📍नई दिल्ली | 9 Dec, 2025, 11:03 PM
Landmine crisis: लैंडमाइन मॉनिटर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 में 1114.82 वर्ग किमी जमीन बारूदी सुरंग से प्रभावित हुई और 1,05,604 बारूदी सुरंगों को खोजकर सुरक्षित रूप से नष्ट किया गया। यह आंकड़े चौंकने वाले हैं। दुनिया के कई हिस्सों में बारूदी सुरंग और युद्ध के विस्फोटक अवशेष आज भी लाखों लोगों की जिंदगी को खतरे में डालते हैं। जंग खत्म हो जाने के बाद भी यह खतरा सालों तक बरकरार रहता है और लंबे समय तक आम नागरिकों, बच्चों, किसानों और लौटने वाले विस्थापित परिवारों की जिंदगी को प्रभावित करता है।
मंगलवार को राजधानी दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आयोजित दूसरी सालाना इंडिया इंटरनेशनल फोरम ऑन माइन एक्शन एंड सेफ्टी (IIFOMAS) सिम्पोजियम 2025 में बारूदी सुरंगों से जुड़े खतरों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि लैंडमाइन यानी बारूदी सुरंगें हटाने का काम अब राष्ट्रीय प्राथमिकताओं, समावेशी विकास और दीर्घकालिक स्थिरता का अहम हिस्सा बन चुका है। सिंपोजियम में देश-विदेश से आए अधिकारियों ने बताया कि बारूदी सुरंगों से से भरे इलाके सालों वर्षों तक लोगों की जिंदगी को खतरे में डालते हैं और युद्ध खत्म होने के बाद भी मौतें जारी रहती हैं।

Landmine crisis: सीडीएस बोले- माइन एक्शन एक नैतिक मिशन
भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने वर्चुअल संबोधित करते हुए कहा कि माइन एक्शन केवल तकनीकी काम नहीं, बल्कि एक नैतिक मिशन है। उन्होंने कहा, “जब एक माइन हटती है, तो एक जिंदगी बचती है; जब एक हेक्टेयर जमीन साफ होती है, तो एक समुदाय फिर से बस सकता है।”
सीडीएस ने कहा कि इस मिशन में डिफेंस प्रोफेशनल्स, वेटरंस, ह्यूमैनिटेरियन वर्कर्स, पॉलिसी मेकर्स, इंडस्ट्री लीडर्स और एकेडमिक्स सभी की साझेदारी जरूरी है, क्योंकि माइन एक्शन सीधे मानवीय सुरक्षा और सामाजिक पुनर्निर्माण से जुड़ा हुआ है।
Landmine crisis: दुनिया भर में 12 करोड़ से ज्यादा लैंडमाइन
IIFOMAS बोर्ड के चेयरमैन रिटायर्ड मेजर जनरल अजय सेठ ने बताया कि दुनिया के लगभग 90 देशों में 80 से 120 मिलियन (8 से 12 करोड़) लैंडमाइन फैली हुई हैं। इन लैंडमाइनों ने ऐसे बड़े क्षेत्र को दूषित कर दिया है जहां लोग खेती या घर बनाने तो दूर, सुरक्षित तरीके से चल भी नहीं सकते। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में लगभग 35 फीसदी जमीन लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं हो पाई। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2023 में अफगानिस्तान के उसके 29 प्रांतों में से केवल दो ही बारूदी सुरंगों से मुक्त माने जाते हैं। जबकि कंबोडिया में गृहयुद्ध के बाद जमीन का बड़ा हिस्सा बरसों तक बेकार पड़ा रहा।
🇮🇳🌍 India’s Humanitarian Demining Efforts Gain Global Importance…
“With global mine-action funding on the decline, India’s role in humanitarian demining has become even more crucial. From Asia to Africa, India is quietly strengthening soft-power diplomacy by helping nations… pic.twitter.com/thI7TFeSdb— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December 9, 2025
उन्होंने बताया कि IIFOMAS का पूरा नाम है India International Forum on Mine Action and Safety। यह होराइजन ग्रुप का एक हिस्सा है। होराइजन ग्रुप कई देशों में बारूदी सुरंगों को साफ करने का काम करता रहा है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने साल 2024 में यह थिंक टैंक शुरू किया। पिछला साल पहला सिम्पोजियम था और इस साल दूसरा सिम्पोजियम हो रहा है।
दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लैंडमाइन की समस्या
