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Agni-Prime Missile: The fire-prime missile will now be left by moving train, many cities in China on the target, know why rail-based launcher is special

Agni-Prime Missile: India successfully tests Agni-Prime from rail-based mobile launcher

Agni-Prime Missile: DRDO successfully test fire-prime missiles while gaining historical achievement on Thursday. This test is so special as the first time this missile was launched from a rail-based mobile launcher. This test was found in the death of DRDO and Stratgeic Forces command. At the same time, India has joined the list of select countries that have the ability to launch missiles from the Canisterized Rail Network.

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Defence Minister Rajnath Singh congratulated DRDO, Strategic Forces Command and Indian Armed Forces, stating this success "historic moment". The Ministry of Defence said in its official statement that this test will further strengthen the strategic capabilities of India and prove decisive to future military strategies.

Agni-Prime Missile: What is Agni-Prime Missile?

The fire-prime missile is a new generation medium-range ballistic missile of India. It is designed to kill from 1,000 to 2,000 kilometres. This missile is capable of carrying both nuclear and traditional weapons.

It is the upgrade version of fire-I and fire-II, but it has a lighter, more accurate and technically advanced. The weight of fire-prim is about 11,500 kg, which is about half than fire-III. Its canisterized design allows it to store for a long time and launch immediately at any time.

Why is Rail-based Mobile Launcher Special?

The biggest feature of this test is that the fire-prime for the first time was released from a rail-based mobile launcher. This launcher can be easily launched on Indian Railway Network without any special preparations.

Rail-based launcher is a fully self-contend system. It has the ability to launch modern communication tools, security systems and independently. It can prepare and launch the missile in a short time, allowing India to take immediate account actions.

India’s railway system is one of the largest network in the world, with a total length of 69,181 km. While, India is rapidly expanding rail networks around China border. The rail network here is mainly the gymmay of the North Eastern States (Northest Frontier Railway), where it plans to create 500 km new lines in 2025. Here the rail network of 800-1,000 km already exists in the areas adjacent to the LAC to 100 to 200 km. Whereas, Nathu La in Sikkam, adjacent to LAC and plans to connect several terrains to Tawaang in Arunachal. After which 10 to 12 cities of China will come to the range of fireprimes. Fire-prime missiles can become a major threat to military infrastructure deployed in the western regions of China.

The use of rail networks helps the missile to move to any part of the country, making it extremely difficult for the enemies to track and destroy it. Special trains carrying it can hide in tunnels. That doesn’t make it look at anyone. This technique can prove "Game Changer" in India’s defence strategy.

"Text Book Launch"

24 सितंबर को किए गए परीक्षण के दौरान मिसाइल की ट्रैजेक्टरी (trajectory) को कई ग्राउंड स्टेशनों से ट्रैक किया गया। डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और स्ट्रैटेजिक फोर्सेसज कमांड के अधिकारियों ने इस लॉन्च को देखा और इसे “टेक्स्ट बुक लॉन्च” बताया, यानी यह पूरी तरह सफल रहा और मिशन के सभी उद्देश्यों को हासिल किया गया।

2,000 किलोमीटर तक की रेंज के साथ यह मिसाइल पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों तक मार करने में सक्षम है। रेल-आधारित लॉन्चर से तैनाती से भारत की सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी मजबूत होगी। वहीं, परमाणु युद्ध की स्थिति में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इससे भारत दुश्मन के पहले हमले के बाद भी प्रभावी जवाब दे सकता है।

इससे पहले अग्नि-प्राइम का पहला सफल परीक्षण 28 जून 2021 को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किया गया था। इसके बाद दिसंबर 2021, जून 2023 और अप्रैल 2024 में भी सफल उड़ान परीक्षण हुए। सड़क-आधारित मोबाइल लॉन्चर से यह मिसाइल पहले ही सेना में शामिल की जा चुकी है। लेकिन रेल-आधारित लॉन्चर से यह पहला परीक्षण था।

अग्नि-प्राइम की खूबियां

अग्नि-प्राइम मिसाइल को कई एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस किया गया है। हल्के डिजाइन होने की वजह से इसे ले जाना आसान है। इसमें डुअल रिडंडेंट नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है, जिसमें आईएनएस, जीपीएस और आईआरएनएसएस शामिल हैं। इसके कारण इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) 10 मीटर से भी कम है, यानी यह अपने लक्ष्य को बहुत सटीकता से भेद सकती है।

मिसाइल में मैन्यूवरेबल री-एंट्री व्हीकल (MaRV) तकनीक है, जो इसे दुश्मन के मिसाइल डिफेंस सिस्टम से बचने में सक्षम बनाती है। इसमें थ्रस्टर या एयरोडायनामिक कंट्रोल सिस्टम होते हैं, जिससे यह मिसाइल वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान अपनी दिशा बदल सकती है। यह दो चरणों में सॉलिड ईंधन पर चलती है। इस मिसाइल को कैनिस्टर में स्टोर किया जाता है। जिससे यह मौसम और बाहरी खतरों से बची रहती है और साथ ही इसे फटाफट लॉन्च किया जा सकता है।

किन-किन देशों के पास है यह सुविधा

रेल-बेस्ड लॉन्चर सिस्टम बहुत कम देशों के पास है। रूस ने 1980 में आरटी-23 मिसाइल के लिए इसका इस्तेमाल किया था। चीन के पास डीएफ-41 मिसाइल का रेल वर्जन है। डीएफ-41 आईसीबीएम के रेल वर्जन को 2015-2016 में टेस्ट किया गया था। यह सॉलिड-फ्यूल्ड और मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) तकनीक से लैस है। MIRV की खासियत है कि एक मिसाइल कई वारहेड्स ले जा सकती है, और प्रत्येक वारहेड को अलग-अलग टारगेट्स पर निशाना बनाने की क्षमता होती है। इसे पीएलए की रॉकेट फोर्स ऑपरेट करती है।

वहीं, उत्तर कोरिया ने 15 सितंबर, 2021 में ह्वासोंग-11A मिसाइल को रेल से छोड़ा था। जिसे रेलवे-बोर्न मिसाइल रेजिमेंट ने ऑपरेट किया था। वहीं, पाकिस्तान के पास अभी ऐसी कोई सुविधा नहीं है और वह अभी भी रोड बेस्ड मिसाइलों पर ही निर्भर है।

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FCAS dispute
France Germany fighter jet dispute

FCAS dispute: एक तरफ चीन जहां अपने छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट चेंगदू जे-36 और शेनयांग जे-50 के प्रोटोटाइप की टेस्टिंग करने में जुटा है, तो वहीं यूरोपीय देशों में अभी छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने को लेकर तू-तू मैं-मैं छिड़ी हुई है। यूरोप की सबसे बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट्स में शामिल फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) को लेकर इन दिनों रार छिड़ी हुई है। इस प्रोजेक्ट के तहत 2040 तक यूरोप की एयर फोर्स के लिए छठवीं पीढ़ी का फाइटर जेट तैयार करना है। वहीं इस प्रोजेक्ट में फ्रांस की दसॉ एविएशन, जर्मनी स्पेन की एयरबस शामिल है। लेकिन इन तीनों के बीच कलह ठन गई है और ये प्रोजेक्ट खत्म होने की कगार पर खड़ा है।

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इस प्रोजेक्ट का मकसद था कि यूरोप अपने दम पर छठवीं पीढ़ी का एक ऐसा फाइटर जेट बनाए जो दुनिया की सबसे आधुनिक तकनीकों से लैस हो। इस विमान को मानवयुक्त लड़ाकू विमानों के साथ ही स्वार्मिंग ड्रोंस और डिजिटल कॉम्बैट क्लाउड से जोड़ा जाना था। लेकिन अब इस प्रोजेक्ट की राह इतनी आसान नहीं लग रही, क्योंकि फ्रांस और जर्मनी के बीच इस पर लीडरशिप को लेकर जबरदस्त खींचतान चल रही है।

FCAS dispute: “सिस्टम ऑफ सिस्टम्स” पर होना था काम

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 2017 में हुई थी, जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन और जर्मनी की तत्कालीन चांसलर एंजेला मर्केल ने इसका एलान किया। इसका लक्ष्य 2040 तक फ्रांस के राफेल, जर्मनी के यूरोफाइटर टाइफून और स्पेन के EF-18 हॉर्नेट जैसे मौजूदा विमानों की जगह लेना था। इस प्रोजेक्ट को फ्रांस में Système de Combat Aérien du Futur-SCAF नाम से भी जाना जाता है। इसकी खासियत यह थी कि इसमें केवल एक फाइटर जेट नहीं, बल्कि पूरे “सिस्टम ऑफ सिस्टम्स” पर काम होना था। इस सिस्टम में तीन मुख्य हिस्से रखे गए। पहला, न्यू जेनरेशन फाइटर यानी मानवयुक्त स्टेल्थ जेट, जिसे फ्रांस की दसॉ एविएशन लीड कर रही थी। दूसरा, रिमोट कैरियर्स यानी ऐसे ड्रोंस जो स्वार्मिंग और मल्टी-रोल मिशंस को अंजाम दे सकें। इन्हें एयरबस की जिम्मेदारी में जर्मनी और स्पेन को तैयार करना था। तीसरा, रीयल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग और डिसीजन मेकिंग के कॉम्बैट क्लाउड सिस्टम, जो एक तरह का डिजिटल नेटवर्क था और जिसका उद्देश्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से सभी प्लेटफॉर्म्स को जोड़ना था।

FCAS dispute: प्रोजेक्ट को कब्जे में लेना चाहता है दसॉ?

जब यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ था तो इसकी लागत लगभग सौ अरब यूरो आंकी गई थी। उम्मीद थी कि यह यूरोप को अमेरिका के एफ-35 और चीन के जे-20 जैसे लड़ाकू विमानों की बराबरी में खड़ा कर देगा। लेकिन जल्द ही मतभेद उभरने लगे। विवाद तब और गहराया जब 2019 में स्पेन भी इसमें शामिल हो गया। स्पेन के शामिल होने से एयरबस का हिस्सा बढ़कर लगभग दो-तिहाई हो गया और दसॉ की हिस्सेदारी एक-तिहाई रह गई। जर्मनी और स्पेन की ओर से प्रतिनिधित्व करने वाली एयरबस का कहना है कि दसॉ प्रोजेक्ट को कब्जे में लेना चाहता है और सभी अहम फैसले अपने हाथ में रखना चाहता है। दूसरी ओर दसॉ का कहना है कि लीडरशिप के बिना प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ सकता।

दसॉ एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने हाल ही में पेरिस के पास एक नई राफेल फैक्ट्री के उद्घाटन पर अपने बयान से पूरे विवाद को और भड़का दिया। उन्होंने कहा कि फ्रांस अकेले भी यह फाइटर जेट बना सकता है। उन्होंने जर्मनी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि बर्लिन चाहे, तो वह भी अकेले यह काम कर सकता है, क्योंकि दसॉ के पास इस तरह की क्षमता पहले से है। उनका कहना था कि फ्रांस ने पिछले सत्तर सालों में मिराज और राफेल जैसे विमान बनाकर यह साबित किया है कि डिजाइन से लेकर प्रोडक्शन तक हर चरण में वह आत्मनिर्भर है।

FCAS dispute: इन वजहों से खटाई में पड़ी साझेदारी

दसॉ न्यू जेनरेशन फाइटर यानी NGF का प्राइम कॉन्ट्रैक्टर है, लेकिन स्पेन की एंट्री के बाद फैसलों में वह आउटवोटेड हो गया। फ्रांस की मांग है रि उसे NGF पर 80 फीसदी कंट्रोल दिया जाए। जर्मनी का आरोप है कि दसॉ फ्रांस में ज्यादातर काम रखना चाहता है और अगले फेज (डेमॉन्स्ट्रैटर बनाने) को ब्लॉक कर रहा है। दसॉ का कहना है कि स्पष्ट लीडरशिप के बिना प्रोजेक्ट धीमा हो रहा है। स्पेन के शामिल होने से एयरबस का शेयर 66 फीसदी हो गया, जिससे दसॉ को केवल 25-33 फीसदी काम मिल रहा है। दसॉ के मुताबिक, इससे “जॉइंट डिजाइन अथॉरिटी” मॉडल फेल हो रहा है। वहीं, जर्मनी के डिफेंस मिनिस्टर बोरिस पिस्टोरियस ने अगस्त 2025 में कहा कि जर्मनी प्रोजेक्ट में देरी और नहीं बर्दाश्त कर सकता”।

