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5 years of Galwan Clash: गलवान हिंसा के पांच साल बाद भारत के लिए क्या हैं 5 सबसे बड़े सबक? दो फ्रंट वॉर के लिए रहना होगा तैयार!

गलवान की घटना ने भारत को सिखाया कि सीमा पर सतर्कता कभी कम नहीं होनी चाहिए। 2020 से पहले, कई लोग मानते थे कि भारत और चीन के बीच छोटी-मोटी सीमा विवाद तो होते रहते हैं, लेकिन बड़ी लड़ाई की संभावना कम है। लेकिन गलवान ने दिखाया कि चीनी सेना अचानक से अपनी पोजीशन मजबूत कर सकती है। इसलिए, भारतीय सेना ने LAC पर अपनी तैनाती बढ़ाई और नई टेक्नोलॉजी जैसे ड्रोन और सैटेलाइट का इस्तेमाल शुरू किया ताकि दुश्मन की हरकतों पर नजर रखी जा सके...
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📍नई दिल्ली | 16 Jun, 2025, 12:57 PM

5 years of Galwan Clash: 15-16 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सटी गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुई हिंसक झड़प को आज पांच साल पूरे हो गए हैं। पूर्वी लद्दाख के गलवान में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प में कर्नल संतोष बाबू समेत 20 भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गंवाई, जबकि चीनी सेना के 40 से भी अधिक जवान मारे गए। हालांकि आधिकारिक तौर पर चीन ने इसकी संख्या नहीं बताई। लेकिन गलवान में हुए खूनी संघर्ष ने देश की सुरक्षा नीति, सामरिक दृष्टिकोण और पड़ोसी देशों को लेकर सोच को बदलने को मजबूर कर दिया।

5 years of Galwan Clash: क्या हुआ था गलवान में?

पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी एक ऐसी जगह है, जहां भारत और चीन की सीमा (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल या LAC) को लेकर हमेशा विवाद रहा है। भारत और चीन के बीच सीमा पर तनातनी कोई नई बात नहीं है। 2013 के बाद से ही ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। 2020 की शुरुआत में, चीनी सैनिकों ने इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई और निर्माण कार्य शुरू किए। एलएसी से सटे इलाकों में ये निर्माण कार्य भारत के लिए चिंता का कारण बने। दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन 15 जून की रात बातचीत के दौरान झड़प हो गई। लेकिन गलवान में हुई इस झड़प में लाठी-डंडों और पत्थरों का इस्तेमाल हुआ, क्योंकि दोनों पक्षों के पास हथियारों का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं थी। फिर भी, इस हिंसा में कई सैनिक घायल हुए और 20 भारतीय जवान शहीद हो गए। एलएसी पर पहली बार 45 सालों में सीमा पर सैनिकों की मौत हुई। 1996 और 2005 के समझौतों के तहत, दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि सीमा पर हथियारों का उपयोग नहीं होगा, लेकिन गलवान में चीनी सैनिकों ने लोहे की छड़ों, कील लगे डंडों और कांटेदार तारों से हमला किया।

इस घटना के बाद दोनों देशों की सेनाओं ने उस इलाके में अपने सैनिक और हथियारों की तैनाती बढ़ा दी। गलवान के बाद LAC पर गश्त और निगरानी बढ़ाई गई, और दोनों देशों के बीच कई बार बैठकें हुईं ताकि हालात पर काबू रखा जा सके।

चीन का यह व्यवहार अचानक नहीं था। 1959 में तिब्बत को हथियाने के बाद से चीन धीरे-धीरे इस क्षेत्र में रणनीतिक रूप से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। 1980 के दशक से वह LAC के आसपास सड़कें, हवाई पट्टियां और निर्माण कर रहा है। साथ ही वह डेमोग्राफिक स्ट्रक्चर भी बदल रहा है और तिब्बत में हान चीनी आबादी बसाकर स्थानीय पहचान को कमजोर कर रहा है।

चीन की मंशा साफ है कि भारत को सीमाओं पर उलझाकर, अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करना। गलवान से पहले डोकलाम (2017) और उससे पहले 2013 में देपसांग और चुमार में भी ऐसी ही घटनाएं हुईं थीं। लेकिन गलवान एक चेतावनी थी, एक ऐसा अलार्म जिसने भारत को झकझोर कर रख दिया।

पहला सबक: सीमा पर सतर्कता जरूरी

गलवान की घटना ने भारत को सिखाया कि सीमा पर सतर्कता कभी कम नहीं होनी चाहिए। 2020 से पहले, कई लोग मानते थे कि भारत और चीन के बीच छोटी-मोटी सीमा विवाद तो होते रहते हैं, लेकिन बड़ी लड़ाई की संभावना कम है। लेकिन गलवान ने दिखाया कि चीनी सेना अचानक से अपनी पोजीशन मजबूत कर सकती है। इसलिए, भारतीय सेना ने LAC पर अपनी तैनाती बढ़ाई और नई टेक्नोलॉजी जैसे ड्रोन और सैटेलाइट का इस्तेमाल शुरू किया ताकि दुश्मन की हरकतों पर नजर रखी जा सके।

इसके अलावा, स्थानीय लोगों और चरवाहों से मिली जानकारी भी अहम साबित हुई थी। 1999 के कारगिल युद्ध की तरह, गलवान में भी शुरुआती अलर्ट चरवाहों ने ही दिया था। इसका मतलब है कि सीमा क्षेत्र में रहने वाले लोगों के साथ तालमेल बनाना जरूरी है ताकि समय रहते खतरे का पता चल सके।