मेजर जनरल अजय सेठ के मुताबिक IIFOMAS का मुख्य उद्देश्य है कि लोगों को बारूदी सुरंगों के खतरे के बारे में जागरूक किया जाए। आज दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लैंडमाइन की समस्या है। हर एक लैंडमाइन हादसा किसी की जिंदगी पूरी तरह बदल देता है। सबसे दुखद बात यह है कि 2024 की लैंडमाइन रिपोर्ट बताती है कि लैंडमाइन से होने वाले कुल हादसों में करीब 40 फीसदी बच्चे होते हैं। इसलिए भारत की जिम्मेदारी है कि वह खासकर दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के उन देशों की मदद करे जहां यह समस्या गंभीर है। हमें उनकी मदद करके डिमाइनिंग यानी सुरंगों को साफ करने के प्रयास बढ़ाने चाहिए।
माइन क्लीयरेंस बहुत जोखिम भरा काम
वहीं IIFOMAS के संस्थापक और डायरेक्टर जनरल कर्नल (सेवानिवृत्त) नवनीत एमपी मित्तल ने बताया कि गाजा में लगभग 7500 से 10,000 मिलियन मीट्रिक टन मलबा पड़ा है, जिसे तभी हटाया जा सकता है जब पूरा इलाका सुरक्षित घोषित हो। उन्होंने कहा कि बारूदी सुरंगें हटाना सिर्फ तकनीकी काम नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी, जमीन, घर, रोजगार और सामाजिक ढांचे को वापस खड़ा करने का काम है। जब जमीन सुरक्षित होती है, तभी लोग खेती कर सकते हैं, सड़कें बन सकती हैं और बच्चे स्कूल जा सकते हैं।

कर्नल मित्तल के मुताबिक, “माइन क्लीयरेंस बहुत जोखिम भरा, धीमा और महंगा काम है, लेकिन यह जरूरी है, क्योंकि इसके बिना कोई समाज युद्ध के बाद सामान्य जीवन में लौट नहीं सकता।”
उन्होंने बताया कि युद्ध क्षेत्र में जहां बिना फटे विस्फोटक होते हैं, वहां एक अकेला डिमाइनर (लैंडमाइन हटाने वाला व्यक्ति) एक दिन में 10 से 200 वर्ग मीटर जमीन ही साफ कर पाता है। जहां मशीनें लगती हैं, वहां रफ्तार बढ़कर 5,000 से 20,000 वर्ग मीटर प्रतिदिन तक हो जाती है। जबकि डॉग्स यानी खोजी कुत्ते 1000 से 1500 वर्ग मीटर प्रतिदिन तक सूंघकर खतरे पहचान सकते हैं। वहीं, रैट्स लगभग 400 वर्ग मीटर प्रतिदिन खोज पाते हैं।
इसके बाद असली प्रक्रिया शुरू होती है बारूदी सुरंग की पहचान करना, उसे सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय करना और जमीन को पूरी तरह साफ घोषित करना। यही वजह है कि माइन क्लीयरेंस बेहद धीमा और जोखिम भरा है।
लैंडमाइन बनाने की लागत 3 डॉलर, हटाने का खर्च 2000 डॉलर तक
कर्नल मित्तल ने कहा, “एक लैंडमाइन बनाने में करीब 3 डॉलर लगते हैं, लेकिन उसे हटाने में 1000 से 2000 डॉलर तक खर्च होता है। और दुनिया के आंकड़ों के मुताबिक हर 5000 लैंडमाइन साफ करते समय एक व्यक्ति की जान जाती है।”
आज दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में लाखों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र लैंडमाइन और विस्फोटक अवशेषों से भरा पड़ा है। इन्हें हटाने में अरबों डॉलर लगते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय फंडिंग इतनी नहीं है। पिछले दस सालों में फंडिंग लगभग 700–800 मिलियन डॉलर प्रति वर्ष ही रही है, जबकि जरूरत इसका कई गुना है।
उन्होंने बताया कि सिर्फ गाजा में माइन एक्शन के लिए 1 बिलियन डॉलर की जरूरत है। वहीं, यूक्रेन में यह आंकड़ा 20–30 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। (Landmine crisis)
‘250 साल लगेंगे लेबनान को साफ करने में’
पूर्व राजनयिक दिनकर श्रीवास्तव ने बताया कि लेबनान में जितना इलाका लैंडमाइनों से भरा है, उसे मौजूदा रफ्तार से साफ करने में 250 साल लगेंगे। उन्होंने कहा कि 2022 में केवल 25,000 वर्गमीटर जमीन साफ हो पाई थी।
उन्होंने बताया कि यूएन माइन एक्शन सर्विस की फंडिंग 7 साल में 125 मिलियन डॉलर से घटकर 46 मिलियन डॉलर रह गई है। उन्होंने यह भी बताया कि 2024 में 68 फीसदी माइन पीड़ित नागरिक थे। उन्होंने अपने अफ्रीका मिशन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि युद्ध खत्म होने के बाद भी बच्चे, किसान और मजदूर माइन के शिकार हो जाते हैं।
श्रीलंका ने लगभग 1 करोड़ लैंडमाइन हटाईं
