📍New Delhi | 12 Oct, 2026, 6:09 PM
Indian Army Underground Bunkers: The growing use of missiles, drones and precision-guide weapons in the modern war has made the security of military bases a great challenge. Now, keeping an eye on the military activities of the enemy, as well as protecting their soldiers, ammunition and necessarily military equipment from attacks has become as important. The Indian Army is working on preparing the Underground Security Structure near borders from China and Pakistan, considering the same need.
Army Northern Command Launched 19 separate projects to protect troops and military resources. These are working under a comprehensive plan of safeguarding force preservation i.e. military forces and their essential resources. The budget of Rs 1,080 crore for these projects has been stated. The scheme includes the construction of safe underground facilities and modular frameworks.
Indian Army Underground Bunkers: Why Underground Bunkers Required in Modern War?
Strong buildings, bunkers and security walls were built over the ground to protect the first military bases. But now long-distance missiles, drones and precise targeting weapons have become a threat to such tractors. It is also easy to identify military bases with the help of satellite, surveillance drone and other sensors.
Precision-Guided हथियार किसी खास इमारत, गोदाम या सैन्य प्रतिष्ठान को निशाना बना सकते हैं। ऐसे हमलों में जमीन के ऊपर मौजूद गोला-बारूद के भंडार, कमांड सेंटर और दूसरे महत्वपूर्ण संसाधन नुकसान की चपेट में आ सकते हैं।
नॉर्दर्न कमांड के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने 9 अक्टूबर को सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स यानी एसआईडीएम के सालाना सत्र में अंजरग्राउंड स्किक्योरिटी स्ट्रक्चर्स से जुड़ी योजनाओं का उल्लेख किया था। उन्होंने खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और सभी योग्य प्रतिभागियों को समान अवसर देने पर जोर दिया।
अंडरग्राउंड सुविधाओं का उद्देश्य जरूरी सैन्य संसाधनों को सीधे हमले से बचाना है। जमीन के नीचे बनाए गए मजबूत ढांचों से सैनिकों की सुरक्षा के साथ गोला-बारूद, उपकरण और संचार सुविधाओं को भी सुरक्षा मिलती है।
नॉर्दर्न कमांड में 19 प्रोजेक्ट, नवंबर तक टेंडर
भारतीय सेना की नॉर्दर्न कमांड ने इस साल अगस्त में इन 19 प्रोजेक्ट के लिए टेंडर जारी किए थे। वहीं, इच्छुक कंपनियों को अपने प्रपोजल जमा करने के लिए 7 नवंबर तक का समय दिया गया है। इन परियोजनाओं में सैन्य संसाधनों, गोला-बारूद और प्रशिक्षण से जुड़ी सामग्री के सुरक्षित भंडारण के लिए सुविधाएं बनाई जानी हैं।
दरअसल सेना अलग-अलग ऑपरेशनल जरूरतों के हिसाब से सुरक्षित अंडरग्राउंड स्ट्रक्चर तैयार करना चाहती है। किसी जगह पर गोला-बारूद के स्टोरेज की जरूरत हो सकती है, तो किसी दूसरी जगह सैन्य उपकरणों या दूसरे जरूरी संसाधनों को सुरक्षित रखने की।
योजना में प्रीफैब्रिकेटेड यानी पहले से तैयार किए गए हिस्सों से बनने वाले स्ट्रक्चर्स को भी शामिल किया गया है। इस तकनीक में स्ट्रक्चरके कई हिस्से निर्माण स्थल से अलग तैयार किए जा सकते हैं। बाद में उन्हें तय जगह पर लाकर जोड़ा जाता है। इससे निर्माण कार्य में तेजी आती है।
इन प्रोजेक्ट के लिए सप्लाई ऑर्डर दिसंबर 2026 तक दिया जाना है। (Indian Army Underground Bunkers)
ऑपरेशन सिंदूर और दूसरे संघर्षों से मिले सबक
अंडरग्राउंड मिलिट्री स्ट्रक्चर तैयार करने की योजना के पीछे आधुनिक युद्ध के अनुभव भी महत्वपूर्ण हैं। पश्चिम एशिया में हुए सैन्य संघर्षों ने दिखाया है कि लगातार हवाई हमलों और मिसाइल हमलों के बीच सैन्य संसाधनों को सुरक्षित रखना कितना मुश्किल हो सकता है।
ईरान के अंडरग्राउंड स्ट्रक्चर्स को अक्सर ‘मिसाइल सिटीज’ कहा जाता है। इन सुविधाओं में सुरंगों और जमीन के नीचे बने ढांचों का इस्तेमाल सैन्य संसाधनों को रखने के लिए किया जाता है। ऐसे ढांचे सतह पर होने वाले हमलों से कुछ हद तक सुरक्षा दे सकते हैं।
भारतीय सेना भी ऑपरेशन सिंदूर समेत हाल के दुनिया में कई जगह चल रहे सैन्य अभियानों से मिले अनुभवों को अपनी सुरक्षा तैयारियों में शामिल कर रही है। नए अंडरग्राउंड स्ट्रक्चर्स के डिजाइन में भारी हवाई हमलों, तोपखाने की गोलाबारी और जमीन के भीतर तक असर डालने वाले बंकर-बस्टर हथियारों से सुरक्षा की जरूरत को ध्यान में रखा जा रहा है। ऐसे हथियार सामान्य बमों की तुलना में मजबूत स्ट्रक्चर्स को भेदने के लिए बनाए जाते हैं। (Indian Army Underground Bunkers)
बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन भी बना रहा भूमिगत बंकर
इस काम में बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बीआरओ कुछ फॉरवर्ड लोकेशंस पर अंडरग्राउंड बंकर बना रहा है। इनका इस्तेमाल कॉम्बैट ड्रोन और दूसरे सैन्य संसाधनों को सुरक्षित रखने के लिए किया जा रहा है।
बीआरओ सीमाई इलाकों में सड़क, पुल और दूसरी जरूरी सुविधाएं बनाता है। इन इलाकों में निर्माण करना आसान नहीं होता, क्योंकि कई जगहों पर ऊंचाई, मौसम, कठिन भूभाग और सीमित परिवहन सुविधाएं चुनौती पैदा करती हैं। (Indian Army Underground Bunkers)
सिलीगुड़ी कॉरिडोर में भी भूमिगत सुविधाओं पर जोर
पूर्वी सेक्टर में सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। इसे आम भाषा में ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, क्योंकि यह पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला एक संकरा भूभाग है।
इस क्षेत्र में भूमिगत सुविधाओं के जरिए सैन्य संसाधनों की सुरक्षा मजबूत करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यहां कमांड सेंटर और लॉजिस्टिक्स सेंटर जैसी सुविधाएं बनाने की योजना बनाई जा रही है। ‘ऑपरेशन फोर्ट्रेस सिलीगुड़ी’ के तहत अंडरग्राउंड एम्युनिशन स्टोरेज, कमांड और कम्युनिकेशन सेंटर तथा सेफ हेवन बनाए जाने हैं। जिसकी गहराई लगभग 20 से 24 मीटर तक होगी।
कमांड सेंटर में ऑपरेशंस का कॉर्डिनेशन किया जाता है। जबकि लॉजिस्टिक्स सेंटर सैनिकों और उपकरणों की आवाजाही तथा सप्लाई में मदद करता है। इन सुविधाओं को सुरक्षित रखने का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि किसी सैन्य संकट के दौरान संचार और सप्लाई व्यवस्था का काम करते रहना जरूरी होता है। (Indian Army Underground Bunkers)
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