📍नई दिल्ली | 9 Oct, 2026, 1:14 PM
Air Chief AP Singh: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा है कि आधुनिक युद्ध में फाइटर जेट्स की जरूरत खत्म नहीं होने वाली है। आने वाले 10 से 15 साल तक मानव संचालित लड़ाकू विमानों की अहम भूमिका बनी रहेगी। हालांकि, भविष्य के युद्ध में मानव संचालित विमानों के साथ अनमैन्ड यानी बिना पायलट वाले ड्रोन और कॉम्बैट एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल भी बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि बदलती तकनीक के बीच वायुसेनाओं को अपनी रणनीति, ट्रेनिंग और हथियारों के इस्तेमाल के तरीके में बदलाव करना होगा।
एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने ये बातें ‘द इवॉल्विंग बैटलस्पेस में एयर पावर की केंद्रीय भूमिका’ विषय पर आयोजित सीएपीएसएस सेमिनार में कहीं। यह कार्यक्रम भारतीय वायुसेना के अभ्यास ‘तरंग शक्ति’ से जुड़ा था। अपने संबोधन में उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों, मानव और बिना पायलट वाले विमानों के तालमेल, स्वदेशी रक्षा उत्पादन, जॉइंट ऑपरेशंस और आधुनिक युद्ध में सूचना की भूमिका पर विस्तार से बात की।
Air Chief AP Singh: ऑपरेशन सिंदूर में एयर पावर की भूमिका का किया जिक्र
Air Chief Marshal AP Singh ने कहा कि मौजूदा वैश्विक संघर्षों और भारत के अपने सैन्य अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ है कि एयर पावर आधुनिक युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाती है।
एयर चीफ ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा, आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाने के शुरुआती उद्देश्य हासिल करने के बाद, जब हमें युद्ध जैसी स्थिति में धकेला गया और चार दिनों तक चले संघर्ष में शामिल होना पड़ा, तब हमने दुश्मन के सैन्य ठिकानों और उसकी सैन्य ताकत को भारी नुकसान पहुंचाया। यह कार्रवाई सीमा के करीब 1,200 किलोमीटर लंबे इलाके में और 200 किलोमीटर से अधिक अंदर तक दुश्मन के सैन्य ठिकानों तक की गई।
उन्होंने कहा, “यह सब इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि हमने अपनी एयर पावर का इस्तेमाल किया और उसका प्रभावी ढंग से उपयोग किया।”
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी सैन्य सेवा अकेले युद्ध नहीं जीत सकती। युद्ध में किस सैन्य क्षमता का इस्तेमाल करना है, यह ऑपरेशन के उद्देश्य और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। लेकिन किसी न किसी तौर पर एयर पावर की भूमिका बनी रहती है।
तीनों सेनाओं के बीच तालमेल क्यों जरूरी?
एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि आधुनिक युद्ध अब केवल जमीन, समुद्र या आसमान तक सीमित नहीं है। इसमें अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों के बीच तालमेल और सूचनाओं का तेजी से आदान-प्रदान बेहद जरूरी हो गया है।
उन्होंने कहा कि तीनों सेनाओं को जॉइंट प्लानिंग, साझा कम्युनिकेशन नेटवर्क, इंटीग्रेटेड डेटा सिस्टम और संयुक्त ट्रेनिंग पर काम करना होगा।
उदाहरण के लिए, अगर किसी एयर डिफेंस रडार को दुश्मन के विमान या मिसाइल की जानकारी मिलती है, तो यह सूचना संबंधित कमांड सेंटर और दूसरे वेपन सिस्टम्स तक समय पर पहुंचनी चाहिए। इससे खतरे की पहचान करने और जवाबी कार्रवाई करने में मदद मिलती है।
एयर चीफ ने कहा कि अब केवल आधुनिक हथियार खरीदना काफी नहीं है। जरूरी है कि उन्हें पहले से मौजूद सैन्य नेटवर्क के साथ जोड़ने की योजना भी बनाई जाए।
उन्होंने कहा, “आज कोई सेंसर, कोई हथियार या कोई ड्रोन, अगर एक-दूसरे से और पूरे सिस्टम से संपर्क नहीं कर सकता, तो उसका इस्तेमाल सीमित हो जाता है।” (Air Chief AP Singh)