दूसरा सबक: सैनिकों की ट्रेनिंग और तैयारी

गलवान में हुई झड़प से पता चला कि सैनिकों को सिर्फ हथियार चलाने की ट्रेनिंग नहीं, बल्कि हाथ से हाथ की लड़ाई (हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट) की भी तैयारी करनी होगी। उस रात सैनिकों ने बिना गोली चलाए डंडों और पत्थरों से अपनी रक्षा की। इसके बाद भारतीय सेना ने अपनी ट्रेनिंग में बदलाव किए। अब सैनिकों को ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ने और ठंड में बचे रहने की खास ट्रेनिंग दी जाती है। साथ ही, उन्हें ऐसी स्थिति से निपटने के लिए नई टैक्टिक्स भी सिखाई जा रही हैं, जहां हथियारों का इस्तेमाल सीमित हो। सेना ने हाई-ऑल्टीट्यूड ट्रेनिंग सेंटर भी शुरू किए, जहां सैनिकों को ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ने की प्रैक्टिस कराई जाती है। इसके अलावा, सेना ने अपने कम्युनिकेशन सिस्टम को अपग्रेड किया ताकि दुश्मन की हरकतों की तुरंत जानकारी मिल सके।

तीसरा सबक: डिप्लोमेसी और सैन्य शक्ति का संतुलन

गलवान के बाद भारत ने समझा कि डिप्लोमेसी (राजनयिक बातचीत) और सैन्य ताकत का संतुलन जरूरी है। झड़प के बाद भारत ने चीन के साथ बातचीत शुरू की, लेकिन साथ ही अपनी सेना और हथियारों को मजबूत किया। भारत ने अपने बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर (सीमा ढांचा) को बेहतर किया, जैसे सड़कें, पुल और हेलीपैड बनाए गए, ताकि सैनिकों को जल्दी मदद पहुंचाई जा सके। साथ ही, भारत ने रूस, अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों से हथियार और टेक्नोलॉजी खरीदी, और अपनी सैन्य क्षमता में इजाफा किया। गलवान हिंसा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीन की आक्रामकता को सामने लाने में मदद की। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपियन यूनियन ने भारत का समर्थन किया। इसके बाद क्वाड (QUAD) समूह की भूमिका भी मजबूत हुई। भारत ने सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर अपनी स्थिति को स्पष्ट किया, हम शांति चाहते हैं, लेकिन कमजोरी नहीं दिखाएंगे।

चौथा सबक: जनता का समर्थन और जागरूकता

गलवान घटना पूरे देश को झकझोरने वाली थी। लोगों ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी और सेना के लिए समर्थन जताया। सोशल मीडिया पर गलवान में सैनिकों की बहादुरी की कहानियां ट्रेंड हुईं, और लोग सैनिकों की बहादुरी की कहानियां शेयर करने लगे। यह घटना ने देशवासियों को यह सिखाया कि सीमा पर क्या हो रहा है, इसकी जानकारी रखना जरूरी है। स्कूलों और कॉलेजों में अब बच्चों को सीमा सुरक्षा और सैनिकों के बलिदान के बारे में बताया जाता है ताकि वे देश के प्रति जिम्मेदारी समझें।

पांचवां सबक: स्वदेशी हथियारों पर जोर

गलवान ने भारत को यह एहसास दिलाया कि विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करनी होगी। इसके बाद भारत ने अपनी डिफेंस इंडस्ट्री को मजबूत करने का फैसला लिया। अब ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम के तहत राइफल्स, ड्रोन और बुलेटप्रूफ जैकेट्स जैसे हथियार बनाए जा रहे हैं। इससे न सिर्फ सेना की ताकत बढ़ेगी, बल्कि देश की इकोनॉमी को भी फायदा होगा।

गलवान के बाद भारत ने LAC पर इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण तेज हुआ। सड़कों और पुलों को अपग्रेड किया गया, बॉर्डर पोस्ट्स को मजबूत किया गया और फॉरवर्ड बेस को एक्टिव किया गया। अब भारत सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि रणनीतिक तैयारी भी करता है।

इसके साथ ही सरकार ने सेना को निर्णय लेने की अधिक स्वतंत्रता दी। भारतीय जवान अब उत्तरी लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर लंबे समय तक तैनात रह सकते हैं। रणनीतिक दृष्टिकोण से यह बदलाव अहम था।

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पाकिस्तान और चीन की साजिशें

पहले गलवान और अब ऑपरेशन सिंदूर ने साबित किया कि चीन और पाकिस्तान की मिलीभगत गहरी होती जा रही है। गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान ने चीन को सैन्य सहूलियतें दी हैं, और चीनी सेना कई पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को ट्रेनिंग भी मुहैया करवा रही है। ऐसे में भारत के लिए दो फ्रंट वाला खतरा और गंभीर हो जाता है। गलवान के बाद भारत ने पश्चिमी मोर्चे यानी पाकिस्तान सीमा पर भी फोकस किया। अब भारत एक साथ दोनों मोर्चों पूर्वी लद्दाख और जम्मू-कश्मीर पर रणनीतिक तौर पर काम कर रहा है।

हरेंद्र चौधरीhttp://harendra@rakshasamachar.com
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवादों, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। 📍 Location: New Delhi, in 🎯 Area of Expertise: Defence, Diplomacy, National Security
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