📍नई दिल्ली | 2 Aug, 2025, 4:25 PM
Bhairav Vs Ghatak Platoon: 26वें करगिल विजय दिवस के मौके पर आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने एक बड़ा ऐलान किया कि अब सेना में एक नई घातक और तेजतर्रार यूनिट तैयार की जा रही है, जिसका नाम होगा ‘भैरव लाइट कमांडो बटालियन’ (Bhairav Light Commando Battalion)। इस ऐलान के साथ ही ये सवाल भी पूछे जाने लगे कि क्या यह नई भैरव फोर्स पुरानी “घातक प्लाटून” को खत्म कर देगी, जो हर इन्फैंट्री बटालियन का एक खास हिस्सा हैं। लेकिन इन दोनों का मकसद दुश्मन पर तेज और असरदार हमला करना है, लेकिन दोनों की भूमिका, क्षमता और इस्तेमाल के तरीके अलग हैं। आखिर ‘घातक’ और ‘भैरव’ में क्या अंतर है? आइए जानते हैं…
Bhairav Vs Ghatak Platoon: घातक प्लाटून: हर बटालियन की सबसे खतरनाक यूनिट
घातक प्लाटून भारतीय सेना की हर इंफैंट्री बटालियन में मौजूद एक विशेष कमांडो टुकड़ी होती है। घातक प्लाटून की सबसे बड़ी खासियत है इनकी तेजी और चपलता। ये हथियारों के साथ-साथ बिना हथियारों के भी लड़ने में माहिर हैं। इन जवानों को बहुत खास मिशनों के लिए तैयार किया जाता है। इनका काम होता है दुश्मन के इलाके में चुपके से जाकर हमला करना, दुश्मन की डिफेंस लाइन को तोड़ना, आतंकवादियों से लड़ना, या सर्जिकल स्ट्राइक जैसे बड़े ऑपरेशन करना।
🚨 #BigStatement by COAS General Upendra Dwivedi on the 26th #KargilVijayDiwas 🇮🇳
🗣️ “We are rapidly advancing as a transformed, modern, and future-ready force.
👉 Under this, we are raising ‘RUDRA’ All Arms Brigades – integrated combat formations including Infantry, Mechanised… pic.twitter.com/HimtNXwgML— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) July 26, 2025
हर बटालियन में करीब 20–30 जवानों की यह टीम बनाई जाती है, जिसमें सिर्फ सबसे फुर्तीले, ताकतवर और प्रशिक्षित जवानों को ही जगह मिलती है। इन सैनिकों को हथियारों से लेकर हाथ से लड़ाई (जैसे कराटे, जूडो, मार्शल आर्ट) तक की ट्रेनिंग दी जाती है। इन जवानों को स्नाइपर राइफल, मशीन गन और बम जैसे हथियार चलाने में महारत हासिल होती है। इन्हें ऊंचे पहाड़ी इलाकों, जंगलों, नदियों और बर्फीली जगहों पर ऑपरेशन करने की भी विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। इसके अलावा इन्हें पैरा जंपिंग जैसे मुश्किल मिशनों के लिए भी तैयार किया जाता है।
Bhairav Vs Ghatak Platoon: घातक प्लाटून का इतिहास
घातक प्लाटून की शुरुआत 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद हुई थी। उस समय सेना ने फैसला किया कि हर इन्फैंट्री बटालियन में एक खास कमांडो प्लाटून होनी चाहिए। इस प्लाटून में सबसे ताकतवर और तेज-तर्रार जवान चुने जाते थे। इनका काम था दुश्मन पर अचानक हमला करना, उनके डिफेंस को तोड़ना और गुप्त मिशनों को पूरा करना। समय के साथ इस कमांडो प्लाटून का नाम बदलकर “घातक प्लाटून” कर दिया गया। साथ ही, इनके प्रशिक्षण को और सख्त और खास बनाया गया ताकि ये और भी खतरनाक और कारगर बन सकें। आज घातक प्लाटून हर बटालियन की रीढ़ हैं और सेना के सबसे मुश्किल मिशनों में हिस्सा लेते हैं।
घातक प्लाटून की उपलब्धियां
घातक प्लाटून ने कई बड़े और मुश्किल मिशनों में अपनी ताकत दिखाई है। 1999 के कारगिल युद्ध में ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव भी 18 ग्रेनेडियर्स की घातक प्लाटून में थे। उनकी टीम ने टाइगर हिल पर कब्जा करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक में घातक कमांडो ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर सटीक और खतरनाक हमले किए। 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुई झड़प में भी घातक प्लाटून के जवानों ने नजदीकी लड़ाई में अपनी ताकत दिखाई। ये जवान हर बार अपनी हिम्मत और कौशल से सेना का नाम रोशन करते हैं।

घातक प्लाटून की खूबियां
घातक प्लाटून का चुनाव पूरी तरह बटालियन के भीतर से होता है। इसमें शामिल होने वाले सैनिक अपनी मर्जी से नामांकन देते हैं, फिर उनमें से सबसे बेहतर को चुना जाता है। यह गर्व की बात मानी जाती है क्योंकि यह यूनिट बटालियन की ‘सबसे घातक’ ताकत होती है। घातक प्लाटून का नेतृत्व आमतौर पर एक युवा अफसर करता है, जो कैप्टन या मेजर रैंक का होता है। इनके साथ जेसीओ, हवलदार और नायक रैंक के जवान होते हैं।
घातक प्लाटून को असली युद्ध के हालात के लिए तैयार किया जाता है। ये न सिर्फ हाथ से लड़ाई में माहिर होते हैं, बल्कि हथियारों का भी बेहतरीन इस्तेमाल जानते हैं। इन्हें यह भी सिखाया जाता है कि कैसे सीमित संसाधनों में जीना है, मैप पढ़ना है और दुर्गम जगहों में टिके रहना है।
क्यों बनाई जा रही है भैरव लाइट कमांडो बटालियन?