स्वदेशी तकनीक और उत्पादन की गति पर जोर
एयर चीफ मार्शल ने कहा कि सैन्य तकनीक तेजी से बदल रही है। ऐसे में किसी नई तकनीक को विकसित करने और उसे बड़े पैमाने पर तैयार करने में बहुत ज्यादा समय लगने से उसकी उपयोगिता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास, उत्पादन क्षमता और आत्मनिर्भरता को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, सेना को ऐसे सिस्टम चाहिए जो जरूरत के समय पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हों और लंबे समय तक ऑपरेशन में इस्तेमाल किए जा सकें।
उन्होंने सप्लाई चेन की अहमियत पर भी जोर दिया। युद्ध या संकट के दौरान अगर किसी हथियार के जरूरी पुर्जे उपलब्ध नहीं होते, तो आधुनिक प्लेटफॉर्म भी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाता।
एयर चीफ ने कहा, “अगर कोई प्लेटफॉर्म या सिस्टम ऑपरेशन या संकट के समय इस्तेमाल करने लायक नहीं रहता, तो वह क्षमता नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी बन जाता है।”
इसका मतलब है कि हथियारों की खरीद के साथ उनके रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और लगातार इस्तेमाल की व्यवस्था भी जरूरी है। यही व्यवस्था लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में सैन्य क्षमता को बनाए रखती है। (Air Chief AP Singh)
फाइटर जेट्स की जगह अभी खत्म नहीं होगी
सेमिनार में मानव संचालित और बिना पायलट वाले विमानों की भूमिका पर भी चर्चा हुई। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि ड्रोन और अनमैन्ड कॉम्बैट एयरक्राफ्ट की क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन इससे फाइटर जेट्स की जरूरत खत्म नहीं हो जाती।
उन्होंने कहा, “मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि मानव संचालित विमानों का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है। अगले 10 से 15 साल तक इनकी भूमिका बनी रहेगी।”
उनके अनुसार, मानव संचालित विमानों और अनमैन्ड प्लेटफॉर्म को अलग-अलग परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जाएगा। इसलिए वायुसेनाओं को दोनों के बीच तालमेल बनाने की जरूरत है।
उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य के युद्ध में केवल यह मायने नहीं रखेगा कि किसी देश के पास कौन-सी तकनीक है। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि उसका इस्तेमाल कितनी कुशलता और समझदारी से किया जाता है।
एक जैसी तकनीक रखने वाले दो विरोधियों के बीच अंतर ट्रेनिंग, ऑपरेशनल अनुभव और सही समय पर सही फैसला लेने की क्षमता से पैदा हो सकता है। (Air Chief AP Singh)
फाइटर जेट से ड्रोन को कंट्रोल करने की तैयारी
इससे पहले वायुसेना प्रमुख ने वायुसेना दिवस से पहले आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में रक्षा समाचार के सवाल का जवाब देते हुए मानव संचालित और बिना पायलट वाले विमानों के बीच तालमेल की तकनीक पर बात की थी। इस अवधारणा को मैनड-अनमैन्ड टीमिंग (MUM-T) कहा जाता है।
उन्होंने बताया था कि फिलहाल बिना पायलट वाले प्लेटफॉर्म को जमीन से कंट्रोल किया जा सकता है। लेकिन ऐसे सिस्टम डेवलप करने पर भी काम हो रहा है, जिनमें हवा में मौजूद मानव संचालित विमान से अनमैन्ड प्लेटफॉर्म को नियंत्रित किया जा सके।
उन्होंने कहा था, “मानव संचालित प्लेटफॉर्म से अनमैन्ड प्लेटफॉर्म को कंट्रोल करने की क्षमता जल्द विकसित हो सकती है। इसके लिए सिस्टम की पोजिशन और एंटीना की पोजिशन जैसी तकनीकी जरूरतों पर काम किया जा रहा है।”
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि एक फाइटर क्लास एयरक्राफ्ट से दूसरे फाइटर क्लास अनमैन्ड एयरक्राफ्ट को कंट्रोल करने वाली पूरी मैनड-अनमैन्ड टीमिंग क्षमता विकसित करना अधिक जटिल काम है। इसमें दोनों प्लेटफॉर्म और उनके बीच कम्युनिकेशन सिस्टम का विकास जरूरी है।
