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GPS Spoofing at IGI Airport: देश के सबसे सुरक्षित इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर जीपीएस स्पूफिंग का खतरा, कई उड़ानें प्रभावित, कई जहाज जयपुर डायवर्ट

एविएशन अधिकारियों के मुताबिक, यह दिल्ली में जीपीएस स्पूफिंग का पहला मामला है। अब तक ऐसी घटनाएं ज्यादातर सीमावर्ती इलाकों में देखी जाती रही हैं, लेकिन पहली बार यह देश की राजधानी के सबसे व्यस्त हवाईअड्डे पर दर्ज हुई है...

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📍नई दिल्ली | 6 Nov, 2025, 11:44 AM

GPS Spoofing at IGI Airport: देश की राजधानी दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर पिछले दो-तीन दिनों से जीपीएस स्पूफिंग का मामला सामने आया है। इसके चलते कई उड़ानें प्रभावित हुई हैं। इस तकनीकी दिक्कत के चलते मंगलवार रात कम से कम सात विमानों को जयपुर डायवर्ट करना पड़ा। इनमें इंडिगो और एयर इंडिया के विमान शामिल थे।

एविएशन अधिकारियों के मुताबिक, यह दिल्ली में जीपीएस स्पूफिंग का पहला मामला है। अब तक ऐसी घटनाएं ज्यादातर सीमावर्ती इलाकों में देखी जाती रही हैं, लेकिन पहली बार यह देश की राजधानी के सबसे व्यस्त हवाईअड्डे पर दर्ज हुई है। खास बाात यह है कि दिल्ली बॉर्डर एरिया से कई सौ किमी दूर है और यह भारत की राजधानी दिल्ली है। यहां से रोजाना 1,550 उड़ानें होती हैं और लाखों यात्री दुनिया के सबसे व्यस्त एयरपोर्ट से उड़ान भरते हैं। वहीं, राजधानी जैसे सुरक्षित क्षेत्र में जीपीएस स्पूफिंग राष्ट्रीय सुरक्षा का सीधा खतरा है।

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GPS Spoofing at IGI Airport: क्या है जीपीएस स्पूफिंग?

जीपीएस स्पूफिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसमें नकली सैटेलाइट सिग्नल भेजे जाते हैं। ये सिग्नल असली ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानी जीपीएस सिग्नल को कन्फ्यूज कर देते हैं, जिससे विमान के नेविगेशन सिस्टम को अपनी असली स्थिति गलत दिखाई देने लगती है।

सरल शब्दों में कहें तो, यह ऐसा है जैसे कोई नकली नक्शा दिखाकर पायलट को गलत दिशा में भेज दे। इस वजह से विमान को यह पता नहीं चल पाता कि वह वास्तव में कहां है, जिससे लैंडिंग और टेक-ऑफ के दौरान स्थिति भयावह बन सकती है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीपीएस स्पूफिंग की घटनाएं आमतौर पर ब्लैक सी, तुर्की, यूक्रेन और पश्चिम एशिया जैसे युद्ध क्षेत्रों में होती रही हैं। लेकिन दिल्ली जैसे शहरी और सुरक्षित इलाके में इसका असर दिखना बेहद चिंता का विषय है।

कैसे हुआ असर एयरपोर्ट पर

टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे का मुख्य रनवे 10/28, जो लंबे समय से इस्तेमाल में है, फिलहाल इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आईएलएस) के अपग्रेडेशन के लिए बंद है। आईएलएस के बंद होने के बाद विमान ‘रिक्वायर्ड नेविगेशन परफॉर्मेंस (आरएनपी) तकनीक के जरिए उतरते हैं, जो पूरी तरह जीपीएस पर निर्भर होती है।

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लेकिन जब जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी आती है, तो इसका असर आरएनपी सिस्टम पर भी पड़ता है। यही वजह है कि दिल्ली एयरपोर्ट पर जीपीएस स्पूफिंग की शुरुआत होते ही मुख्य रनवे पर फ्लाइट ऑपरेशन में दिक्कतें होने लगीं।

