📍नई दिल्ली | 29 Aug, 2025, 2:07 PM
ECHS Scheme for Disabled Cadets: ट्रेनिंग के दौरान घायल होकर स्थायी विकलांगता का शिकार होने वाले भारतीय सेना के अफसर कैडेट्स के लिए सरकार ने बड़ा राहत देने वाला कदम उठाया गया है। रक्षा मंत्रालय ने आदेश जारी कर कहा है कि ऐसे कैडेट्स को एक्स-सर्विसमेन कॉन्ट्रिब्यूटरी हेल्थ स्कीम (ECHS) के तहत चिकित्सा सुविधाएं दी जाएंगी। यह फैसला उस समय आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लेकर सरकार से पूछा था कि इन कैडेट्स के लिए बेहतर देखभाल, मुआवजा और बीमा की व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही।
यह कदम ऐसे समय में आया है जब कोर्ट और मीडिया रिपोर्ट्स ने बार-बार इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान खींचा। दरअसल, अब तक ट्रेनिंग के दौरान विकलांग हुए कैडेट्स को एक्स-सर्विसमेन का दर्जा नहीं दिया जाता था। नतीजतन, वे ECHS जैसी योजनाओं के दायरे से बाहर थे और केवल एक मामूली से एक्स-ग्रेशिया रकम पर निर्भर थे।
ECHS Scheme for Disabled Cadets: क्या है रक्षा मंत्रालय का आदेश
रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी आदेश में कहा गया है कि अब ऐसे कैडेट्स जिन्हें ट्रेनिंग के दौरान मेडिकल ग्राउंड पर बाहर कर दिया जाता है, उन्हें ECHS की सुविधाओं का लाभ मिलेगा। इसके तहत वे ECHS की सदस्यता ले सकेंगे, आउट पेशेंट और इन पेशेंट दोनों तरह की सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे और एम्पैनल्ड अस्पतालों में कैशलेस इलाज करा सकेंगे।
मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि कैडेट्स से किसी तरह की एकमुश्त सदस्यता फीस नहीं ली जाएगी। वर्तमान में एक्स-सर्विसमेन अधिकारियों के लिए यह फीस 1.20 लाख रुपये है, लेकिन कैडेट्स को इससे छूट दी गई है।
ECHS Scheme for Disabled Cadets: सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस मामले पर सुनवाई की थी। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की बेंच ने सरकार से कहा था कि इस मामले को मानवीय दृष्टिकोण से हल किया जाए। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अब तक करीब 500 कैडेट्स अलग-अलग स्तर की विकलांगता के शिकार हो चुके हैं। अकेले नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) से ही 2021 से जुलाई 2025 के बीच 20 कैडेट्स मेडिकल कारणों से बाहर कर दिए गए।
कोर्ट ने इस तरफ भी ध्यान दिलाया कि फिलहाल इन कैडेट्स को केवल 40,000 रुपये तक की मासिक सहायता मिलती है, जबकि उनका औसतन मेडिकल खर्च ही 50,000 रुपये से ऊपर है।
जस्टिस नागरत्ना ने एक मीडिया रिपोर्ट पर संज्ञान लिया और इसे चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अनुमति से स्वतः संज्ञान याचिका के रूप में दर्ज किया गया।
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने चंडीगढ़ के कैडेट विक्रांत राज का भी जिक्र किया। विक्रांत एनडीए में ट्रेनिंग के दौरान सिर पर गंभीर चोट लगने से ब्रेन हैमरेज का शिकार हुए और छह महीने तक कोमा में रहे। आज वे सामान्य कामकाज करने में असमर्थ हैं। उनकी मां ने बताया कि फिजियोथेरेपी और प्राइवेट हॉस्पिटल के इलाज का खर्च इतना ज्यादा है कि परिवार पर भारी बोझ आ गया है। कोर्ट ने इस मामले में सरकार से विशेष जवाब मांगा है।
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने आश्वासन दिया कि सरकार 4 सितंबर तक इस मुद्दे पर जवाब दाखिल करेगी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि प्रभावित कैडेट्स की ओर से आने वाले सुझाव लिखित रूप में सरकार तक पहुंचाए जाएं।
कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या इन कैडेट्स को बीमा कवर दिया जा सकता है, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में उनके परिवार को सुरक्षा मिल सके। साथ ही यह भी जांचने को कहा गया कि क्या इन्हें ‘राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज एक्ट, 2016’ के तहत अधिकार मिल सकते हैं।
कोर्ट ने सुनवाई में कहा कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि जो युवा देश की रक्षा के लिए खुद को तैयार करने के दौरान घायल या विकलांग हो जाते हैं, उन्हें अनदेखा न किया जाए। अदालत ने जोर दिया कि इन्हें स्वास्थ्य बीमा, पर्याप्त मुआवजा और पुनर्वास प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं मिलनी ही चाहिए।