कार्यक्रम में शामिल श्रीलंका की हाई कमिश्नर महिशिनी कॉलोन ने बताया कि उनके देश ने 2009 से अब तक लगभग 99 लाख लैंडमाइन हटाईं और 1.5 मिलियन अनएक्सप्लोडेड आर्डनेंस (UXO) नष्ट किए। इससे माइन हादसों में 99% कमी आई है, वहीं 2002 में 252 मौतों से घटकर 2024 में सिर्फ 3 तक रह गया। (Landmine crisis)

उन्होंने कहा कि इतने बड़े ऑपरेशन ने 9.17 लाख से ज्यादा लोगों को उनके घर लौटने, खेती शुरू करने और जीवन को फिर से पटरी पर लाने में मदद की। श्रीलंका ने 2017 में एंटी-पर्सनल माइन बैन कन्वेंशन को अपनाकर अपनी मानवीय प्रतिबद्धता मजबूत की।
लेकिन उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि 2024 के बाद से अंतरराष्ट्रीय सहायता 45 फीसदी गिर गई है, जिससे डी-माइनिंग कार्य बाधित हो रहा है। अभी भी 23 वर्ग किलोमीटर संदिग्ध क्षेत्र साफ होना बाकी है।
भारत में IEDs का बदलता खतरा- डिप्टी एनएसए पंकज सिंह की बड़ी चेतावनी
रिटायर्ड आईपीएस और वर्तमान में डिप्टी एनएसए पंकज सिंह ने बताया कि भारत में आईईडी यानी इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस समय के साथ बहुत खतरनाक और चालाक तरीके से बदलते गए हैं। शुरुआत 1985 में दिल्ली में बने साधारण ट्रांजिस्टर बम से शुरू हुई, लेकिन ये तकनीक अब प्रेशर कुकर, साइकिल, खिलौने, डॉल और कई सामान्य चीजों में छिपाई जाने लगी। जयपुर, अहमदाबाद और हैदराबाद में ऐसे बमों से भारी तबाही मचाई हुई। (Landmine crisis)

उन्होंने कहा कि आईईडी बनाने में इस्तेमाल होने वाला सामान जैसे कमर्शियल एक्सप्लोसिव, फर्टिलाइजर, जेलटिन स्टिक्स और डेटोनेटर अक्सर खनन क्षेत्रों, पुलिस या रक्षा डिपो से चोरी किए जाते हैं। कुछ सामान ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पर उपलब्ध है।
उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने मृत सीआरपीएफ जवानों के शरीर के अंदर विस्फोटक भरकर सिल दिया था, ताकि पोस्ट-मॉर्टम के दौरान धमाका हो सके। अब तो ड्रोन से भी मैग्नेटिक आईईडी गिराए जा रहे हैं, जैसा जम्मू एयरपोर्ट पर देखने को मिला थ। पुलवामा हमला और कोच्चि व बेंगलुरु के ब्लास्ट भी इसी तरह की घटनाएं थीं। वहीं, ड्रोन अब 100 किलो तक का वजन ले जाकर हथियार पहुंचा सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ड्रोन और एआई से जुड़ी नई तकनीकें भविष्य में इस खतरे को और बढ़ा सकती हैं। (Landmine crisis)
बड़ी चुनौती: बजट घटा रहे देश
मेजर जनरल अजय सेठ का कहना है कि कि इस काम में सबसे बड़ी चुनौती है फंडिंग, यानी पैसों की कमी। पहले अमेरिका, जापान, जर्मनी और कई यूरोपीय देश इस काम के लिए बहुत मदद करते थे। लेकिन अब लगभग सभी देशों ने इस क्षेत्र में अपना बजट घटा दिया है। इस वजह से डिमाइनिंग प्रोजेक्ट प्रभावित हो रहे हैं। दूसरी चुनौती है मैनपावर, यानी लोगों की कमी। लैंडमाइन हटाने का काम बहुत मेहनत और बड़ी टीमों की जरूरत वाला काम है। इसके लिए विशेष ट्रेनिंग वाली टीमों का होना जरूरी है। जबकि तीसरी चुनौती है तकनीक। जिस तरह बारूदी सुरंगों की तकनीक लगातार बदल रही है, उसी तरह उन्हें खोजने और हटाने की तकनीक भी आधुनिक होनी चाहिए। नई मशीनों, सेंसर्स और सिस्टम की जरूरत बढ़ती जा रही है। (Landmine crisis)
भारत सरकार से की यह अपील
उन्होंने भारत सरकार से तीन महत्वपूर्ण अपीलें रखीं। जिसमें भारत को मानवीय लैंडमाइन एक्शन को अपनी ग्लोबल डिप्लोमैटिक पहल बनाना चाहिए। इस काम के लिए बजट और प्रबंधन को स्कूल, सड़क, और स्वास्थ्य सेवाओं की तरह महत्वपूर्ण मानकर आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही, भारत को यूएन से मान्यता प्राप्त ट्रेनिंग, उपकरण ट्रांसफर, और क्षेत्रीय क्षमता निर्माण केंद्रों को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि प्रभावित देश स्वयं यह काम सुरक्षित तरीके से कर सकें। (Landmine crisis)