फ्रांस पहले भी हुआ था बाहर

यह भी कहा जा रहा है कि यूरोफाइटर प्रोजेक्ट के फेल होने के पीछे भी फ्रांस ही था। यूरोफाइटर टाइफून को यूरोपियन फाइटर एयरक्राफ्ट (EFA) या फ्यूचर यूरोपियन फाइटर एयरक्राफ्ट (FEFA) के नाम से जाना जाता था, जो चौथी पीढ़ी का मल्टी-रोल फाइटर जेट है। इसे 1983 में यूरोप के चार देशों जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, इटली और स्पेन के सहयोग से शुरू किया गया था। वहीं शुरुआत में फ्रांस भी इसका हिस्सा था, लेकिन वह 1985 में ही बाहर हो गया था। कहा जाता है कि फ्रेंच इंडस्ट्री हमेशा से सहयोग के खिलाफ रही, लेकिन पॉलिटिकल दबाव और यूरोपियन यूनियन के चलते ऐसा करना पड़ा।

जर्मनी तलाश रहा साझेदार

जर्मनी की स्थिति फिलहाल असमंजस में है। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस पहले ही यह कह चुके हैं कि प्रोजेक्ट में और देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। जर्मनी की संसद में तो यहां तक सुझाव दिया गया कि बर्लिन को इस प्रोजेक्ट से बाहर निकलकर किसी अन्य साझेदारी की ओर देखना चाहिए। इसके बाद खबरें आईं कि जर्मनी ब्रिटेन, इटली और जापान के साथ मिलकर चल रहे GCAP यानी ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम से जुड़ने पर विचार कर रहा है। यही नहीं, स्वीडन के साथ भी बातचीत की चर्चा है।

क्या कहना है स्पेन का

स्पेन इस विवाद में अपेक्षाकृत शांत है। उसकी भूमिका एयरबस के जरिए है और वह फ्रांस तथा जर्मनी के बीच सीधी खींचतान में नहीं पड़ना चाहता। लेकिन स्पेन भी प्रोजेक्ट में लगातार हो रही देरी से परेशान है क्योंकि इस पर उसकी वायुसेना के भविष्य की योजनाएं टिकी हैं। स्पेन का कहना है कि वह इस प्रोजेक्ट में पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। स्पेनिश प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने हाल ही में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “स्पेन की रुचि इस प्रोजेक्ट में तीनों देशों जर्मनी, फ्रांस और स्पेन द्वारा पहले से तय शर्तों पर पूरी तरह से है। सांचेज ने कहा कि FCAS “मूल वर्कशेयर डील” का सम्मान करे। बता दें कि स्पेन 2019 में फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम प्रोजेक्ट में शामिल हुआ था। वहीं, मैड्रिड ने अमेरिकी एफ-35 को भी ठुकरा कर FCAS या यूरोफाइटर टाइफून पर फोकस कर लिया।

वहीं स्पेन की कंपनी इंद्रा सिस्टेमास (Indra) इस प्रोजेक्ट में सेंसर, रिमोट कैरियर्स (ड्रोंस) और कॉम्बैट क्लाउड पर काम कर रही है। साथ ही, स्पेन कुल फंडिंग का लगभग 33 फीसदी (फ्रांस और जर्मनी के बराबर) दे रहा है।

वहीं, अगर फ्रांस नहीं मानता है, तो जर्मनी GCAP यानी यूके-इटली-जापान या स्वीडन से जुड़ सकता है। इससे स्पेन का नुकसान कम होगा। वहीं अगर FCAS सफल हुआ तो स्पेन को 100+ विमान मिलेंगे, जो EF-18 को 2040 तक रिप्लेस करेंगे।

क्या होंगी FCAS में खूबियां

फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम के तहत न्यू जेनरेशन फाइटर एक ट्विन इंजन डेल्टा विंग डिजाइन पर बेस्ड स्टेल्थ जेट होगा। इसकी रफ्तार मैक 2 से भी अधिक बताई जा रही है और इसमें आफ्टरबर्नर के बिना ही सुपरक्रूज की क्षमता होगी। इसका कॉम्बैट रेडियस लगभग 1500 किलोमीटर से ज्यादा होगा। इसमें इंटरनल वेपन्स बे होंगे, जिससे इसका रडार क्रॉस सेक्शन बेहद कम रहेगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कॉकपिट और सेंसर फ्यूजन की खूबी होगी। साथ ही यह फाइटर जेट विमान हाइपरसोनिक हथियारों और लेजर वेपंस तक ले जाने में सक्षम होगा।

रिमोट कैरियर्स इस प्रोजेक्ट का दूसरा अहम हिस्सा है। ये ऐसे ड्रोन्स होंगे जो अलग-अलग आकार और भूमिका में तैनात किए जा सकेंगे। इनका इस्तेमाल निगरानी, स्ट्राइक और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे मिशनों में किया जाएगा। इन्हें विमान या अन्य प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकेगा। ये पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से ऑपरेट होंगे लेकिन कंट्रोल नीचे क्रू के हाथों में रहेगा।

कॉम्बैट क्लाउड FCAS का तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक डिजिटल नेटवर्क होगा जो रीयल-टाइम डेटा शेयरिंग, साइबर सिक्योरिटी और बिग डेटा एनालिसिस की सुविधा देगा। इसकी मदद से वायु, थल, नौसेना और स्पेस सभी प्लेटफॉर्म एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे। यह नेटवर्क युद्ध के दौरान फैसले लेने में मदद करेगा।

FCAS के इंजन की बात करें, तो इसे सफरान और एमटीयू मिल कर बना रही हैं। इसमें वेरिएबल साइकिल एडवांस्ड टर्बोफैन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा, जिससे यह सुपरक्रूज कर सकेगा और साथ ही फ्यूल एफिशिएंसी भी बनी रहेगी। यह इंजन हाई थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो देने वाला होगा और इसमें ऐसा डिजाइन होगा जिससे इसका इन्फ्रारेड सिग्नेचर कम हो और दुश्मन इसे आसानी से ट्रैक न कर सके।

भारत को दिया था शामिल होने का ऑफर

जहां एक ओर यूरोप इस प्रोजेक्ट को लेकर बंटा हुआ नजर आ रहा है, वहीं भारत को भी इसमें शामिल होने का ऑफर दिया गया था। जर्मनी और स्पेन ने नवंबर 2024 में इस प्रोजेक्ट में भारत को ऑब्जर्वर स्टेटस देने का प्रस्ताव रखा था। जिसके तहत भारत इस प्रोजेक्ट की तकनीक को करीब से देख सकेगा और उसकी सप्लाई चेन यानी एवियोनिक्स, सेंसर, इंजन कंपोनेंट्स की सप्लाई में हिस्सा ले सकेगा। हालांकि इसमें भारत के पास फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं होता। वहीं, इसके लिए फ्रांस और स्पेन की मंजूरी जरूरी थी। खबरों के मुताबिक पिछले साल फ्रांस, जर्मनी औऱ स्पेन ने भारत में मल्टी लेटरल एक्सरसाइज तरंग शक्ति में हिस्सा लिया था। जो इस ऑफर का आधार का बना। हालांकि फ्रांस ने ऑफर का विरोध नहीं किया, लेकिन मंजूरी भी नहीं दी। वहीं भारत को डुअल ऑफर्स मिले। जहां भारत को FCAS के अलावा यूके-इटली-जापान के ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम- GCAP में भी आमंत्रित किया गया था।

भारत ने इसलिए किया रिजेक्ट

वहीं, भारत ने फरवरी 2025 में ऑफर को अस्वीकार कर दिया। भारत की प्राथमिकता फिलहाल अपना स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA प्रोजेक्ट पर है। भारत नहीं चाहता कि उसकी एनर्जी और रिसोर्सेज किसी विदेशी प्रोजेक्ट में उलझें। लेकिन अगर भारत को ऑब्जर्वर स्टेटस मिलता है तो उसकी प्राइवेट डिफेंस इंडस्ट्री को यूरोप की सप्लाई चेन में जुड़ने का बड़ा मौका मिल सकता था।

भारत के लिए यह स्थिति दिलचस्प है। एक ओर वह AMCA पर तेजी से काम कर रहा है, दूसरी ओर वह यूरोपीय तकनीक से सीखने का अवसर भी पा सकता है। लेकिन भारत के लिए प्राथमिकता आत्मनिर्भरता ही है और इसी वजह से उसने FCAS में शामिल होने का कोई औपचारिक प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। वहीं, भारत और सफरान मिल कर AMCA के लिए इंजन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इस समझौते के तहत भारत को पहली बार पूर्ण रूप से जेट इंजन की टेक्नोलॉजी मिलेगी। यह भारत का पहला 100 फीसदी स्वदेशी जेट इंजन होगा जिसे यहीं बनाया जाएगा। और सफरान ने 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश भी की है।

MiG-21 Retirement on Sept 26: A tradition over with MiG-21, the father tested so the son dropped the enemy ship

MiG-21 Retirement on Sept 26

MiG-21 Retirement on Sept 26: भारतीय वायुसेना के लिए साल 2025 बेहद अहम रहा है। पहले ऑपरेशन सिंदूर और अब वायुसेना के वर्कहॉर्स के नाम से मशहूर मिग-21 की विदाई भी इसी साल हो रही है। पिछले पांच दशकों से आसमान पर राज करने वाला मिग-21 26 सितंबर को भारतीय वायुसेना को अलविदा कह देगा। इनके साथ ही भारतीय वायुसेना के इतिहास का एक बड़ा अध्याय भी बंद हो जाएगा। भारतीय वायुसेना के इतिहास में शायद मिग-21 ही ऐसा फाइटर जेट रहा है, जिस पर पायलटों की कई पीढ़ियों ने ट्रेनिंग ली है। पिता ने भी मिग-21 को उड़ाया तो बेटे ने भी बाइसन पर ट्रेनिंग लेकर अपने करियर की नींव रखी। ऐसी ही एक कहानी है पाकिस्तान का एफ-16 गिराने वाले अभिनंदन वर्थमान की।

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MiG-21 Retirement on Sept 26: एफ-16 और मिग-21 की यादगार डॉगफाइट

साल 2019 का वह वाकया तो आपको याद होगा, जब बालाकोट एयर स्ट्राइक के अगले दिन भारत-पाकिस्तान के फाइटर जेट्स की डॉग फाइट हुई थी। इसी दौरान जब ग्रुप कैप्टन अभिनंदन वर्थमान ने पाकिस्तानी एफ-16 को अपने मिग-21 बाइसन से गिराया था। हालांकि उनका विमान भी गिरा और उन्हें पाकिस्तान ने बंदी बना लिया था। उस दौरान उनकी मूंछों वाली तस्वीर खूब वायरल हुई थी। ऐसा इतिहास में पहली बार था जब किसी MiG-21 ने अमेरिका के अत्याधुनिक एफ-16 को निशाना बनाया हो।

MiG-21 Retirement on Sept 26: दादा भी थे वायुसेना में

वहीं उनके पिता एयर मार्शल (रिटायर्ड) सिम्हकुत्ती वर्थमान भी कभी मिग-21 उड़ाते थे। वे चार दशक तक वायुसेना में रहे और कई युद्धों व अभियानों का हिस्सा बने। इससे पहले उनके दादा भी वायुसेना में रहे। यानी वर्थमान परिवार की तीन पीढ़ियां भारतीय आसमान की रखवाली करती रही हैं।

MiG-21 Retirement on Sept 26: 1973 में जॉइन की थी वायुसेना

तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित सैनिक स्कूल अमरावतीनगर से पढ़ाई करने के बाद एयर मार्शल सिम्हकुत्ती वर्थमान ने 1973 में वायुसेना जॉइन की। वे एक कुशल फाइटर पायलट बने और बाद में टेस्ट पायलट के रूप में जाने गए। उनके करियर के कई अहम पड़ाव भारतीय वायुसेना के इतिहास से जुड़े हुए हैं।

पूर्वी क्षेत्र में उन्होंने मिग-21 स्क्वॉड्रन की कमान संभाली। उनकी यूनिट ने 9,500 उड़ानें बिना किसी दुर्घटना के पूरी कीं, जिसके लिए उन्हें 2002 में विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। सिम्हकुत्ती ने MiG-21 के कई वेरिएंट्स जैसे टाइप 77 औऱ बाइसन उड़ाए।

