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Sasoma-DBO Road: चीन की नजरों में आए बिना डेपसांग और दौलत बेग ओल्डी में तेजी से तैनात हो सकेगी भारतीय सेना, 2026 के आखिर तक तैयार हो जाएगा नया रूट

Sasoma–DBO Road to Boost Army Access to Depsang Without Chinese Surveillance, Operational by End of 2026

यह वैकल्पिक मार्ग करीब 130 किलोमीटर लंबा होगा, जिसमें कुल 9 पुल होंगे जो 40 टन भार वहन कर सकेंगे। वहीं, मौजूदा दरबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी रोड 255 किलोमीटर लंबी है और इसमें 37 पुल हैं। नए मार्ग के बन जाने से लेह से दौलत बेग ओल्डी की दूरी 322 किलोमीटर से घटकर 243 किलोमीटर रह जाएगी और सफर का समय दो दिन से घटकर केवल 11–12 घंटे ही रह जाएगा...
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📍नई दिल्ली | 19 Jul, 2025, 7:14 PM

Sasoma-DBO Road: पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटे डेपसांग और दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) को कनेक्ट करने के लिए एक वैकल्पिक सड़क मार्ग के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है और इसके अक्टूबर-नवंबर 2026 तक पूरी तरह से शुरू होने की उम्मीद है। यह नया मार्ग ससोमा-सासेर ला-सासेर ब्रंगसा–गपशान-डीबीओ के रूट पर बनाया जा रहा है और यह मौजूदा दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DSDBO) सड़क के लगभग समानांतर है। इस सड़क मार्ग को बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन बना रहा है। अभी तक भारतीय सेना दौलत बेग ओल्डी तक पहुंचने के लिए दरबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी रोड का ही इस्तेमाल कर रही है, लेकिन इसके कई हिस्सों पर चीन की सीधी नजर है।

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Sasoma-DBO Road: नई सड़क की क्या है खूबियां

यह वैकल्पिक मार्ग करीब 130 किलोमीटर लंबा होगा, जिसमें कुल 9 पुल होंगे जो 40 टन भार वहन कर सकेंगे। वहीं, मौजूदा दरबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी रोड 255 किलोमीटर लंबी है और इसमें 37 पुल हैं। नए मार्ग के बन जाने से लेह से दौलत बेग ओल्डी की दूरी 322 किलोमीटर से घटकर 243 किलोमीटर रह जाएगी और सफर का समय दो दिन से घटकर केवल 11–12 घंटे ही रह जाएगा। इनमें ससोमा–सासेर ला (52.4 किमी), सासेर ला–सासेर ब्रंगसा (16 किमी), सासेर ब्रंगसा–मुरगो (18 किमी) और सासेर ब्रंगसा–गपशन की दूरी 41.97 किमी है।

सूत्रों के अनुसार, “सूत्रों ने बताया, “ससोमा से सासेर ब्रांग्सा तक का काम पूरा हो चुका है और इसके आगे पूर्व की ओर, मुरगो और गपशान तक, 70 प्रतिशत से अधिक काम पूरा हो चुका है। हमें भरोसा है कि अगले साल अक्टूबर-नवंबर तक यह पूरा मार्ग चालू हो जाएगा।”

सूत्रों के अनुसार, 255 किलोमीटर लंबी डीएसडीबीओ सड़क 16,614 फीट की ऊंचाई पर दौलत बेग ओल्डी यानी डीबीओ में समाप्त होती है, जो 18,700 फीट ऊंचे कारोकारम पास से लगभग 20 किलोमीटर पहले है।

क्यों जरूरी है यह रोड

यह मार्ग सेना के लिए वैकल्पिक कम्यूनिकेशन लाइन तैयार करेगा, जिससे सैनिकों और हथियारों की फटाफट तैनाती की जा सकेगी। इसके अलावा सियाचिन क्षेत्र के लिए भी यह रास्ता अहम होगा, क्योंकि यह ससोमा से निकलता है जो नुब्रा घाटी में सियाचिन बेस कैंप के रास्ते में पड़ता है। ससोमा लेह से सियाचिन बेस कैंप के रास्ते पर पड़ता है। सूत्रों ने बताया, “इस मार्ग पर सासेर ब्रांग्सा तक लगभग सभी तरह के आर्टिलरी की लोड कैपेसिटी का परीक्षण पहले ही किया जा चुका है। इनमें बोफोर्स भी शामिल है।”

सूत्रों ने यह भी बताया, यहां मौजूद 40 टन क्षमता वाले पुलों को अब 70 टन में बदला जा रहा है, जिससे भारी बख्तरबंद वाहनों की तैनाती संभव होगी।

नया सड़क मार्ग ससोमा से शुरू हो कर वहां से यह सासेर ला (17,800 फीट ऊंचा दर्रा) और फिर नीचे उतरकर सासेर ब्रंगसा तक जाता है। यह स्थान पुराने समय में कश्मीर-शिनजियांग व्यापार मार्ग पर एक अस्थायी कैंपिंग साइट थी। यहां से सड़क दो दिशाओं में जाती है: एक रास्ता पूर्व की ओर मुरगो जाता है, तो दूसरा रास्ता उत्तर-पूर्व की ओर गपशान की ओर बढ़ता है। फिर आखिर में दोनों रास्तों का अंत वर्तमान 255 किलोमीटर लंबी दरबुक–श्योक–डबो (DSDBO) सड़क से अलग-अलग स्थानों पर होता है।

