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रनवे की जरूरत खत्म! पानी और जमीन दोनों से उड़ेंगे विमान, भारत में डिफेंस से टूरिज्म तक गेमचेंजर बनेंगे एम्फिबियन एयरक्राफ्ट

अल्बाट्रॉस 2.0 की खास बात यह है कि यह दुनिया का पहला और इकलौता ऐसा एम्फिबियन एयरक्राफ्ट है, जिसे ट्रांसपोर्ट कैटेगरी में एफएए या ईएएसए सर्टिफिकेशन मिला है और जिसमें 19 से ज्यादा, यानी 28 यात्रियों तक बैठने की क्षमता है...

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📍नई दिल्ली | 5 Feb, 2026, 8:23 PM

Amphibious Aircraft India: भारत में पहली बार एंफीबियन एयरक्राफ्ट के लिए बड़ी पहल हुई है। भारत में डिफेंस और सिविल एविएशन मार्केट की जरूरतों को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया की कंपनी एम्फीबियन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (एएआई) और भारत की अपोजी एयरोस्पेस के बीच एक बड़ी रणनीतिक साझेदारी हुई है। इस समझौते के तहत अपोजी एयरोस्पेस ने 15 अल्बाट्रॉस 2.0 एम्फिबियन एयरक्राफ्ट के लिए करीब 3,500 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया है। यह डील सिर्फ एयरक्राफ्ट खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ भारत में मैन्युफैक्चरिंग, मेंटेनेंस, ट्रेनिंग और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट का पूरा इकोसिस्टम खड़ा करने की योजना भी है।

Amphibious Aircraft India: एम्फिबियन एयरक्राफ्ट क्या होते हैं और क्यों हैं खास

एम्फिबियन एयरक्राफ्ट ऐसे विमान होते हैं, जो रनवे के साथ-साथ वाटर से भी टेक-ऑफ और लैंडिंग कर सकते हैं। इन्हें आम भाषा में सी-प्लेन भी कहा जाता है। भारत जैसे देश के लिए, जहां लंबी समुद्री तटरेखा, सैकड़ों द्वीप, बड़ी नदियां और दूर-दराज के इलाके हैं, ऐसे विमान बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं।

अब तक भारत में इस तरह के विमानों का इस्तेमाल सीमित रहा है। लेकिन सरकार की रीजनल कनेक्टिविटी, ब्लू इकॉनमी, सागरमाला प्रोग्राम और द्वीप विकास योजनाओं को देखते हुए एम्फिबियन एयरक्राफ्ट की जरूरत तेजी से महसूस की जा रही थी। इस डील का मकसद भारत के डिफेंस और सिविल एविएशन बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाना है। (Amphibious Aircraft India)

अल्बाट्रॉस 2.0: पुराने नाम में नई तकनीक

अल्बाट्रॉस 2.0 कोई बिल्कुल नया नाम नहीं है। यह मशहूर ग्रुमैन एचयू-16 अल्बाट्रॉस से प्रेरित आधुनिक एयरक्राफ्ट है, जिसे आज की जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह नया डिजाइन दिया गया है।

अल्बाट्रॉस 2.0 की खास बात यह है कि यह दुनिया का पहला और इकलौता ऐसा एम्फिबियन एयरक्राफ्ट है, जिसे ट्रांसपोर्ट कैटेगरी में एफएए या ईएएसए सर्टिफिकेशन मिला है और जिसमें 19 से ज्यादा, यानी 28 यात्रियों तक बैठने की क्षमता है।

यह एयरक्राफ्ट सिर्फ टूरिज्म या सिविल फ्लाइट्स के लिए नहीं, बल्कि डिफेंस, कोस्ट गार्ड, नेवी, सर्च एंड रेस्क्यू और मेडिकल इवैक्यूएशन जैसे मिशनों के लिए भी तैयार किया गया है। (Amphibious Aircraft India)

भारत में 500 करोड़ रुपये का निवेश

इस डील का सबसे अहम हिस्सा सिर्फ 15 एयरक्राफ्ट नहीं हैं, बल्कि भारत में होने वाला निवेश है। भारतीय पार्टनर कंपनी अपोजी एयरोस्पेस के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (रिटायर्ड) विंग कमांडर एमवीएन साई ने बताया कि उनकी कंपनी वह 500 करोड़ रुपये तक का निवेश करेगी। इस निवेश से भारत में टेल-सेक्शन मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी, मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (एमआरओ) सेंटर, ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और सिस्टम्स इंटीग्रेशन की सुविधाएं डेवलप की जाएंगी। इसके अलावा मिलिट्री वर्जन के लिए एडवांस्ड सिस्टम्स इंटीग्रेशन की सुविधा डेवलप होगी। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में अल्बाट्रॉस 2.0 के कई अहम पार्ट्स और सर्विसेज भारत में ही तैयार होंगी।

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उन्होंने बताया कि यह पहल भारत के एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के साथ-साथ रीजनल एयर कनेक्टिविटी को मजबूत करने में मदद करेगी। (Amphibious Aircraft India)