1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वे ग्वालियर एयरबेस के चीफ ऑपरेशंस ऑफिसर थे। उनकी प्लानिंग और कॉर्डिनेशन के कारण मिराज-2000 विमानों का इस्तेमाल कर भारत ने पाकिस्तानी ठिकानों को सटीक निशाना बनाया। यह युद्ध भारतीय वायुसेना की क्षमता दिखाने वाला अहम मोड़ था।

बेंगलुरु की एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट (ASTE) में वे चीफ टेस्ट पायलट रहे। यहां उन्होंने मिग-21 सहित कई विमानों की टेस्टिंग की। बाद में 2011 में उन्हें ईस्टर्न एयर कमांड का प्रमुख बनाया गया और 2012 में वे रिटायर हुए। उनकी पत्नी डॉ. शोभा वर्थमान डॉक्टर हैं और बेटी अदिति फ्रांस में रहती हैं।

MiG-21 Retirement on Sept 26: हीरो बनकर लौटे थे अभिनंदन

वहीं, अभिनंदन 2004 में भारतीय वायुसेना में कमीशन हुए और फिर फाइटर पायलट बने। वे राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के पूर्व छात्र रहे हैं। अभिनंदन ने 16 साल तक मिग-21 उड़ाया और 3,000 से ज्यादा उड़ान घंटे पूरे किए।

26 फरवरी 2019 को भारत ने बालाकोट एयरस्ट्राइक कर पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को नष्ट किया, तो अगले दिन पाकिस्तानी वायुसेना ने जवाबी कार्रवाई की और एफ-16 समेत कई लड़ाकू विमान भारतीय सीमा में दाखिल हुए। अभिनंदन ने श्रीनगर एयर बेस से MiG-21 बाइसन से उड़ान भरी। इस दौरान अभिनंदन वर्थमान ने अपने मिग-21 बाइसन के साथ एफ-16 का मुकाबला किया।

उन्होंने हवा में डॉगफाइट कर एक एफ-16 को मार गिराया। लेकिन उनका मिग-21 भी गिरा और उन्हें पाकिस्तान की सीमा में लैंडिंग करनी पड़ी। उन्हें पाकिस्तानी सेना ने पकड़ लिया। दो दिन बाद पाकिस्तान ने उन्हें रिहा कर दिया और वे हीरो बनकर लौटे। इस मिशन में उनकी बहादुरी के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके थर्ड जनरेशन मिग-21 ने पुराने डिजाइन के बावजूद फोर्थ जनरेशन एफ-16 जैसे आधुनिक जेट को टक्कर दी।

पिता ने कहे थे ये शब्द

जब अभिनंदन पाकिस्तान की हिरासत में थे तो एयर मार्शल (रिटायर्ड) सिम्हकुत्ती वर्थमान ने अपने बेटे विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान की बहादुरी पर गर्व जताया था। पाकिस्तानी मीडिया में अभिनंदन के इंटरोगेशन वीडियो सामने आने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा था, “एक सच्चा सैनिक, देखिए कैसे बहादुरी से बोला। मैं प्रार्थना करता हूं कि उसे प्रताड़ित न किया जाए और वह सुरक्षित लौटे।” वहीं जब अभिनंदन रिहा हुए थे उनके पिता ने कहा, “हमारी प्रार्थनाएं सुन ली गईं,” और उन्होंने उनकी मिग-21 उड़ाने की क्षमता को परिवार का गौरव बताया।

एक युग का अंत!

भारतीय वायुसेना के इतिहास में मिग-21 सिर्फ एक फाइटर जेट नहीं है, बल्कि यह एक युग के खत्म होने जैसा है। इस विमान ने 1965, 1971 और 1999 के युद्धों में अपनी अहमियत साबित की। इसने पायलटों को वह अनुभव दिया, जिसने उन्हें अनुभवी बनाया। वर्थमान परिवार इसका जीता-जागता उदाहरण है। पिता और पुत्र दोनों ने अलग-अलग समय में इस विमान को उड़ाया। एक ने कारगिल युद्ध के समय प्लानिंग और स्ट्रैटेजी से इतिहास रचा, तो दूसरे ने पाकिस्तानी F-16 को मार गिराकर नई पीढ़ी के सामने साहस का उदाहरण पेश किया।

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MiG-21 flying hours

MiG-21 record flying hours: Some names in the history of the Indian Air Force are recorded, which are not just a person but a symbol of an era. The same name is Retired Air Comodore Surendra Singh Solitaire, who used to call his fellow pilot "Bundle". He was a fighter pilot of the Indian Air Force, who took the history by flying on the most Mig-21 in the world.

MiG21 in 1965 War: When MiG-21 in the rust of 1965 appeared for the first time its supersonic power, was stuttered by the Squadron Leader of the Pakistani Air Force

He alone completed more than 4003 hours on this single plane and 6316 sortiz (the flight mission) in himself is the only one who could not touch any more. This figure is so big that today it remains the world record. Even for the record flight from the Russian government to Mig-21, they had also given trophy in 2013.

MiG-21 flying hours
Anchit Gupta (Photo: Anchit Gupta on X)

MiG-21 record flying hours: Lifelong relationship with MiG-21

In the year 1965, the commission was received from the 92nd pilot course, Surendra Singh was involved in the Indian Air Force. This round was extremely challenging. The 1962 war with China and the 1965 rust with Pakistan had taught India that the strength of the air force must be increased continuously. At the same time India from the Soviet Union MiG-21 As Supersonic Jets included in their squadron.

The fate of the renunciation also brought him closer to Mig-21 at the same time. On 17th July 1968 he first blown Mig-21 at 45 Squadron, located Chandigarh. At that time pilots were blowing transonic aircraft like Hunter and Vampire. MiG-21 The speed and strength of the youth mandreled. He said, "When I lifted from Mig-21 runway with Afterburner, I felt like I’m left with Arjun’s bow. "The relationship that made after that first flight was sustained throughout life.

MiG-21 record flying hours: 1971 of India-Pak War making Turning Points

1971’s India-Pak War proved to be the decisive turn of the career of the Solitaire. At that time they were operating from Tejapur Airbase. During this war, he flew 22 sorties alone. His squadron bombarded enemy bases in Bangladesh and ravaged Dhaka Airbase. Indian Air Force first showed that MiG-21 Not just an interceptor but rather multi-rollfighter jet, can play every role up to ground attack, reconstance mission and electronic warfare.

MiG-21 flying hours
Anchit Gupta (Photo: Anchit Gupta on X)

MiG-21 record flying hours: Fighter Combat Leader and Trainer

Air Comodor Solitaire did not fly only on MiG-21 but also trained countless pilots. He became the Fighter Combat Leader (FCL) and also gave air-to-air combat as well as air-to-ground veneer training. He made the operational of several squadrons of Indian Air Force, including 3, 7, 17, 21 and 26 squadrons. His training technic was so impressive that in just 5 months 13 pilots were fully prepared for war.

MiG-21 record flying hours: MiG-21 blowing "study"

The flight of Mig-21 was not easy as per the resignation. But the style of their flight was extremely unique. They paid full attention to energy management and angle-of-attack. That’s why he MiG-21 Created records of thousands of hours safe flying on tough planes like. He said, "When the cockpit was closed, it seemed like they went to the stage of meditation. For every moment there was caution, control of speed and monitor of the enemy’s movements. "This was why they never encountered severe accident and completed thousands of hours flight while staying safe.

He also landed crashes with a speed of 400 km/hour on the basis of an engine failure in 1978, but escaped side-turn. Mastered the "snacking" (volatility above Mac 2.3) of Mig-21, which could go up to Mac 2.45.

His fellow pilots remember that they were always calm, restrained and disciplined. Anyone can understand how closely and responsibly they entered every flight.

MiG-21 record flying hours: Iraqi Air Force training

During the year 1981 to 1983, Surendra Singh was sent to Iraq. There he taught Iraqi Air Force to blow Mig-21. During this time, he took about 445 hours. This experience was extremely unique to them as they proved to be the capabilities of MiG-21 internationally.

MiG-21 flying hours
Anchit Gupta (Photo: Anchit Gupta on X)

MiG-21 record flying hours: Mother was like MiG-21

On 26th September 2025, Mig-21 will be departed from Indian Air Force. But before the stories of the giants like Air Comodor Surender Singh Solitaire will always be remembered. The renunciation himself said in an interview that Mig-21 was not just a plane for them but a mother. Sometimes, if there was a rhythm, sometimes forgiven. This relationship always connects them and Mig-21 to each other.

However, before the retirement in 2025 of Mig-21 Bison, at the age of 83 he also has the desire for a final sorting. It is believed that the day that the MiG-21 retirement will probably have a chance to fly with an active pilot in the two-seater trainer.

MiG-21 record flying hours: Indian Air Force Spine Mig-21

Indian Air Force used Mig-21 in multiple roles. At the beginning it was included as an interceptor, but over time it began to be carried out on such missions as bombardment, rocket attack, electronic warfare and reconstance. Mig-21 during the Kargil War helped the Indian Army strategically by drawing photographs of enemy checkpoints and bases.

Mig-21 remained the backbone of Indian Air Force for six decades. Just as F-16 has been Ahmed for the U.S. Mig-21 gave India’s air power new height. This is the aircraft, which also challenged Pakistan’s F-16, and in 2019, Group Capton Abhinandan Varthman dropped the F-16 of the enemy from this aircraft.

MiG-21 in 1971 War: Operation shifted from 54 years ago by MiG-21. It was tremendous ‘Prison Strike’, hands stooled "Gargian Angel"

MiG-21 in 1971 War

MiG-21 in 1971 War: Operation Sindoor is known today as Prison Target Strike; but in the same way today the air action on the Dhaka on 14 December 1971 has also been considered a Taga Prison Strike in history, 54 years ago. On that day, the Indian Air Force showed the skill, accuracy and restraint, which not only destroyed the target but also reduced damage to the common jam-mal around, just as the operation was in the centre. The attack was not just a military achievement, but also a decisive turn that transformed the political picture of South Asia.

The China War of 1962 had made India realize that the range of modern air forces cannot be safe without. India from the Soviet Union after this shock MiG-21 Purchase. The aircraft for the first time in 1963 joined the Indian Air Force. His delta wing design, supersonic speed and missile capacity gave India a new power. These were fast, supersonic interceptors.

MiG-21 Gun Troubles: The initial MiG-21 was ‘Ganless Jet’, read how Indian Air Force created an interceptor from the jugor Dogfighter

MiG-21 in 1971 War: 1965 No Kill Found in Rust

The first examination of Mig-21 took place in India-Pak war of 1965. At that time Pakistan had aircraft like the American F-86 Sabare and F-104 Starfighter. Only a squadron (Number 28, First Supersonics) at the time of the war of 1965 was Operational. This squadron was mainly deployed for the Defensive Sorty (Combat Air Patrol or CAP), especially in the Punjab region.
1965 in MiG-21 He tried several interceptions in the war, but no successful air won. On September 4, 1965, Mig-21 followed the Pakistani F-86 Sabur Jets and K-13 missiles were fired (2-3 missiles), but no hit. A suede pilot child escaped. While the MiG-21 was primarily used for high-level interceptions, there was no kill due to pilot training and reduction of missile liability.

The war of 1965 was primarily named Gnat and Hunter (Hunter) planes, but proved that Mig-21 is going to become the backbone of the Indian Air Force in the coming days.

Pilots of MiG-21 aircraft molded them in multiroll role by 1971. Due to the simplicity, speed and small size of MiG-21 it began to be called ‘WorkHors’, and it soon became the backbone of Indian Air Force.

MiG-21 in 1971 War: Pakistan was waiting for the "Gargen Angels"

In the mid-December 1971, the Indian Army moved rapidly into several parts of East Pakistan, and the Pakistani army was encircled around Dhaka. At that time the activities of the International Political Pressure and the U.S. Summer Fleet made the situation sensitive.

भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशॉ ने रेडियो पर बार-बार पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण करने की अपील की, लेकिन असर नहीं हुआ। पाकिस्तानी सैनिक “गार्जियन एंजल्स” यानी अमेरिका की मदद का इंतजार कर रहे थे। वास्तव में, अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पाकिस्तान को हथियार दिए थे और भारत को युद्ध से रोकने की चेतावनी भी दी थी। उन्होंने अमेरिकी सेवंथ फ्लीट को बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया। इसमें न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर य़ूएसएस एंटरप्राइजेज भी शामिल था। यह सीधे चिटगांव की ओर बढ़ रहा था।

MiG-21 in 1971 War: ढाका गवर्नर हाउस की अहम बैठक

भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पता लगाया कि पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर एएम मलिक ने ढाका सर्किट हाउस में एक अहम बैठक बुलाई है। इस बैठक में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि जॉन केली को भी बुलाया गया था। अगर इस बैठक से अंतरराष्ट्रीय दखल की अपील हो जाती, तो भारत की जीत अधर में लटक सकती थी। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने यह जानकारी तुरंत दिल्ली और एयरफोर्स तक पहुंचाई। आदेश साफ था – इस बैठक को हर हाल में रोका जाए। लेकिन किसी नागरिक या विदेशी को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

MiG-21 in 1971 War
IAF MiG-21 attack on Dhaka Governor House in 1971 war

MiG-21 in 1971 War: मिग-21 को मिला ऐतिहासिक आदेश

ऐसे हालात में सारी जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना और खासकर ग्रुप कैप्टन मैलकम वोलन पर आ गई। उनके पास दो MiG-21 स्क्वाड्रन की कमान थी। समस्या यह थी कि भारतीय पायलटों के पास ढाका का कोई सैन्य नक्शा नहीं था। आखिरकार पर्यटक नक्शे का सहारा लिया गया। विंग कमांडर बीके बिश्नोई को इस ऑपरेशन का नेतृत्व सौंपा गया। उनके साथ चार मिग-21 और दो हंटर विमान थे।

14 दिसंबर 1971: 20 मिनट की उड़ान और प्रिसिजन स्ट्राइक

मिग-21 ने गुवाहाटी और हाशीमारा एयरफील्ड से उड़ान भरी। ढाका पहुंचने में सिर्फ 20 मिनट लगे। आसमान से बिश्नोई ने देखा कि गवर्नर हाउस के बाहर कई गाड़ियां खड़ी थीं। उन्होंने अंदाजा लगाया कि बैठक वहीं चल रही है। गुंबद के नीचे ही कॉन्फ्रेंस रूम होगा।

MiG-21 in 1971 War
IAF MiG-21 attack on Dhaka Governor House in 1971 war

बिश्नोई ने आदेश दिया और मिग-21 ने रॉकेट दागे। ये सीधे गुंबद को चीरते हुए मीटिंग हॉल में गिरे। इसके बाद हंटर विमानों ने मशीन गन से हमला किया। यह हमला इतना सटीक था कि किसी आम नागरिक को नुकसान नहीं हुआ, लेकिन बैठक तहस-नहस हो गई। गवर्नर मलिक ने तुरंत इस्तीफा लिखकर संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी कार्यालय का रुख किया। सिर्फ 48 घंटे के भीतर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने 90,000 सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया।

16 दिसंबर को ढाका में भारतीय सेना ने जीत का परचम लहराया और बांग्लादेश का जन्म हुआ।

ग्रुप कैप्टन मैलकम वोलन को उनकी भूमिका के लिए वीर चक्र से सम्मानित किया गया। विंग कमांडर बी.के. बिश्नोई और उनके साथियों का नाम इतिहास में अमर हो गया। इस प्रिसिजन स्ट्राइक के बाद मिग-21 भारत का “हीरो” बन गया।

MiG-21 in 1971 War: पश्चिमी मोर्चे पर भी किया कमाल

पूर्वी मोर्चे के अलावा मिग-21 ने पश्चिमी मोर्चे पर भी शानदार प्रदर्शन किया। 12 दिसंबर को जामनगर में पाकिस्तानी F-104 ने हमला किया। फ्लाइट लेफ्टिनेंट बीबी सोनी ने मिग-21 से उसका पीछा किया और गनफायर से गिरा दिया। मिग-21 से पाकिस्तान के दिग्गज पायलट विंग कमांडर मर्विन मिडलकॉट को मार गिराया। यह दुनिया की पहली घटना थी जब मिग-21 ने एफ-104 स्टारफाइटर को मार गिराया। 16 और 17 दिसंबर को राजस्थान के उत्तरलई सेक्टर में स्क्वाड्रन लीडर आईएस बिंद्रा और उनके साथियों ने भी पाकिस्तानी एफ-104 स्टारफाइटर को मिसाइल और गन दोनों से निशाना बनाया।

असली सुपरसोनिक गनफाइटर

1971 युद्ध के बाद भारतीय वायुसेना ने तय किया कि हर MiG-21 में गन होना जरूरी है। रूस और भारत ने मिलकर मिग-21एमएफ (MiG-21MF) तैयार किया, जिसमें गन को विमान के भीतर फिट किया गया। भारतीय इंजीनियरों ने यहां तक जुगाड़ निकाला कि गन के कारतूसों को विमान के एयर इनटेक के चारों ओर लपेटकर रखा जाए। साथ ही आधुनिक ASP-PFD गाइरो गनसाइट भी लगाया गया। इससे मिग-21 एक असली सुपरसोनिक गनफाइटर बन गया।

60 Years of 1965 War: Hajipier, the real answer and the rust of Dogri wrote the story of victory in the rust of 65, the waiters miss the war of the fresh

60 Years of 1965 War
Indian Army in Lahore

60 Years of 1965 War: India-Pakistani’s rust in 1965 even if 60 years have passed. But many of the wetlands that have shown their hearts in rust are still fresh today. Just as soon as it is rusted. While the 1965 rust began in April 1965 from the barn areas of the run-off clever, where Pakistan began to shackles small to explore India’s willpower. These naps heated the atmosphere and Pakistan had delusions that India will quickly come under pressure if he would infiltrate in Jammu and Kashmir.

Haji Pir Pass: Indian army won twice Haji Pir Pass, but returned, panic do here infiltration

60 Years of 1965 War: Battle of Operation Gibraltar and Hajipier

Pakistan launched Operation Gibraltar in August 1965. Thousands of armed intruders were sent to J&K so that local rebellion can be erected. The Indian Army immediately took action and took control of the situation. On 28th August 1965, Indian soldiers captured Hajipier Pass. It was extremely important to have a strategic vision as the intruders were enrolled in India.

Veteran Retired Brigadier Arvinder Singh (1 para) was the company commander in this operation. He said, "Haziper was not easy to capture. Breathing at a height of 8500–9000 feet was also difficult. The enemy from above was attacking by height. We didn’t have the support of artillery, there were only small weapons. Hand-held battle also occurred. My seven young martyrs were injured and I was injured myself. But the capture of Darre was our greatest achievement. ""

In their memories, the difficulties of that round are still fresh today. He said that the infiltration in the valley is reduced to 90 per cent if Hajipier passes to India today.

60 Years of 1965 War: Pakistan’s Operation Grand Slam

The operation of Gibraltar was disappointed by Pakistan. At the beginning of September he began the operation Grand Slam. The aim was to break the contact of India of the Kashmir Valley by capturing Akhanur. At the same time, Pakistan attacked large-scale tanks in the Khmerising area of Punjab.

But the Indian army countered the robbery. The Battle of the Actual North in Quarification is considered to be one of the largest wins in India. Indian soldiers threw over 100 paton tanks. After this win, the memorization began to be called the "Gravyard of Pattons" tank.

Veteran Col Bansi Red (1/9 Gorakh regiment) was the witness of that battle. "The enemy in the morning of September 8 attacked with tanks. Our piece had already handled front. 94 tanks of the enemy devastated. We did not leave the ground despite the artillery and air attacks for several days. ""

"On September 5, we were sent to Khemman Sector. The enemy attacked the tanks in the morning of September 8. We had already handled the front. Our ensemble devastated many enemy tanks. We did not leave the ground despite frequent artillery and air attacks. In this area, 94 tanks of Pakistan were devastated. That’s why it’s called Gravure of Pattons. ""

The heroism of the company Quarter Master Hwaldar Abdul Hamid in this corrosion is still remembered today. He devastated several Patton tanks alone and was honored with PVC.

60 Years of 1965 War
1965 War Veterans interacting with COAS

60 Years of 1965 War: Lahore and Sialkot to Increased Indian Army

On September 6, 1965, India took the international border and started moving towards Lahore and Sialkot. During this period, Dogri’s rust was extremely important.

Veteran Major RS Baydi (14 Horses – Sind Horses) released the tank ensemble on this front. "On September 17, we found the order to move toward Dogri. The enemy carried out vigorous firing. My tank lifted water from the enemy pill. Two men were killed, I was seriously injured. But I took my driver out of the burning tank. It was believed to be the work of gallantry and I found the heroic cycle. ""

Bedi further told that India strengthened intelligence agencies after the war. That was why in 1969 Raw Bunny and later NTRO was established, which he played an important role in standing in 2003. He reported that the Intelligence system and strengthened in India after the 1965 war.

60 Years of 1965 War: Rust of Filura and Chavinda

लाहौर और सियालकोट की तरफ बढ़ते हुए भारतीय सेना ने फिल्लौरा और चाविंडा में भीषण टैंक लड़ाइयां लड़ीं। यहां भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान के हमले को रोकते हुए अपनी ताकत दिखाई। वहीं, राजस्थान सेक्टर में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान के अंदर मोर्चाबंदी शुरू करते हुए मुनाबाओ और गडरा रोड पर कब्जा किया। इससे भारतीय सेना ने यह साबित किया कि वह रेगिस्तानी मोर्चों पर भी बड़े पैमाने पर युद्ध लड़ सकती है। वहीं, शकरगढ़ बुल्ज क्षेत्र में टैंकों की भीषण लड़ाई हुई। भारतीय सेना ने पाकिस्तान को रोकते हुए जम्मू–पठानकोट मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित की।

60 Years of 1965 War
Maj Sudarshan Singh, father of Additional Director General (ADG) of Strategic Communication interacting with COAS General Upendra Dwivedi and Raksha Mantri Rajnath Singh

60 Years of 1965 War: मेजर सुदर्शन सिंह ने साझा की यादें

1965 के भारत–पाक युद्ध को गुजरे हुए 60 साल बीत चुके हैं, लेकिन उस दौर की यादें आज भी जीवंत हैं। 1 डोगरा रेजिमेंट के अधिकारी रहे वेटरन मेजर सुदर्शन सिंह उस समय सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर थे। उन्होंने उस दौर के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया, “हमें बिना ज्यादा ट्रेनिंग के आदेश मिला कि सीमा पर जाना है। मुझे बस आदेश मिला और मैंने सोचा कि आदेश का पालन करना ही मेरा कर्तव्य है। उस समय यह नहीं सोचते थे कि आगे क्या होगा। बस ड्यूटी समझकर सीमा पर जाना था।”

मेजर सुदर्शन सिंह ने कहा कि उस समय वे प्लाटून कमांडर थे। उनका मुख्य काम रात में सामान और गोला-बारूद पहुंचाना था, जो बेहद तनावपूर्ण होता था। रात के अंधेरे में कभी नहीं पता होता था कि दुश्मन कब सामने आ जाएगा। दिन में ज्यादा मूवमेंट संभव नहीं था क्योंकि दुश्मन के हवाई हमले का खतरा हमेशा मंडराता था।

उन्होंने एक खास मिशन का जिक्र करते हुए कहा, “मुझे आदेश मिला कि ढोलन गांव की स्थिति का पता लगाओ। अगर वह पाकिस्तान के कब्जे में है, तो दुश्मन को आगे बढ़ने मत देना और अगर खाली है तो उसे कब्जे में लेना। यह काम बेहद जोखिम भरा था लेकिन यही हमारी जिम्मेदारी थी।”

60 Years of 1965 War: पहुंच चुके थे लाहौर के नजदीक

मेजर सुदर्शन सिंह से जब पूछा गया कि क्या 1965 में भारतीय सेना लाहौर तक पहुंच गई थी, तो उन्होंने कहा कि उस समय सैनिकों को स्पष्ट आदेश नहीं दिए जाते थे। कई बार सिर्फ यह बताया जाता था कि आगे बढ़ो और कब्जा करो। “हम लाहौर के बिल्कुल नजदीक तक पहुंचे थे, लेकिन उसके बाद हमें वापस बुला लिया गया।”

“युद्ध कभी अच्छा नहीं होता”

आज की आधुनिक युद्ध प्रणाली और 1965 के युद्ध की तुलना पर उन्होंने कहा, “वह पारंपरिक युद्ध था और आज का युद्ध ड्रोन और तकनीक पर आधारित है। लेकिन सच्चाई यह है कि युद्ध कभी अच्छा नहीं होता। यह देश की अर्थव्यवस्था और व्यवस्था को पीछे धकेल देता है। युद्ध से कोई लाभ नहीं होता।”

23 सितंबर 1965 को संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से युद्धविराम हुआ। पाकिस्तान की कोशिश थी कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति बदली जाए, लेकिन भारतीय सेना ने उसे पूरी तरह नाकाम कर दिया।

Relocation of terror camps: After the operation shift from the base POK of the Jash-Hizbull after the transfer, the terror in preparation for large recruitment in the occupation on September 25,

Relocation of terror camps
Marqaz Shuhuhuda-e-Islam

Relocation of terror camps: The strategy of active panic organizations in Pakistan is being seen after operation shifter. The Indian Army had demolished at least nine large panic bases in Pakistan authorized Kashmir (POK) as per intelligence sources. After which the panic Pakistan has released the decree of shifting these organizations into its base Khabar Pakhtunkhwa (KPK) province.

