📍नई दिल्ली/जम्मू-कश्मीर | 28 Dec, 2025, 12:09 PM
Indian Army New Winter Doctrine: इस साल पहलगाम हमले के बाद भारतीय सेना ने अपनी पुरानी रणनीतियों में कई बदलाव किए हैं। यह बदलाव खासतौर पर पहलगाम आतंकी हमले के बाद सामने आया है, जिसके बाद सेना ने यह साफ कर दिया कि अब आतंकी सर्दियों की आड़ लेकर भारत में घुसपैठ नहीं कर सकेंगे।
पहलगाम अटैक से पहले सर्दियों में जिस तरह से पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने सरहद पार करके भारतीय इलाकों में घुसपैठ की थी और फिर वारदात को अंजाम दिया था। उसके बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ भारतीय सेना की काउंटर-टेररिज्म की रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सर्दियों को अब केवल मुश्किल मौसम नहीं, बल्कि ऑपरेशनल मौके के तौर पर देखा जा रहा है। इसे ही भारतीय सेना की नई विंटर डॉक्ट्रिन कहा जा रहा है।
आमतौर पर जम्मू-कश्मीर में दिसंबर और जनवरी के महीने, खासकर चिल्लई कलां के दौरान काउंटर-टेरर ऑपरेशंस की कम हो जाते हैं। भारी बर्फबारी, बंद रास्ते और बेहद ठंडे मौसम के चलते ऊंचाईं वाले इलाकों में सैन्य मूवमेंट सीमित रहता था। ऐसे हालात का फायदा उठाकर आतंकी ऊंचाई पर स्थित जंगलों और पहाड़ी इलाकों में छिप जाते थे, रीग्रुपिंग करते थे और अगली गर्मियों की तैयारी करते थे। (Indian Army New Winter Doctrine)
Indian Army New Winter Doctrine: पहलगाम हमले के बाद बदला सोच का तरीका
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम इलाके में हुए आतंकी हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे हालात का दोबारा मुआयना किया। इस आकलन में यह बात साफ सामने आई कि आतंकवादी सर्दियों को एक “सेफ पीरियड” मानकर अपनी गतिविधियों की प्लानिंग करते हैं और दोबारा से संगठित करते हैं। इसी के बाद सेना ने तय किया कि अब सर्दियों में भी ऑपरेशंस उसी तेजी से चलाए जाएंगे, जैसी गर्मियों में होते हैं।
नई विंटर डॉक्ट्रिन लागू करके भारतीय सेना ने का आतंकियों को यह स्पष्ट तौर यह संदेश दे दिया है कि अब वे सर्दियों का फायदा नहीं उठा सकते। बर्फ, ठंड और दुर्गम इलाका अब सेना के लिए रुकावट नहीं, बल्कि ऑपरेशन का हिस्सा हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)

प्रोएक्टिव विंटर पोस्चर: अब कोई ब्रेक नहीं
इस डॉक्ट्रिन के तहत सेना ने प्रोएक्टिव विंटर पोस्चर अपनाया है। इसका मतलब है कि सर्दियों में ऑपरेशंस को कम करने की बजाय उन्हें और मजबूत किया गया है। किश्तवाड़, डोडा, राजौरी और पुंछ जैसे इलाकों में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अस्थायी विंटर बेस और सर्विलांस पोस्ट बनाई गई हैं।
पहले जिन इलाकों को सर्दियों में खाली कर दिया जाता था, अब वहां सैनिक लगातार तैनात हैं। बर्फ से ढके पहाड़, घने जंगल और संकरी घाटियों में अभी भी पेट्रोलिंग हो रही है। इससे आतंकियों के लिए किसी भी इलाके को सुरक्षित ठिकाना बनाना मुश्किल हो गया है। (Indian Army New Winter Doctrine)
दशकों से 1990 की इंसर्जेंसी से लेकर 2024 तक चिल्लई कलां आतंकवादियों की घुसपैठ के लिए सुरक्षित पीरियड या नेचुरल शील्ड की तरह काम करता था। भारी बर्फबारी से ऊंचे दर्रे बंद हो जाते थे, और सेना के बड़े ऑपरेशंस मुश्किल हो जाते थे। हिंटरलैंड जैसे जम्मू रीजन जैसे डोडा, किश्तवाड़ में सेना मुख्य रूप से डिफेंसिव रहती थी। इससे आतंकवादियों को मौसमी फायदा मिलता था और वे लोकल सपोर्ट के जरिए छिपकर सर्वाइव करते थे। इसे “टेम्परेरी लुल इन टेररिस्ट एक्टिविटी” भी कहा जाता था। (Indian Army New Winter Doctrine)