Amphibious Aircraft India

डिफेंस सेक्टर के लिए क्यों अहम है यह डील

डिफेंस सेक्टर को लेकर कंपनी ने साफ किया कि वह आने वाले सरकारी खरीद कार्यक्रमों में हिस्सा लेगी। इससे पहले 10 जनवरी को आई रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय पहले ही भारतीय नौसेना के लिए चार फिक्स्ड-विंग एम्फिबियन एयरक्राफ्ट को वेट लीज पर लेने के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (आरएफआई) जारी कर चुका है। जिसकी खबर सबसे पहले रक्षा समाचार ने ब्रेक की थी। इन विमानों का इस्तेमाल रिकॉनिसेंस, सर्विलांस और सर्च एंड रेस्क्यू के लिए किया जाना है।

एम्फिबियन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज के प्रेसिडेंट और सीईओ गोपी रेड्डी ने कहा कि उनकी भारतीय पार्टनर कंपनी अपोजी एयरोस्पेस इस बिडिंग प्रक्रिया में हिस्सा लेगी। उन्होंने बताया कि अल्बाट्रॉस 2.0 एक पूरी तरह प्रोवेन एयरक्राफ्ट है और भारतीय नौसेना इसे पहले दिन से ऑपरेट कर सकती है। उन्होंने बताया कि आने वाले 18 से 24 महीनों में पहला अल्बाट्रॉस 2.0 भारत में ऑपरेशन में आ सकता है। उनका दावा है कि जहां दूसरे विकल्पों जैसे शिनमयवा US-2 की कीमत 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा है, वहीं अल्बाट्रॉस 2.0 की बेस कीमत करीब 25 मिलियन डॉलर के आसपास है। (Amphibious Aircraft India)

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सिविल एविएशन और टूरिज्म को भी मिलेगा फायदा

सिर्फ डिफेंस ही नहीं, सिविल सेक्टर में भी इस एयरक्राफ्ट की बड़ी भूमिका देखी जा रही है। अल्बाट्रॉस 2.0 वर्जन 28 यात्रियों को ले जा सकता है या फिर 4.5 टन कार्गो ढो सकता है। सााथ ही, लास्ट माइल कनेक्टिविटी द्वीपों, पहाड़ी इलाकों और नदी-तटीय क्षेत्रों को जोड़ सकता है

अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, पूर्वोत्तर भारत और तटीय राज्यों में यह विमान टूरिज्म और कनेक्टिविटी को नई रफ्तार दे सकता है। खास बात यह है कि इसे बड़े एयरपोर्ट या रनवे की जरूरत नहीं होती, यानी यह जीरो इंफ्रास्ट्रक्चर से ऑपरेट हो सकता है। (Amphibious Aircraft India)

Amphibious Aircraft India

भारत को ग्लोबल हब बनाने की योजना

एम्फीबियन एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (AAI) के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन खोआ होआंग ने साफ कहा है कि कंपनी का अंतिम लक्ष्य भारत में दूसरी पूरी मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली लाइन स्थापित करना है। फिलहाल AAI की मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी अमेरिका में है, लेकिन भारत को भविष्य का बड़ा सेंटर माना जा रहा है।

अगर यह योजना साकार होती है, तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सकता है, जहां से एम्फिबियन एयरक्राफ्ट का निर्माण, मेंटेनेंस और एक्सपोर्ट किया जाएगा। (Amphibious Aircraft India)

आत्मनिर्भर भारत और बजट सपोर्ट

दिलचस्प बात यह है कि यह डील ऐसे समय पर हुई है, जब केंद्रीय बजट 2026-27 में सरकार ने सी-प्लेन और एम्फिबियन एयरक्राफ्ट के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने की बात कही है। बजट में सी-प्लेन वीजीएफ स्कीम लाने का भी ऐलान किया गया है, जिससे इनके ऑपरेशन को सपोर्ट मिलेगा। (Amphibious Aircraft India)

क्यों माना जा रहा है इसे गेम-चेंजर

इस पूरे समझौते को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि यह भारत की डिफेंस और सिविल एविएशन जरूरतों को एक साथ पूरा करता है। यह एयरक्राफ्ट पानी और जमीन दोनों से ऑपरेट कर सकता है, जिससे यह भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों के लिए काफी उपयोगी बन जाता है। साथ ही, कंपनी मिलिट्री वर्जन के लिए पूरे सिस्टम्स इंटीग्रेशन की सुविधा भी दे रही है। सरकार की मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को मजबूत करता है।

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सिविल एविएशन की बात करें तो अल्बाट्रॉस 2.0 में 28 यात्री या 4.5 टन कार्गो ले जाने की क्षमता है। इस वजह से यह द्वीपों, तटों और दूरदराज इलाकों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर-फ्री कनेक्टिविटी देता है, जो सरकार की रीजनल कनेक्टिविटी योजनाओं का अहम हिस्सा है। इसके अलावा भारत को एम्फिबियन एविएशन का ग्लोबल हब बनाने की दिशा में ले जाता है। (Amphibious Aircraft India)

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  • रनवे की जरूरत खत्म! पानी और जमीन दोनों से उड़ेंगे विमान, भारत में डिफेंस से टूरिज्म तक गेमचेंजर बनेंगे एम्फिबियन एयरक्राफ्ट

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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