Pakistan Terror Funding: Terrorist, Jash-e-Mohammed launched in the world’s eyes through digital wallets. Fundraising Network of Rs 3.91 billion

According to the formulas, organizations such as Jash-A-Mohammed and Hizbul Mujahidin now consider POK as unsafe. They think the POK is no longer safe in front of the ability of the exact attack of the Indian Army. That’s why they’ve stumbled Khabar Pakhtunkhwa i.e. K.P.K., as the geographical conditions are completely different here. At the same time, Ahadi Safe Haven already exists near Afghan Border and Pakistan’s government agencies have a direct support.

Relocation of terror camps
Mulana Mufti Masood Ilyasi Alias Abu Mohammad

Relocation of terror camps: Mansehra Games

According to the formulas, the greatest information has been revealed from the Garhi Hubibulla Kasbe in Mansehra district. Jash-e-Mohammed had organized a public recruitment campaign about seven hours before the India-Pakistan Cricket Match began on 14 September 2025.

हालांकि दिखावे के लिए इसे देवबंदी धार्मिक सम्मेलन बताया गया, लेकिन असल में यह जैश और जमीअत उलेमा-ए-इस्लाम द्वारा मिलकर चलाया गया भर्ती अभियान था। इस कार्यक्रम की अगुवाई जैश के खैबर पख्तूनख्वा और कश्मीर प्रभारी मौलाना मुफ्ती मसूद इलियास कश्मीरी उर्फ अबु मोहम्मद ने की। यह वही व्यक्ति है, जो जैश के संस्थापक मसूद अजहर का करीबी माना जाता है और भारत में वांछित आतंकियों की सूची में शामिल है।

इलियास कश्मीरी ने 14 सितंबर 2025 को खैबर पख्तूनख्वा के गढ़ी हबीबुल्लाह में आयोजित ‘मिशन मुस्तफा कॉन्फ्रेंस’ में बयान दिया था कि ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना ने बहावलपुर के मारकज सुब्हानअल्लाह (जैश का मुख्यालय) पर हमला किया, जिसमें मसूद अजहर का पूरा परिवार (बीवी, बेटे और बच्चे) “टुकड़े-टुकड़े हो गया”। उसने कहा, “सब कुछ कुर्बान करने के बाद, 7 मई को बहावलपुर में मौलाना मसूद अजहर के परिवार के लोग रेजा-रेजा हो गए, टुकड़ों में तक्सीम हो गए।” कश्मीरी ने दावा किया था कि पाकिस्तानी सेना और सेना प्रमुख आसिम मुनीर जैश को खुला समर्थन देते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय हमलों में मारे गए जैश सदस्यों के अंतिम संस्कार में पाकिस्तानी सेना के जनरल पहुंचे थे।

Relocation of terror camps
Inspector Liaqat Shah

Relocation of terror camps: पुलिस सुरक्षा में जैश का कार्यक्रम

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह पूरा कार्यक्रम पुलिस सुरक्षा में हुआ। स्थानीय पुलिस थाने का इंस्पेक्टर लियाकत शाह खुद मौजूद था। जेईएम के हथियारबंद आतंकी अमेरिकी एम-4 राइफल्स लेकर सुरक्षा में खड़े थे। इससे यह साफ है कि पाकिस्तान की सरकारी मशीनरी न सिर्फ इन संगठनों को संरक्षण देती है, बल्कि इनके खुलेआम कार्यक्रमों को भी सहयोग करती है।

Relocation of terror camps
Marqaz Shuhuda-e-Islam, Manshera-2

Relocation of terror camps: ओसामा बिन लादेन को बताया प्रिंस

सूत्रों ने बताया कि कार्यक्रम में मसूद इलियास कश्मीरी ने करीब 30 मिनट का भाषण दिया। उसने ओसामा बिन लादेन को शोहदा-ए-इस्लाम और प्रिंस ऑफ अरब कहकर पेश किया। साथ ही उसने जेईएम की विचारधारा को सीधे अल-कायदा की विरासत से जोड़ दिया।

उसने लोगों को याद दिलाया कि 1999 के कंधार हाइजैक के बाद जब मसूद अजहर भारत की जेल से छूटकर पाकिस्तान लौटा था, तब उसने खैबर पख्तूनख्वा के बालाकोट को अपना मुख्यालय बनाया था। उसने कहा कि केपीके हमेशा से मुजाहिदीन का सुरक्षित ठिकाना रहा है और आगे भी रहेगा।

Relocation of terror camps: ऑपरेशन सिंदूर का किया जिक्र

कश्मीरी ने अपने भाषण में साफ कहा कि 7 मई को जब भारत ने जैश के मरकज सुब्हानअल्लाह कैंप पर हमला किया और मसूद अजहर के परिवार के कई सदस्य मारे गए, तब पाकिस्तानी सेना ने इसे गंभीर मानते हुए जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) से आदेश जारी किया। जिसके अनुसार, सेना के अधिकारियों ने आतंकियों के जनाजे में सलामी दी और पाकिस्तान एयर फोर्स ने ऊपर से सुरक्षा दी। वहीं, कश्मीरी के इस बयान से यह खुलासा हुआ कि पाकिस्तान की सेना खुद इन आतंकियों को शहीद मानती है और खुलेआम उनका सम्मान करती है।

Relocation of terror camps
JeM planning another gathering on 25 Sep 25 at Peshawar

Relocation of terror camps: भर्ती कैंप और नए ट्रेनिंग सेंटर

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक यह पूरा आयोजन दरअसल भर्ती के लिए था। सूत्रों ने पुष्टि की है कि मंसेहरा में मरकज शोहदा-ए-इस्लाम नामक ट्रेनिंग कैंप का विस्तार भी किया जा रहा है। लोगों को खुलेआम कहा गया कि वे जैश में भर्ती हों और जिहाद के लिए तैयार रहें।

स्थानीय लोगों ने यह भी बताया कि इस कैंप में पिछले कुछ महीनों से लगातार निर्माण कार्य और सामग्री की सप्लाई बढ़ी है। इससे यह साफ है कि ऑपरेशन सिंदूर में पीओके के अड्डे नष्ट होने के बाद जैश ने अपने नए ठिकाने के रूप में केपीके को चुना है।

Relocation of terror camps: पेशावर में अगला बड़ा इवेंट

सूत्रों ने बताया कि जैश अब 25 सितंबर 2025 को पेशावर में मरकज शहीद मकसूदाबाद में एक और बड़ा कार्यक्रम करने जा रहा है। यह सभा मसूद अजहर के भाई यूसुफ अजहर की याद में होगी, जो ऑपरेशन सिंदूर में मारा गया था।

इस कार्यक्रम का आयोजन जैश के नए नाम अल-मुराबितून के तहत किया जाएगा। यह नाम पश्चिम अफ्रीका के एक अल-कायदा समूह से मिलता-जुलता है, जिसका अर्थ है – इस्लाम की जमीन के रक्षक। सूत्रों का कहना है कि नाम बदलकर जैश अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचना चाहता है, क्योंकि यह पहले से प्रतिबंधित संगठन है।

Relocation of terror camps
HIZBUL MUJAHIDDEN CAMP RELOCATION TO KPK

Relocation of terror camps: हिजबुल मुजाहिदीन का नया ठिकाना

सिर्फ जैश ही नहीं, बल्कि हिजबुल मुजाहिदीन ने भी खैबर पख्तूनख्वा यानी केपीके में अपने ठिकाने बनाने शुरू कर दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व पाकिस्तानी कमांडो खालिद खान की अगुवाई में लोअर दिर जिले के बंडाई इलाके में नया ट्रेनिंग सेंटर एचएम- 313 बनाया जा रहा है।

Relocation of terror camps
Khalid Khan, Hizbul Mujahideen Commander (ex Pak Army Commando)

यह जमीन अगस्त 2024 में खरीदी गई थी और अब ऑपरेशन सिंदूर के बाद यहां तेजी से निर्माण का काम चल रहा है। 313 नाम का सीधा संबंध इस्लामी इतिहास की बद्र की जंग और अल-कायदा की ब्रिगेड 313 से है। इससे साफ है कि हिजबुल अब वैश्विक जिहादी समूहों से अपनी पहचान जोड़ना चाहता है।

मसूद इलियास कश्मीरी की भूमिका

इस पूरी रणनीति के केंद्र में मसूद इलियास कश्मीरी है। वह 2001 से जैश से जुड़ा और 2007 में उसने पीओके में अपना ट्रेनिंग कैंप बनाया। बाद में उसे केपीके और कश्मीर का अमीर बनाया गया। वह 1980 के दशक में पाकिस्तानी सेना की स्पेशल सर्विस ग्रुप (SSG) में शामिल हुआ था। सोवियत-अफगान युद्ध (1979-1989) में उसने मुजाहिदीनों को माइन वारफेयर की ट्रेनिंग दी। इस दौरान उसने एक आंख और एक उंगली गंवा दी। 1990 के दशक में कश्मीर में भारत के खिलाफ लड़ाई लड़ी। हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (HuJI) के नेता कारी सैफुल्लाह अख्तर से मतभेद के बाद 313 ब्रिगेड नामक इसने अपनी यूनिट भी बनाई, जो अल-कायदा से जुड़ी हुई है। एक समय में इसे लादेन का उत्तराधिकारी भी कहा जाता था। वहीं, 2011 में अमेरिकी ड्रोन हमले में इसके मारे जाने की रिपोर्ट भी आई। लेकिन जून 2011 में टीटीपी ने इसे जिंदा बताया। वहीं, 2012 में यूएन ने इसे ‘रिपोर्टेडली डीड’ कहा, लेकिन हाल ही में इसके कई वीडियो सामने आने के बाद यह स्पष्ट है कि इलियास कश्मीरी अभी जिंदा है। इलियास कश्मीरी को दक्षिण एशिया के सबसे खतरनाक जिहादी कमांडरों में गिना जाता है।

Relocation of terror camps
MASOOD ILYAS KASHMIRI- JeM SENIOR COMMANDER & COMMANDER OF HILAL-UL-HAQ BRIAGDE (ALIAS PEOPLES’ ANTI FASCIST FRONT OR PAFF)

भारत की एनआईए चार्जशीट में उसका नाम 2018 के सुंजवां आर्मी कैंप अटैक में आया था, जिसमें छह भारतीय सैनिक और एक नागरिक शहीद हुए थे। 2019 में उसने लश्कर-ए-तैयबा और जैश की साझा ब्रिगेड हिलाल-उल-हक की कमान संभाली, जिसे बाद में पीपुल्स एंटी फासीस्ट फ्रंट (PAFF) नाम दिया गया।

जेईएम का नेता मसूद इलियास कश्मीरी सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका और इजराइल के खिलाफ भी जहर उगलता है। इसके बावजूद पाकिस्तान इन संगठनों को पनाह दे रहा है। यह वही नीति है जिसमें पाकिस्तान एक तरफ सहयोगी दिखता है और दूसरी तरफ आतंकियों को बढ़ावा देता है।

MiG-21 Gun Troubles: Starting MiG-21 was ‘Ganless Jet’, read how Indian Air Force created an interceptor from ‘jugada’ Dogfighter