जानकारी के अनुसार, यह समस्या तब ज्यादा बढ़ जाती है जब हवा पूर्व दिशा से चलती है। ऐसे में विमान द्वारका की दिशा से उतरते हैं और वसंत कुंज की ओर उड़ान भरते हैं, इस दौरान जीपीएस सिग्नल सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

फ्लाइट्स पर पड़ा असर, सात विमान जयपुर डायवर्ट

मंगलवार की रात को इंडिगो के पांच और एयर इंडिया के दो विमान, दिल्ली में सुरक्षित लैंडिंग नहीं कर पाए और उन्हें जयपुर भेजना पड़ा। दिल्ली एयरपोर्ट की आटोमैटिक टर्मिनल इन्फॉर्मेशन सर्विस (एटीआईएस) ने सभी पायलटों को अलर्ट किया है और कहा है कि वे दिल्ली के एयरस्पेस में एंट्री करते समय सावधानी बरतें।

एक अधिकारी ने बताया, “यह सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मामला है। हमें यह जानने की जरूरत नहीं कि स्पूफिंग क्यों हो रही है, बल्कि जरूरी यह है कि रनवे 10/28 पर आईएलएस सिस्टम को जल्द से जल्द चालू किया जाए।”

GPS Spoofing at IGI Airport: कितना बड़ा खतरा है यह

एविएशन एक्सपर्ट्स का कहना है कि जीपीएस स्पूफिंग का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह विमान के पायलट को गलत स्थिति की जानकारी देता है। कभी-कभी यह गड़बड़ी 2,000 से 2,500 किलोमीटर तक की दूरी तक गलत दिशा दिखा सकती है। यहां कि जीपीएस स्पूफिंग से दो विमान आपस में भी टकरा सकते हैं।

इससे न सिर्फ पायलट भ्रमित होते हैं, बल्कि लैंडिंग के दौरान गलत लोकेशन पर उतरने का खतरा भी बढ़ जाता है। खासतौर पर बॉर्डर एरिया में जहाज दुश्मन देश में भी लैंड कर सकते हैं।

दुनिया में कई देशों ने पहले भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन वहां यह युद्ध या मिलिट्री वजहों से होती हैं। उदाहरण के लिए, रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष के दौरान कई बार सिग्नल जैमिंग और स्पूफिंग की घटनाएं दर्ज की गई थीं। जियो-पॉलिटिकल साइबर वारफेयर की आशंका को भी जन्म देती है।

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ईरान ने 2011 में एक अमेरिकी आरक्यू-170 ड्रोन को जीपीएस स्पूफिंग के जरिए गिराने का दावा किया था। इसी तरह, 2023 और 2024 में इराक, तुर्की, यूक्रेन और ब्लैक सी क्षेत्र में कई बार जीपीएस स्पूफिंग की घटनाएं दर्ज की गईं।

क्या कर रहे हैं अधिकारी और एयरलाइंस

एविएशन अथॉरिटी (GPS Spoofing at IGI Airport) और एयरलाइंस दोनों ने इस स्थिति से निपटने के लिए तात्कालिक कदम उठाए हैं। एयरलाइंस अपने पायलटों को पहले से अलर्ट कर रही हैं कि वे दिल्ली की ओर आने से पहले जीपीएस की गड़बड़ी की संभावना को ध्यान में रखें।

पायलटों को सलाह दी गई है कि वे वैकल्पिक नेविगेशन सिस्टम्स जैसे पारंपरिक रेडियो बीकन और ऑनबोर्ड नेविगेशन का इस्तेमाल करें। दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड का कहना है कि मुख्य रनवे 10/28 पर नया आईएलएस सिस्टम 27 नवंबर तक एक्टिव करने की तैयारी चल रही है।

इंडिगो एयरलाइन ने हाल ही में इस रनवे पर ट्रायल फ्लाइट भी की थी, ताकि अपग्रेडेड सिस्टम की परफॉरमेंस को जांचा जा सके। जिसकी रिपोर्ट डीजीसीए को सौंपी जा चुकी है।