Indian Army New Winter Doctrine: क्या है सर्विलांस-स्वीप-सर्विलांस मॉडल
नई विंटर डॉक्ट्रिन का बेस सर्विलांस-स्वीप-सर्विलांस मॉडल है। इसका मतलब है कि किसी भी इलाके में पहले लगातार निगरानी की जाती है। ड्रोन, थर्मल इमेजर और ग्राउंड सेंसर्स से मूवमेंट पर नजर रखी जाती है। जैसे ही पुख्ता इनपुट मिलता है, वहां ऑपरेशन चलाकर इलाके को क्लियर किया जाता है। इसके बाद भी निगरानी जारी रहती है, ताकि आतंकी दोबारा उसी इलाके में वापस न आ सकें।
इसका मतलब है कि इस मॉडल के बाद ऑपरेशंस अब लगातार चलते रहेंगे। सेना का मकसद सिर्फ आतंकियों को मार गिराना नहीं, बल्कि पूरे इलाके को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखना है। (Indian Army New Winter Doctrine)
Indian Army New Winter Doctrine: ऊंचाई और ठंड वाले इलाकों में भी तैनाती
सर्दियों में ऑपरेशन चलाना शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति की भी परीक्षा है। सैनिकों को घुटनों तक बर्फ में चलना पड़ता है, एवलांच संभावित इलाकों से गुजरना होता है और शून्य से काफी नीचे तापमान में रातें बितानी पड़ती हैं।
इसके लिए सेना ने स्पेशलाइज्ड विंटर वॉरफेयर सब-यूनिट्स को आगे बढ़ाया है। इन यूनिट्स को स्नो नेविगेशन, कोल्ड वेदर सर्वाइवल, एवलांच रिस्पॉन्स और ऊंचाई पर कॉम्बैट की विशेष ट्रेनिंग दी गई है। यही कारण है कि अब चिल्लई कलां के दौरान गश्त और ऑपरेशन लगातार जारी हैं। चिल्लई कलां में दिसंबर-जनवरी में भयंकर सर्दी पड़ती है और भारी बर्फबारी और मुश्किल मौसम के कारण वहां बड़े ऑपरेशंस कम या स्केल डाउन हो जाते थे। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)
Defence Sources |
Winter Ops Intensified 🇮🇳
The Indian Army has stepped up
counter-terrorism operations in Kishtwar and Doda during the harsh
Chillai Kalan winter period. Despite sub-zero temperatures, heavy
snowfall and difficult terrain, troops have pushed into higher,… pic.twitter.com/dZO8lepyjX—
Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) December
27, 2025
Indian Army New Winter Doctrine: ऐसा क्या खास है चिल्लई कलां में?
चिल्लई कलां एक फारसी शब्द है, जिसमें “चिल्ला” का मतलब 40, और “कलां” मतलब बड़ा/मेजर होता है। यानी “बड़ी 40 दिनों की ठंड” पड़ती है। मध्य एशिया से आए सूफी संतों ने सर्दियों में 40 दिनों की एकांत साधना (चिल्ला) प्रथा शुरू की, जहां वे श्राइन में रहकर ध्यान करते थे। यह प्रथा कश्मीर में लोकप्रिय हुई और सबसे ठंडे 40 दिनों को “चिल्लई कलां” कहा जाने लगा। इसका जिक्र सूफी संतों की तजकीराओं (जीवनी ग्रंथों) में मिलता है।
कुछ इतिहासकार कहते हैं कि इसका इतिहास 1000 साल से ज्यादा पुराना है। ईरानी परंपरा में 21 दिसंबर की रात को “शब-ए-यल्दा” या “शब-ए-चेल्ले” (40 की रात) मनाया जाता है, जो कश्मीर तक पहुंचा। वहीं पहले बौद्ध काल में इसे “शिश्शर मास” भी कहा जाता था।