MiG-21 Gun Troubles: How Indian Air Force overcame Soviet design flaws

MiG-21 Gun Troubles: पिछली सीरीज में हमने आपको बताया था कि कैसे 1965 की जंग में पहली बार सुपरसोनिक फाइटर जेट मिग-21 की एंट्री हुई। और कैसे विंग कमांडर एमएसडी “मैली” वॉलेन ने अपनी के-13 मिसाइल से एक सेबर को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन मिसाइल ग्राउंड क्लटर के चलते निशाना चूक गया, वहीं दूसरी मिसाइल भी नाकाम रही। हालांकि इससके बाद पाकिस्तान में MiG-21 को लेकर खौफ छा गया था कि भारत के फाइटरजेट उसके सेबर और अमेरिकी F-104 स्टारफाइटर का मुकाबला कर सकते हैं। लेकिन इसके बीच एक दिक्कत भी सामने आई कि मिग-21 के शुरुआती मॉडल्स में गन नहीं थी और मिसाइल पर निर्भरता ने पायलटों को युद्ध में कई बार मुश्किल में डाल दिया था।

MiG21 in 1965 War: When MiG-21 in the rust of 1965 appeared for the first time its supersonic power, was stuttered by the Squadron Leader of the Pakistani Air Force

MiG-21 Gun Troubles: एक्सपोर्ट वर्जन से कई जरूरी उपकरण हटाए

साल 1960 के दशक की शुरुआत में जब पहले MiG-21F भारत पहुंचे, तो पायलट हैरान रह गए। यह मॉडल बेहद साधारण और अधूरा था। एक्सपोर्ट वर्जन से कई जरूरी उपकरण हटा दिए गए थे। इनमें आईएफएफ यानी Identification Friend or Foe सिस्टम नहीं था, रेडियो बेहद कमजोर थे और सबसे चौंकाने वाली कमी थी गनसाइट का न होना।

इसमें लगा हुआ “रिंग-एंड-बीड” रेटिकल द्वितीय विश्व युद्ध के विमान जैसा था। जबकि दस साल पहले आए MiG-15 में भी बेहतर जायरो गनसाइट लगा था।

भारत को मिला अगला वर्जन था MiG-21F-13 (Type-74)। इसमें जायरो गनसाइट तो था, लेकिन वह भी 2.75G से ऊपर की स्थिति में फेल हो जाता था। यानी असली डॉगफाइट में यह पूरी तरह बेकार साबित होता। साफ था कि सोवियत डिजाइनरों ने इस विमान को मिसाइल-केंद्रित बनाया था और गन को केवल औपचारिकता मान लिया था।

MiG-21 Gun Troubles: How Indian Air Force overcame Soviet design flaws
A Pakistan Air Force F-86 Sabre in the Gunsight of an Indian Air Force MiG-21 in the 1965 war
(Photo By: IAF Pilot Sameer Joshi)

MiG-21 Gun Troubles: हर गोली 1 किलो वजनी

मिग-21F-13 में लगी थी NR-30 कैनन, जो कागज पर बेहद शक्तिशाली थी। इसकी हर गोली 1 किलो वजनी थी, जो पश्चिमी 30 मिमी राउंड्स से दोगुनी भारी थी। यह 1000 राउंड प्रति मिनट की रफ्तार से फायर कर सकती थी। लेकिन इसमें सिर्फ एक ही कैनन लगी थी, वह भी स्टारबोर्ड साइड पर, और मात्र 80 राउंड्स की फीड थी।

यह गन वास्तव में बॉम्बर्स को रोकने के लिए बनाई गई थी, न कि डॉगफाइट्स के लिए। रिटायर्ड एयर चीफ मार्शल एवाई टिपनिस ने बाद में कहा था कि गनसाइट इतनी सीमित थी कि टारगेट को हिट करने से पहले वह विमान की नाक के नीचे गायब हो जाता था।

MiG-21 Gun Troubles: मिग-21PF (Type-76) में गायब की गन

When MiG-21PF (Type-76) आया, तो सोवियत डिजाइनरों ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए गन को पूरी तरह हटा दिया। इसमें नया RP-21 सैफायर रडार लगाया गया था, लेकिन वजन और ईंधन की जरूरत के कारण गन निकाल दी गई। असल ने सोवियत डिजाइनरों ने मिग-21 को इंटरसेप्टर के तौर पर डिजाइन किया था, ना कि डॉगफाइट या कॉम्बैट रोल के लिए।

MiG-21 Gun Troubles
Source: Legacy of a Legend- MiG-21 in the Indian Air Force

पूरी सीरीज पढ़ने के लिए इस लिंक MiG-21 पर क्लिक करें….

अब यह विमान केवल दो K-13 (AA-2 Atoll) इंफ्रारेड मिसाइलों पर निर्भर था। सोवियत सोच के मुताबिक यह काफी था। पश्चिम में भी उस दौर में यही ट्रेंड था। F-4 Phantom II और English Electric Lightning भी बिना गन के आए। केवल फ्रांस ने असहमति जताई और अपने Mirage III में ट्विन DEFA कैनन लगाए।

लेकिन भारतीय वायुसेना के लिए यह फैसला खतरनाक साबित होना था।

MiG-21 Gun Troubles: 1965 पहली लड़ाई और फेल हुई मिसाइल

4 सितंबर 1965 को जम्मू के जौरियां-अख्नूर सेक्टर में MiG-21 का कॉम्बैट डेब्यू हुआ। योजना थी कि मिग-21PF आसमान को सुरक्षित रखेंगे और पाकिस्तानी स्टारफाइटर्स को फंसाएंगे।

मिशन लीड कर रहे थे विंग कमांडर मल्ली वोल्लेन। उनके साथ थे उनके विंगमैन मुखो। दोनों सोवियत प्रेशर सूट में आसमान में पेट्रोलिंग कर रहे थे। तभी दो पाकिस्तानी F-86 सेबर नजर आए। वोल्लेन ने मिसाइल लॉक किया और फायर किया। पहली K-13 मिसाइल जमीन में जा गिरी। उन्होंने दूसरी मिसाइल चलाई, वह भी लक्ष्य से चूककर नीचे गिरी। अब उनके पास कोई हथियार नहीं बचा था।

गुस्से और निराशा में उन्होंने तय कर लिया कि वे सेबर को रैम यानी (टक्कर) मारेंगे। मिग-21 इतनी नजदीक पहुंच गया कि टक्कर महज 10 मीटर दूर रह गई। आखिरी क्षण में उन्होंने विमान ऊपर खींच लिया। बाद में उन्होंने बेस पर उतरते ही कहा— “एक तोप के लिए… सिर्फ एक तोप के लिए!”

भारतीय प्रेशर के बाद लगाया GP-9 गन पॉड

भारतीय वायुसेना ने तुरंत महसूस किया कि मिसाइलों पर निर्भर रहना खतरनाक है। सोवियत संघ पर दबाव डाला गया और नतीजे में आया GP-9 गन पॉड। इसमें लगा था GSh-23 ट्विन-बैरल गन, जो 3000 राउंड प्रति मिनट की स्पीड से फायर करता था।

200 राउंड्स के साथ यह लगभग 1300 मीटर तक प्रभावी था। GP-9 को विमान के नीचे फिट किया जाता था। यह बेहद भरोसेमंद था और पायलटों के मुताबिक, “इसने कभी युद्ध में फायर करने से इनकार नहीं किया।” इससे इंजन पर असर नहीं पड़ता था और हैंडलिंग भी प्रभावित नहीं होती थी।

हालांकि, यह 490 लीटर का ड्रॉप टैंक हटा देता था, जिससे विमान की रेंज कम हो जाती। इसलिए हर स्क्वाड्रन में सिर्फ कुछ विमान गन फिटेड रहते, बाकी फ्यूल टैंक के साथ उड़ते।

दिक्कत और भी थी – इसमें लगा PKI-1 फिक्स्ड साइट बेहद साधारण था। यह पायलट को डॉगफाइट में कोई मदद नहीं देता थाा। यह केवल एक चमकता हुआ डॉट दिखाता था, जिससे पायलट को एंगल और स्पीड का हिसाब खुद लगाना पड़ता था। फिर भी, GP-9 ने पायलटों का आत्मविश्वास लौटा दिया। अब उनके पास मिसाइल फेल होने पर एक फाइनल हथियार था।

एचएएल से छीना काम

1970 तक गन पॉड आ चुका था, लेकिन स्क्वॉड्रन्स में फिटिंग की रफ्तार बेहद धीमी थी। 1971 में युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। IAF ने 90 GP-9 पॉड और 120 GSh-23 गन का ऑर्डर दिया था। स्क्वाड्रन लीडर डेनजिल कीलोर ने चेतावनी दी कि बिना गन और साइट के मिग-21 खतरनाक रूप से अधूरा रहेगा।

इस बीच, एयर मार्शल वाईवी माल्से ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने एचएएल नासिक से काम छीनकर थर्ड बीआरडी (बेस रिपेयर डिपो) चंडीगढ़ को सौंपा। तीन महीने में ही बीआरडी ने मिग-21 को गन पॉड और PKI-1 साइट के साथ तैयार कर दिया।

जुगाड़ गनसाइट

गन लगने के बावजूद गनसाइट की समस्या बनी रही। तब भरातीय वायुसेना ने अपने ग्नैट (Gnat) से ब्रिटिश एमके आईवीई जायरो सााइट निकाला और MiG-21 में उल्टा फिट कर दिया। आश्चर्यजनक रूप से यह काम कर गया।

12 दिसंबर 1971 को इसी सी-750 मिग-21FL ने पाकिस्तानी स्टारफाइटर को गिराया। यह भारतीय जुगाड़ की जीत थी, जिसने साबित किया कि मजबूरी में भी इनोवेशन से युद्ध जीता जा सकता है।

भारतीय वायुसेना का ‘गनलेस जेट’ को गनफाइटर बनाना

मिग-21 को सोवियत संघ ने एक मिसाइल इंटरसेप्टर बनाया था। लेकिन भारत ने इसे अपनी ज़रूरतों के हिसाब से डॉगफाइटर में बदल दिया। GP-9 गन पॉड और जुगाड़ साइट ने इसे वह ताकत दी, जिसने पाकिस्तान के सेबर और स्टारफाइटर्स के खिलाफ भारतीय पायलटों को निर्णायक बढ़त दी। मिग-21 को गनफाइटर बनाने का श्रेय भारतीय वायुसेना की जिद और मेहनत को जाता है। जहां सोवियत डिजाइनर मिसाइल पर भरोसा कर रहे थे, वहीं भारतीय पायलटों ने बार-बार साबित किया कि डॉगफाइट में गन की अहमियत कभी खत्म नहीं होती।

US Military in Bangladesh: Are there any major ‘sports’ in Chatgaon through Bangladesh? Why was Myanmar’s Army Commander active after India visit?

US Military in Bangladesh
A exercise between the Bangladesh Army's Para-Commandos and the US 221 Cavalry

US Military in Bangladesh: Bangladesh’s strategically Aham is increasing the US military activities in Chatgaon. After which both India and Myanmar have been alert. It is important that the geographical circumstance of Chatgaon is extremely important. Because it is extremely close to the Northeast and Myanmar borders of India. The impact of every bustle happening here can be directly on the safety of neighboring countries.

Nepal crisis: Is Nepal violence behind US-ISI’s hand, what is Bangladesh student movement connection?

On Sunday, the C-130J Super Hercules aircraft landed at Shah Amanat International Airport in Chatgaon. This aircraft usually operates from Japan’s Yokota Airbase. A growing interest in the US region is a matter of concern.

US Military in Bangladesh: Myanmar’s Army Commander

Myanmar Army’s Commander BSO-1, Leftinant General had visited India from 10th to 12th September and his four-member delegation. During this time he visited the Easter Command Headquarters located Vijay Durg, New Delhi, Agra, Gaya and Kolkata. The journey was part of the seventh Army-to-Army Staff Talks (AAST) between India and Myanmar.