क्यों होती है GPS जामिंग या स्पूफिंग

सामान्य तौर पर, जीपीएस जामिंग (GPS Spoofing at IGI Airport) सेना द्वारा किसी इलाके में अपने ठिकाने या हथियारों की लोकेशन छिपाने के लिए की जाती है। वहीं, जीपीएस स्पूफिंग का इस्तेमाल ऐसे लोग करते हैं जो जानबूझकर गलत सिग्नल भेजकर विमान या जहाजों को कन्फ्यूज करना चाहते हैं।

यह मॉडर्न टेक्नोलॉजी वॉरफेयर का एक हिस्सा है, लेकिन इसका असर अगर नागरिक हवाईअड्डों पर दिखने लगे, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों और डीजीसीए ने जांच शुरू कर दी है। एयरपोर्ट पर सभी रडार सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल की निगरानी बढ़ा दी गई है। सिग्नल की जियो-लोकेशन ट्रैकिंग चल रही है। अधिकारियों ने बताया कि फिलहाल यह तकनीकी या बाहरी सिग्नल इंटरफेरेंस का मामला हो सकता है।

इस साल भारत में स्पूफिंग के 465 मामले

इस साल (GPS Spoofing at IGI Airport) केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि नवंबर 2023 से फरवरी 2025 के बीच अमृतसर और जम्मू के हवाई क्षेत्र में जीपीएस इंटरफेरेंस और स्पूफिंग के 465 मामले दर्ज किए गए हैं। इन घटनाओं में कई एयरलाइनों ने रिपोर्ट किया कि उनके विमान उड़ान के दौरान गलत लोकेशन डेटा दिखा रहे थे। नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया था कि यह घटनाएं मुख्य रूप से भारत-पाकिस्तान सीमा के नजदीकी इलाकों खासकर अमृतसर और जम्मू में हुईं।

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यह घटनाएं तब ज्यादा देखी गईं जब विमान भारत-पाकिस्तान सीमा के पास से गुजरते हैं। एयरलाइंस ने बताया कि पायलटों को अचानक गलत दिशा, दूरी और ऊंचाई की जानकारी मिलने लगी, जिससे उन्हें वैकल्पिक नेविगेशन सिस्टम का सहारा लेना पड़ा।

मुरलीधर मोहोल ने बताया कि एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया नेविगेशन और सर्विलांस सिस्टम को अपग्रेड कर रही है ताकि हवाई यातायात बढ़ने के बावजूद सुरक्षा बनी रहे। उन्होंने कहा कि भारत में अब कई बड़े एयरपोर्ट्स पर अत्याधुनिक रेडियो नेविगेशन और सैटेलाइट ट्रैकिंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं, जिससे जीपीएस पर पूरी तरह निर्भरता कम हो सके।

GPS Spoofing at IGI Airport: भारतीय वायुसेना के विमान हुए थे स्पूफिंग के शिकार

यह घटना (GPS Spoofing at IGI Airport) इस साल 29 मार्च को हुई थी, जब भारतीय वायुसेना का सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान म्यांमार में भूकंप के बाद ऑपरेशन ब्रह्मा के तहत मानवीय सहायता लेकर रवाना हुआ था। उड़ान के दौरान विमान के जीपीएस सिग्नल से छेड़छाड़ की गई, जिससे विमान का नेविगेशन सिस्टम गलत लोकेशन डेटा दिखाने लगा। बाद में राहत सामग्री लेकर भेजे गए वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर-III विमानों को भी इसी तरह की जीपीएस स्पूफिंग का सामना करना पड़ा। जिसके बाद वायुसेना के पायलटों ने तुरंत इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल कर सुरक्षित उड़ान भरी। यह सिस्टम जीपीएस से अलग होता है और गाइरोस्कोप और एक्सीलरोमीटर की मदद से विमान की रफ्तार, दिशा और ऊंचाई को अपने सेंसरों से ट्रैक करता है।

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