविधियों की जांच कर सकते हैं। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

नेवी के पास नहीं एम्फीबियस एयरक्राफ्ट

मिली जानकारी मुताबिक फिलहाल भारतीय नौसेना के पास कोई भी फिक्स्ड विंग एम्फीबियस एयरक्राफ्ट सर्विस में नहीं है। पिछले कई सालों से जापान के शिनमायवा यूएस-2 विमान को लेकर बातचीत चलती रही, लेकिन कीमत और अन्य शर्तों के कारण समझौता आगे नहीं बढ़ सका। इसी वजह से अब नौसेना ने लीज के रास्ते से तत्काल क्षमता हासिल करने का फैसला किया है।

भारतीय नौसेना का नेवल एविएशन, जिसकी औपचारिक शुरुआत 11 मई, 1953 को कोच्चि में हुई थी, उसने अपने पहले भारतीय नौसैनिक विमान के तौर पर शॉर्ट्स सीलैंड एम्फीबियस एयरक्राफ्ट को ऑपरेट किया थ। हालांकि, 1960 में इनका ऑपरेशन बंद कर दिया गया।

वहीं, इस आरएफआई को नौसेना की लॉन्ग टर्म एविएशन रोडमैप का हिस्सा मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि लीज पर लिए गए विमानों के ऑपरेशनल अनुभव के आधार पर भविष्य में स्थायी खरीद या स्वदेशी विकास का रास्ता भी खुलेगा। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस आरएफआई का जवाब केवल ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स या अधिकृत लेसर ही दे सकते हैं। लेसर का भारतीय यूनिट होना और विमान का मालिक होना आवश्यक है। आरएफआई के साथ ही लेसर से बजटरी अनुमान, दायित्व और बीमा विवरण, तथा डीएपी-2020 के प्रावधानों के अनुपालन की पुष्टि भी मांगी गई है। आरएफआई का जवाब मिलने के बाद नौसेना और रक्षा मंत्रालय इन प्रस्तावों का अध्ययन करेंगे। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि किन विकल्पों को अगले चरण में ले जाया जाए। इसके बाद ही रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) या अन्य औपचारिक प्रक्रिया शुरू होगी। (Indian Navy Amphibious Aircraft RFI)

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  • Herry passport

    Harendra Chaudhary is active in defence journalism and is associated with RakshaSamachar.com. They have long been covering strategic news, defence policies and national security related issues involving Indian Army, Navy and Air Force. In his career of journalism, Harendra has written detailed articles on Parliament’s activities, military campaigns, India-Pak and India-China border dispute, defence procurement and ‘Make in India’ defence projects. They are known for deep understanding and analytical approach of defense cases.

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