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L-70 FCR Drone Detector: भारतीय सेना की 50 साल पुरानी ये एतिहासिक गन बनेगी और दमदार, अब ‘सूंघ-सूंघ’ कर माइक्रो और स्वॉर्म ड्रोनों का करेगी विनाश

अभी L-70 गन पुराने रडार सिस्टम जैसे अपग्रेडेड सुपर फ्लेडरमस और फ्लाई कैचर के साथ काम करती हैं, जो फाइटर जेट और हेलिकॉप्टर डिटेक्शन में सक्षम हैं...

सेना पहले विदेशी रडार खरीदने की योजना बना रही थी, लेकिन आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत अब स्वदेशी कंपनियों से रडार खरीदे जाएंगे। रक्षा मंत्रालय की पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट में एयर डिफेंस इक्विपमेंट्स शामिल हैं, जिसके कारण विदेशी खरीद पर रोक लग गई है...
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📍नई दिल्ली | 6 Aug, 2025, 7:56 PM

L-70 FCR Drone Detector: 7 से 10 मई के दौरान ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तानी ड्रोनों को मार गिराने वाली 70 के दशक की L-70 एयर डिफेंस गन अब और घातक बनने जा रही है। उस दौरान इन गनों ने अपनी सटीक निशानेबाजी से अपनी क्षमता साबित की थी। रक्षा मंत्रालय ने इन गनों के लिए एयर डिफेंस नए फायर कंट्रोल रडार-ड्रोन डिटेक्टर (ADFCR-DD) खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जिसके बाद एल-70 गन छोटे से छोटे ड्रोन को खोजने, पहचानने और मार गिराने में समक्षम होंगी।

L-70 AD Guns: ऑपरेशन सिंदूर में तहलका मचाने वाली L-70 गनें हुईं सॉफ्ट पावर से लैस, अब नहीं बच पाएंगे दुश्मन के ड्रोन

L-70 FCR Drone Detector: ऑपरेशन सिंदूर में L-70 गनों की ताकत

मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत के सैन्य ठिकानों और नागरिक इलाकों में ड्रोनों और स्वार्म ड्रोन्स के जरिए निगरानी और हमले की कोशिश की। पाकिस्तान का मकसद खुफिया जानकारी जुटाना और एयर डिफेंस को नुकसान पहुंचाना था। लेकिन भारतीय सेना के एयर डिफेंस नेटवर्क, जिसमें L-70 गन, रूसी Zu-23mm और शिलका गन शामिल थीं, उन्होंने एक-एक कर सभी पाकिस्तानी ड्रोन को निशाना बनाया। इन गनों का हाई रेट ऑफ फायर और सटीक टारगेटिंग ने दुश्मन की हर कोशिश नाकाम कर दी।

L-70 FCR Drone Detector: 1970 के दशक में खरीदी थी स्वीडन से

40mm सिंगल बैरल एंटी-एयरक्राफ्ट L-70 गनें 1970 के दशक में स्वीडन से खरीदी गई थीं। ये अपनी जबरदस्त फायरिंग कैपेसिटी के लिए जानी जाती हैं। यह प्रति मिनट 300 से ज्यादा गोले दाग सकती हैं, जिनकी प्रोजेक्टाइल स्पीड 1000 मीटर प्रति सेकंड है। वहीं, इसकी मारक क्षमता 3-4 किलोमीटर तक है। हाल के वर्षों में इसे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, थर्मल इमेजर और एयर डिफेंस नेटवर्क से जोड़ा गया है, जिससे यह और घातक हो गई है।

L-70 FCR Drone Detector: छोटे ड्रोनों का है खतरा

अभी L-70 गन पुराने रडार सिस्टम जैसे अपग्रेडेड सुपर फ्लेडरमस और फ्लाई कैचर के साथ काम करती हैं, जो फाइटर जेट और हेलिकॉप्टर डिटेक्शन में सक्षम हैं। पिछले कुछ सालों में हवाई खतरों का स्वरूप बदल गया है। पहले दुश्मन के लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर मुख्य खतरा थे, लेकिन अब माइक्रो ड्रोन, स्वॉर्म ड्रोन और लो-आरसीएस UAV नए खतरे बनकर उभरे हैं। ये ड्रोन छोटे आकार, कम रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) और कम इन्फ्रारेड सिग्नेचर के कारण आसानी से पकड़ में नहीं आते। रूस-यूक्रेन, इजरायल-हमास और ऑपरेशन सिंदूर में इन ड्रोनों का इस्तेमाल निगरानी और हमले के लिए देखा गया है।