चिल्लई कलां कश्मीर घाटी की सर्दियों का सबसे कठिन और ठंडा दौर है, जो हर साल 21 दिसंबर से 31 जनवरी तक लगभग 40 दिनों तक चलता है। यह कश्मीर की सर्दियों का “पीक” पीरियड है, जब ठंड सबसे ज्यादा प्रचंड होती है। इस दौराान तापमान -10 डिग्री फ्रीजिंग पॉइंट से काफी नीचे चला जाता है और भारी बर्फबारी होती है, पानी की पाइपें जम जाती हैं, डल झील जैसी झीलें फ्रीज हो सकती हैं, और ऊंचे इलाकों में रास्ते बंद हो जाते हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)
Indian Army New Winter Doctrine: टेक्नोलॉजी बनी सबसे बड़ी ताकत
नई विंटर डॉक्ट्रिन में टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद अहम है। ड्रोन से ऊंचे इलाकों की निगरानी की जा रही है, जहां पैदल पहुंचना जोखिम भरा हो सकता है। थर्मल इमेजिंग उपकरण बर्फ और अंधेरे के बीच भी हीट सिग्नेचर पकड़ लेते हैं। ग्राउंड सेंसर्स से जंगलों और घाटियों में हलचल का पता लगाया जा रहा है।
इन सभी उपकरणों को रियल-टाइम इंटेलिजेंस नेटवर्क से जोड़ा गया है, ताकि फील्ड यूनिट्स को तुरंत इनपुट मिल सके। हालांकि सेना के सूत्र साफ कहते हैं कि तकनीक मददगार है, लेकिन अंतिम फैसला और कार्रवाई जमीन पर मौजूद सैनिक ही करते हैं। (Indian Army New Winter Doctrine)
आतंकियों पर बढ़ रहा दबाव
हाल ही में जारी इंटेलिजेंस इनपुट्स के मुताबिक जम्मू रीजन में करीब 30 से 35 आतंकी सक्रिय बताए जाते हैं। लगातार चल रहे ऑपरेशंस के कारण इन्हें निचले और आबादी वाले इलाकों से पीछे हटकर ऊंचे और निर्जन क्षेत्रों में जाना पड़ा है। स्थानीय ओवरग्राउंड वर्कर्स और सपोर्ट नेटवर्क पर भी दबाव बढ़ा है।
सर्दियों में जब गांवों तक पहुंचना मुश्किल होता है, तब आतंकियों के लिए राशन, दवाइयां और कम्युनिकेशन बनाए रखना और भी कठिन हो जाता है। सेना का मानना है कि यही दबाव आतंकियों को कमजोर करता है। (Indian Army New Winter Doctrine)
जॉइंट और इंटीग्रेटेड अप्रोच
नई रणनीति में सेना अकेले काम नहीं कर रही है। जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ, स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप, फॉरेस्ट गार्ड्स, विलेज डिफेंस गार्ड्स और सिविल एडमिनिस्ट्रेशन के साथ मिलकर एक साझा सिक्योरिटी ग्रिड बनाया गया है।
इंटेलिजेंस शेयरिंग तेज हुई है और ऑपरेशन के बाद इलाके की सुरक्षा जिम्मेदारी तय की जाती है। इससे आतंकियों के लिए दोबारा घुसपैठ या वापसी की गुंजाइश कम हो जाती है। (Indian Army New Winter Doctrine)
ग्रामीण इलाकों में भरोसा कायम रखने की कोशिश
बर्फीले और दूरदराज के गांवों में सेना की मौजूदगी से स्थानीय लोगों में भी भरोसा बढ़ रहा है। पहले जो इलाके सर्दियों में अलग-थलग पड़ जाते हैं औऱ जिसका फादयाा आतंकी उठाते थे, अब वहं सेना की लगातार मौजूदगी देखने को मिल रही है। विलेज डिफेंस गार्ड्स से गांवों में सुरक्षा पुख्ता हो रही है। सेना लगातार ग्रामीणों से संपर्क रखती है, ताकि डर और अफवाह का माहौल न बने।
स्थानीय लोग भी अब संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी तुरंत सुरक्षा बलों तक पहुंचा रहे हैं, जिससे ऑपरेशंस करने में आसानी हो रही है।
वहीं, नई विंटर डॉक्ट्रिन के जरिए सेना ने यह साफ कर दिया है कि आतंकवाद के लिए अब कोई “ऑफ-सीजन” नहीं होगा। बर्फ से ढकी पहाड़ियां, ठंडी रातें और सुनसान जंगल अब आतंकियों के लिए ढाल नहीं बनेंगे। (Indian Army New Winter Doctrine)