2025 में करगिल विजय दिवस के मौके पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने घोषणा की कि अब सेना “भैरव लाइट कमांडो बटालियन” नाम से एक नई विशेष कमांडो यूनिट तैयार कर रही है। इसका उद्देश्य यह है कि बॉर्डर के नजदीक दुश्मन को चौंका देने वाली कार्रवाई की जा सके।
भैरव यूनिट्स को ‘लाइट कमांडो बटालियन’ इसलिए कहा गया है क्योंकि ये सामान्य स्पेशल फोर्सेस (जैसे पैरा स्पेशल फोर्सेज) की तरह भारी हथियारों से लैस नहीं होंगी, लेकिन फिर भी ये बेहद फुर्तीली, घातक और आधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस होंगी। इन यूनिट्स में ड्रोन्स, स्मार्ट गियर और लेटेस्ट कम्यूनिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा।
सेना प्रमुख के मुताबिक, भैरव यूनिट्स को खासतौर पर बॉर्डर इलाकों में घात लगा कर दुश्मन को चौंकाने वाली कार्रवाई करने के लिए तैयार किया गया है।
भैरव फोर्स की हर बटालियन में करीब 620 जवान
भैरव फोर्स में 40 से 50 इन्फैंट्री यूनिट्स होंगी, जिन्हें धीरे-धीरे बनाया जाएगा। हर बटालियन में करीब 620 जवान होंगे। ये यूनिट्स ड्रोन, नाइट विजन डिवाइस, एडवांस हथियार, GPS, और कम्युनिकेशन सिस्टम से लैस होंगी, जो इन्हें आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करेंगे। भैरव फोर्स का काम होगा खास मिशनों में दुश्मन को नुकसान पहुंचाना। लेकिन यह स्पेशल फोर्सेज, जैसे पैरा एसएफ, की तरह बड़े और रणनीतिक मिशनों के लिए नहीं होगी। यह सीमा पर त्वरित और छोटे हमलों के लिए बनी हैं। कुछ भैरव यूनिट्स पहले ही बन चुकी हैं और सीमा पर तैनात होने के लिए तैयार हैं।
Bhairav Vs Ghatak Platoon: घातक और भैरव में क्या है अंतर?
घातक प्लाटून और भैरव यूनिट्स दोनों ही भारतीय सेना की आक्रामक रणनीति का हिस्सा हैं, लेकिन इनके काम करने के तरीके और स्केल में फर्क है। घातक प्लाटून बटालियन स्तर की यूनिट है, यानी हर इंफैंट्री बटालियन के पास खुद की घातक टीम होती है। ये सीमित संख्या में होते हैं और उनका इस्तेमाल बटालियन की जरूरतों के अनुसार होता है।
वहीं, भैरव यूनिट्स ब्रिगेड या उससे ऊपर के स्तर की स्केमेटिक फोर्स हैं। इन्हें अलग से खड़ा किया जा रहा है, और यह पूरी तरह एक नई कमांडो ब्रिगेड जैसी होंगी। घातक प्लाटून पारंपरिक युद्ध और आतंकवाद विरोधी अभियानों में अधिक इस्तेमाल होती हैं, जबकि भैरव फोर्स को खासतौर पर सीमावर्ती इलाकों में छोटे लेकिन सटीक हमले करने के लिए तैनात किया जाएगा। घातक फोर्स में शामिल सैनिक बटालियन के भीतर से ही चुने जाते हैं, जबकि भैरव बटालियन के लिए नए तरीके से चयन और प्रशिक्षण की योजना बनाई जा रही है। वहीं, घातक प्लाटून ज्यादातर जमीनी ऑपरेशंस को अंजाम देती है, जबकि भैरव यूनिट्स को डिजिटल युद्ध, ड्रोंस, निगरानी और फास्ट पेट्रोलिंग जैसे कामों के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है।
क्या भैरव के बाद खत्म हो जाएगी घातक प्लाटून?
यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कई लोगों को लगता है कि जब भैरव जैसी नई फोर्स बन रही है तो घातक प्लाटून की जरूरत नहीं रह जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं है। सेना के सूत्रों के अनुसार, घातक प्लाटून बटालियन के सबसे करीबी और भरोसेमंद फोर्स मानी जाती है। घातक प्लाटून बटालियन के अंदर होती है और उसका दायरा सीमित होता है। उनका इस्तेमाल तुरंत और लोकल स्तर पर होता है।
दूसरी ओर, भैरव यूनिट्स को रणनीतिक स्तर पर तैनात किया जाएगा। दोनों की भूमिका अलग-अलग है और दोनों ही एक-दूसरे को पूरक बनाती हैं। सूत्रों ने बताया कि भारतीय सेना का उद्देश्य अपनी युद्ध क्षमता को और मजबूत करना है, न कि मौजूदा यूनिट्स को खत्म करना। भैरव लाइट कमांडो बटालियन को तैयार करना एक अतिरिक्त कदम है, जो सेना को और अधिक फुर्तीला बनाएगा।
नहीं, सेना ने साफ किया है कि भैरव, स्पेशल फोर्स जैसी नहीं होंगी, जैसे पैरा स्पेशल फोर्स या गरुड़ कमांडो होती हैं। लेकिन इनकी ट्रेनिंग और हथियार उन्हें एक ‘मिनी स्पेशल फोर्स’ जैसा बनाएंगे। भैरव एक स्टैंड-अलोन यूनिट होगी, जिसे जरूरत के हिसाब से सीमावर्ती क्षेत्रों या टारगेट ऑपरेशन में तैनात किया जाएगा। सूत्रों ने बताया कि नई भैरव लाइट कमांडो बटालियनें भारतीय सेना की पहले से मौजूद 10 पैरा स्पेशल फोर्स और 5 पैरा (एयरबोर्न) बटालियनों के अलावा होंगी। ये पुरानी यूनिट्स खास ट्रेनिंग और आधुनिक हथियारों से लैस हैं, और दुश्मन की सीमा के अंदर गुप्त ऑपरेशनों के लिए बनाई गई हैं।
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद का मानना है, “घातक प्लाटून भारतीय सेना की रीढ़ हैं और उनकी भूमिका को कम नहीं किया जा सकता। भैरव फोर्स का गठन सेना की रणनीति को और मजबूती देगा, ताकि वह विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना कर सके। घातक प्लाटून नजदीकी लड़ाई और बटालियन-स्तर के मिशनों में माहिर हैं, जबकि भैरव फोर्स बड़े पैमाने पर हल्के और तेज हमलों के लिए है।”
जरूरी है ऐसी फोर्सेज का फॉर्मेशन
आज के जमाने के युद्ध पहले जैसे नहीं रहे। अब लड़ाई सिर्फ़ बंदूक और सैनिकों से नहीं होती, बल्कि इसमें टेक्नोलॉजी और ड्रोन से होती है, जिसमें तुरंत कार्रवाई की जरूरत होती है। चीन अपनी सेना को मार्शल आर्ट जैसी फुर्तीली लड़ाई की ट्रेनिंग दे रहा है और तिब्बत जैसे ऊंचे इलाकों में खास सैनिक तैनात कर रहा है। वहीं ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने कई सबक सीखें हैं। जिसमें भारतीय सेना की रिस्ट्रक्चरिंग किए जाने की जरूरत महसूस हुई। ऐसे माहौल में भारत को भी अपनी सेना को हर मोर्चे के लिए तैयार रखना जरूरी है, चाहे वो जमीनी लड़ाई हो, सीमाओं की निगरानी हो या अचानक जवाब देने की जरूरत। घातक फोर्स जहां जरूरत पड़ने पर बटालियन की पहली पंक्ति में होते हैं, वहीं भैरव भारत की नई युद्ध शैली की नींव रखेंगी, जहां टेक्नोलॉजी और रणनीतिक चौकसी सबसे बड़ी ताकत होगी।