L-70 FCR Drone Detector: Indian Army’s 50-Year-Old Iconic Gun to Get Deadly Upgrade, Now Capable of Detecting & Destroying Micro and Swarm Drones
Photo: Indian Army

ऑपरेशन सिंदूर से सबक लेते हुए भारतीय सेना को अपने एयर डिफेंस को और मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई। L-70 गनें प्रभावी तो हैं, लेकिन उनके पुराने रडार सिस्टम छोटे ड्रोनों को पकड़ने में पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। इसलिए, रक्षा मंत्रालय ने अब नए फायर कंट्रोल रडार की खरीद का फैसला किया है, जो विशेष रूप से ड्रोनों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किए गए हैं। सेना को ऐसा फायर कंट्रोल रडार चाहिए, जो इन छोटे और कम सिग्नेचर वाले ड्रोनों को कहीं भी और कभी भी ट्रैक कर सके।

L-70 FCR Drone Detector: फायर कंट्रोल रडार में क्या है खास?

रक्षा मंत्रालय ने अगस्त 2025 की शुरुआत में एक रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (RFI) जारी किया है, जिसमें नए फायर कंट्रोल रडार-ड्रोन डिटेक्टर की जरूरतों को बताया गया। सेना ने अपनी जरूरत के मुताबिक साफ किया है कि नया फायर कंट्रोल रडार हल्का होना चाहिए और इसे एक 4×4 वाहन पर आसानी से माउंट किया जा सके। यह रडार कम से कम दो L-70 गनों को एक साथ कंट्रोल करने में सक्षम हो। इसमें 3D एक्टिव ऐरे तकनीक पर आधारित सर्च रडार हो, जो एक समय में 25 लक्ष्यों को ट्रैक कर सके। ट्रैक रडार की रेंज न्यूनतम 12 किलोमीटर होनी चाहिए और यह 4,500 मीटर की ऊंचाई तक आसानी से काम कर सके।

सिस्टम में इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल फायर कंट्रोल सिस्टम, लेजर रेंज फाइंडर और Identification Friend or Foe (IFF) सिस्टम भी शामिल होना चाहिए, ताकि अपने और दुश्मन के टारगेट्स में फर्क किया जा सके। यह रडार डेटा को वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (VSHORADS) और शोल्डर-लॉन्च्ड मिसाइल सिस्टम तक ट्रांसमिट करने में सक्षम हो। इसके अलावा, यह सिस्टम सभी तरह के इलाकों चाहे वह रेगिस्तान हो, हाई एल्टीट्यूड क्षेत्र, तटीय इलाका या मैदानी क्षेत्र में बिना किसी रुकावट के इस्तेमाल किया जा सके।

स्वदेशी रडार पर फोकस

सेना पहले विदेशी रडार खरीदने की योजना बना रही थी, लेकिन आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत अब स्वदेशी कंपनियों से रडार खरीदे जाएंगे। रक्षा मंत्रालय की पॉजिटिव इंडिजिनाइजेशन लिस्ट में एयर डिफेंस इक्विपमेंट्स शामिल हैं, जिसके कारण विदेशी खरीद पर रोक लग गई है।

सेना के पास करीब 800 L-70 गन

बता दें कि वर्तमान में सेना के पास करीब 800 L-70 गन हैं, जो लद्दाख से लेकर पूर्वोत्तर और पश्चिमी मोर्चे तक तैनात हैं। इनके पुराने रडार, जैसे सुपर फ्लेडरमस और फ्लाई कैचर, 1970 और 1980 के दशक के हैं। सुपर फ्लेडरमस को 1990 के दशक में अपग्रेड किया गया था, लेकिन अब ये छोटे ड्रोनों को पकड़ने में कम असरदार हैं। नए रडार इन तोपों को आधुनिक खतरों से निपटने की नई ताकत देंगे।

बीईएल ने L-70 को बनाया मॉडर्न

पिछले कुछ सालों में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने L-70 गनों को मॉडर्न बनाया है। पुराने मैकेनिकल सिस्टम को इलेक्ट्रिक ड्राइव से बदला गया, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और फायर कंट्रोल कंप्यूटर जोड़े गए। ये तोपें अब एयर डिफेंस और एंटी-ड्रोन नेटवर्क से जुड़ी हैं, जिससे इन्हें रीयल-टाइम जानकारी मिलती है। इससे तोपें तेजी से लक्ष्य पर निशाना साध सकती हैं। ऑपरेशन सिंदूर में इन अपग्रेड्स ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

News Desk
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