सुरंग बनाने की भी है योजना

सूत्रों ने बताया, इस हमारी तैयारी है कि इस सड़क मार्ग को हर मौसम के लिए उपयोगी बनाया जाए। इसके लिए बॉर्डर रोड आर्गेनइजेशन की सासेर ला पर 8 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने की भी योजना है, जो 17,660 फीट की ऊंचाई पर बनेगी। सुरंग बनने के बाद यह रास्ता बारी बर्फबारी में भी खुला रहेगा। फिलहाल यह सुरंग को लेकर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (Detailed Project Report) तैयार की जा रही है, और इस सुरंग परियोजना के बनने में 4–5 साल लग सकते हैं।

प्रोजेक्ट हिमांक और प्रोजेक्ट विजयक पर जिम्मेदारी

लद्दाख में महत्वपूर्ण सड़कों के निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी बीआरओ के पास है। बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) की दो परियोजनाएं प्रोजेक्ट हिमांक और प्रोजेक्ट विजयक इस कार्य की जिम्मेदारी निभा रही हैं। भारत पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ 832 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) साझा करता है। ससोमा से सासेर ब्रांग्सा तक का निर्माण कार्य बीआरओ के प्रोजेक्ट विजयक द्वारा किया जा रहा है, जिसमें 300 करोड़ रुपये की लागत आई है। सासेर ब्रांग्सा से डीबीओ तक सड़क और पुलों का निर्माण बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक द्वारा किया जा रहा है, जिसकी लागत 200 करोड़ रुपये है।

इस सड़क मार्ग के बन जाने के बाद डीबीओ और दूसरी फॉरवर्ड पोस्टों पर सैनिकों, हथियारों और रसद की आवाजाही आसान हो जाएगी, क्योंकि सियाचिन बेस कैंप पास में है। सियाचिन बेस कैंप हाई एल्टीट्यूड और कम ऑक्सीजन स्तर के चलते तैनाती से पहले सैनिकों के लिए एक्लिमटाइजेशन का तीसरा फेज है।

मई 2020 में भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ने के बाद इस वैकल्पिक मार्ग की जरूरत समझी गई और इसके निर्माण की योजना बनाई गई। गलवान घाटी उसी इलाके में है जहां से मौजूदा डीएसडीबीओ सड़क गुजरती है और इस इलाके में चीनी सेना की सीधी निगरानी रहती है। इस सड़क निर्माण को मई 2022 के बाद गति मिली जब राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wildlife) ने इस नए मार्ग को काराकोरम वन्यजीव अभयारण्य (Karakoram Wildlife Sanctuary) के 55 हेक्टेयर क्षेत्र से होकर गुजरने की अनुमति दी। यह स्वीकृति इस मार्ग के सामरिक महत्व को देखते हुए दी गई, क्योंकि मौजूदा DSDBO मार्ग किसी आपातकाल में खतरे की स्थिति में आ सकता है।

डेपसांग में सबसे ऊंचा एयरफील्ड

डेपसांग क्षेत्र सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सियाचिन और दौलत बेग ओल्डी एयरफील्ड से जुड़ा हुआ है, जो विश्व का सबसे ऊंचा एयरफील्ड है, जिसकी ऊंचाई 16,614 फीट (5,065 मीटर) है। इस क्षेत्र में भारी बख्तरबंद गाड़ियों की आवाजाही संभव है और चीन की कई सड़कें यहां तक पहुंच रखती हैं, जबकि भारत के पास केवल डीएसडीबीओ मार्ग ही था। वहीं, इस नए वैकल्पिक सड़क मार्ग के बनने से पूर्वी लद्दाख के सब सेक्टर नॉर्थ (Sub-Sector North-SSN) के डेपसांग प्लेंस और दौलत बेग ओल्डी जैसे अहम क्षेत्रों तक पहुंच आसान होगी।

LAC से सटे इस इलाके में 65 पेट्रोलिंग पॉइंट

लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) से सटे इस इलाके में कुल 65 पेट्रोलिंग पॉइंट हैं, जो काराकोरम पास से लेकर डेमचोक तक फैले हुए हैं। डेपसांग में अक्टूबर 2024 में हुए सैन्य गतिरोध के दौरान चीन ने पांच पेट्रोलिंग पॉइंट 10, 11, 11A, 12 और 13 तक भारतीय सेना की पहुंच को रोक दिया था। इन पांच पॉइंट्स का कुल क्षेत्रफल लगभग 952 वर्ग किलोमीटर है। ये सभी पॉइंट्स रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माने जाते हैं, क्योंकि ये भारत की सीमा के अंदर होते हुए भी एलएसी के करीब हैं और चीनी गतिविधियों को रोकने के लिए यहां लगातार पेट्रोलिंग की जरूरत है।

हरेंद्र चौधरीhttp://harendra@rakshasamachar.com
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवादों, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। 📍 Location: New Delhi, in 🎯 Area of Expertise: Defence, Diplomacy, National Security
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