📍उत्तरकाशी/नई दिल्ली | 8 Aug, 2025, 8:21 PM
Dharali HADR OPS: उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के हर्षिल के पास बसे शांत पहाड़ी गांव धाराली में 5 अगस्त 2025 को बादल फटने के बाद आई भीषण आपदा ने तबाही मचा दी। तेज बारिश, उफनते झरनों और ढहते पहाड़ों के बीच, भारतीय सेना की सर्च एंड रेस्क्यू टीम के छह प्रशिक्षित खोजी कुत्ते और उनके हैंडलर राहत और बचाव कार्यों में अपनी बहादुरी और कौशल से साबित किया कि वे आपदा राहत कार्यों में सेना के सबसे भरोसेमंद साथी हैं। इन खास कैनाइन वॉरियर्स के नाम हैं सारा, ओपना, जेंसी, हेजल, जून और राही। ये सभी लैब्राडोर नस्ल के हैं और मानवीय जिंदगियां बचाने में माहिर माने जाते हैं। वहीं, इनकी उम्र 2 से 7 साल के बीच है।
Dharali HADR OPS: एडवांस सर्च एंड रेस्क्यू के एक्सपर्ट
जैसे ही धाराली में बादल फटने की सूचना मिली तो, वहां तैनात भारतीय सेना हरकत में आ गई। हादसे के बाद इन सभी डॉग्स को मेरठ, देहरादून और लखनऊ से हवाई मार्ग से तुरंत प्रभावित इलाके में रवाना किया गया। सारा, ओपना और जेन्सी ने हाल ही में मेरठ के रीमाउंट वेटरनरी कोर (आरवीसी) से एडवांस सर्च एंड रेस्क्यू (SAR) ट्रेनिंग पूरी की थी और इससे पहले केरल के वायनाड और हिमाचल प्रदेश के रामपुर में आई बाढ़ राहत अभियानों में भी हिस्सा लिया था। अपनी कम उम्र के बावजूद, ये कई मानवीय आपदा राहत (एचएडीआर) अभियानों में काफी कुशल बन चुके हैं।
🚨 Update | Dharali Flash Flood Relief Ops | Uttarkashi 🇮🇳
🐾 Army Canines deployed for search & rescue.
🚁 Drones scanning inaccessible areas.
📡 Ground Penetrating Radars in action to locate survivors under debris.@adgpi @suryacommand @UBArea_IA @PRODefDehradun @BROindia… pic.twitter.com/AMtmpi8Dh6— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 8, 2025
Dharali HADR OPS: 7 अगस्त को हेलिकॉप्टर से हर्षिल पहुंचे
वहीं, जून और उनके हैंडलर एडीटी घेवरलाल डी पटेल पहले से ही हर्षिल में तैनात थे। 14 राजपूताना राइफल्स के जवानों के साथ जब वे घटना स्थल की ओर बढ़ रहे थे, तो अचानक बाढ़ का पानी उनके वाहन को बहाने लगा। समय रहते वे बच निकले, लेकिन नदी के उफान के कारण आगे नहीं बढ़ पाए। हालात की गंभीरता को देखते हुए सेंट्रल कमांड ने तुरंत अतिरिक्त सर्च एंड रेस्क्यू डॉग्स भेजने का आदेश दिया। राही को देहरादून से रवाना किया गया, लेकिन भूस्खलन के चलते वह हर्षिल से 60 किमी पहले ही फंस गए। 6 अगस्त को और कुत्तों जिनमें सारा, ओपना, जेन्सी और हेजल शामिल थे, उन्हें पहले देहरादून, फिर मौसम साफ होते ही 7 अगस्त को हेलिकॉप्टर से हर्षिल पहुंचाया गया।
Dharali HADR OPS: मलबे में जिंदगी की तलाश
इन डॉग्स वॉरियर की खूबी है कि ये सात फीट तक मलबे और कीचड़ में दबे लोगों की मौजूदगी को सूंघने में सक्षम हैं। वे उन जगहों पर काम कर सकते हैं, जहां मशीनें नहीं पहुंच पातीं। एक घंटे से भी कम समय में ये कुत्ते पांच एकड़ से अधिक इलाके को स्कैन कर सकते हैं, जो 20 प्रशिक्षित जवानों और एडवांस इक्विपमेंट्स के बराबर है।
मौके पर लगातार बारिश, फिसलन भरी जमीन और हाई एल्टीट्यूड होने के बावजूद, कुत्तों और उनके हैंडलरों ने असाधारण साहस और अनुशासन दिखाते हुए फंसे हुए लोगों को ढूंढने और मृतकों के अवशेष बरामद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जेन्सी और हेजल का पहला मिशन
धाराली आपदा में गोल्डन लैब्राडोर जेन्सी और काले लैब्राडोर हेजल का यह पहला सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन था। इनमें जेन्सी मेरठ के आरवीसी सेंटर से और हेजल 20 आर्मी डॉग यूनिट से थी। नौ महीने की विशेष ट्रेनिंग के बाद इन्हें ग्राउंड जीरो पर भेजा गया। सेना की तरफ से जारी एक वीडियो में जेन्सी और हेजल अपने हैंडलरों के साथ मलबे में दबी जिंदगियों की तलाश करते दिखे।
प्रशिक्षण और विशेष खूबियां
ये कुत्ते न केवल बाढ़ और भूस्खलन में, बल्कि हिमस्खलन जैसी आपदाओं में भी जवानों को ढूंढने में माहिर हैं। आरवीसी सेंटर में इन्हें अलग-अलग मिशन के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। खोज और बचाव अभियानों के अलावा, सेना के हमलावर (असॉल्ट) K9 कुत्तों को शहरी इलाकों में सर्च ऑपरेशन (FIBUA), घेराबंदी और खोज अभियान (CASO), लक्ष्यों को खोजकर नष्ट करने का अभियान (SADO), जंगल सर्च और एरिया सैनिटाइजेशन जैसे खास मिशनों के लिए भी तैयार किया जाता है।
कुछ कुत्तों को लेजर-गाइडेड अटैक और हथियारों की बरामदगी के लिए भी प्रशिक्षित किया जाता है। इसके अलावा, रेडियो-गाइडेड डायरेक्शनल कंट्रोल, जिसमें डॉग्स के सिर पर टैक्टिकल कैमरे लगाए जाते हैं, जिससे रियल टाइम वीडियो सर्विलांस और छुपकर हमला करने की क्षमता बढ़ती है। ये कुत्ते काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म मिशनों में फर्स्ट रिस्पॉन्डर के रूप में काम करते हैं।
600 से ज्यादा प्रशिक्षित कैनाइन
भारतीय सेना के पास इस समय 600 से ज्यादा प्रशिक्षित डॉग्स हैं, जो 25 से अधिक डॉग यूनिट्स में तैनात हैं। हर यूनिट में 24 डॉग होते हैं और इनकी ट्रेनिंग मेरठ के आरवीसी सेंटर में होती है, जो छोटी उम्र से शुरू होकर 36 हफ्तों तक चलती है। सेना में शामिल होने के बाद ये कुत्ते 7-8 साल तक सेवा देते हैं, जिसके बाद इन्हें रिटायर कर दिया जाता है। फिलहाल में सेना में लैब्राडोर, जर्मन शेफर्ड, बेल्जियन मैलिनोइस जैसे विदेशी ब्रीड्स के साथ-साथ 2016 से चिप्पीपराई, कोम्बाई और राजापलयम जैसे स्वदेशी ब्रीड के डॉग्स भी शामिल हैं।