इस यात्रा के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल को को ऊ ने ईस्टर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल राम चंदर तिवारी से मुलाकात की था। इस बैठक में दोनों पक्षों ने रक्षा सहयोग को बढ़ाने पर विस्तार से चर्चा की, खासकर कटिंग-एज टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में। फोकस दोनों देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर था, जिसमें सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना शामिल था। साथ ही, लेफ्टिनेंट जनरल को को ऊ ने 10-11 सितंबर को शत्रुजीत ब्रिगेड का भी दौरा किया था।

शत्रुजीत ब्रिगेड भारत की सेना की एक एलीट पैराशूट रेजिमेंट है, जो मुख्य रूप से कोलकाता, पश्चिम बंगाल में स्थित है। यह भारतीय सेना की 50वीं पैराशूट ब्रिगेड का हिस्सा है। शत्रुजीत ब्रिगेड का ऑपरेशनल बेस कोलकाता में है। यह ब्रिगेड पूर्वी कमांड के तहत काम करती है और रणनीतिक रूप से बंगाल की खाड़ी और पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

US Military in Bangladesh
BAF and US Air Forces Train Together in Chattogram

US Military in Bangladesh: लगातार चटगांव आ रहे हैं अमेरिकी सैन्य दल

अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार को सत्ता से हटाने के बाद अंतरिम प्रधानमंत्री मुहम्मद यूनुस की सरकार बनने के बाद से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी में तेजी आई है। यूनुस के शासनकाल में अमेरिकी सैन्य दल चटगांव और आसपास के इलाकों में अक्सर देखे गए हैं। कभी वे सर्वेक्षण मिशन पर आते हैं, तो कभी संयुक्त सैन्य अभ्यासों में शामिल होते हैं।

हाल ही में अमेरिका और बांग्लादेश ने मिलकर ऑपरेशन पैसिफिक एंजेल-25 और टाइगर लाइटनिंग-2025 अभ्यास चटगांव में आयोजित किए थे। इनमें एयर मोबिलिटी, आपदा प्रतिक्रिया और काउंटर टेररिज्म जैसी एक्सरसाइज शामिल थीं। सिलहेट के जलालाबाद कैंटोनमेंट में हुए टाइगर लाइटनिंग में अमेरिकी आर्मी पैसिफिक और बांग्लादेश आर्मी के 100 से अधिक सैनिक शामिल हुए। इसमें जंगल ऑपरेशन, मेडिकल इवैक्यूएशन और आईईडी डिफ्यूज करने की ट्रेनिंग दी गई थी।

सूत्रों ने बताया कि एक और संयुक्त अभ्यास की तैयारी चल रही है। पिछले सप्ताह अमेरिकी सैनिकों का एक नया दल चटगांव पहुंचा था। सितंबर 2025 में रैडिसन ब्लू होटल में 120 से अधिक अमेरिकी अधिकारी ठहरे थे, जो इस अभ्यास की योजना बना रहे थे।

US Military in Bangladesh: अमेरिकी अधिकारी की रहस्यमयी मौत

पिछले महीने 31 अगस्त 2025 को वेस्टिन होटल के रूम नंबर 808 में 50 वर्षीय टेरेंस आर्वेल जैक्सन का शव मिला। जैक्सन अमेरिकी आर्मी के एलीट फर्स्ट स्पेशल फोर्सेज कमांड एयरबोर्न के कमांड इंस्पेक्टर जनरल थे, जो नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग से जुड़े थे। वे अप्रैल 2025 से बांग्लादेश में तैनात थे और बांग्लादेशी सैनिकों को ट्रेनिंग दे रहे थे। ढाका पुलिस ने प्रारंभिक जांच में मौत को प्राकृतिक कारणों से बताया, लेकिन ऑटोप्सी न कराने और अमेरिकी दूतावास की तत्काल कार्रवाई ने मामले को और रहस्यमय बना दिया।

जैक्सन अप्रैल 2025 से बांग्लादेश में थे और कई जगहों पर सरकारी काम से घूम रहे थे। होटल में चेक-इन 29 अगस्त को किया था, लेकिन वे दो दिन पहले ही वहां पहुंच चुके थे। होटल स्टाफ ने दोपहर में रूम से कोई जवाब न मिलने पर पुलिस को सूचना दी। सीसीटीवी फुटेज में कोई संदिग्ध गतिविधि नजर नहीं आई। उनके पास 20 वर्षों से अधिक का अनुभव था। वे 2003 में नेशनल गार्ड में शामिल हुए, 2006 में आर्मी में इंफैंट्री ऑफिसर बने और बाद में स्पेशल फोर्सेज में पहुंचे। वे एशिया थिएटर में कई कॉम्बैट डिप्लॉयमेंट्स का हिस्सा रहे और अगले दो वर्षों में रिटायर होने वाले थे। बांग्लादेशी खुफिया एजेंसियों का कहना है कि सबूत बताते हैं कि वे ढाका और सिलहेट में बांग्लादेश आर्मी को ट्रेनिंग दे रहे थे। फोटोज में वे नाइन लाइन अपैरल पहने बांग्लादेशी सैनिकों को सेशन लेते दिखे, जो एक पूर्व स्पेशल फोर्सेज ऑफिसर की ब्रांड है। जैक्सन के अलावा कम से कम एक अन्य अमेरिकी स्पेशल फोर्स अधिकारी अभी भी बांग्लादेश में हैं।

इस मामले में जासूसी की आशंका भी जताई जा रही है। पाकिस्तानी आईएसआई की गतिविधियां बांग्लादेश में बढ़ रही हैं, जो रोहिंग्या रेडिकलाइजेशन और सीमा पार घुसपैठ से जुड़ी हैं। जैक्सन की मौत को आईएसआई और जिहादी एलिमेंट्स से जोड़ा जाा रहा है। सूत्रों का कहना है कि बांग्लादेश की अस्थिरता ने इसे कोवर्ट वॉर का बैटलग्राउंड बना दिया है।

वहीं, पूर्व अमेरिकी राजदूत एरियल हास की यात्राओं ने चिंता बढ़ी हैं। 5 अगस्त को हास ने कॉक्स बाजार में नेशनल कोऑर्डिनेशन प्लेटफॉर्म के पांच नेताओं से मिले, जो एंटी-डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट्स मूवमेंट से जुड़े हैं। भारतीय एजेंसियां इसे क्षेत्रीय सुरक्षा से जोड़ रही हैं।

US Military in Bangladesh: क्या सेंट मार्टिन आइलैंड चाहिए अमेरिका को?

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने हटाए जाने के पीछे अमेरिका की भूमिका बताई थी। उनका कहना था कि अमेरिका ने उन्हें सत्ता से इसलिए हटवाया क्योंकि उन्होंने सेंट मार्टिन आइलैंड अमेरिका को देने से इनकार कर दिया। बंगाल की खाड़ी में स्थित यह छोटा द्वीप सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।

हालांकि, हसीना के बेटे साजेब वाजेद ने इस आरोप को खारिज किया और अमेरिकी व्हाइट हाउस ने भी किसी साजिश से इनकार किया। फिर भी, हसीना के जाने के बाद यूनुस सरकार ने अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत किया। अमेरिका-बांग्लादेश के बीच हुए नए समझौते में टैरिफ की दरें भी 20 फीसदी रखी गईं, जो भारत से भी कम है।

US Military in Bangladesh: दुर्लभ खनिजों की है लड़ाई

चटगांव की गतिविधियां सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं हैं। म्यांमार में चल रहे गृहयुद्ध में सक्रिय काचिन इंडिपेंडेंस आर्गेनाइजेशन (KIA) जैसे विद्रोही समूह दुर्लभ खनिज संसाधनों पर नियंत्रण रखते हैं। अमेरिका और चीन दोनों इन विद्रोहियों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।

चीन ने बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट्स के तहत म्यांमार में अरबों डॉलर निवेश किए हैं, जबकि अमेरिका इन खनिजों को चीन से दूर रखना चाहता है। भारतीय खुफिया एजेंसियां भी इन गतिविधियों पर नजर रख रही हैं क्योंकि म्यांमार विद्रोहियों का असर भारत के पूर्वोत्तर में स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।

वहीं, अमेरिकी दूतावास का कहना है कि बांग्लादेश के साथ उनका सैन्य सहयोग पिछले 50 वर्षों से है। 2014 से अब तक अमेरिका ने 78 मिलियन डॉलर की फॉरेन मिलिट्री फाइनेंसिंग और 14 मिलियन डॉलर की इंटरनेशनल मिलिट्री एजुकेशन एंड ट्रेनिंग सहायता दी है। इसके तहत पैट्रोल बोट्स, वाहन, ट्रेनिंग और RQ-21 ब्लैकजैक ड्रोन शामिल हैं।

हालांकि, बांग्लादेश सेना अमेरिकी सैनिकों की बढ़ती मौजूदगी से पूरी तरह सहज नहीं है। सेना का कहना है कि संयुक्त अभ्यासों के अलावा अतिरिक्त सैनिकों की मौजूदगी से स्थानीय माहौल पर असर पड़ सकता है। ़

US Military in Bangladesh: भारत और म्यांमार की चिंता

भारतीय खुफिया एजेंसियों ने साफ कहा है कि चटगांव क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां पूर्वोत्तर की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं। असम, त्रिपुरा और मिजोरम जैसे राज्यों में म्यांमार से लगी संवेदनशील सीमाएं हैं। म्यांमार में सक्रिय विद्रोही गुट यदि बाहरी शक्तियों से समर्थन मिलता है, तो भारत की सुरक्षा चिंताएं और बढ़ सकती हैं।

MiG21 in 1965 War: When MiG-21 in the rust of 1965 appeared for the first time its supersonic power, was stuttered by the Squadron Leader of the Pakistani Air Force

MiG-21 in 1965 War: Debut of India’s First Supersonic Fighter Jet in Combat

MiG21 in 1965 War: अलविदा! मिग-21 सीरीज की इस कड़ी में हम बात कर रहे हैं, उस वक्त की, जब मिग को आए केवल दो साल ही हुए थे और भारत की सीमाओं पर एक दूसरे युद्ध ने दस्तक दे दी। 1962 की जंग से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोल दिया। पाकिस्तान ने “ऑपरेशन जिब्राल्टर” शुरू किया, जिसके तहत पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने जम्मू और कश्मीर में भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर अस्थिरता फैलानी की कोशिश की। वहीं, 65 की जंग केवल जमीनी लड़ाई तक सीमित नहीं थी, बल्कि आसमान में भी लड़ी गई थी। इसी युद्ध में पहली बार भारतीय वायुसेना ने अपने सुपरसोनिक जेट मिग-21 को जंग में उतारा। 1963 में सोवियत संघ से आए MiG-21 की भले ही इस जंग में सीमित भूमिका थी, लेकिन उनका युद्ध में उतरना ही जंग में एक अहम मोड़ साबित हुआ।

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MiG21 in 1965 War: 1963 में थे केवल छह एयरक्राफ्ट

भारत ने 1962 में फ्रांसीसी मिराज-III और अमेरिकी F-104 स्टारफाइटर जैसे विमान खरीदने पर विचार किया था। लेकिन सौदा सोवियत संघ के साथ हुआ क्योंकि उन्होंने भारत को न सिर्फ विमान देने बल्कि लाइसेंस प्रोडक्शन की अनुमति भी दी। यह उस दौर में भारत के लिए आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम था।

पहले बैच के पायलट और इंजीनियर 1963 में कजाखस्तान के लुगोवाया एयरबेस में ट्रेनिंग लेकर लौटे थे और 28 स्क्वॉड्रन “द फर्स्ट सुपरसॉनिक्स” बनाई। हालांकि उस समय केवल छह मिग-21F13 (टाइप-74) विमान ही उपलब्ध थे और कोई ट्रेनर एयरक्रफ्ट भी नहीं था।

जब 1 सितंबर 1965 को पाकिस्तान की 7वीं डिवीजन और 2 टैंक रेजीमेंट ने चंब-जौरियन सेक्टर में हमला बोला। अचानक हुए इस हमले ने भारतीय 191 ब्रिगेड को चौंका दिया और उसे काफी नुकसान हुआ। पाकिस्तानी सेना के इस तेज दबाव ने भारतीय सैनिकों को मुनावर तवी नदी तक पीछे धकेल दिया। यहां भारतीय सेना ने 20 लैंसर्स की एक AMX-13 टैंक स्क्वॉड्रन और 3 महार रेजीमेंट के सहारे रीयर गार्ड एक्शन किया। इस कार्रवाई के दौरान भारतीय वायुसेना के वैम्पायर और मिस्टेयर विमानों ने भी एयर स्ट्राइक्स की, जिससे पाकिस्तानी पैटन टैंकों की रफ्तार धीमे हो गई।

पाकिस्तानी 7वीं डिवीजन के कमांडर ने तुरंत हवाई मदद मांगी। इसके जवाब में पाकिस्तान वायुसेना के F-86 सेबर जेट विमानों ने सीजफायर लाइन पार की और इस हमले के दौरान भारतीय वायुसेना के तीन पुराने वैम्पायर जेट मार गिराए।