भारत के संदर्भ में यह तकनीक इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पायलट वाला विमान सीधे खतरे वाले क्षेत्र में जाने के बजाय अपने साथ उड़ रहे ड्रोन या अनमैन्ड प्लेटफॉर्म की मदद से ऑपरेशन कर सकता है। (Air Chief AP Singh)
तकनीकी बदलाव के बीच नई ट्रेनिंग जरूरी
एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि नई तकनीक के साथ सैन्यकर्मियों को प्रशिक्षित करने के तरीके भी बदलने होंगे। केवल पारंपरिक ट्रेनिंग के जरिए आधुनिक हथियारों की पूरी क्षमता का इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है।
उन्होंने सिम्युलेटर, वर्चुअल ट्रेनिंग और अन्य आधुनिक तरीकों की भूमिका का जिक्र किया। इनकी मदद से कर्मियों को वास्तविक ऑपरेशन जैसी परिस्थितियों में अभ्यास कराया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सैनिकों और एयरक्रू को नई तकनीक के अनुरूप तेजी से ढलने की क्षमता विकसित करनी होगी। किसी सिस्टम की क्षमता तभी उपयोगी है, जब उसे चलाने वाले लोग उसके इस्तेमाल में पूरी तरह प्रशिक्षित हों।
एयर चीफ ने यह भी कहा कि युद्ध के दौरान हर योजना के अनुसार काम नहीं होता। कभी योजना सही होती है, लेकिन उसे लागू करने में समस्या आती है। कभी योजना में ही ऐसी कमियां रह जाती हैं, जिनका पहले अंदाजा नहीं लगाया गया होता।
ऐसे में किसी विफलता के बाद तेजी से संभलना और ऑपरेशन जारी रखने की क्षमता भी सैन्य तैयारी का अहम हिस्सा है। (Air Chief AP Singh)
सस्ती तकनीक ने बढ़ाई चुनौती
एयर चीफ ने कहा कि पहले अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल मुख्य रूप से बड़ी प्रयोगशालाओं और आर्थिक रूप से मजबूत देशों तक सीमित था। अब कम लागत वाली तकनीक के चलते छोटे देश और दूसरे पक्ष भी प्रभावी सैन्य साधन तैयार कर सकते हैं।
इसका फायदा भी है और चुनौती भी। कम लागत वाले ड्रोन और अन्य सिस्टम से सैन्य क्षमताएं बढ़ सकती हैं, लेकिन उनके इस्तेमाल के तरीके और खतरे का अनुमान लगाना भी कठिन हो जाता है।
उन्होंने कहा कि वायुसेनाओं को ऐसे माहौल में काम करने की तैयारी करनी होगी, जहां कम्युनिकेशन, नेविगेशन या दूसरे सिस्टम बाधित हो सकते हैं। ऐसे हालात में भी ऑपरेशन जारी रखने की क्षमता जरूरी है। (Air Chief AP Singh)
एयर पावर केवल हमले और रक्षा तक सीमित नहीं
अपने संबोधन में एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने एयर पावर के दूसरे पहलुओं पर भी बात की। उन्होंने कहा कि वायुसेना की भूमिका केवल दुश्मन पर हमला करने या अपने हवाई इलाके की सुरक्षा तक सीमित नहीं है।
विमानों और हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल आपदा राहत, मानवीय सहायता और मित्र देशों तक जरूरी सामग्री पहुंचाने में भी किया जाता है। ऐसे अभियानों से किसी देश की अंतरराष्ट्रीय छवि और दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों को मजबूती मिल सकती है। (Air Chief AP Singh)
Author
Harendra Chaudhary is active in defence journalism and is associated with RakshaSamachar.com. They have long been covering strategic news, defence policies and national security related issues involving Indian Army, Navy and Air Force. In his career of journalism, Harendra has written detailed articles on Parliament’s activities, military campaigns, India-Pak and India-China border dispute, defence procurement and ‘Make in India’ defence projects. They are known for deep understanding and analytical approach of defense cases.





