back to top
HomeGeopoliticsTaliban Internal Rift: तालिबान में आंतरिक कलह गहराई; पिछले 40 दिनों से...

Taliban Internal Rift: तालिबान में आंतरिक कलह गहराई; पिछले 40 दिनों से ‘लापता’ है सिराजुद्दीन हक्कानी, पाकिस्तान पर उठ रहीं उंगलियां

Read Time 0.7 mintue

📍नई दिल्ली | 5 Mar, 2025, 9:06 PM

Taliban Internal Rift: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार में अंदरूनी कलह तेजी से बढ़ती जा रही है। तालिबान सरकार के आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी के 40 दिनों से लापता रहने की खबरें सामने आ रही हैं। सिराजुद्दीन हक्कानी 22 जनवरी को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए रवाना हुए थे और अब तक अफगानिस्तान नहीं लौटे हैं। उनकी गैरमौजूदगी के चलते इस्लामी शासन के भीतर गहरे मतभेदों की खबरें तेज हो गई हैं।

Taliban Internal Rift: Sirajuddin Haqqani 'Missing' for 40 Days, Pakistan's Role Under Question

Taliban Internal Rift: स्तानिकजई भी दुबई में

सूत्रों के मुताबिक, हक्कानी और तालिबान सुप्रीम लीडर हैबतुल्लाह अखुंदजादा के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है। 20 जनवरी को तालिबान के उप-विदेश मंत्री अब्बास स्तानिकजई ने सार्वजनिक तौर पर अखुंदजादा की नीतियों की आलोचना की थी, जिससे अंदरूनी विवाद खुलकर सामने आ गया था। जिसके बाद हैबतुल्लाह अखुंदजादा ने स्तानिकजई की गिरफ्तारी के आदेश जारी कर दिए, जिसके बाद उन्हें दुबई भागना पड़ा।

Taliban Internal Rift: तालिबान में दो धड़े – कंधार गुट बनाम हक्कानी नेटवर्क

सूत्रों के मुताबिक, सिराजुद्दीन हक्कानी की यह गैरमौजूदगी केवल एक विदेश यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि तालिबान के भीतर उभरते गंभीर सत्ता संघर्ष का संकेत साफ नजर आ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि कंधार गुट और हक्कानी नेटवर्क के बीच तनाव इन दिनों चरम पर है। तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्ला अखुंदजादा की अगुवाई वाला कंधार गुट पाकिस्तान के प्रभाव के खिलाफ है, जबकि हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान का करीबी सहयोगी माना जाता है। वहीं, स्तानिकजई का यह बयान ऐसे समय आया, जब हक्कानी पाकिस्तान समर्थित समूह के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सिराजुद्दीन हक्कानी की विदेश यात्रा भी पाकिस्तान के समर्थन से हुई थी, जिससे कंधार गुट नाराज है।

Taliban Internal Rift: कंधार से काबुल पहुंचे भारी संख्या में लड़ाके

तालिबान की अंदरूनी फूट तब और गहरी हो गई, जब अखुंदजादा ने काबुल के कई महत्वपूर्ण इलाकों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अपने वफादार लड़ाकों को तैनात कर दिया। इनमें बाला हिसार किला और काबुल इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे प्रमुख इलाके शामिल हैं, जो पहले हक्कानी नेटवर्क के निगरानी में थे।

Taliban-India Relations: क्या अफगानिस्तान में फिर से खुलेगा भारतीय दूतावास? तालिबान संग रिश्ते सुधारने की कूटनीतिक कोशिश या मजबूरी?

सूत्रों के अनुसार, बीते एक सप्ताह में कंधार से बड़ी संख्या में तालिबानी लड़ाके काबुल पहुंचे हैं। इन लड़ाकों ने एयरपोर्ट और वहां के सुरक्षा चेकप्वाइंट्स पर तैनात हक्कानी नेटवर्क के लड़ाकों को हटा दिय। एक एयरपोर्ट कर्मचारी ने बताया कि काबुल में अब चारों तरफ हथियारों से लैस तालिबानी लड़ाके ही नजर आ रहे हैं। कंधार से आए लड़ाकों ने सुरक्षा चौकियों का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया है और अब शहर के विभिन्न हिस्सों में गश्त कर रहे हैं।

Taliban Internal Rift: हक्कानी को भगाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ?

हक्कानी नेटवर्क के पाकिस्तान से गहरे संबंध हैं और कयास लगाए जा रहे हैं कि पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में अहम भूमिका निभा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिराजुद्दीन हक्कानी की UAE और सऊदी अरब की यात्रा पाकिस्तान की सहमति से हुई थी, लेकिन इससे तालिबान के कंधार गुट में नाराजगी बढ़ गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हक्कानी लंबे समय तक अफगानिस्तान से बाहर रहते हैं, तो इससे तालिबान के भीतर सत्ता संतुलन पूरी तरह से बदल सकता है। अखुंदजादा के वफादार लड़ाकों की काबुल में तैनाती यह संकेत देती है कि कंधार गुट अब तालिबान सरकार पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

तालिबान का भविष्य अधऱ में?

सूत्रों ने बताया कि कंधार गुट के लड़ाकों के काबुल में आने के बाद अब शहर में तनाव बढ़ गया है। बाला हिसार किला और हवाई अड्डे पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। कहा जा रहा है कि तालिबान के गुटों के बीच संघर्ष और तेज हो सकता है। कंधार और काबुल के सूत्रों का कहना है कि अखुंदजादा ने यह रणनीति हक्कानी नेटवर्क की ताकत को सीमित करने के लिए बनाई है। पहले, हक्कानी नेटवर्क का इन इलाकों में प्रभाव था, लेकिन अब यह कंधार गुट के हाथों में जाता दिख रहा है।

Lt Col Habib Zahir: बेनकाब हुआ पाकिस्तान का झूठ, 2017 में जिस कर्नल के नेपाल से किडनैप का भारत पर लगाया था आरोप, क्वेटा में मारी गोली

वहीं, तालिबान के अंदर बढ़ती गुटबाजी उसके शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अफगानिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और पाकिस्तान के बढ़ते दखल से जूझ रहा है, ऐसे में तालिबान के दो बड़े गुटों के बीच सत्ता की लड़ाई देश में और अस्थिरता को जन्म दे सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सिराजुद्दीन हक्कानी अफगानिस्तान लौटते हैं या नहीं, और अगर लौटते हैं तो क्या तालिबान के भीतर यह विवाद और गहराएगा?

हरेंद्र चौधरीhttp://harendra@rakshasamachar.com
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवादों, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। 📍 Location: New Delhi, in 🎯 Area of Expertise: Defence, Diplomacy, National Security
Share on WhatsApp
Exit mobile version