MiG21 in 1965 War: 3 सितंबर को गिराया पहला पाकिस्तानी सेबर जेट

3 सितम्बर 1965 को इस इलाके के ऊपर एक जबरदस्त हवाई मुठभेड़ हुई। इस दौरान भारतीय वायुसेना ने अपना पहला हवाई शिकार किया। नं. 23 स्क्वॉड्रन (पैंथर्स) के फ्लाइट लेफ्टिनेंट ट्रेवर कीलर ने, विंग कमांडर जॉनी ग्रीन की अगुवाई वाले ग्नैट (Gnat) विमानों के फॉर्मेशन का हिस्सा रहते हुए, पाकिस्तान वायुसेना का एक F-86F सेबर जेट मार गिराया। यह भारतीय वायुसेना की 1965 युद्ध की पहली बड़ी हवाई सफलता थी।

हालांकि अभी तक MiG-21 जंग के मैदान में नहीं उतरे थे। 1965 तक भारतीय वायुसेना के पास मिग-21 की सीमित संख्या थी। शुरुआती स्क्वॉड्रन में पायलट नए थे और ट्रेनिंग भी पूरी तरह से नहीं हो पाई थी। इसके बावजूद तब स्थिति को संभालने के लिए मिग-21 को भी एक्टिव करना पड़ा।

MiG21 in 1965 War: पाकिस्तानी विमान लगातार कर रहे थे हमला

4 सितंबर 1965 को जौरियन-अखनूर सेक्टर में भारतीय मिग-21 पहली बार दुश्मन के खिलाफ ऑपरेशन में उतरे। जौरियां उस समय भीषण लड़ाई का केंद्र बन चुका था। पाकिस्तानी सेना की 7वीं डिवीजन भारतीय सेना पर लगातार दबाव बना रही थी। इसी बीच पाकिस्तान एयर फोर्स ने दिनभर में 31 हवाई मिशन जौरियां सेक्टर पर चलाए। सबसे बड़ा हमला पाकिस्तान एयर फोर्स के 15 स्क्वॉड्रन ‘कोब्राज’ ने किया, जिसकी अगुवाई उनके कमांडिंग ऑफिसर स्क्वॉड्रन लीडर इरशाद कर रहे थे। 12 F-86 सेबर जेट्स के इस पैकेज को तीन फॉर्मेशनों में बांटा गया था। हर फॉर्मेशन चार–चार विमानों का था, जो पांच–पांच मिनट तक बारी-बारी से भारतीय सेना के ठिकानों पर हमला कर रहे थे।

पहले दो फॉर्मेशन ने अख्नूर–जौरियां मार्ग पर भारतीय सेना के ट्रकों और गाड़ियों पर 2.75 इंच रॉकेट्स दागकर आग लगा दी। इसके बाद आखिरी फॉर्मेशन, जिसका नेतृत्व स्क्वॉड्रन लीडर मुनीरुद्दीन अहमद कर रहे थे, नापाम बम लेकर हमला करने पहुंचा। मुनीरुद्दीन अहमद को खुशमिजाज और हकलाने वाली आदत के लिए जाना जाता था। वे अपने चार सेबर विमानों को लेकर जौरियां में 200 फीट की ऊंचाई पर आए। उन्होंने एक बिल्डिंग को सैन्य ठिकाना समझकर “बम रिलीज, बम रिलीज़” का आदेश दिया। नापाम बम जमीन पर गिरते ही भयंकर आग के गोले में बदल गए।

MiG21 in 1965 War: हकला गया था पाकिस्तानी स्क्वॉड्रन लीडर

हमले के बाद अहमद ने अपने फॉर्मेशन का रेडियो चेक किया, लेकिन वाइपर-4, यानी फ्लाइट लेफ्टिनेंट नासिर बट्ट का कोई जवाब नहीं आया। तभी उन्होंने अपने दाईं ओर एक आग की लकीर और धुएं का ट्रेल देखा, जो उनके विमान के बहुत करीब से गुजरा था। यह हमला था – और पहली बार उन्होंने सामने भारतीय वायुसेना का नया मिग-21 देखा। मुनीरुद्दीन अहमद रेडियो पर हकलाते हुए चिल्लाया – “कॉन्टैक्ट विद म-म-म-मिग-21, बाय गॉड ही नियर्ली हैड मी!”

यही वह क्षण था जब पाकिस्तान एयर फोर्स को आधिकारिक तौर पर पता चला कि भारतीय वायुसेना ने अब MiG-21 सुपरसोनिक जेट को भी युद्ध में उतार दिया है।

4 सितम्बर को मिग-21 की पहली उड़ान

भारतीय वायुसेना ने मिग-21 की 28 स्क्वॉड्रन द फर्स्ट सुपरसोनिक्स को तुरंत आदमपुर एयरबेस से पठानकोट भेज दिया था। स्क्वॉड्रन के कमांडर विंग कमांडर एमएसडी. ‘मल्ली’ वॉलेन और उनके फ्लाइट कमांडर स्क्वॉड्रन लीडर एके मुखर्जी ने 4 सितम्बर को अपनी पहली कॉम्बैट एयर पेट्रोल (CAP) उड़ान भरी।

विंग कमांडर एमएसडी “मैली” वॉलेन और स्क्वॉड्रन लीडर एके मुखर्जी की जोड़ी को पाकिस्तानी जहाजों को रोकने का आदेश मिला था। वॉलेन और मुखर्जी ने अपने MiG-21 T-76 वर्जन से कॉम्बैट एयर पेट्रोल शुरू किया। ये विमान दो के-13 एयर-टू-एयर मिसाइलों से लैस थे लेकिन इनमें गन नहीं थी। यह सोवियत यूनियन की उस समय की सोच थी कि मॉडर्न वॉरफेयर में मिसाइलें ही काफी होंगी।

चार पाकिस्तानी सेबर जेट्स को जौरियां पर थे, तभी MiG-21 ने उन्हें इंटरसेप्ट किया। लेकिन पहाड़ी इलाके की वजह से रडार क्लटर आ रहा था। तभी उनके साथी फ्लाइट लेफ्टिनेंट वीएस पाठानिया ने ग्नैट से एक सेबर को मार गिराया। वॉलेन ने अपनी के-13 मिसाइल से एक सबरे को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन मिसाइल ग्राउंड क्लटर के चलते लक्ष्य से भटक गई। दूसरी मिसाइल भी नाकाम रही। गुस्से में वॉलेन ने सबरे को टक्कर मारने की कोशिश की, लेकिन अंतिम क्षण में उन्होंने विमान ऊपर खींच लिया और टक्कर से बच गए।

हालांकि उस दिन कोई दुश्मन विमान नहीं गिरा, लेकिन पाकिस्तानी पायलटों ने पहली बार भारतीय मिग-21 को आसमान में देखा और रेडियो पर घबराकर इसकी पुष्टि भी की। यह मिग-21 का भारतीय उपमहाद्वीप में पहला एरियल कॉम्बैट था।

यह पहली बार था जब पाकिस्तान को पक्के तौर पर मालूम चला कि भारत ने अपने नए सुपरसोनिक MiG-21 को युद्ध में उतार दिया है। भले ही वॉलेन अपने शिकार को मार नहीं पाए, लेकिन यह मुकाबला इस बात का एलान था कि अब आसमान में भारतीय वायुसेना के पास भी एक ऐसा लड़ाकू विमान है, जो पाकिस्तान के F-104 स्टारफाइटर का सीधा मुकाबला कर सकता है।

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उस समय भारतीय मिग-21PF (टाइप-76) वैरिएंट में केवल मिसाइलें थीं और कैनन (तोप) नहीं था। यही वजह थी कि वॉलेन और मुखर्जी दुश्मन को निशाना बनाते हुए भी अंतिम सफलता हासिल नहीं कर सके। बाद में इस गलती से सबक लेकर मिग-21 के अन्य वर्जन में कैनन और आधुनिक हथियार जोड़े थे।

खौफ में आया पाकिस्तान

इस घटना के बाद पाकिस्तान एयर फोर्स ने अपने कई कॉम्बैट एसेट्स को सिर्फ मिग-21 को ट्रैक और बाइट करने में लगा दिए। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। पाकिस्तानी पायलट्स के बीच चर्चा होने लगी कि अगर मिसाइलें ठीक से काम कर जातीं या मिग-21 के पास गन होती, तो सेबर कभी बच नहीं पाता। यह डर आगे भी कायम रहा।

11 सितम्बर 1965 को पहला मैक-2 मुकाबला

इतिहास का पहला मैक-2 (सुपरसोनिक) बनाम मैक-2 हवाई मुकाबला भी इसी युद्ध में हुआ। 11 सितंबर को पाकिस्तानी एयर फोर्स का एक F-104 स्टारफाइटर पश्चिमी क्षेत्र में भारतीय वायुसेना के दो MiG-21 से भिड़ गया। हालांकि यह मुठभेड़ लंबी नहीं चली और पाकिस्तानी एयर फोर्स का पायलट पेड़ के ऊपर-नीचे उड़ान भरते हुए भाग निकला। भारतीय मिग-21 अब सीधे-सीधे पाकिस्तानी स्टारफाइटर को चुनौती दे रहा था।

पठानकोट में दो मिग-21 पर हमला

पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा मिग-21 से ही महसूस हुआ। यही वजह थी कि उन्होंने पठानकोट एयरबेस पर सबसे ज्यादा बमबारी की। 6 सितंबर को हुए एक हमले में पाकिस्तानी एयर फोर्स के विमानों ने वहां खड़े दो मिग-21 T-76 वर्जन को नष्ट कर दिया। यह पाकिस्तान की सोची-समझी रणनीति थी ताकि भारतीय वायुसेना अपने सुपरसोनिक फाइटर्स का ज्यादा इस्तेमाल न कर सके।

1965 के युद्ध में पाकिस्तानी एयर फोर्स को अमेरिका से मिले रडार सिस्टम ने बड़ा फायदा दिया। इसकी वजह से उनके पायलट्स को ग्राउंड कंट्रोल इंटरसेप्शन से बेहतर गाइडेंस मिलती थी। जबकि भारत के पास उस समय केवल अमृतसर का एक बड़ा रडार और ग्राउंड ऑब्जर्वर थे।

इसके अलावा पाकिस्तानी एयर फोर्स के पास AIM-9B साइडवाइंडर मिसाइल थी, जो भारतीय K-13 मिसाइल से ज्यादा एडवांस थी। पाकिस्तान ने 1965 में कम से कम तीन एयर-टू-एयर किल्स इन्हीं मिसाइलों से किए थे। लेकिन भारतीय मिग-21 पायलट्स ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने लगातार कॉम्बैट एयर पेट्रोल मिशन उड़ाए और पाकिस्तानियों को कभी भी बढ़त नहीं लेने दी।

हालांकि 1965 में मिग-21 की संख्या बहुत कम थी और युद्ध में कोई बड़ी जीत नहीं हुई, फिर भी इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत गहरा पड़ा। पाकिस्तानी वायुसेना जान गई कि अब भारत के पास ऐसा सुपरसोनिक जेट है जो उनके स्टारफाइटर और सेबर को टक्कर दे सकता है।

1965 का युद्ध मिग-21 के लिए एक टेस्टिंग ग्राउंड साबित हुआ। पायलटों ने सीखा कि सुपरसोनिक जेट को ग्राउंड कंट्रोल इंटरसेप्शन के साथ कैसे सिंक करना है। इसके साथ ही, मिसाइलों की सीमाएं भी पता चलीं, जिससे भविष्य में मिग-21FL और मिग-21Bis जैसे वर्जन में सुधार किए गए।

50 डिग्री तक पहुंच जाता था कॉकपिट का टेंपरेचर

रिटायर्ड एयर मार्शल विक्रम सिंह का कहना है कि MiG-21 भारतीय वायुसेना को “बड़े खिलाड़ियों के क्लब” में ले गया। इसकी मैक-2 (ध्वनि से दोगुनी गति) और हवाई मिसाइल क्षमता ने इसे उस दौर का सबसे आधुनिक विमान बना दिया। हालांकि 1965 में इसकी संख्या कम थी, लेकिन 1971 में यही जेट पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक साबित हुआ।

वह बताते हैं कि मिग-21 उड़ाना आसान नहीं था। कॉकपिट छोटा था औऱ समझने में मुश्किल होती थी। राजस्थान की गर्मी में कॉकपिट का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता था। लैंडिंग स्पीड 340 किमी/घंटा थी, जो बेहद चुनौतीपूर्ण थी। फिर भी भारतीय पायलटों ने इसे न सिर्फ संभाला बल्कि युद्ध में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया।

अलविदा! मिग-21 सीरीज आगे भी जारी…