back to top
HomeLegal and Policy NewsSupreme Court on JAG Posts: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की सेना की...

Supreme Court on JAG Posts: सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की सेना की भर्ती नीति, अब जज एडवोकेट जनरल में लिंग के आधार पर नहीं होगा भेदभाव

अदालत ने कहा कि असली जेंडर न्यूट्रैलिटी (लैंगिक समानता) का मतलब यह है कि योग्यता के आधार पर, बिना किसी लैंगिक भेदभाव के सभी योग्य उम्मीदवारों का चयन किया जाए...

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं को पहले भर्ती न करने की भरपाई के लिए कम से कम 50 फीसदी रिक्तियां महिला उम्मीदवारों को दी जाएं। लेकिन यह सीमा तभी लागू हो जब महिलाओं की योग्यता पुरुष उम्मीदवारों से कम हो। यदि महिला उम्मीदवार पुरुषों से अधिक अंक लाती हैं, तो उन्हें सीमित सीटों के कारण रोका जाना समानता के अधिकार का उल्लंघन है...
Read Time 0.11 mintue

📍नई दिल्ली | 11 Aug, 2025, 4:30 PM

Supreme Court on JAG Posts: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल (JAG) शाखा में पुरुष उम्मीदवारों के लिए अधिक पद आरक्षित करने और महिलाओं के लिए महिलाओं के लिए कम पद रखने की नीति को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि असली जेंडर न्यूट्रैलिटी (लैंगिक समानता) का मतलब यह है कि योग्यता के आधार पर, बिना किसी लैंगिक भेदभाव के सभी योग्य उम्मीदवारों का चयन किया जाए। कोर्ट ने कहा कि यह नीति गलत है और संविधान में दी गई समानता के खिलाफ है। कोर्ट ने आदेश दिया कि अब जेएजी भर्ती में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। सभी उम्मीदवारों की एक ही मेरिट लिस्ट बनेगी, जिसमें सभी उम्मीदवारों के अंक सार्वजनिक किए जाएंगे।

Indian Army Rudra Brigades: पूर्वी लद्दाख और सिक्किम में तैनात होंगी भारतीय सेना की नई ‘रुद्र’ ब्रिगेड्स

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की बेंच (Supreme Court on JAG Posts) ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि सेना ने 1950 के आर्मी एक्ट के तहत महिलाओं को जैग में शामिल होने की इजाजत दी है। फिर भी पुरुषों के लिए ज्यादा पद रखना और महिलाओं की संख्या सीमित करना गलत है। कोर्ट ने 2023 की उस अधिसूचना को भी गलत बताया, जिसमें नौ जैग पदों में से छह पुरुषों और सिर्फ तीन महिलाओं के लिए थे। बैंच के मुताबिक, महिलाओं के लिए केवल तीन और पुरुषों के लिए छह पद रखने का प्रावधान संविधान में समानता के सिद्धांत के खिलाफ है, क्योंकि यह पुरुषों के लिए आरक्षण जैसा है।

अदालत ने कहा कि जज एडवोकेट जनरल ब्रांच में (Supreme Court on JAG Posts) पुरुष और महिला अधिकारियों के अलग-अलग कैडर या सेवा शर्तें नहीं हैं। चयन की प्रक्रिया और मानदंड दोनों के लिए समान हैं। इसीलिए 2023 की नीति के तहत सबसे योग्य उम्मीदवारों का चयन लिंग के भेद के बिना किया जाना चाहिए, क्योंकि इस शाखा का मुख्य काम सेना को कानूनी सलाह देना है। जस्टिस मनमोहन ने कहा कि अगर दस महिला उम्मीदवार जेएजी के लिए योग्य हैं और उनकी मेरिट पुरुषों से बेहतर है, तो सभी दस को चुना जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि देश की आधी आबादी को पीछे रखकर देश की सुरक्षा मजबूत नहीं हो सकती।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं को पहले भर्ती न करने की भरपाई के लिए कम से कम 50 फीसदी रिक्तियां महिला उम्मीदवारों को दी जाएं। लेकिन यह सीमा तभी लागू हो जब महिलाओं की योग्यता पुरुष उम्मीदवारों से कम हो। यदि महिला उम्मीदवार पुरुषों से अधिक अंक लाती हैं, तो उन्हें सीमित सीटों के कारण रोका जाना समानता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता ने 447 अंक प्राप्त किए थे, जबकि पुरुष उम्मीदवार ने 433 अंक हासिल किए थे, फिर भी पुरुष उम्मीदवार का चयन हो गया और महिला उम्मीदवार को बाहर कर दिया गया। इसे अदालत ने इनडायरेक्ट डिस्क्रिमिनेशन (अप्रत्यक्ष भेदभाव) बताया। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को अगले ट्रेनिंग कोर्स में जेएजी ब्रांच में शामिल किया जाए।

यह मामला दो महिला उम्मीदवारों की याचिका से शुरू हुआ था। जिन्होंने जैग एंट्री स्कीम 31वें कोर्स में चयन के लिए आवेदन किया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने क्रमशः चौथा और पांचवां स्थान हासिल किया था और कई पुरुष उम्मीदवारों से बेहतर अंक प्राप्त किए थे, फिर भी महिलाओं के लिए केवल तीन पद होने के कारण उनका चयन नहीं हुआ। याचिका में कहा गया था कि जैग में पुरुषों के लिए आरक्षण मनमाना और भेदभावपूर्ण है।

वही, दूसरी याचिकाकर्ता को राहत नहीं मिली, क्योंकि उसने याचिका लंबित रहने के दौरान भारतीय नौसेना में नौकरी शुरू कर दी थी। कोर्ट ने पूछा कि क्या वह नौसेना में अपनी नौकरी रखना चाहती है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से सवाल किए। सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि 2023 से जैग की भर्ती में 50-50 का अनुपात अपनाया गया है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि अगर ज्यादा महिलाएं योग्य हैं, तो 50 प्रतिशत की सीमा लगाना भी गलत है। कोर्ट ने कहा कि जब चयन के नियम और काम एक जैसे हैं, तो लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि अगर जेएजी की महिला अधिकारी सीमा पर युद्ध में तैनात होती हैं, तो उनके युद्धबंदी बनने का खतरा हो सकता है। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब भारतीय वायुसेना में महिलाएं राफेल विमान उड़ा सकती हैं, तो जेएजी जैसे कानूनी पदों पर उनकी नियुक्ति में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

News Desk
रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें प्रस्तुत करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा के लिए।"
Share on WhatsApp
Exit mobile version